बुधवार, 25 दिसंबर 2013

Social Network Vs Blogging


वर्ष 2006 में पहली बार ब्‍लॉग (Blog) को देखा और वर्ष 2007 में तो इसकी सवारी ही शुरू कर दी। उन दिनों ऑनलाइन लेखन (Online writing) और आज के ऑनलाइन लेखन में दिन रात का अंतर आ गया है। हालांकि पोस्‍ट करने और तुरंत टिप्‍पणियां (Comments) पाने की लालसा और बलवती ही हुई है, लेकिन पहले जितना सटीकता से लिखा जा रहा था, उतनी सटीकता अब नहीं आ पा रही है। कारण स्‍पष्‍ट है कि अब न तो वैसा आराम है न इंतजार। 

ब्‍लॉग की यह खूबसूरत कमी रही है कि हर बार लिखने से पहले सोचने और फिर उसे एडिट (Edit) करने के लिए हमेशा पर्याप्‍त समय रहा। लिखने की जल्‍दबाजी भी नहीं रही। जो लिख दिया, वह तुरंत लोगों की नजर में नहीं आया तो उसे सुधारने या डिलीट तक कर देने के विकल्‍प हमेशा हाथ में रहे। वहीं सोशल मीडिया (Social) में और खासतौर से कहूं तो फेसबुक (Facebook) पर एक बार विचार पोस्‍ट कर देने के बाद डिलीट करने की फुर्सत तक नहीं मिल पाती और लाइक (Like) व कमेंट का दौर शुरू हो जाता है। फिर सोचते हैं यार इतने लोगों ने तो देख लिया अब डिलीट करने से क्‍या फायदा। 

दूसरी तरफ फेसबुक लेखन ने लेखों की लंबाई को लील लिया है। एक विचार पकने से पहले परोसा जाने लगा है। इसका नतीजा कई बार तो यह भी हो रहा है कि मैं सोच कुछ रहा हूं, लिख कुछ रहा हूं और सर्किल में मौजूद लोग उसका अर्थ कुछ और ही लगा रहे हैं। परिणाम यह होता है कि विचार की भ्रूण हत्‍या (Abortion) ही हो जाती है। अब तेज माध्‍यम विचार करने की प्रवृत्ति को उकसाता है, लेकिन विचारों की इस प्रकार की अकाल मृत्‍यु कई बार क्षुब्‍ध कर देती है। 

ब्‍लॉगिंग के शुरूआती दिनों में एक माह में कुल मिलाकर ही तीन या चार पोस्‍ट से ऊपर मेरा आंकड़ा कभी नहीं गया, लेकिन फेसबुक पर तो रोजाना तीन से चार पोस्‍टें हो रही हैं। कई बार मैं खुद को रोकने का प्रयास करता हूं। सोचता हूं कुछ ठहरकर पहले विचार को पक लेने दिया जाए, लेकिन फिर केवल कौतुहल से ही विचार पोस्‍ट होता है कि देखें लोग इस मुद्दे पर क्‍या सोच रहे हैं। नतीजा यह होता है कि पोस्‍ट का ही कबाड़ा हो जाता है। 

सोशल नेटवर्क की एक खूबसूरती यह है कि यह आपको जनता से बीच अधिक से अधिक परोसे जाने का विकल्‍प पेश कर रहा है लेकिन कमी यह है कि चाहने पर भी आप न तो अपनी पूरी बात लिख सकते हैं न लोगों के पास लंबे ख्‍याल पढ़ने का वक्‍त है। 

ब्‍लॉग के जमाने में ब्‍लॉग अखबारों (Newspapers) के रूप में ब्‍लॉगवाणी (Blogvani) और चिठठाजगत (Chitthajagat) ने हम जैसे कई नौसिखियों को पनाह दे रखी थी। हम कुछ भी पोस्‍ट करते, दो या तीन हजार लोगों के समूह तक वह बात पहुंच जाती थी। इसके चलते दूसरे लेखकों और पाठकों के मिलने का सिलसिला बना रहा। इन दोनों ब्‍लॉग एग्रेगेटरों के बंद हो जाने के बाद तो लगा कि अब यहा समय किसके सहारे व्‍यतीत किया जा सकता है। सो आंशिक पलायन कर गए। 

यहां आंशिक इसलिए कहा क्‍योंकि पिछले तीन साल से फेसबुक पर अतिसक्रिय रहने के बावजूद अब तक न तो ब्‍लॉग का प्रेम कम हो पाया है न ही यहां लिखने की चाह खत्‍म हुई है। अब भी जब तक कुछ ऐसा लिखना होता है, जिसे मैं अर्से बाद फिर से देखना चाहूं, तो यहां लिखने चला आता हूं।

देखता हूं कि फेसबुक पर मेरे ही लिखे लेख कालपात्र में समाते जा रहे हैं। सक्रियता में कुछ कमी हुई नहीं कि लोग भूलने लगते हैं। पहले जहां एक पोस्‍ट को मुश्किल से 100 पाठक मिल पाते थे, वहीं अब हर फेसबुक स्‍टेटस (status) को दो से तीन सौ लोग पढ़ रहे हैं। 

फेसबुक प्रोफाइल (profile) पर इसका पता नहीं लगता, लेकिन फेसबुक पेज तो आपको बता देता है कि इतने लोगों की नजर से आपका लेख अब तक निकल चुका है। अब पाठक किसे नहीं चाहिए। समस्‍या तो तब है जब लिखने का अनुशासन आने से पहले पाठक आपसे रूबरू होना शुरू हो जाएं।