शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

चेतना को प्रभावित करता कचरा

इंसान की किसी भी चीज के लिए दो प्रकार की दृष्टि होती है। एक तो वह चीजों को देखता है और दिमागी रूप से प्रतिक्रिया विहीन रहता है। दूसरा वह वस्तु विशेष के प्रति सजग होता है। अंग्रेजी की पुस्तकों में इसे लुक और ऑब्जर्व के रूप में परिभाषित किया गया है। जब मैं इसे कचरे के साथ जोड़कर देखता हूं तो स्थिति और भी भयावह महसूस होती है। कई साल पहले हमारे एक वरिष् पत्रकार साथी ने दीपावली से कुछ दिन पहले एक लेख लिखा। वह मुझे अब तक आन्दोलित करता है। इसमें उन्होंने एक दृश् की रचना की जिसमें एक महिला दीपावली के लिए घर की सफाई में जुटती है। और पहुंच जाती है स्टोर में। वहां रखे कचरे को साफ करने के लिए एक-एक चीज उठाती है और उससे जुड़ा इतिहास उसकी आंखों के सामने तैर जाता है। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और चौथा। अचानक एक-एक सामान कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो उठता है। बेटे का पुराना रैकेट, बेटी के स्केट्स हर चीज अपने पूरे महत् और यादों के साथ महिला को घेर लेते हैं। वह महिला पूरा दिन कचरे के साथ बिताती है और शाम को हर चीज अपने स्थान पर रख स्टोर से लौट जाती है। रात का खाना खाए बिना पलंग पर घिरती है और आगामी कई दिन इन्हीं यादों के साथ बीतते हैं। स्टोर का कचरा चेतना को बुरी तरह प्रभावित कर जाता है। इसी तरह का बहुत सा कचरा हमारी चेतना को भी प्रभावित करता है। जरूरी नहीं कि वह स्टोर में हो। वह छत, ड्राइंगरूम, बैडरूम, दीवान में, घर के पिछवाड़े सहित उन तमाम स्थानों पर हो सकता है जहां हम उठते-बैठते रहते हैं। इस बार आप कचरा फेकेंगे तो अपनी चेतना को कुछ स्वतंत्र हुआ पाएंगे।