सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रिंग रिंग रिंगा.. भाग एक

शुरू से आखिर तक जमाल के पास उम्‍मीद बांधने का कोई आधार नहीं होता। धोबीघाट से झुग्‍गी झोंपडि़यों और सड़कों से ट्रेन की पटरियों तक होता है तो बस संघर्ष खुद को जिंदा बनाए रखने का। भाई सलीम फिर भी सोचता है कि उसे पैसा कमाना है लेकिन जमाल बस जुनून होता है। 
हर काम, हर शब्‍द, हर क्षण, हर बात में जुनून। अब इस अंदर की आग को कैसे पेश किया जाए। भावनाओं का तूफान तैयार कर दिया गया है। किसकी जटाएं इस सैलाब को समेट सकती हैं। तो गढ़ दी गई लतिका। अब समझ में आता है कि क्‍यों इस छोरे के दिल में इतनी आग है। फिल्‍म जिजिविषा से हटकर आ जाती है प्रेम के तीव्र भाव पर। निर्देशक की मजबूरी है। अधिसंख्‍य समुदाय इसी लॉजिक को समझेगा कि लगातार कठिन होती जिंदगी में ऐसा कौनसा दीपक था जो बर्फीले पानी में छोरे को खड़े रहने का साहस दे गया। क्‍या लतिका के प्‍यार में ऐसा कुछ था। 

नहीं मुझे नहीं लगता। 

रिंग रिंग रिंगा... 
रिंग रिंग रिंगा्... 
रिंग रिंग रिंगा... 


नहीं ऐसा नहीं हो सकता। 

ठीक है एक उदाहरण है अभी मेरे पास। शायद कभी ओशो ने सुनाया होगा अपने शिष्‍यों को। वे कहते हैं जब बुद्ध घर से निकले और बीमार, कमजोर और मृत को देख चुके थे तो वे उतनी दुनिया देख चुके थे जितनी कि एक आम पश्चिमी व्‍यक्ति देखता है। फिर बुद्ध ने देखा एक साधू को। बस यहीं अंतर आ गया। इसी दुनिया में रहते हुए दुनिया से निवृत्त रहकर साधना करता है और एक दिन परम पिता में एकाकार होने के लिए चल देता है। पहले सशरीर उसके साथ होता है बाद में शरीर भी छोड़ देता है। 

जमाल सामान्‍य बच्‍चा है। अपनी जिंदगी जी रहा है। पिता का पता नहीं एक दिन मां भी मर जाती है। अब कहां जाए। जहां जिंदा रहा जा सके। भीख मंगवाने वाले से दूर रहना भी जरूरी है। मूर्ख विदेशियों ने गाइड समझ लिया तो अच्‍छा है। इसी से कुछ पैसा कमा लेंगे। हमें कौनसी जमीन खरीदनी है। बस जिंदा रहना है। भाई छोड दे, यार दोस्‍त अलग हो जाए तो भी जिंदगी चलती रहती है। उसी दम पर तेजी से आगे बढ़ती है। कॉल सेंटर का चायवाला कॉल सेंटर के कई एक्‍जीक्‍युटिव्‍स से अधिक जानता है। आग है और लगातार जल रही है। अब एक दिन हू वांट्स टू बी मिलेनियर में पहुंच जाता है। जिंदगी के तीखे उतार चढ़ावों के साथ सवालों का उतार चढ़ाव तारतम्‍यता बैठा लेता है। अब जमाल, जिन्‍दगी और सवाल एक हो जाते हैं। पूछने वाले को अंदाज नहीं है कि सामने जो चायवाला बैठा है उसके पीछे कितनी कहानियां हैं। 

बस एक ही मलाल --- ये राम और अल्‍लाह नहीं होते तो आज जमाल की मां जिन्‍दा होती। 

रिंग रिंग रिंगा... 

मंदी की मार झेल रही दुनिया में झुग्‍गी से बाहर आए भारत की आंखें चमक से भरी हुई है और एक नियंत्रक पूरे जोश के साथ जमाल का स्‍वागत कर रहा है आइए खेलते हैं जमाल ए चायवाल के साथ कौन बनेगा करोड़पति। 

रिंग रिंग रिंगा... 


ये अनिल कपूर और ओबामा की शकल मिलती जुलती है क्‍या... 


रिंग रिंग रिंगा... 

बस एक सेकेण्‍ड के लिए और पकाउंगा-- जिन लोगों ने ओबामा की विजय के बारे में इस ब्‍लॉग पर पढ़ा है तो पिंकी की विजय  के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। विजय का दौर फिर से शुरू हो रहा है।