रविवार, 4 अगस्त 2013

इतना स्‍वार्थी बन जाएं कि परमार्थी हो जाएं

आपरो घी सौ कोस हालै


               यह मारवाड़ी की एक प्रसिद्ध कहावत है। यह कहावत घी बचाने या उसके इस्‍तेमाल के बारे में नहीं बल्कि सहायता देने और उसके वापस मिलने से संबंधित है। आध्‍यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सृष्टि का हर जीव और अजीव भी एक अदृश्‍य सूत्र से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। ऐसे में अगर आज मैं किसी को छटांक घी भी देता हूं तो वह आगे से आगे सूत्र में बढ़ता रहेगा और एक दिन वापस मुझे ही मिलेगा। यह सहायता का सुख है। 

               एक शोध के मुताबिक जब व्‍यक्ति तनाव में होता है तो दूसरों की सहायता करने में कम रुचि दिखाता है और स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न होने पर सहायता के लिए तत्‍पर नजर आता है। इसे बायस्‍टेंडर प्रभाव कहा जाता है। ऐसी अवस्‍था में इंसान दूसरों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को लेकर लापरवाह हो जाता है। अगर सजगता से सहायता करने की प्रवृत्ति को बचाए रखा जा सके, तो इससे तनाव से बचने में मदद भी मिलती है।

               जब हम किसी की सहायता करते हैं तो वास्‍तव में हम अपनी ही सहायता कर रहे होते हैं। चाहे वह भौतिक साधनों के रूप में हो या ज्ञान। जब भी कोई व्‍यक्ति आपसे कुछ मांगने आता है, तो सृष्टि के नैसर्गिक नियम के अनुसार प्रकृति ने मांगने वाले के रूप में उस व्‍यक्ति का और देने वाले के रूप में आपका चुनाव किया है। अब सहायता करनी है या नहीं करनी है, यह आपकी खुद की इच्‍छा पर निर्भर है। इच्‍छा की यही स्‍वतंत्रता हमें ईश्‍वर द्वारा स्‍थापित पूर्व नियतता से मुक्‍त करती है। एक कहावत के अनुसार आप दूसरों को जो कुछ देते हैं, वह वास्‍तव में आप बचा रहे हैं और जो कुछ आप अपने पास रखते हैं वह वास्‍तव में खो देते हैं। देने के साथ ही आपकी चेतना का विस्‍तार अपनी शरीर से बाहर निकलकर आपकी सहायता के विस्‍तार तक फैल जाता है। जब आप सहायता करने से इनकार कर देते हैं तो आपकी चेतना सिकुड़कर आप के भीतर ही कहीं कुंठित हो जाती है। ऐसे में सहायता करना आपको बढ़ाता है और इनकार करना आपको कुंठित करता है। प्रकृति ने आपकी मदद की है सहायता की इच्‍छा वाले व्‍यक्ति को आप तक पहुंचाने की। आखिर में सहायता करने के बाद यह अहंकार का भाव भी न रखिए कि सहायता आपने की है। बस आपका चुनाव किया गया कि आपके जरिए सहायता की जानी है और इसके बदले में भविष्‍य में आपको भी ऐसी या इससे बेहतर सहायता मिल सकेगी। 

               अगर तर्क की परिभाषा में देखें तो स्‍वार्थ की अति परमार्थ और परमार्थ की अति स्‍वार्थ है। इसे समझने के लिए हमें उदाहरण लेना होगा कि एक व्‍यक्ति चाहता है कि वह स्‍वर्गिक वातावरण में रहे। इसके लिए पहले वह अपने कमरे को दुरुस्‍त करेगा, यदि उसका स्‍वार्थ बढ़ता है तो अपने पूरे घर को संवारेगा, फिर अपनी गली में सुधार करेगा, फिर मोहल्‍ले, गांव, जिले और राज्‍य से होते हुए पूरे देश को सुधारने पर चिंतन करेगा। यदि यह स्‍वार्थ अपने चरम पर पहुंच जाएगा तो वह पूरी पृथ्‍वी पर ही स्‍वर्गिक वातावरण बनाने का प्रयास करेगा। ऐसे में आपका निजी स्‍वार्थ अति हो जाने पर परमार्थ में तब्‍दील हो जाएगा। इस कोण से देखें तो हम जब किसी दूसरे की सहायता कर उसे बेहतर स्थिति में ला रहे हैं तो वास्‍तव में अपने ही स्‍वार्थ के किसी कोण की पूर्ति कर रहे होते हैं। दूसरों की सहायता करने या सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले लोग आम लोगों की तुलना में अधिक स्‍वस्‍थ और सक्रिय रहते हैं। यहां दूसरों की चिंता की नहीं बल्कि दूसरों की सजग सहायता की बात हो रही है। 

               जरूरी नहीं कि सहायता हमेशा ऐसे रूप में हो कि आपको उसकी कीमत ही चुकानी पड़ रही हो। आपके घर में पड़ा कबाड़ हो सकता है आपके खुद के लिए किसी काम का न हो, लेकिन किसी दूसरे व्‍यक्ति के लिए यह उपयोगी सामान सिद्ध हो सकता है। अधिकांश लोग संग्रह की प्रवृत्ति के चलते न तो कबाड़ से छुटकारा पा पाते हैं और न ही उसका उपयोग कोई और कर पाता है। आध्‍यात्मिक स्‍तर पर आपके घर में या कह दें आपकी मिल्कियत के तहत आने वाला हर संसाधन आपकी चेतना के एक हिस्‍से पर काबिज होता है। एक ओर जहां आपके मन में अपने साधनों और वस्‍तुओं के प्रति अधिकार का भाव होता है, वहीं दायित्‍व का बोझ भी आपके उन्‍मुक्‍त मन को बोझिल बनाए रखता है। जब आप अपने पास पड़ी किसी ऐसी वस्‍तु को उस व्‍यक्ति के पास पहुंचाते हैं, जो वस्‍तु का बेहतर उपयोग कर सके, तो आप आपको मानसिक और शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाता है। आपकी चेतना का जो अंश वस्‍तु को लेकर बाधित हो चुका था, वह किसी और को देने के बाद मुक्‍त हो जाता है। आप इस बात से भी संतुष्‍ट रहते हैं कि अमुक व्‍यक्ति इसका सही इस्‍तेमाल करेगा। दूसरी ओर कबाड़ से पैदा हुई नकारात्‍मक ऊर्जा के दुष्‍प्रभाव से भी आप बच जाते हैं। 

               संसाधनों के साथ की जाने वाली सहायता के अलावा शारीरिक रूप से की गई सहायता के भी बहुत मायने हैं। जब आप देने के भाव में होते हैं तो स्‍वार्थ मुख्‍य धारा से हट जाता है। अब आप जो भी काम करते हैं, उसे पूरा मन लगाकर और बिना किसी प्रत्‍युत्‍तर की इच्‍छा के करते हैं। ऐसे में शारीरिक श्रम सामान्‍य श्रम न रहकर ईश्‍वर की आराधना में तब्‍दील हो जाता है। सिक्‍ख और सिंधी गुरुओं ने इंसान की इस नै‍सर्गिक प्रवृत्ति को समझा और गुरुद्वारों और झूलेलाल के मंदिरों में कारसेवकों की भूमिका को बढ़ावा दिया। आज हम ऐसे धार्मिक स्‍थल पर करोड़पति हो चुके व्‍यक्तियों को भी जूते पॉलिश करते और झूठे बर्तन धोते हुए देख सकते हैं। धार्मिक कार्य में उनकी यह शारीरिक सहायता श्रद्धालुओं को न केवल शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाती है, बल्कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में भी सुधार लाती है।