शनिवार, 20 जून 2009

राहत की बात - मैं अकेला नहीं हूं :)

अभी सुरेश चिपलूनकर जी  टिप्पणी सम्बन्धी खुराफ़ात के बारे में बता रहे थे तब पहली बार लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। इस कारण नहीं कि वे ज्‍योतिष और वास्‍तु जैसी विधाओं को कोसते रहे हैं। इस विषय पर तो मैंने उनका विरोध किया है। लेकिन उनकी कविता नहीं समझ पाने की स्थिति ने मुझे काफी राहत दी है। अब तक ऐसा लगता था कि दुनिया के अधिकांश पढ़ने लिखने वाले लोग गद्य के अलावा पद्य को आसानी से समझ लेते हैं और सृजन भी कर लेते हैं। इस पोस्‍ट में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें कविता समझ में नहीं आती। दरअसल मुझे भी नहीं आती। :)

इसके बावजूद नेट पर रोजाना पचासों कविताएं नई आती हैं। मौलिक और गहरी। कईयों के तो शब्‍द और वाक्‍य संरचना तक दिमाग के एंटीना को भी छू नहीं पाते। खैर मुझे लगता है मेरे और सुरेश जी के अलावा जहां में और भी होंगे जो सुखनवर न बन पाए हों। वैसे गद्य लिखकर भी मैं भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की परम्‍परा को ही आगे बढ़ा रहा हूं। उन्‍होंने पद्य में अतुकांत का समावेश किया और फिर अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में गद्य को प्रभावी तरीके से शामिल कर दिया। मैं अपने मन की बात सहज होकर कह पा रहा हूं। तब शायद पद्य की इतनी आवश्‍यकता भी नहीं है।

फिर भी उड़न तश्तरी .... को देखता हूं तो कर्मकाण्‍ड की एक बात याद आ जाती है जिसमें बताया गया है कि सरस्‍वती की बीजमंत्र के साथ आराधना करने पर कवित्‍व शक्ति अर्जित की जा सकती है। समीरजी न केवल गद्य में अपनी बात रोचक और गहराई के साथ व्‍यक्‍त करते है और पद्य भी सहज रच लेते हैं। यह मुझमे ईर्ष्‍या भाव जगा देता है।

(मैं यहां द्वेष नहीं कह रहा :))

इसी तरह अनुराग आर्य जी के दिल की बात ही ले लीजिए। वे अपनी बात गद्य के छोटे बड़े टुकड़ों में करते हैं और आखिर में पद्य की तीन या चार लाइने इतनी प्रभावी होती हैं कि पोस्‍ट के नीचे के कमेंट्स में गद्य से अधिक पद्य तालियां बटोरता नजर आता है। यही स्थिति चिट्ठा चर्चा की भी है। अनूपजी पूरी पोस्‍ट लिखने के बाद आखिर में एक लाइना लिखते हैं। यह एक ओर गद्य होता है तो दूसरी ओर लाइन को पूरा करने के चक्‍कर में पद्य जैसा बन जाता है। यह इतनी रोचक होती है कि मैं पूरी पोस्‍ट छोड़कर पहले एक लाइना पर जाता हूं। वहां कुछ दम दिखाई देता है तो बाकी की पोस्‍ट भी पढ़ लेता हूं वरना आगे रवाना। अनूपजी ने कुछ पोस्‍टें तो पूरी ही एक लाइना लिखी हैं। गद्य और पद्य का यह मिलन किसी चिठ्ठा चर्चा में ही हो सकता है। जहां बात समझ नहीं आने पर लिंक पर चटका लगाओ और पहुंच जाओ माजरा समझने के लिए :)

अब सोच रहा हूं कि ऐं, वद् वद् वाग्‍वादिनी के सवा लाख जप करके कवित्‍व शक्ति प्राप्‍त कर ही लेनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां कहा जाता है धिके जित्‍ते धिकन्‍दे यानि जब तक चलता रह सकता है चलने दो। ठीक है गद्य ही सही... :)

 

आखिर में बात लिंक रोड की। जयपुर के राजीव जैन जी ने एक नया ब्‍लॉग शुरू किया है। यहां वे क्‍लासिफिकेशन के आधार पर ब्‍लॉग्‍स जमा रहे हैं। इसमें बीकानेर के ब्‍लॉग में मेरे ब्‍लॉग का पता भी है। इसके अलावा कार्टूनिस्‍टों के ब्‍लॉग, हास्‍य व्‍यंग, लेखकों, तकनीकी आदि ब्‍लॉगों के बारे जानकारी दे रहे हैं। फिलहाल बहुत कम ब्‍लॉग इनकी लिस्‍ट में है लेकिन यह लगातार बढ़ता रहा तो एक दिन रेफरल चिठ्ठा बन जाएगा। राजीव जी को शुभकामनाएं।