गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

Kejriwal's angle : Paradigm shift or hidden agenda "2014"

मुझे पहला आश्‍चर्य तब हुआ तब राजीव शुक्‍ला (Rajiv Shukla) का चैनल पूरे दिन राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के एक भाषण में रही कमी को लेकर उसकी पूंछ फाड़ने का प्रयास करता रहा। यह अजीब मसला था। अब तक जो संस्‍थान जिन लोगों के भरोसे या सही शब्‍द कहें कि कृपा से जी रहा था, वह अचानक हिंदी का पैरोकार बनकर सीधे राहुल गांधी पर ही आक्रमण कर रहा था। 

                उत्‍तर प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka gandhi wadra) और उनके बच्‍चे भी जब सहानुभूति की लहर पैदा करने में विफल रहे तो कांग्रेस को सत्‍ता विरोधी लहर को दबाने का यही एक तरीका समझ में आया कि इस आग की झुलस को विपरीत दिशा की आग से ही काबू में किया जाए।


आग से आग बुझाने की पद्धतियों में से एक फायर ब्रेक (Fire Break) है। यह दो तरह से काम करती है। पहला तो यह कि जंगल या घास के मैदान की आग के बीच अंतराल पैदा किया जाए ताकि ईंधन की आपूर्ति बाधित हो और साथ ही आग जिस दिशा में बढ़ रही हो, उसी दिशा में आगे जाकर फायर लाइन (Fire line) बना दी जाए। यह फायर लाइन रास्‍ते की ऑक्‍सीजन (Oxygen) को खत्‍म कर देती है और पीछे से आ रही आग बीच का गैप होने और ऑक्‍सीजन की कमी के चलते दम तोड़ देती है। इससे बीहड़ या घास का मैदान बचा रह जाता है। राजनीति के इस बीहड़ को बचाने के‍ लिए केजरीवाल फायर ब्रेकर सिद्ध हो सकते हैं। 


मुझे केजरीवाल शुरू से ही फायर ब्रेकर ही दिखाई दिए।  पहली तो उनकी एंट्री ही रजनीकांत (Rajnikant) वाले अंदाज में होती है। अब चूंकि वे सितारा हैसियत के थे नहीं, तो इसके लिए भारत के दक्षिणी पश्चिमी कोने में अपना काम कर रहे अन्‍ना हजारे (Anna hazare) को उठया गया। आम आदमी (Aam Admi) के नाम पर आंदोलन किया गया। एक के बाद दूसरी हस्तियां कतार में आती गई और उनका दोहन कर केजवरीवाल आगे आते रहे। मैं यह नहीं मानता कि शुरू से ही अरविन्‍द केजरीवाल को ही इस काम के लिए नियुक्‍त किया गया होगा, लेकिन प्रमुख लोगों में एक शामिल रहे होंगे। 

                आगे के सूत्रों को खुला छोड़े रखे जाने के लिए जरूरी है कि एक से अधिक विकल्‍प साथ लेकर ही चला जाए। मैं देखता हूं कि केजरीवाल दूसरों को पछाड़ आगे निकलते गए। लोकपाल (Lokpal) के लिए संघर्ष हुआ। इसके बाद अन्‍ना हजारे का कद घटाने वाला गुजरात का चुनाव हुआ। अन्‍ना का कद घटाने वाला इसलिए क्‍योंकि अन्‍ना को लाया ही इसलिए गया था कि भ्रष्‍टाचार या अन्‍य मुद्दों की बात कर वे जनता में अपनी तगड़ी छवि बनाए जो वास्‍तव में सरकार के विरुद्ध दिखाई दे। इसके बाद गुजरात (Gujrat) चुनाव के समय अन्‍ना का परीक्षण किया गया। जिसमें वे बुरी तरह फेल साबित हुए। 

                यही से अरविन्‍द केजरीवाल घटना का उदय शुरू हो गया था। अब पांच राज्‍यों के चुनाव तक यह फायर लाइन अधिक काम नहीं कर पाई। क्‍योंकि मोदी ने भी गुजरात को छोड़कर कहीं और कुछ भी नहीं किया था। हद तो यह है कि उत्‍तर भारत के अधिकांश राज्‍यों में मोदी के आदमी अभी केवल जमीन तैयार करने का काम कर रहे हैं। जैसे उत्‍तरप्रदेश और बिहार में अमित शाह। ऐसे में सीधा मोदी पर हमला बोले जाने की संभावनाएं क्षीण हो गई। 

                अब पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव आते हैं तो अपना आकार बढ़ाने में नाकामयाब रही इस फायरलाइन के पास दिल्‍ली (Delhi) का ही विकल्‍प शेष रहता है। क्‍यों‍कि ये फायर फाइटर देख चुके थे कि दिल्‍ली से बाहर महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में इसी प्रकार का प्रयास बुरी तरफ फ्लॉप सिद्ध हो चुका था। अन्‍य राज्‍यों में भी धरना प्रदर्शन किए गए, लेकिन कहीं से प्रभावी फीडबैक नहीं मिला। 

(राज्‍यों के छोटे छोटे जिलों में से अधिकांश में सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता केजरीवाल एण्‍ड कंपनी के साथ दिखाई दे रहे हैं, क्‍यों? पता नहीं।)

ऐसे में मेन स्‍ट्रीम मीडिया के साथ भावुक होने वाली मैट्रो दिल्‍ली ही सबसे मुफीद जगह हो सकती थी। केजरीवाल ने यही काम किया। दिल्‍ली में पूरी ताकत झोंक दी गई। पूरी ताकत झोंक दी गई, किसकी ? 

                स्‍पष्‍ट तौर पर न भी कहा जाए तो केवल इस तथ्‍य को समझा जा सकता है कि दिल्‍ली में जितने कुल वोट पड़े उसमें करीब सत्रह प्रतिशत वोट तो केवल आखिरी आधे घंटे में पड़े। अब आम आदमी पार्टी को मिले मतों को देखा जाए तो लगता है कि उन सत्रह प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को तो वोट नहीं ही दिया होगा। अगर भाजपा को ही वोट देना होता तो शाम साढ़े चार बजे तक किसका इंतजार करते। खैर, आम आदमी पार्टी के नौ कैंडिडेट करीब एक हजार वोटों के अंतर से जीत गए। 

                अगर केजरीवाल एण्‍ड पार्टी को अब भी फायर ब्रेकर ही समझा जाए तो आम आदमी पार्टी की यह जीत उनके खुद के रास्‍ते में एक बड़ी बाधा बनकर उभर आई है। सत्‍ता का मद खुद केजरीवाल पर भारी पड़ रहा है। क्‍योंकि यह फायर लाइन तो बनाई गई है वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए, लेकिन इसका बड़ा भाग यहीं दिल्‍ली में टूट और बिखर रहा है। ऐसे में अगर हवा विपरीत हो जाती है तो यह फायर लाइन की आग ही फायर फाइटर्स को लील लेगी। 

अब मुझे तीन स्थितियां समझ में आ रही है 

                - वर्ष 2014 के चुनाव के लिए सक्रिय बने रहना है और देशभर में आम आदमी पार्टी की जड़ें फैलानी है तो केजरीवाल को दिल्‍ली की गद्दी छोड़नी पड़ेगी। लेकिन यहां एक समस्‍या यह हो गई है कि सभी प्रमुख लोगों को लोकसभा चुनाव के लिए रोका गया था, अब अधिकांश चुनकर आए लोग ऐसे हैं कि दिल्‍ली की गद्दी उन्‍हें सौप दी जाए तो आम आदमी पार्टी की पहली मुख्‍यमंत्री की कुर्सी ही रजिया गुंडों में वाली हालत में पहुंच जाएगी। ऐसे में खुद केजरीवाल को ही यह भार झेलना पड़ेगा। 

                - दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री की कुर्सी को बचाने में कामयाब होते हैं। ऐसे में 7 मार्च के बाद भी राज्‍य सरकार बनी रहती है और कांग्रेस का समर्थन जारी रहता है तो भाजपा के नए नेतृत्‍व और शक्तिशाली विपक्ष को भी झेलना केजरीवाल की मजबूरी होगी। ऐसे में लोकसभा में मोदी से लड़ने का सपना यहीं कुचलकर खत्‍म हो जाएगा। ऐसे में लोकसभा की बागडोर किसी अन्‍य के हाथ में दी जा सकती है। 

छीन झपट कर और पाले पोसे गए इस सपने को केजरीवाल भी किसी और को नहीं देना चाहेंगे। तब वे सरकार गिराकर और कांग्रेस को गालियां निकालते हुए जनता की सहानुभूति के रथ पर सवार हो सकते हैं।  

                - अगर केजरीवाल दिल्‍ली का मोह छोड़कर सीधे लोकसभा की तैयारी करते हैं और पीछे से दिल्‍ली में कुछ ऐसा वैसा हो जाता है तो उनकी हालत हिलते मंच पर खड़े होकर भाषण दे रहे नेताजी जैसी हो जाएगी। नीचे टांगे धूज रही होगी और ऊपर मुंह से बांग निकल रही होगी। 

दिल्‍ली की कुर्सी हाथ में आने के साथ ही केजरीवाल के मुंह में नेवला आ गया है। केजरीवाल ने इससे बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन डॉ. हर्षवर्द्धन पहले ही दिन यह तय कर चुके थे कि चूंकि जनता ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, सो भाजपा सरकार नहीं बनाएगी। भापजा सरकार बनाती तो केजरीवाल को दोहरी सहायता मिलती। दिखाने के लिए 28 एमएलए होते और बोलने और दोषारोपण के लिए एक और जगह खुल जाती। लेकिन अब जिम्‍मेदारी ही सिर पर आ गिरी है। 

यहीं पर आकर फायर ब्रेकर खुद ब्रेक हो रहा है। 

अब इसे मोदी की किस्‍मत कहें या केजरीवाल की बदकिस्‍मती कि प्रधानमंत्री का सपना देख रहे आम आदमी को दिल्‍ली का ऐसा तख्‍त मिला है जिसके नीचे की सारी चूलें हिली हुई है। अब तक जितना बोला है, उतना कर दिखाना तो शक्तिमान के बस में भी नहीं दिखाई दे रहा। कम से कम लोकसभा चुनाव 2014 तक तो कतई नहीं।

मोदी या कहें भाजपा के लिए जरूरी है कि अब केजरीवाल किसी सूरत में दिल्‍ली की राज्‍य सरकार के ही लिपटे रहें। अगर इस काम में भाजपा विफल रहती है तो आम आदमी पार्टी को पूरे देश में फैलने से कोई रोक नहीं पाएगा। 

मोदी आंधी नहीं सत्‍ता के विरोध का दावानल है 
और एक दावानल केजरीवाल को खड़ा किया जा रहा है। 
जिस बिंदू पर दोनों आमने सामने भिडेंगे वहीं दोनों खत्‍म होंगे।