गुरुवार, 5 मार्च 2009

रुत आई पपैया थारे बोलण री

रुत आई रे पपैय्या थारै बोलण री रुत आई रे...

महज दस दिन में सर्द हवाएं जैसे गायब हो गई हैं। दिन की तल्‍ख धूप के बाद रेत के धोरों से ठण्‍डी होकर आई हवाएं माहौल में मद घोल देती हैं। ऐसी ही शीतल बयार और शांत वातावरण के बीच चंग की आवाज दूर तक सुनाई देती है और बोल ऐसे कि कदम खुद रुक जाएं। चंग के साथ छमछमों की आवाज थिरकने को मजबूर कर देते हैं। इस बीच बीकानेर में इन दिनों चल रही है होली के धमाल की तैयारी। एक ओर होली की छेड़छाड़ की तैयारियां चल रही हैं वहीं रम्‍मतों और स्‍वांग ने शहर की रंगत ही बदलकर रख दी है। दिन में मानों शहर सोया रहता है और रात ढलते ही गली मोहल्‍ले जीवंत हो उठते हैं।

पहले बात रम्‍मतों की

जहां तक मेरी जानकारी है रम्‍मत का रिवाज केवल बीकानेर में ही है। यहां होली से करीब सात दिन पहले रम्‍मतें शुरू हो जाती है। इनमें प्रमुख हैं हड़ाऊ मैरी, फक्‍कड़ दाता और अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत। रम्‍मत वास्‍तव में एक प्रकार का लोकनाट्य है। इसमें मोहल्‍ले के बीचों बीच स्थित पाटे जिनका उल्‍लेख मैं पहले कर चुका हूं, पर एक नाटक का मंचन किया जाता है। इसमें कलाकार बाहर से नहीं बुलाए जाते बल्कि गली मोहल्‍लों के ही कलाकार पाटे पर पहुंचते हैं और पूरी रात नाटक का मंचन चलता है। लेकिन पाटे पर चढ़ने की राह इतनी आसान भी नहीं होती। पहले सर्वसम्‍मति से कलाकार तय होते हैं। हफ्तों और महीनों पहले इसका अभ्‍यास शुरू हो जाता है। और जब कलाकार मंच पर होते हैं तो एक एक पेज तक के डॉयलॉग एक सांस में बोल जाते हैं। ऐसा बहुत कम ही हुआ है कि कोई कलाकार स्‍टेज पर अपना डॉयलॉग भूला हो। 

हड़ाऊ मैरी की रम्‍मत जहां प्रेम कहानी है वहीं अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत वीर रस से ओतप्रोत होती है। इन नाटकों को लिखा भी स्‍थानीय लोगों ने ही है। रम्‍मत के दौरान ही ख्‍याल भी गाए जाते हैं। ख्‍याल एक प्रकार से तत्‍तकालीन सामाजिक और राजनैतिक व्‍यवस्‍थ पर कटाक्ष होते हैं। स्‍थानीय नेता और जनप्रतिनिधि भी कई बार इन समारोहों में मौजूद रहते हैं और ख्‍याल के दौरान हुए कटाक्ष को हंसते हुए झेलते हैं। उनके पास सिवाय बड़े बूढ़ों के पैर छूने के और कोई ईलाज नहीं होता।

फागणिया फुटबॉल और स्‍वांग

यह भी बीकानेर की अनूठी परम्‍परा है। यहां के पुष्‍करणा स्‍टेडियम में होली से पहले एक दिन फागणिया फुटबॉल भी खेली जाएगी। जिसमें बराक ओबामा से ओबामा बिन लादेन तक सभी शिरकत करेंगे। अस्‍पताल का रोगी और कुंवारी कन्‍या के पीछे भागता साधू भी नजर आ जाएगा। हां जी यह है फागणिया फुटबॉल और जिन लोगों को आप देखेंगे वे होंगे स्‍वांग। यानि बहूरूपिए। बीकानेर के गली मोहल्‍लों में ये स्‍वांग अभी दे दिखाई देने लगे हैं। कई बार तो अजीब स्थिति तब होती है जब अपने काम से जा रहे आदमी को अचानक पीछे से एक युवती आकर दबोच लेती है। आदमी सचेत हुआ तो उसे पता चल जाएगा कि यह युवती का स्‍वांग किए लड़का है तो वापस सहज हो जाएगा वरना बुरी तरह झेंपेगा। कई आदमी तो इतना अच्‍छा स्‍वांग रचाते हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि आदमी है कि औरत। अच्‍छी तरह साफ की गई दाड़ी और गहनों से लदे आदमी की मर्दानगी वेषभूषा में पूरी तरह छिप जाती है।

होली के गीतों और गेवर पर बात अगली पोस्‍ट में ....

यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे

एक  सूचना 


प्रसिद्ध साहित्‍यकार यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे। हजार घोड़ों का सवार सहित सवा सौ पुस्‍तकें लिखने वाले यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र ने मीरा पुरस्‍कार सहित तमाम प्रकार के पुरस्‍कार लिए और अंत तक सादा जीवन जीया। अपनी पत्‍नी जिसे वे भट्टाचार्य के नाम से पुकारते थे, के साथ अंतिम दिनों तक बीकानेर स्थित अपने ही छोटे से घर में रह रहे थे। पिछले दिनों तबियत बिगड़ने पर उन्‍हें एम्‍स ले जाया गया। वहां एक महीने के इलाज के बाद बीकानेर के पीबीएम अस्‍पताल लाया गया। जहां दो-तीन दिन आईसीयू में भर्ती रहने के बाद उन्‍होंने इस ग्रह को अलविदा कह दिया। हिन्‍दी के अलावा मायड़ भाषा में उनके किए कार्यों को लोग लम्‍बे समय तक याद रखेंगे। जनकवि हरीश भादाणी, चिंतक नन्‍दकिशोर आचार्य सहित साहित्‍य से जुड़े तमाम लोगों को साहित्‍य के बड़े भाई के निधन पर शोक हुआ है। मेरा उनसे परिचय इतना था कि बचपन में एक बार उनके घर गया तो उन्‍होंने खुद की लिखी कहानियों की एक छोटी सी किताब मुझे भेंट की थी। इसके बाद कभी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी।

देश में बीकानेर को पहचान और सम्‍मान दिलाने वाले चंद्र की आत्‍मा को ईश्‍वर शांति दे।

उनकी एक पुस्‍तक मरु केसरी की झलकी देख सकते हैं।

बुधवार, 4 मार्च 2009

ऐसो बंसी बजाइ रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...

बीकाणे में जमा होली का रंग
कहते हैं बीकानेर में होली गुजरने के छह महीने तक उसका असर बना रहता है और छह महीने पहले होली की रंगत शुरू हो जाती है। यहां के व्‍यासों को तो साल के किसी भी दिन होली की तरंग में आने की बाकायदा छूट मिली हुई है। वे कभी भी कुछ भी कर सकते हैं। अब जब होली में कुछ ही दिन बाकी बचे हैं तो होली की रंगत परवान पर चढ़ चुकी है। तंग गलियों, खुले मोहल्‍लों और शहर की फसील से सटी चाय-पान की दुकानों पर होली के रसिए शाम ढलते ही एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। डफ (चंग) के साथ के साथ रसियों की फौज जैसे मस्‍ती का माहौल बनाती है, उसे देखकर आने जाने वाले भी रुककर कुछ देर संगीत का आनन्‍द लेते हैं। 

ऐसो बंसी बजई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...
महलां मांई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो.. 

रात गहराने के साथ धोरों से लिपटकर आई बयार फिजा में कुछ ऐसी मस्‍ती घोल देती है कि आठ से साठ सभी मस्‍ती की तरंग में झूमने लगते हैं। बीकानेर में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की खेलणी सप्‍तमी के दिन से होली की अधिकारिक घोषणा हो जाती है। यानि इस दिन से होली की मजाक, गीत और तराने हर कहीं सुनाई देने लगते हैं। अब किसी ने बुरा माना तो वह खुद बुरा बन जाएगा। तैयार रहिए होली की मजाक के लिए। 
अगली पोस्‍ट में बताउंगा होली की रम्‍मतों और गीतों के बारे में... 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

कुछ दिन पहले एक साल हो गया

मुझे सक्रिय रूप से ब्‍लॉग में लिखते हुए कुछ दिन पहले एक साल हो गया है। मुझे ठीक से याद नहीं कि पहला दिन कौनसा था लेकिन फरवरी 2008 में मैंने लेख लिखने शुरू कर दिए थे। अपनी ब्‍लॉगर प्रोफाइल देखता हूं तो पता चलता है कि मैं ब्‍लॉगिंग से जुलाई 2006 से जुड़ा हुआ हूं। लेकिन तब मैंने एकाध पोस्‍ट लिखी और लम्‍बे समय तक चुप हो गया। एक तो पत्रकारिता में बुरी तरह उलझा हुआ था दूसरे कुछ ही दिन में मेरा पुत्र कान्‍हा पैदा हो गया था। सो जिन्‍दगी ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि अब तक रोलर कोस्‍टर राइड कर रहा हूं। हां, छोटे शहर की अपने तरह की राइड है, लेकिन है तेज ही।

मेरा पहला ब्‍लॉग यही दिमाग की हलचल था। शुरू में पता नहीं था कि क्‍या लिखें कैसे लिखें। तो मैंने अपने ब्‍लॉग का नाम दिया था दर्शन और अध्‍यात्‍म। फिलासाफी में एमए किया था तो सोचा कि अब तक पढ़ने के बाद चर्चा से तैयार हुआ ज्ञान नेट पर बिखेरा जाए। कुछ ही दिन में गलती पता चल गई और लगा कि कई धुरंधर लोग मुझसे अधिक कूटा-छाना हुआ पेश कर रहे हैं तो फिर रुक गया। इसी दौरान एक और ब्‍लॉग बना लिया ज्‍योतिष दर्शन। इसमें मेरे पास ढेर सा मसाला था जिसे मैं नेट पर शेयर कर सकता था। लिखना शुरू किया तो दिशा नहीं थी। शुरू में तो एग्रेगेटर्स से भी नहीं जुड़ा था सो मैं लिखता और लोगों को घर बुलाकर नेट चलाकर दिखाता और लेख पढ़वाता था। बाद में धीरे-धीरे इंटरनेट की यु‍‍टीलिटीज के बारे में जानकारी एकत्रित की। हर दिन कुछ नया सीखता। टैम्‍पलेट, एचटीएमएल, यूनीकोड फोंट, हिन्‍दी टूल जैसी सैकड़ों चीजें सीखी। आज की तारीख में महज गूगल के ही 27 टूल इस्‍तेमाल कर रहा हूं। इस दौरान ही वर्डप्रेस पर भी गया। वहां ज्‍योतिषी नाम से एक ब्‍लॉग बनाया। लेकिन वह अधिक सफल नहीं हुआ। बाद में मैंने इसे बदलकर ज्‍योतिष प्रवेशिका कर दिया। समय आने पर इसमें बहुत सा मैटर पेल सकूंगा।

ज्‍योतिष दर्शन और दिमाग की हलचल के बाद नम्‍बर आया भड़ास का। पत्रकारों के इस ब्‍लॉग में पहले सदस्‍यता के लिए मेल नहीं करनी पड़ती थी। यह सबके लिए खुला था। मैंने लॉगइन किया और बन गया सदस्‍य। शुरू में कुछ लिखना भी शुरू किया लेकिन बाकी लोग इतना भीषण लिख रहे थे कि मेरी हिम्‍मत ही नहीं होती थी उस स्‍तर पर जाने और वैसा लिखने की। धुरंधर लोगों के बीच बस पाठक के रूप में शामिल रहा। अब इस ब्‍लॉग में कुछ सुधार हुआ है सो लिखने का मन करने लगा है। शीघ्र ही कुछ बिंदुओं के साथ भड़ास पर लिखना शुरू करूंगा। हां इस कम्‍युनिटी ब्‍लॉग पर लगे मेरे ब्‍लॉग के लिंक से बहुत से लोग मेरे पास आए। यह जानकारी मुझे दी गूगल एनालिटिक्‍स ने।

इसके बाद बना मेरे अंचल की कहावतें ब्‍लॉग। जयपुर के ब्‍लॉगर राजीव जैन से चैट के दौरान में लगातार लोकोक्तियां इस्‍तेमाल कर रहा था। उन्‍होंने मुझे प्रोत्‍साहित किया और एक कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनाने के लिए कहा। बातचीत के दौरान ही मैंने वह ब्‍लॉग बना दिया। कहावतें नाम से यूआरएल भी मिल गया। पहली ही रात इस ब्‍लॉग के दो सदस्‍य बन चुके थे। बाद में और लोग भी जुड़े। आज इसके 19 लेखक हैं। कुछ लेखक तो नियमित रूप से इसमें लिखते हैं तो कुछ ने एक समय विशेष में लिखा। इन दिनों उनकी कहावतें नहीं आ रही। लेकिन इस खूबसूरत ब्‍लॉग में हर लेखक का योगदान अमूल्‍य है। एक मॉडरेटर के रूप में मुझे जो लोगों का प्रेम और विश्‍वास मिला उसे शब्‍दों में व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता।

कहावतें ब्‍लॉग के बाद पिछले दिनों अपनी भाषा में कुछ करने का मन हुआ। हालांकि इससे पहले अविनाश वाचस्‍पति जी मुझे सलाह दे चुके थे कि अधिक संख्‍या में ब्‍लॉग बनाओगे तो उनमें नियमित रूप से लिखने में कठिनाई होगी। पर यहां समस्‍या यह है कि हर विषय और स्‍वाद के अनुसार ब्‍लॉग तो अलग रखना ही पड़ेगा। वरना एक ही ब्‍लॉग में खिचड़ी बन जाएगी। सो अपनी मातृभाषा के लिए कुछ करने के उद्देश्‍य से शुरू किया आपणी मायड़ ब्‍लॉग। इस ब्‍लॉग में शुरू में मैंने वैद्य सत्‍यनारायणजी व्‍यास सा की कविताएं प्रस्‍तुत की हैं। उनके नायक नायिका भेद को भी ब्‍लॉग में उतारने के बाद मैं आपणी मायड़ में बीकानेर में मायड़ भाषा को लेकर हो रही गतिविधियों को परोसने का प्रयास करूंगा। आज-कल में न सही दो पांच या दस साल में यह महत्‍वपूर्ण ऑनलाइन दस्‍तावेज बन जाएगा।

भड़ास और कहावतें के अलावा नुक्‍कड़, भारतीय शिक्षा और भारतीय ज्‍योतिषी कम्‍युनिटी ब्‍लॉगों का भी सदस्‍य हूं। लेकिन इनमें मैंने बहुत नहीं लिखा है। नुक्‍कड़ में तो अब तक एक भी लेख नहीं लिख पाया हूं। कहते हुए शरमा तो रहा हूं लेकिन एक ब्‍लॉग मैंने अंग्रेजी में भी बनाया। इसे बनाने के दो कारण थे। पहला तो यह कि कई हिन्‍दी ब्‍लॉगर्स ने मुझसे पूछा कि आपको गूगल एडसेंस ने कैसे जोड़ लिया हमें तो वह अनसपोर्टेड लैंग्‍वेज कहकर छिटका देता है। यही समस्‍या मेरे साथ भी आई थी। मैंने अपने स्‍तर पर गूगल एडसेंस से बातचीत की और उन्‍हें एड देने के लिए मना लिया। बाद में गूगल ने एड तो दिए लेकिन सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही देता रहा। तब मैंने दूसरे ब्‍लॉगर्स को बताने के लिए और गूगल एडसेंस को चेक करने के लिए अंग्रेजी में 99 ka pher नाम से ब्‍लॉग बनाया। इसमें मैंने पैसा कमाने के तरीके बताने शुरू किए। हालांकि अब तक मैंने केवल यही बताया है कि एडसेंस से कैसे वार्ता की जाए कि वे एड देने के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉगर को रजिस्‍टर कर लें। चार लेख से आगे यह ब्‍लॉग बढ़ नहीं पाया है। इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि पैसा कमाने के प्रति मेरी बहुत अधिक रूचि नहीं है। एडसेंस से एड लेना प्रतिष्‍ठा का विषय बना तो ले लिए। दूसरा कारण अंग्रेजी में हाथ तंग होना तो है ही। :)

इस तरह एक साल का समय कुछ ऐसे बीता कि पता ही नहीं चला कि कब एक साल हो गया। बस लिखता गया और बढ़ता गया। मुझे लगता है कि आज जो लेख लिखा है यह मुझे पांच साल बाद लिखना चाहिए। उम्‍मीद करता हूं कि फरवरी 2013 में एक बार फिर मैं ऐसा लेख लिखूं जिसमें बहुत सारी यादें हों। वैसे यादें तो अब तक की भी हैं। मसलन स्‍त्री की सुंदरता के विषय में लिखने के बाद महिला ब्‍लॉगरों से झाड़ खाना, टिप्‍पणी पर लिखकर समीर भाई को छेड़ देना, भड़ास पर मन नहीं लगने की बात कहकर हलचल पैदा करना। लेकिन कहीं भी मेरा मंतव्‍य ऐसा नहीं था कि हलचल पैदा करूं। हां, वे सभी हलचलें मेरे दिमाग में जरूर थीं।

अब तक सभी ब्‍लॉगरों से सहयोग, प्‍यार, आशीर्वाद और विचार मिले हैं। आशा करता हूं कि आगे भी मिलते रहेंगे...

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

कुरजां के साथ एक दिन

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

इन्‍हें फेल कर दो

समीरजी की किसी ने देखा तो नहीं पढ़ा तो मुझे भी अपना एक किस्‍सा याद आ गया। तब मैं सातवीं कक्षा में था। दिनभर खेलना कूदना और धमाचौकड़ी करना। इसके लिए हम पर्याप्‍त दोस्‍त थे। एक मिनट भी शांति नहीं मिलती थी। स्‍कूल से बारह बजे लौटने के बाद रात दस बजे एक एक मिनट का कार्यक्रम पूर्वतय रहता। सो पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता था। अनुज आनन्‍द छठी क्‍लास में था। दोनों की धमाचौकड़ी से परेशान मम्‍मी ऑफिस से लौटने के बाद जमकर गालियां निकालती। गला साफ करने के बाद हाथ भी साफ करतीं। सो मानसिक और शारीरिक ताकत की कीमत और उसे जल्‍द से जल्‍द अतिविकसित करने का ख्‍याल वहीं से आया।

खैर हमारी धींगामुश्ति को देखते हुए ऐन परीक्षा के दिनों में मम्‍मी किन्‍हीं कारणों से पढ़ा नहीं पाई। परीक्षा के बाद उन्‍हें ध्‍यान आया कि बच्‍चों की परीक्षा हो चुकी है। सो उन्‍होंने अधिकृत घोषणा कर दी कि इस साल आनन्‍द और नरेन्‍द्र (मेरा घर का नाम) दोनों फेल होंगे। मिठाईयां बंट गई और शाबासी के न्‍यौते आने लगे। अब हम क्‍या सफाई दें। इम्तिहान में मिले पर्चे लेकर हम लगभग सभी गुणीजनों की सेवा में उपस्‍िथत हुए और पूरा पर्चा हल करके बताया तो हमारी तारीफ भी हुई और सलाह भी मिली कि पहले ही मेहनत करके पाठ याद करते तो परीक्षा में भी ऐसा ही पर्चा हल कर आते। हम कटकर रह जाते। परीक्षा परिणामा आने तक तो खुद हम दोनों को ही यकीन हो गया कि इस बार तो फेल हो गए। किताबें भी नई नहीं दिलाई गई। पिछले साल की किताबें ही जो काम आनी थी।

परिणाम आ गया। घर में सभी लोग इतने आशवस्‍त थे कि कोई भी स्‍कूल नहीं गया। दोस्‍तों को पता था कि सिद्धार्थ हर साल की तरह इस साल भी गिरता पड़ता पास हो जाएगा तो किसी ने रिजल्‍ट शीट में मेरा नाम ढूंढने की भी कोशिश नहीं की। धमाका आनन्‍द ने कर दिया। वह क्‍लास टॉप कर गया। सो उसके मित्र घर आ गए और बता दिया। मम्‍मी ऑफिस गई थी। हम दोनों ही घर में थे। आनन्‍द ने सुना तो मेरा पूछा। दोस्‍तों ने कहा पता नहीं तेरा तो देखा ही नहीं। मैं सन्‍न। किसी तरह तैयार होकर स्‍कूल पहुंचा तो मास्‍टरजी मिल गए। पूछा क्‍या हुआ पास या फेल। मैंने कहा पता नहीं तो उनकी पेशानी पर भी बल पड़ गया। खैर बाबूजी से पूछा तो पता चला कि पिछले सालों की तरह ही पास हो गया था।

अब शाम तो सभी लोग घर पहुंचे तो हम पहले की तरह नाच गा रहे थे। पिछले कुछ दिन से  यह क्रम रुक सा गया था। अब फिर से शुरू हुआ तो मम्‍मी ने कहा कि इन लड़कों को बिल्‍कुल शर्म नहीं है। हमने बताया कि पास हो गए हैं तो मम्‍मी बिगड़ गई। पहले तो विश्‍वास ही नहीं किया और जब विश्‍वास दिलाया तो और भी बड़ा धमाका हुआ। वे अगले दिन सुबह हमारी स्‍कूल के प्रिंसीपल शास्‍त्री जी (उन्‍होंने संस्‍कृत में शास्‍त्री की उपाधि प्राप्‍त की थी सो उनका नाम ही शास्‍त्रीजी पड़ गया था, एक बात और वे औरतों से बात नहीं करते थे, महिला सामने आने पर गर्दन नीचे किए रखते और धीरे धीरे बोलते थे) के पास पहुंच गई। उन्‍होंने उनकी मेज पर धौल मारकर बोलीं इन बच्‍चों को आपने कैसे पास कर दिया। इन दोनों ने पूरे साल पढ़ाई नहीं की। अगर इसी तरह आप पास करते रहे तो इनकी नींव कमजोर रह जाएगी। कैसे भी हो आप इन दोनों को फेल कर दो। अब हैरान होने के बारी शास्‍त्रीजी की थी। उन्‍होंने कहा ठीक है कर दूंगा और किसी तरह मम्‍मी को टाला और शाम तक आ गए मेरे पड़नानाजी के पास जो उनके गुरू रहे थे। मेरे पड़नाना बहुत हंसे। बोले विश्‍वास तो मुझे भी नहीं हो रहा है। उन्‍होंने शास्‍त्रीजी को समझाकर भेजा। अगले दिन पूरी स्‍कूल और सभी रिश्‍तेदारों को यह बात मालूम हो चुकी थी। यह कई दिन तक हंसी मजाक का केन्‍द्र बनी रही। और हमारी हालत... वह तो किसी ने भी नहीं देखी।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

कोने रोकने का खेल

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जब हम लोग छोटे थे तो एक खेल खेलते थे। इस खेल में पाटे पर कुछ बच्‍चे चढ़ जाते। आमतौर पर इसे पांच लोग खेल सकते हैं। जैसा कि आप समझ सकते हैं कि चौकोर पाटे में चार खाने हो सकते हैं। एक बच्‍चा एक कोने में और बाकी तीन दूसरे तीन खानों में। पांचवा बच्‍चा बीच में खड़ा होता। एक बच्‍चा अधिक देर तक अपने स्‍थान पर खड़ा नहीं रह सकता था। यानि उसे कोना छोड़ना होता था और दूसरे कोने वाले से एक्‍सचेंज करना होता। इसी प्रयास के दौरान बीच में खड़ा बच्‍चा खाली हो रहे कोने में धंसकने की कोशिश करता। अगर कोना पकड़ने में सफल होता तो जो पिछड़ता वह बीच में आ जाता। इसे खुणा रोकणी यानि कोना रोकने का खेल कहते हैं।

इस खेल के बाद एक दूसरे खेल में जुड़ा वह था बॉस्‍केटबॉल। मैं तीन कोर्ट पर प्रेक्टिस किया करता था। कॉलेज में, रेलवे ग्राउंड में और पुष्‍करणा स्‍टेडियम में। मुझे तीनों जगह आसानी से प्रवेश मिल जाता था। इसके दो कारण थे। पहला कि मैं किसी ग्रुप का सदस्‍य नहीं था। तो जो भी टीम बनती मुझे आसानी से प्रवेश मिल जाता। खेलने वालों को तो बस खिला‍ड़ी चाहिए। यहां खुणा रोकणी से दूसरी बार साक्षात्‍कार हुआ। हर कोर्ट पर अपने कोने दबाए हुए लोग मिलते। कुछ किनारों पर होते तो कुछ बीच में खड़े भी मिलते। मैं खुद ही बीच में ही रहता। क्‍योंकि तीन कोर्ट में प्रवेश होने के कारण कभी किसी कोने से मोह नहीं रहा। खेल के आखिरी दिनों में मैंने छोटे बच्‍चों को सिखाना शुरू किया और पूर्व में सिखा रहे प्रशिक्षकों की दमनकारी नीतियों से हटकर हर किसी को कोर्ट पर खुला निमंत्रण दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहली बार पुष्‍करणा स्‍टेडियम की टीम जिला स्‍तरीय प्रतियोगिता में तीसरे चक्र तक पहुंची। आमतौर पर उसे प्रवेश ही नहीं मिलता था। पहली सफलता के बाद कई लोगों के कोने असुरक्षित हो गए। मेरा विरोध शुरू हो गया। मेरा ध्‍यान पहली बार कोना पकड़कर खड़े लोगों पर गया। मैंने उन्‍हें समझाने की कोशिश की लेकिन देर हो चुकी थी। मैं चाहे-अनचाहे भीषण वार कर चुका था। एक बार फिर मैंने पूरा पाटा ही छोड़ दिया। यानि ग्राउंड जाना बंद कर दिया। लेकिन एक सोच दिमाग में घर कर गई कि जो लोग जिन किनारों पर खड़े होते हैं उन्‍हें उन किनारों से प्‍यार हो जाता है। जब कोई बाहर से आता है और उन किनारों में कुछ बदलाव करने की कोशिश करता है तो किनारा पकड़कर बैठे लोगों को बहुत तकलीफ होती है।

अब ऐसा ही कुछ खेल ब्‍लॉगिंग में भी दिखाई दे रहा है...

 

...इति

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

फलवर्द्धिका यानि फलौदी यानि फल का बढ़ना

बताया जाता है कि जोधपुर के राठौड़ परिवार से संबंध रखने वाली मां लटियाल यानि उष्‍ट्रवाहिनी माता ने जोधपुर छोड़ दिया और एक अनजाने गंतव्‍य की ओर निकल पड़ी। एक स्‍थान पर आकर खेजड़ी के एक वृक्ष में उनका ऊंट गाड़ी फंस गई। ऐसा फंसी कि बहुत कोशिश करने के बाद भी निकल नहीं पाई। तो पुष्‍करणा ब्राह्मण समुदाय की इस कुलदेवी ने कहा कि इस स्‍थान पर जो व्‍यक्ति साधना करेगा उसके फल में वृद्धि होगी। इस घटना के बाद स्‍थान का नाम पड़ा फलवर्द्धिका। बाद में इसी नाम का अपभ्रंश बना फलौदी। 

फलौदी तहसील के पास खींचन के तीन पानी के छोटे-छोटे स्रोत हैं। जहां साइबेरिया, मंगोलिया और मध्‍य यूरोप से हर साल हजारों की तादाद में प्रवासी कुरजां पक्षी आते हैं। इस पक्षी का जूलोजिकल नाम शीघ्र ही पता लगाकर बताउंगा। खींचन के आस-पासा के करीब पैंतालीस किलोमीटर क्षेत्र में यह पक्षी बिखरे हुए हैं लेकिन सुबह साढ़े छह से साढ़े सात बजे के बीच ये सभी पक्षी खींचन में एकत्रित हो जाते हैं। इसका एक ही कारण है, वह है भोजन। यहां बने एक चुग्‍गाघर में करीब आठ क्विंटल दाना हर रात डाला जाता है। जिसे खाने के लिए कुरजां यहां एकत्र होते हैं। सुबह होते ही चुग्‍गाघर के आस-पास के धोरों पर कुरजां का जमाव शुरू हो जाता है। कुछ देर धोरों पर शौचादि से निवृत होने के बाद कुरजां चुग्‍गाघर का रुख करते हैं पैदल। यानि मॉर्निंग वॉक भी हो गया। इसके बाद कुरजां एक साथ चुग्‍गाघर के चारों ओर तीन चक्‍कर लगाते हैं। दिसम्‍बर में इनकी संख्‍या सर्वाधिक होती है। रविवार की सुबह जब मैं वहां था तो बताया जा रहा था कि अब तो केवल आठ हजार कुरजां ही यहां बचे हैं, शेष अपने वतन को लौट चुके हैं। हम चुग्‍गाघर के बिल्‍कुल सटी हुई बिल्डिंग में डटे हुए थे। तो करीब आठ हजार कुरजां हमारे सिर के ऊपर से तीन चक्‍कर निकाले। कर-कर की आवाज के साथ हजारों पक्षियों के समूह ने हमें नि:शब्‍द कर दिया। हम बस आंखे फैलाए अपने छोटे बडे़ कैमरों से उनकी तस्‍वीरें निकाल रहे थे। ठण्‍ड से हाथ जमे जा रहे थे लेकिन बटन दबाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। जैसे ही सूर्य उदय हुआ मानो काले और सफेद रंग के कुरजां एकदम से सुनहरे रंग में तब्‍दील हो गए।
कुरजां के कुछ और फोटोग्राफ के साथ .... 

यह मेरे द्वारा खींचा गया सबसे अच्‍छा फोटो कहा जा सकता है। शनिवार शाम जब सूर्य अस्‍त हो रहा था तो तालाब, मंदिर, सूर्य और कुरजां को एक साथ कैमरे में कैद करने में सफल हो पाया था। वैसे हमारे साथ पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्‍ता भी थे। उनके खीचें चित्रों के सामने यह मजाक लगता है। उन्‍होंने डूबते सूर्य के बीच में से गुजरते कुरजां को कैद किया। उन्‍होंने अपने फोटो दिखाए तो मैंने अपना कैमरा पीछे छिपा लिया था। :)
यह दृ श्‍य बहुत अधिक बयां करता है। मैं केवल संकेत देना चाहूंगा। चित्र में एक ओर कुरजां हैं जिनके लिए यह चुग्‍गाघर बना है और दाना डाला जाता है। इन्‍हें देखने के लिए टूरिस्‍ट यहां आते हैं। दूसरी ओर कबूतरों का झुण्‍ड है जो दाना देखकर एकत्र होता है। देखने में यह पंचायत बैठी लगती है जहां गोल घेरा बनाए लोग भोजन का प्रसाद ले रहे हैं लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। ध्‍यान से देखने पर बीचों-बीच बैठी बिल्‍ली दिखेगी। अब आप माजरा समझ गए होंगे कि यह गोल घेरा कैसे बना। इस तस्‍वीर को लेकर बाकी बातें फिर कभी। 

अरे नया नया पक्षी विज्ञानी :) 
इसकी तो शक्‍ल भी मुझसे मिलती है। :)
देखकर पहचान जाता हूं कि इनके पर हैं और उड़ भी रहे हैं तो पक्षी ही होंगे :) 


सुनहरी उड़ान यह उस वक्‍त का फोटो है जब कुरजां चुग्‍गाघर के ऊपर चक्‍कर लगा रहे थे। सूरज उदय हो रहा था और दाना चुगने के लिए दूसरे पक्षी भी जमा हो रहे थे। 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

लौटने लगे प्रवासी


जोधपुर के पास फलोदी तहसील में खीचन गाँव में हर साल हजारों प्रवासी कुरजां आते हैं. टूरिस्ट इन प्रवासियों को देखतें हैं और यहाँ के बच्चे टूरिस्टों को

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रिंग रिंग रिंगा.. भाग एक

शुरू से आखिर तक जमाल के पास उम्‍मीद बांधने का कोई आधार नहीं होता। धोबीघाट से झुग्‍गी झोंपडि़यों और सड़कों से ट्रेन की पटरियों तक होता है तो बस संघर्ष खुद को जिंदा बनाए रखने का। भाई सलीम फिर भी सोचता है कि उसे पैसा कमाना है लेकिन जमाल बस जुनून होता है। 
हर काम, हर शब्‍द, हर क्षण, हर बात में जुनून। अब इस अंदर की आग को कैसे पेश किया जाए। भावनाओं का तूफान तैयार कर दिया गया है। किसकी जटाएं इस सैलाब को समेट सकती हैं। तो गढ़ दी गई लतिका। अब समझ में आता है कि क्‍यों इस छोरे के दिल में इतनी आग है। फिल्‍म जिजिविषा से हटकर आ जाती है प्रेम के तीव्र भाव पर। निर्देशक की मजबूरी है। अधिसंख्‍य समुदाय इसी लॉजिक को समझेगा कि लगातार कठिन होती जिंदगी में ऐसा कौनसा दीपक था जो बर्फीले पानी में छोरे को खड़े रहने का साहस दे गया। क्‍या लतिका के प्‍यार में ऐसा कुछ था। 

नहीं मुझे नहीं लगता। 

रिंग रिंग रिंगा... 
रिंग रिंग रिंगा्... 
रिंग रिंग रिंगा... 


नहीं ऐसा नहीं हो सकता। 

ठीक है एक उदाहरण है अभी मेरे पास। शायद कभी ओशो ने सुनाया होगा अपने शिष्‍यों को। वे कहते हैं जब बुद्ध घर से निकले और बीमार, कमजोर और मृत को देख चुके थे तो वे उतनी दुनिया देख चुके थे जितनी कि एक आम पश्चिमी व्‍यक्ति देखता है। फिर बुद्ध ने देखा एक साधू को। बस यहीं अंतर आ गया। इसी दुनिया में रहते हुए दुनिया से निवृत्त रहकर साधना करता है और एक दिन परम पिता में एकाकार होने के लिए चल देता है। पहले सशरीर उसके साथ होता है बाद में शरीर भी छोड़ देता है। 

जमाल सामान्‍य बच्‍चा है। अपनी जिंदगी जी रहा है। पिता का पता नहीं एक दिन मां भी मर जाती है। अब कहां जाए। जहां जिंदा रहा जा सके। भीख मंगवाने वाले से दूर रहना भी जरूरी है। मूर्ख विदेशियों ने गाइड समझ लिया तो अच्‍छा है। इसी से कुछ पैसा कमा लेंगे। हमें कौनसी जमीन खरीदनी है। बस जिंदा रहना है। भाई छोड दे, यार दोस्‍त अलग हो जाए तो भी जिंदगी चलती रहती है। उसी दम पर तेजी से आगे बढ़ती है। कॉल सेंटर का चायवाला कॉल सेंटर के कई एक्‍जीक्‍युटिव्‍स से अधिक जानता है। आग है और लगातार जल रही है। अब एक दिन हू वांट्स टू बी मिलेनियर में पहुंच जाता है। जिंदगी के तीखे उतार चढ़ावों के साथ सवालों का उतार चढ़ाव तारतम्‍यता बैठा लेता है। अब जमाल, जिन्‍दगी और सवाल एक हो जाते हैं। पूछने वाले को अंदाज नहीं है कि सामने जो चायवाला बैठा है उसके पीछे कितनी कहानियां हैं। 

बस एक ही मलाल --- ये राम और अल्‍लाह नहीं होते तो आज जमाल की मां जिन्‍दा होती। 

रिंग रिंग रिंगा... 

मंदी की मार झेल रही दुनिया में झुग्‍गी से बाहर आए भारत की आंखें चमक से भरी हुई है और एक नियंत्रक पूरे जोश के साथ जमाल का स्‍वागत कर रहा है आइए खेलते हैं जमाल ए चायवाल के साथ कौन बनेगा करोड़पति। 

रिंग रिंग रिंगा... 


ये अनिल कपूर और ओबामा की शकल मिलती जुलती है क्‍या... 


रिंग रिंग रिंगा... 

बस एक सेकेण्‍ड के लिए और पकाउंगा-- जिन लोगों ने ओबामा की विजय के बारे में इस ब्‍लॉग पर पढ़ा है तो पिंकी की विजय  के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। विजय का दौर फिर से शुरू हो रहा है। 

रविवार, 25 जनवरी 2009

डर का ठोस कारण

पहली बार ऐसी हॉरर मूवी देखी है जिसमें डर का एक ठोस कारण है। डर पैदा करने वाले का भी और जो लोग डरे हुए हैं उनका भी। फिल्‍म खत्‍म होने के साथ ही डर भी खत्‍म हो गया और हॉल से निकलते वक्‍त दिल और दिमाग दोनों हल्‍के थे।
भारतीय फिल्‍म परम्‍परा में प्रेम और बदला प्रमुख हैं। राज द मिस्‍ट्री कन्‍टीन्‍यूज में पहले तो यही कंफ्यूजन है कि हीरो कौन है। अपने दिमाग के अनुसार तो वही हीरो होता है जिसके पास हीरोइन होती है (नशा पैदा करने वाली नहीं नशे में रहने वाली) और जो हीरोइन और हीरो के मिलने का विरोध करता है वह विलेन होता है। इस मूवी में तो सब गढमढ है। हीरोइन फिल्‍म के शुरू में किसी और के सामने नाचती है और इंटरवेल तक किसी और के साथ गंभीर हो जाती है और अंत में अकेली बैठी नजर आती है।
अब प्रेम का पक्ष तो खत्‍म बचा बदला। हीरो अपने बाप का बदला नहीं लेता बल्कि जिस लक्ष्‍य को लेकर उसका बाप मरा है उस लक्ष्य को पूरा करने की बस गरज होती है। अंत में हीरो के बाप को खुद ही विलेन को मारना पड़ता है।
जो भी हो फिल्‍म में पर्यावरण के प्रति दिखाई गई चिंता और डर पैदा होने का ठोस कारण इसे विशिष्‍ट बना देते हैं। कहानी इतनी दमदार है कि अन्‍य पक्षों की कमजोरी का पता ही नहीं चलता। दर्शक दम साधे कहानी के साथ आगे बढता रहता है। आखिर में जब सबकुछ खुलकर सामने आ जाता है तो तीन घण्‍टे के दौरान पैदा हुआ स्‍ट्रेस भी खत्‍म हो जाता है।
अंत में मेरी सलाह यही है कि फिल्‍म देखनी चाहिए। और हां फिल्‍म में जग्‍गू दादा का अहम रोल है।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

भारतीय सुंदरियों और ओबामा की विजय

बाजार का दबाव किस तरह सत्‍ता को बदल देता है इसका दूसरा उदाहरण मैंने अपनी जिंदगी में देखा है। पहला उदाहरण था भारतीय सुंदरियों का विश्‍व विजयी होना। भारत की उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के ठीक बाद यह घटना हुई। यानि अचानक भारतीय सुंदरियां इतनी सुंदर और समझदार हो गई कि उन्‍होंने गोरी चमड़ी और उनके दीर्घकालीन प्रशिक्षणों तक को धता बजाते हुए विश्‍व की दो सबसे बड़ी स्‍पद्धाओं में ब्रह्माण्‍ड सुंदरी और विश्‍व सुंदरी के खिताब हासिल कर लिए। इसके बाद तो भारत की हर सुंदरी विश्‍व विजय का ख्‍वाब देखने लगी। सभी को पता था कि चेहरे का अधिक महत्‍व नहीं है। सुंदर होने के लिए कुछ कैमिकल्‍स और कुछ प्रशिक्षण की जरूरत है बस। देसी कंपनियों के पास वह कैमिकल नहीं था और विदेशी कंपनियों के लिए विश्‍व स्‍तर की भारतीय सुंदरियों वकालत की। चाहे एड में ही सही। लेकिन असर हुआ और गा‍रनियर से लेकर लोरियाल तक की कंपनियों ने बढ़ते बाजार में जमकर माल बेचा। माल इतना अधिक बिका कि फेयर एण्‍ड लवली को तो अपनी विज्ञापनो में यहां तक लिखना पड़ा कि केरल और तमिलनाडू की सुंदरियों को यह क्रीम गोरा नहीं बना पाएगी।
मुझे यही स्थिति ओबामा की विजय की लगती है। रेड इंडियन्‍स को खदेड़ने के बाद क्‍या आज तक एक भी ऐसा काला आदमी नहीं आया जो इतना बुद्धिमान हो कि वह अमरीकी शासन का नेतृत्‍व कर सके। नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता। आज तक ओबामा से कहीं अधिक बुद्धिमान और श्रेष्‍ठ काले लोगों ने अमेरिका के लिए बहुत कुछ किया होगा और इस देश को आगे बढ़ाने के प्रयासों में कहीं कसर नहीं रखी होगी। अब ऐसा क्‍या हो गया जो ओबामा को शीर्ष पर बिठाना पड़ गया। क्‍या तीसरी दुनिया के देशों से संवाद का यही एक रास्‍ता बचा था, क्‍या मंदी से टूटते अमरीका को किसी काले की जरूरत थी, क्‍या आम आदमी की राष्‍ट्रभक्ति पाने के लिए काले को लाया गया है, यह काला कितने प्रतिशत काला है, किन कालों का नेतृत्‍व करता है। ये सब बातें आपस में गढ़मढ़ होती है और भारतीय होने के नाते चुप रहने की कोशिश करता हूं। क्‍योंकि आखिर ओबामा ने दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक भारत को चुना और पाकिस्‍तान को चेतावनी दी। फिर भी क्‍यों मुझे लगता है वर्णभेद, इस्‍लामी आतंकवाद और बाजार के दबाव ने ओबामा का भाग्‍य पहले ही तय कर दिया था। अब इंसान के रूप में खड़ा यह व्‍यक्ति तो निमित्त मात्र है।

सोमवार, 5 जनवरी 2009

सरजमीने हिन्‍द की औरतों...

आज मैं कह सकता हूं, सरजमीने हिंद की औरतों, तुम्हें सलाम।
ऐसा क्यों । इसका एक मोटा कारण है।

रविवार को मैं जयपुर में था। मौका था राजस्थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्कारों का। बैस्ट कवरेज कैटेगरी में मेरी टीम को राष्ट्रीय स्‍तर पर तीसरा पुरस्कार मिला था। पुरस्कार लेने के बाद हमें अतिरिक्त पुरस्कार के रूप में मिला स्वामीनाथन गुरूमूर्ति का भाषण। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय इकॉनोमी पर स्वामीनाथन के भाषण ने जैसे हमारी (मेरी) आंखें खोल दी।

उन्होंने फैमिली सिस्टम के आधार पर अमरीकी उपभोक्तावाद और बचत के प्रारूप को विस्तार से बताया। आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि अमरीका का इकॉनोमिक डाउनफॉल 80 के दशक में ही शुरू हो चुका था। इसके बाद का काल तो ऐसा था कि अमरीकी लोगों के लिए खर्च करने के लिए जेब भरी होने की जरूरत ही नहीं थी। यानि उधार लो और खर्च कर दो। अब अमरीकी लोगों ने बाजार से पैसा लिया और घूमने फिरने जैसे उपभोग में उसे खर्च कर दिया। चूंकि उनका पैसा और पैसा पैदा नहीं कर रहा था इसलिए रीपेमेंट की स्थितियां बाकी नहीं बची। ऐसे में अमरीकी उपभोक्‍तावाद पूरी तरह उधार लो और खर्च कर दो पर आ गया। अमरीका को सुपर पावर मानने वाले देश उसे ही ऋण देकर पैसे वाला बना रहे थे। आने वाले पैसे का उपभोग अमरीकी करते रहे। एक दिन बिना बचत वाला यह गुब्‍बारा फूट गया।

कुल मिलाकर समझा जाए तो किसी भी देश की अर्थव्‍यवस्‍था आम आदमी की बचत पर निर्भर करती है। और इसी आम आदमी द्वारा खर्च को बढ़ावा दिए जाने पर अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। जिन देशों को अधिक उपभोक्ताओं की जरूरत थी उन्होंने टारगेटेड देश की औरतों को इस प्रकार शिक्षित किया कि वे औरतें घोंसला संभालने वाली चिडि़या की बजाय आदमी का ही दूसरा रूप बन गई और जमकर खरीदारी और निवेश करने लगीं। ऐसे देश तेजी से उपभोक्ता वादी संस्‍कृति के‍ शिकार हुए। इसके विपरीत जापान में न तो पुरुषों में ना ही स्त्रियों में बचत को निकालकर निवेश या खर्च की प्रवृत्ति है। इस कारण बाजार को गति देने के प्रयास के मद्देनजर जब जापान में बचत पर ब्याज को कम किया गया उसके बावजूद वहां बचत की प्रवृत्ति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अब बात करते हैं भारत की

भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो दशक हो रहे हैं। इस दौरान ब्याज की दरों में कमी, शेयर बाजार की तेजी, निवेश के आसान रास्ते और खर्च प्रोत्सातहित करने के लिए अनगिनत स्कीमें लोगों के सामने पेश की गई। इतना सबकुछ होने के बाद जहां भारतीय पुरुष आम पुरुषों की तरह खर्च और निवेश पर ध्यान देने लगे, वहीं भारतीय स्त्रियां अब भी जरूरत की चीजों में ही खर्च कर रही हैं। यानि एक स्‍त्री जब कोई चीज खरीदती है तो उसका मूल कारण यही होता है कि क्‍या इस उत्‍पाद की अभी घर में जरूरत है। इस वजह से जहां कुल जीडीपी का महज दो प्रतिशत शेयर बाजार में है वहीं बचत का प्रतिशत आज भी बहुत ऊँचा बना हुआ है। यह भारतीय स्त्रियों के कारण ही हो सका। धन्य है मेरे देश की स्त्रियां जिनके कारण वैश्विक मंदी के बावजूद आम भारतीय परिवार मंदी की मार से बचा हुआ है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो बिना शोर शराबे और बिना क्रांति का गीत गाए पारम्परिक भारतीय औरत ने बिना पुरुषों को गाली निकाले देश को बचा लिया। सही कहूं तो वे अपने योगदान से अंजान अब भी समाज और अर्थव्यंवस्था की धुरी बनी हुई हैं।

इस लेख में स्‍वामीनाथन गुरूमूर्ति से सुने गए शब्द और कुछ मेरे विचारों का घालेमल हो गया है। उम्मीद है लोग पसंद करेंगे।