शुक्रवार, 20 जून 2008

जब चेहरे पर नूर बढ़ जाता है


पिछले कुछ समय से देख रहा हूं कि नई हीरोइनों का दौर खत् सा हो गया है। मानो सुंदर लड़कियां पैदा होनी ही बंद हो गई है। युवतियों के चेहरे से नूर गायब होता जा रहा है। और रुपहले पर्दे पर नजर रही हैं वही तीस या चालीस साल पुरानी हीरोइनें। चाहे हेमा मालिनी हो या जयाप्रदा। सोहा की मम्मी सोहा से अधिक खूबसूरत और ईशा की मम्मी ईशा से अधिक खूबसूरत। कुल मिलाकर मम्मियां गजब ढाने में लगी हुई हैं। पर्यटन विभाग की ओर से साल में एक बार विदेशी पर्यटकों को दिखाने के लिए मिस मरवण प्रतियोगिता होती है। इसमें भी एक मम्मी मिस मरवण बन गई।
कमाल हो गया। प्रतियोगिता में शामिल करीब दो दर्जन फूल सी कंवारी लड़कियों के बीच एक छोटी सी बच्ची की मां ने दर्शकों और जजों का दिल जीत लिया। हालांकि बाद में वास्तविकता छिपाने और नियमों की अवहेलना करने के दण् के रूप में उस युवति से खिताब वापस छीन लिया गया लेकिन उस बाला ने यह सिद्ध कर दिया कि शादी के बार नूर में बढोतरी होती है और कुंवारी लड़की उसके सामने फीकी ही रहती है।
ऐसा क्या है कि मम्मी के चेहरे का नूर बढ रहा है और बेटियां (या कह दें कुंवारियां) बेनूर नजर रही हैं। अगर इस तथ् को मैं एक निष्कर्ष के रूप में लूं तो एक नई गड़बड़ दिमाग में पैदा होती है वह यह कि जो लड़कियां कुंवारेपन में ही गदराई और खूबसूरत दिखाई देने लगे उनके बारे में सही सोचूं या गलत। जो भी हो लेकिन इसका सारा श्रेय पतियों को देना चाहिए। धरम पा जी, नवाब साब और दूसरे प्रतिष्ठित लोग धन् हैं जिनके प्यार ने पुरानी बालाओं (मैं सुंदर अभिनेत्रियों को बूढी कहने से बचने की कोशिश कर रहा हूं।) को आज भी जवान बना रखा है।