सोमवार, 1 जुलाई 2013

टूटता भारतीय आर्थिक सुरक्षा का कवच

आम भारतीय परिवार की धारणा यही है कि जैसे ही कुछ पैसे बचे सोने की छोटी मोटी रकम बनाकर रख ली जाए। एक ओर परिवार की महिलाएं प्रसन्‍न तो दूसरी ओर परिवार का आर्थिक आधार मजबूत होता रहे। पर, सोने पर आधारित यह आर्थिक सुरक्षा का कवच अब टूटने लगा है। आपके लॉकर में रखा सोना कल तक जहां दस लाख रुपए कीमत का था, आज महज सात लाख रुपए कीमत का रह गया है। इसमें रुपए का गिरना और सोने का टूटना दोनों जिम्‍मेदार हैं। कृषि आधारित हमारे देश का बड़ा तबका यानी करोड़ों परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं।

अर्थव्‍यवस्‍था का सामान्‍य नियम कहता है कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से नियंत्रित होने वाला सोना डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने पर महंगा होना चाहिए। वर्तमान घटनाक्रम पर गौर कीजिए, सोना और रुपया दोनों के दाम साथ-साथ नीचे गिर रहे हैं। यह स्थिति इस आशंका को जन्‍म देती है कि कहीं हम किसी अंतरराष्‍ट्रीय साजिश का शिकार तो नहीं हो रहे।
सोने की कीमतों में वर्ष 2006 के बाद से एक कृत्रिम तेजी का दौर शुरू हो गया था। सोने की कीमतें बढ़ती रहीं। इस वर्ष तो सोने ने वे भाव देखे जो पहले कभी नहीं थे। 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की कीमत पहुंचने पर लगा कि यह एक लाख रुपए तक जाएगा। स्‍थानीय निवेशकर्ताओं ने जमकर सोना खरीदा। आज वही सोना कुछ ही महीने के अंतराल में 25 हजार 500 रुपए के दाम पर आ टिका है। बाजार का अनुमान है कि सोना अभी और गिर सकता है। डॉलर महंगा होने के साथ सोना गिरना हमें दो तरह से नुकसान पहुंचा रहा है। पहले आई तेजी और अब इस कृत्रिम मंदी हमें षड़यंत्र की बू देती है। जैसा कि पूर्व में अमरीकी और यूरोपीय अर्थव्‍यवस्‍था को धक्‍का पहुंचाने के लिए चीन पूर्व में 19 रुपए प्रति बैरल वाले तेल को 147 रुपए प्रति बैरल तक ले गया था और पैट्रोल के बढ़े हुए भावों ने पश्चिमी अर्थतंत्र की कमर तोड़कर रख दी थी। कमोबेश ऐसा ही भारत के साथ भी हो सकता है। संसाधनों के विकास के बाद अब टैंक और तोपों से जमीनी युद्ध होने की आशंका कम हुई है, लेकिन क्‍या हम अर्थयुद्ध लड़ने में सक्षम हैं। अगर नहीं तो हमारा देश इस युद्ध में हारकर टूट भी सकता है। वह युद्ध की अवस्‍था से भी बड़ी भयानक त्रासदी सिद्ध हो सकती है।

पहले यह समझने की जरूरत है कि डॉलर के मुकाबले अगर रुपए का अवमूल्‍यन हो रहा है तो इसमें रूपया दोषी या डॉलर खुद मजबूत हो रहा है। इसके लिए हमें दूसरे देशों की मुद्राओं की तुलना में डॉलर की स्थिति को देखना होगा। चीनी युआन, जापानी येन और यूरोपीय यूरो की तुलना में डॉलर न तो मजबूत हुआ और न ही गिरा है। लेकिन भारतीय रुपया अपने स्‍तर से नीचे आ रहा है। यानी गलती हमारी ही है। हमारी अर्थव्‍यवस्‍था के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्‍वास टूटता जा रहा है। इस कारण देश में प्रत्‍यक्ष और परोक्ष विदेशी निवेश घटता जा रहा है। ऐसा आमतौर पर दो कारणों से होता है। पहला कारण है वर्तमान में चल रही योजनाएं और नीतियां विदेशी निवेशकों के अनुकूल न होना। आज केन्‍द्र सरकार किसी विदेशी कंपनी को यह भरोसा देती है कि यहां आइए और निवेश कीजिए, हम आपको उपयुक्‍त सुविधाएं देंगे, लेकिन कंपनी जब देश में आ जाती है, तो कहीं तृणमूल तो कहीं डीएमके, कहीं जनता दल तो कहीं भाजपा की सरकारें उस विदेशी कंपनी को पूर्व में तय की गई सुविधाएं और साधन मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं होती।

दूसरा बड़ा कारण है सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान। हर साल चुनावों का साल है। विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के संकेत इस तरह नहीं लगते कि जो पार्टी वर्तमान में सरकार चला रही है और नीतियां बना रही है, वह आगे भी जारी रहेगी। अगर सरकार बदलती है तो हो सकता है, नई सरकार पूर्व में बनी नीतियों और विदेशी कंपनियों से किए गए करार पर काम ही न करे। ऐसे में निवेश को खासा नुकसान हो सकता है। ऐसे में निवेशक केवल इंतजार ही कर सकते हैं।

इस बीच हमारी आर्थिक नीति भी अर्थव्‍यवस्‍था को खोखला करती जा रही है। बजाय कि देश में उत्‍पाद तैयार करने के, हम विश्‍व बाजार से तैयार माल खरीद रहे हैं। हालां‍कि हमारे वित्‍त मंत्री सोने को लक्ष्‍य कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में मोबाइल, टैब, लैपटॉप और कम्‍प्‍यूटर के जरिए हम खरबों रुपए की विदेशी मुद्रा चीन को सौंप रहे हैं और कुछ ही महीने में डंप हो जाने वाली तकनीक और प्‍लास्टिक खरीद रहे हैं। क्‍या कारण है कि हम अपने ही देश में इन गैजेट्स को नहीं बना पा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्‍तरप्रदेश सरकार ने स्‍कूली बच्‍चों को टैबलेट बांटे, क्‍या वे देश में बने हुए थे। अब राजस्‍थान सरकार ने पौने चार लाख बच्‍चों को टैबलेट खरीदने के लिए धन दिया है, क्‍या राजस्‍थान में एक भी यूनिट है जो टैब बना सके। हम क्‍यों चीन, जापान और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों को सस्‍ती तकनीक और प्‍लास्टि के पेटे रुपया दे रहे हैं।

कमजोर अर्थव्‍यवस्‍था रुपए को गिरा रही है। ठीक है रुपया गिरता है तो डॉलर के भाव मिलने वाला सोना महंगा होना चाहिए। लेकिन वह भी नहीं हो रहा है। क्‍योंकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार जानता है कि जब भी मंदी का दौर आता है तो भारतीय अपना निवेश सोने में करते हैं और खराब दिनों को आसानी से गुजार लेते हैं। अभी हाल ही में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर आई मंदी का असर भारत पर बहुत कम हुआ, बाकी दूसरे अधिकांश देश इसकी चपेट में आए। इसका बड़ा कारण भारतीयों की बचत करने की आदत रही। अब यही बचत अगर लॉकर में पड़ी पड़ी ही खत्‍म हो जाए, तो हमारा आर्थिक सुरक्षा कवच भी कुछ काम नहीं आएगा।

- सिद्धार्थ जोशी
वरिष्‍ठ उपसंपादक
नेशनल राजस्‍थान