रविवार, 6 अप्रैल 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना- भाग पांच

मानसिक गुलामी...
ईश्वर ने हमें पैदा किया तो साथ ही हमारे खाने की भी व्यवस्था की। इस धारणा के साथ हरी घास के मैदान में चरती भेड का चित्रण किया गया। फिर इस भेड को एक रस्सी से बंधा देखा गया और निष्कर्ष निकाला गया कि खूंटे से बंधी रस्सी से बंधी भेड उतनी दूर तक ही चर सकती है जितनी दूर तक रस्सी जाती है। यानि कल्पना करें कि अधिक से अधिक कितनी घास खाई जा सकती है तो लगता कि एक गोल घेरे जितनी घास जिसका व्यास रस्सी के बराबर हो। यहां फिर से पूर्वनियतता धमकती है। यानि खूंटा ईश्वर ने लगाया, रस्सी उसने दी और कितना खा सकते हो इसकी आजादी भी। यहां आजादी है लेकिन रस्सी से बंधी आजादी। यह कल्पना भारतीय प्राचीन दर्शन से मेल नहीं खाती जो खुद को ईश्वर का ही अंश बताती है और एक दिन ईश्वर हो जाने का विश्वास भी दिलाती है।
पश्चिमी दार्शनिकों ने हालांकि स् और ईश्वर दोनों की ही विशद व्याख्या की है लेकिन भारतीय दर्शन ने तो मुक्ति के नाम पर चमत्कार ही कर दिया। हर बंधन का जवाब है। अद्वैतवाद में देखा जाए तो सबकुछ मिथ्या है और इससे परे निकला जा सकता है। द्वैतवाद को देखें तो लगता है कि भले ही सबकुछ मिथ्या हो लेकिन इससे बाहर निकला जा सकता है। चार्वाक की सुनें तो ऋण लेकर भी जिंदगी को और विशाल बनाया जा सकता है। सांख् की सुनें तो सृष्टि के साथ ही बंधन दिखाई देता है। इसके परे निकलने पर निर्गुण तक पहुंचा जा सकता है। यानि बच निकलने की संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन मानसिक गुलामी का क्या जो भेड के साथ बंधी रस्सी की शक् में लगातार हमारे साथ रहती है।