मंगलवार, 29 मार्च 2011

पगे लागूं महाराज

बचपन में मैं महाराजों को बहुत देखता था। इन सालों में महाराजों की संख्‍या कुछ कम हो गई है। कुछ परिभाषा में भी आंशिक बदलाव आ गया तो महाराज की इतनी गरिमा भी नहीं रही। जब उन महाराजों को देखता था तो सोचता था कि एक दिन मैं भी महाराज बनूंगा। मैंने किसी समझदार से पूछ भी लिया कि महाराज कैसे बनते हैं। समझदार मेरी उम्‍मीद से ज्‍यादा समझदार था, उसने बताया जो अपना घर फूंककर तमाशा बनते हैं वे महाराज बन जाते हैं। उनसे वही लोग बराबरी कर सकते हैं जो अपना खुद का घर फूंकना जानते हो या फूंक चुके हों। यह परिभाषा सुनकर पांव के नीचे से जमीन सरक गई। खैर बाद में मैंने एक महाराज को करीब से भी देखा... आज उनकी याद आ गई...

हालांकि मैं उनका वास्‍तविक नाम भी बता सकता हूं लेकिन नाम से अधिक उनकी कहानी में दम है सो सुनिए...

महाराज के पिता नायब तहसीलदार थे। करीब चालीस साल पहले यह बहुत शानदार पोस्‍ट हुआ करती थी। पटवारी से शुरू हुए थे और दसवीं पास होने के कारण तेजी से तरक्‍की करते हुए तहसीलदार के पद पर पहुंच गए थे। अपने रुआब से अच्‍छी खासी जमीनें, गहने और जायदाद जमा कर लिए थे। महाराज को इन सबकी जानकारी थी। सो कभी पढ़ने में मन नहीं लगाया। ऐसा नहीं था कि पढ़ने जितना दिमाग न हो, लेकिन शुरू से ही पढ़ाई को डिस्‍कार्ड ही कर दिया। खेलने का शौक था। फुटबॉल खेलने के लिए जाते थे, सो एक दिन बात की बात में टीम से अलग हो गए और अपनी अलग फुटबॉल टीम बना ली। कोच से लेकर अर्दली तक रिक्रुट कर लिए। जितनी टीम उतना ही स्‍टाफ। खैर टीम में भी ऊंची कीमतों पर एक से बढ़कर एक खिलाडि़यों को शामिल किया। कुछ महीने तक बीकानेर में ही प्रेक्टिस की और चले विश्‍वविजय को। बीकानेर से सीधे कलकत्‍ता गए। मैत्री मैच हुआ और मोहनबागान को टिका दिया। जमकर वाह वाह हुई। महाराज पक्‍के महाराज बन गए। घर फुंक रहा था, लेकिन महाराज के पिता खुश थे, कि बेटा नाम कमा रहा है। धीरे धीरे खेल से अलग हुए तो घोड़ों का शौक पाल लिया। टीम में शामिल खिलाडि़यों के खाने के लाले पड़े तो खिलाडि़यों ने छोटे मोटे धंधे करना शुरू कर दिया और दिन रात महाराज के गुण गाते। इधर महाराज का घोड़ों का शौक बढ़ता जा रहा था। तेल का पीपा घोड़े के मुंह के आगे ही खोल कर रखा जाता। जब तेल खत्‍म हो जाता और घोड़ा मुंह मारता रहता तो तेल के खुले पीपे में घी उंडेल दिया जाता। महाराज के घोड़े शहर की शान बन गए।

इसी दौरान समयचक्र ने पलटा खाया। महाराज की किसी बात पर पिता से लड़ाई हो गई। अपनी आन पर जिंदा रहने वाले महाराज ने पिता से पैसा लेना बन्‍द कर दिया। परिवार में बीबी बच्‍चों थे, सो उनको लेकर अलग हो गए। महाराज के पिता कमरे बन्‍द कर कर के खूब रोए लेकिन महाराज को नहीं मना पाए। सोने और चांदी का चम्‍मच मुंह में लेकर पैदा हुए महाराज के बच्‍चों के सामने दोनों समय के खाने का जुगाड़ मुश्किल हो रहा था। महाराज ने अपने किसी यारबाज से पैसा लेकर जीप खरीद ली। महाराज मेहनती तो थे ही जीप का काम भी अच्‍छा चल पड़ा। एक बार सड़क पर लाश पड़ी देखी तो उसे जीप में डालकर ले आए। खबर आग की तरफ फैली तो लोगों ने मांगलिक कार्यों के लिए जीप में किराए पर लेना बन्‍द कर दिया। महाराज कहां हार मानने वाले थे, उन्‍होंने लाशें ढोने के काम में ही खुद को खपा दिया। इसी दौरान पता चला कि महाराज के बड़े बेटे ने अपने दादा से सांठ-गांठ कर सारी संपत्ति अपने नाम करा ली है। महाराज ने आव देखा न ताव, अपने पिता के घर से बाहर चल पड़े। अपना अलग घर बना लिया। छोटा बेटा महाराज के ही नक्‍शे कदम पर चल रहा था, सो संगीत का शौक पाल बैठा। हालांकि कहीं से तालीम नहीं ली, लेकिन दिन महीने और साल तबले, हारमोनियम, सितार और मंजीरे बजाते हुए ही निकल रहे थे। ऐसे में गृहस्‍थी का सारा बोझ महाराज के कंधों पर ही रहा। एक दिन महाराज टूट गए। बीमार होकर बिस्‍तर पर पड़े तो वापस उठ नहीं पाए। सालों की मेहनत से बनाई आन और गृहस्‍थी टुकड़ा टुकड़ा कर टूटती नजर आ रही थी। तीन साल तक बिस्‍तर में रहे। बीबी ने खूब सेवा की। आखिर यमराज ने महाराज को उठा लिया। जब महाराज अंतिम सांसें गिन रहे थे तो एक लकड़ी के पाटे पर निश्‍तेज पड़े थे और आंखें पथरा रही थी। करोड़ों रुपए की संपत्ति पर बड़ा पुत्र काबिज था और छोटा बेटा संगीत की धुनों में खोया हुआ था...

महाराज तो फिर भी महाराज ही रहे। जिसे भी पता चला कि महाराज का निधन हो गया है, अपना काम छोड़ सीधा उनके घर की ओर भागता हुआ आया। जिन लोगों को पैसा दिया वे लौटे नहीं और जिन्‍हें प्‍यार लुटाया वे सम्‍मान लुटाने आ पहंचे। मैं भी कई बार उनके प्‍यार की बारिश में नहाया था। सो मैं भी उनकी अंतिम यात्रा में साथ था। कंधा देने के बाद मैं शवयात्रा में पीछे लौटा तो लोग आपस में बात कर रहे थे...

महाराज तो महाराज थे, उनकी तरह अपना सबकुछ फूंककर कौन दूसरों पर प्‍यार लुटा सकता है...

नहीं कोई नहीं लुटा सकता...