गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

लड़का ही क्‍यों...

पिछले तीन दिन से बस सोच ही रहा हूं। आमतौर पर किसी एक विषय को लेकर सोचने का क्रम कभी इतना लम्‍बा नहीं चल पाता है लेकिन पिछले तीन दिन में हर काम करते-करते, उठते-बैठते, आते-जाते, सोते-जागते यही सोच रहा हूं। बचपन में मां सरस्‍वती की एक तस्‍वीर थी। उसमें उनके हाथ में वीणा और सादे वस्‍त्र देखा करता था। चेहरे पर ऐसी सौम्‍यता कि लगता काश यही मेरी मां होती। बाद में पता चला कि ये तो वास्‍तव में सबकी मां है। लता मंगेशकर को बहुत बाद में देखा। सुना पहले। कुछ खास अनुभव नहीं हुआ लेकिन जब देखा तो देखता रह गया। वही सादगी और वीणा के तारों की झनकार जैसी आवाज। मानो सरस्‍वती उनके जरिए अपनी आभा दिखा रही हो। कई कार्यक्रमों में देखा। एक बार तो टीवी पर लाइव शो देखा। उसमें अमिताभ बच्‍चन उनके साथ गा रहे थे। कुछ लोग स्‍टेज पर आने पर उनके पैर छू रहे थे। कुछ नहीं भी छू रहे थे, तब मैंने सोचा कि जो लोग लता जी के पैर नहीं छू रहे हैं वे एक अच्‍छा मौका खो रहे हैं। एक बार यसुदास ने कहा कि अब लताजी की आवाज में कंपन आ गया है उन्‍हें गाना बंद कर देना चाहिए। तब अच्‍छा खासा बवाल खड़ा हो गया था। तब खुद लताजी ने कहा कि यसुदास सही कह रहे हैं। उसके बाद ही मैंने यसुदास के कैसेट्स लाकर सुने। लड़कपन से एक इच्‍छा यह भी है कि एक बार मुम्‍बई जाउं और लताजी के पैर छूकर आउं। लताजी को देखकर ही मुझे शायद एक बेटी की भी इच्‍छा है।

पिछले दिनों वे अस्‍सी साल की हो गई। वही सौम्‍य अंदाज और वही वीणा के तारों की आवाज। उनके अस्‍सीवें जन्‍मदिन पर उनके एक पुराने इंटव्‍यू को छापा गया था। उसी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। उसमें उन्‍होंने कहा कि अगले जन्‍म में वे लड़की नहीं बल्कि एक साधारण परिवार में लड़का बनकर जन्‍म लेना चाहती हैं। इस बात ने मुझे झकझोर दिया। मैं सोच रहा था कि वैसी जिंदगी बार-बार कौन नहीं चाहेगा लेकिन इस जन्‍म में भी लताजी को शांति नहीं मिली तो कैसे जन्‍म में मिलेगी। क्‍या एक लड़का होना अच्‍छी जिंदगी की गारंटी है। क्‍या लड़कियां वास्‍तव में खाली दु:ख पाने के लिए ही पैदा होती हैं। हो सकता है कि मंगेशकर बहनों का बचपन इतना अच्‍छा नहीं रहा। हर किसी ने अपने तरीके से संघर्ष किया। लताजी के अलावा आशा भोंसले के जीवन में भी उतार चढ़ाव रहे और दोनों मंगेशकर बहनों की वृहद् छाया में उषाजी को भी कुछ तकलीफ हुई होगी। भले ही निरी ईर्ष्‍या के कारण ही हुई हो। लेकिन किसे समस्‍या नहीं है।

एक ज्‍योतिषी या एक पत्रकार के तौर पर देखता हूं तो समस्‍याएं हर जगह दिखाई देती हैं। क्‍या पलायन से शांति संभव है। क्‍या संघर्ष से भागने पर इसका अंत हो जाता है। क्‍या रणछोड़ बन जाने से युद्ध की स्थिति खत्‍म हो जाती है। लड़ना तो पड़ेगा ही संघर्ष की लकीरें नहीं होगी तो कैसे लिखेंगे जीवनी।

फिर दूसरा पक्ष भी मैं सोचना चाहता हूं। मैंने पढ़कर और देखकर अनुभव किया है कि इंसान दो चीजों के लिए जिंदा रहता है। स्‍पर्श और महत्‍व। वास्‍तव में इस जिंदगी में लताजी को इनमें से एक ही मिला होगा। असामान्‍य बचपन ने स्‍पर्श का अभाव दिया, असामान्‍य जवानी ने भी स्‍पर्श को दूर रखा और अब वृद्धावस्‍था भी स्‍पर्श से अछूती लगती है। ऐसे में जीवन अनुभव के दो मूल तत्‍वों में से एक का एकांतिक अभाव ऐसी सोच को पैदा कर रहा होगा। मैं भी चाहता हूं कि लताजी को अपने अगले जीवन में दोनों सुख मिले और भरपूर मिले, लेकिन क्‍या उसके लिए लड़का होना जरूरी है।

मैं निजी तौर पर चाहता हूं कि हमारी अगली संतान कन्‍या हो। लता मंगेशकर जैसी हो। भले ही उसे लताजी जैसी प्रसिद्धि न मिले लेकिन सादगी और वीणा के तारों सी आवाज हो। उसे हर संभव सुविधाएं मुहैया कराउं, उसके लिए अच्‍छा वर ढूंढकर लाउं और वह मनमर्जी का अच्‍छा जीवन जिए। मेरे जैसे बहुत से लोग होंगे जो ऐसी कामना रखते होंगे। लताजी से निवेदन है कि वे ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि ऐसे ही किसी घर में वे अगले जन्‍म में पैदा करे। फिर से कन्‍या बनाकर न कि लड़का। क्‍योंकि मां सरस्‍वती के आशीर्वाद की अभी इस धरती को बहुत जरूरत है। इस जन्‍म में भी मैं चाहता हूं कि लताजी कम से कम बीस साल तो और जिएं। उनके सौ साल पूरे होने तक मैं इंतजार कर लूंगा। उसके बाद अगली संतान करने को तैयार हूं। फिर मेरे घर आए कन्‍या के रूप में मां सरस्‍वती का आशीर्वाद बनकर...