गुरुवार, 21 मई 2009

जो ब्‍लॉगर मुझे प्रभावित करते हैं - चिठ्ठा चर्चा

पिछले कई दिन से लिखने के बजाय पढ़ने का क्रम बना हुआ है। नेट पर बैठता हूं। पहले अपने पसंदीदा ब्‍लॉग्‍स को खोलकर पढ़ता हूं। फिर वहां मिली कडि़यों से आगे बढ़ता जाता हूं। दो चार या छह घण्‍टे तक यही क्रम चलता है। इस दौरान लगा कि कई चिठ्ठे बहुत अच्‍छे हैं। मुख्‍यतया कंटेट के मामले में। सोचा अन्‍य पाठकों को भी बताया जाए। अब इसका लहजा स्‍वत: ही चिठ्ठा चर्चा जैसा बन रहा है। देखिएगा।

केरल पुराण   बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायणजी एक के बाद दूसरी केरल की शानदार कहानियां सुना रहे हैं। बीच-बीच में एक दो दिन का गैप आता है तो लगता है अंतराल में सदियां बीत गई। हर कहानी बहुत शानदार। और अनुवाद लगातार निखरता जा रहा है। कई कथाएं तो छह या सात खण्‍डों में भी हैं। रसास्‍वादन कीजिएगा।

लिख डाला में शाहिद मिर्जाजी  यह बिल्‍कुल लॉटरी लगने जैसा अनुभव है। शाहिद मिर्जा जी को जो लोग जानते हैं। यानि लाखों लोगों को पता है कि उनका लेखन कैसा रहा है। उनकी पत्‍नी वर्षा भम्‍भाणी मिर्जा जी ने अपने ब्‍लॉग लिख डाला में उनका एक लेख पिछले दिनों प्रकाशित किया। सालों पहले लिखा गया लेख आज भी उतना ही सटीक है। इसे कालजयी कृति कह सकते हैं। देखिएगा...

Life is beautiful  इस ब्‍लॉग के बारे में शायद रविरतलामीजी ने बताया था। रंगीन चित्रों में कला से अधिक जीवन ढूंढने की कोशिश करता यह ब्‍लॉग वाकई शानदार है। हर पोस्‍ट में पिछली पोस्‍ट से अधिक सशक्‍त अभिव्‍यक्ति दिखाई देती है। हैं बस चित्र ही...

ज्‍योतिष की सार्थकता पंडित डीके शर्माजी अब तक सॉफ्ट अंदाज में अपनी बातें कहते रहे हैं। उनके ताजे लेख में तो उन्‍होंने विज्ञान की सबसे एडवांस शाखा अंतरिक्ष विज्ञान के समक्ष ही चुनौती पेश कर दी है। मेरा मतान्‍तर यह है कि ज्‍योतिष को ज्‍योतिष ही रहने दिया जाए उसे विज्ञान सिद्ध करने के चक्‍कर में अधिक कचरा होता है। क्‍यों न अब विज्ञान को ही ज्‍येातिष के पैमाने पर परखने का प्रयास किया जाए।

निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग  निशांत मिश्राजी ने जेन कथाओं के साथ इस ब्‍लॉग की शुरुआत की। शुरू में छोटी छोटी कहानियां आ रही थी। बाद में कुछ बड़ी और बहुत बड़ी पोस्‍टें भी आई। लेकिन अब भी छोटी प्रेरक कथाओं का क्रम चालू है। हर रोज इस ब्‍लॉग पर एक तो ऐसी कथा होती ही है। कभी सुनी हुई तो कभी बिल्‍कुल नई। पिकासो और आइंस्‍टाइन के वृत्‍तांत को कमाल के हैं। इसे फीड रीडर से नियमित पढ़ा जा सकता है। मैं इस ब्‍लॉग का फैन हूं।

संजय व्यासजी ये जोधपुर के हैं। पिछले दिनों पहली बार इनके ब्‍लॉग पर गया और एक अभिशप्‍त कस्‍बे की कहानी पढ़कर इनका मुरीद हो गया। अब गूगल फ्रेंड कनेक्‍ट के माध्‍यम से इनसे जुड़ गया हूं और आगे नियमित पढ़ने की कोशिश करूंगा। आप भी इन्‍हें पढ़ सकते हैं। इनके लेखन में ताजे पानी का अहसास होता है।

डॉ अनुराग आर्य इनके ब्‍लॉग पर पहले भी जाता रहा हूं लेकिन पिछली पोस्‍ट में अनुराग जी ने क्‍लीन बोल्‍ड कर दिया। तर्जुमा था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव' और इसका सुधार था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव- इट हैपंस' आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं। आप जब भी वहां पहुंचेंगे तो अपने छात्र जीवन और उन दोस्‍तों को जरूर याद करेंगे जो बेगरज आपके यार रहे हैं।

बस इतना ही... बाकी के बारे में फिर कभी बताउंगा। ब्‍लॉग के लिंक उठाना और उन्‍हें एक एक कर जमाना वाकई कठिन काम है। चिठ्ठा चर्चा नियमित रूप से करने वालों को साधुवाद। :)

बुधवार, 20 मई 2009

याद आई फैशन परेड

पिछले दिनों मेरे नानीजी श्रीमती राधादेवी हर्ष जयपुर से बीकानेर आई। अपने आवश्‍यक काम निपटाने के दौरान एक दिन मुझे पुराने घर बुलाया और मुझे एक शर्ट दिया। लाल चौकड़ी वाला। यह शर्ट मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में  पहनता था। मैंने मुस्‍कुराते हुए पूछा ये फैशन परेड के लिए है क्‍या ?

तो नानीजी भी हंस पड़ी बोली तुम्‍हें नहीं दे रही, कान्‍हे की मां को दे देना। यह सामान्‍य काम था। मोटरसाइकिल में शर्ट की थैली को अटका लिया। घर आया तो याद आया कि शर्ट पड़ा है। मैंने बताया कि कान्‍हे के लिए नानीजी ने कोई शर्ट भेजा है वह मेरा पुराना शर्ट है। कान्‍हे की मां दौड़ी- दौड़ी बाहर गई और शर्ट ले आई। हाथों-हाथ कान्‍हे को पहनाकर दिखाया। उस समय कान्‍हे और उसकी मां की आंखों की चमक देखने लायक थी। पता नहीं पुरुष हूं इसलिए या मूढ हूं इसलिए, मुझे कभी समझ नहीं आया कि पुराना शर्ट कुतूहल कैसे पैदा कर सकता है। जो भी हो मुझे अपनी फैशन परेड याद आ गई।

फैशन टीवी के जमाने से बहुत साल पहले मेरे घर में फैशन परेड का जमाना आ गया था। साल में दो बार यह परेड होती। रंगबिरंगे कपड़े, जमा जमाया रैम्‍प और केवल जज। हां जी जितने दर्शक होते उतने ही जज होते। एकाध आया-गया भी अपनी राय जरूर भेंट चढ़ा जाता। बस तकलीफ तब होती जब अनफिट कपड़ों में हमें फिट करने का प्रयास किया जाता। सर्दियां खत्‍म होकर गर्मियां शुरु हो या गर्मियां खत्‍म होकर सर्दियां शुरू हो। नानीजी पुराने कपड़े निकालकर बैठ जाती और मुझे और भाई आनन्‍द को एक एक कर आवाज देती। बीते मौसम में कम बार पहने हुए कपड़े, मामा के कपड़े और मामा के मामा के कपड़े और कई साल पहले सिलाई हुए कपड़े। सब एक जगह पड़े होते। पैंट की हाफपेंट बनती और शर्ट की बंडी। कुल मिलाकर कपड़ों में हमें फिट किया जाता। अब ये कपड़े दुरुस्‍त भी लग रहे हैं या नहीं इसे देखने के लिए अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक चलना होता और वहां से लौटना होता। ड्रेस डिजाइन, कांबिनेशन, लैंथ, चालू फैशन को किसी तरह मैच करने का प्रयास किया जाता। गर्मी की छुट्टियों में नानीजी (जो खुद अध्‍यापिका थी) हमारी तरह पूरी तरह फ्री होती। तो, किसी भी सुबह यह क्रम शुरू हो जाता और अगले कई दिन तक जारी रहता। इस दौरान जा पहचान के लोग, रिश्‍तेदार और मामाओं के दोस्‍त तक मिलने के लिए आते। हर किसी की अपनी राय होती। किसी को रंग की फिक्र होती तो किसी को डिजाइन की, कोई कांबिनेशन पर ध्‍यान देता तो कोई बचत के प्रति जागरुक दिखाई देता। पचासों ड्रेस ट्राई करने के बाद पांच-सात ड्रेस ऐसी होती जिनको कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के लिए रख लिया जाता और अधिकतम राय जुटाने के प्रयास किए जाते। इसी क्रम में सात ड्रेस को उनचास बार पहनकर दिखाना पड़ता और रैम्‍प वही रहता। अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक। कई दिनों तक चलने वाले इस क्रम में अगर हम दोनों में से कोई 'बागी' हो जाता तो उसकी खैर नहीं। नानीजी झल्‍ला जाते। कहते मैं इतनी मेहनत से इन बच्‍चों के लिए यह काम कर रही हूं और इन्‍हें कदर ही नहीं है। हम हारकर फिर से परेड में जुट जाते।

 

हमारी बगिया में खिला एक और सुंदर फूल

<KENOX S760  / Samsung S760>

मुझे इसका नाम पता नहीं है। यह आकार में काफी छोटा है और हमारा माली इसे फुलवारी कहता है। किसी को पता हो तो बताने की कृपा करें।

मंगलवार, 12 मई 2009

जब अवार्ड लेकर आया था।


जनवरी में राजस्‍थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्‍कारों में बीकानेर की जस्‍ट टीम को मिला बैस्‍ट स्‍पेशल कवरेज कैटेगरी में अवार्ड। लेने मुझे भेजा गया था। चित्र में दाएं से दूसरे आगे बैठे हुए पत्रकारों में से एक। 

सोमवार, 11 मई 2009

छोटे शहर के वाशिंदे और रंगीन पल

यह बीकानेर का सार्दुल सिंह सर्किल है। बीकानेर रियासत के कुछ विश्‍वप्रसिद्ध राजा हुए हैं। उनमें से एक थे सार्दुल सिंह। यह फोटो संभवतया अजीज भाई का खींचा हुआ है। बीकानेर स्‍थापना दिवस, छब्‍बीस जनवरी और पंद्रह अगस्‍त को यह इसी तरह रौशन होता है।

 
मुशायरा 
मेरा एक ही दोस्‍त ऐसा है जो शेरो शायरी करता है। वली मोहम्‍मद गौरी। फ्रेंड्स एकता कमेटी बना रखी है। इसी नाम से फ्रेंड्स एकता पार्क भी है। इसी पार्क में वली भाई मुशायरा करते हैं। हिन्‍दी, अंग्रेजी और राजस्‍थानी के कवियों को भी बुला लेते हैं। फिर इसे नाम दिया जाता है विविध भाषा या बहुभाषा कविता संगोष्‍ठी। मैंने एक बार शिरकत की थी। यह शिरकत शब्‍द भी वहीं से सीखकर आया हूं। नीचे दिया गया फोटो हमारे फोटो अजीज भुट्टा जी का खींचा हुआ है। मेरे दोस्‍त का है सो मैंने लगा लिया है। माइक पर मुंह लगाए बैठे हैं वली मोहम्‍मद गौरी। साथ में अन्‍य विधाओं के कवि और गणमान्‍य लोग भी बैठे हैं। (अब वली भाई गा रहे हैं तो कोई तो झेलेगा ही। :) )



सेलिब्रिटी मेरे साथ ... 
और यह है राजा हसन। इसने बहुत जिद की तो मैंने इसके साथ फोटो खिंचवा लिया। वैसे ऑफिस में सब कह रहे थे कि मैं जिद कर रहा था। पता नहीं मुझे स्‍पष्‍ट याद नहीं है। लेकिन आप लोगों को राजा हसन याद होगा। सारेगामापा में राजा ने जो वंदे मातरम गाया था। उस परफार्मेंस में तो राजा ने रहमान को भी पीछे छोड़ दिया था। यह वही राजा हसन है। 


अगली बार फिर कुछ दृश्‍य एकत्र करने की कोशिश करूंगा। जैसा कि ज्ञानदत्त पाण्‍डेजी कहते हैं कैमरा तो पोस्‍ट एम्‍बेडेड गैजेट है। 

गुरुवार, 7 मई 2009

कुछ ऐसा है मेरा बीकाणा

चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान कैमरा भी हाथ में था सो कुछ तस्‍वीरें ऐसी भी ली जो भले ही चुनाव के काम की न हो लेकिन बीकानेर को प्रदर्शित करने वाली हो सकती हैं। 

मैंने अपनी नजर से बीकानेर को पेश करने का प्रयास किया है। गौर फरमाइए। 

  
छोटा फॉर्म हाउस। वैसे रेगिस्‍तान में अरंडी का पेड़ भी वृक्ष की शोभा पाता है। यहां तो सचमुच का पेड़ है। हां भरा नहीं है लेकिन पूरा है। पुराने तरीके की झोंपड़ी। आजकल तो बीकानेर में टूरिज्‍म के लिहाज से भी झोंपडि़यां बनने लगी हैं। उनमें एसी और कूलर भी लगे होते हैं।

धोरों पर बनने वाली ये लकीरें आम दिनों में अधिक स्‍पष्‍ट होती है। मैं जिस क्षेत्र में था वहां वनस्‍पति बढ़ने लगी है सो धोरे कम हो रहे हैं और धूल की लकीरें भी। 

भीषण गर्मी में कीकर की छांव में भेड़ें आराम फरमा रही हैं। 
आ लेके चलूं तुझे ऐसे गगन के तले, जहां गम भी न हो आसूं भी न हो
 
रेगिस्‍तान के जहाज के लिए चालीस डिग्री तापमान कुछ भी नहीं है। वह आराम से बैठा है। :) 

शुक्रवार, 1 मई 2009

ये तो टू- मच हो गया। हयं ?

आज अमितजी की नजर से दुनिया देखी तो हिट लिस्‍ट बना ही डालने की तैयारी करने लगा। बाद में देखा तो 99 टास्‍क के अलावा कुछ और भी दिमाग में आया तो जोड़ दिया। कुछ मेरे से संबद्ध नहीं था सो छोड़ दिया। पलटकर नजर डाली तो लगा कि ये तो टू-मच हो गया।

  1. अपना ब्लॉग आरंभ किया- कौनसा वाला, खुद के नाम वाला या विषय विशेष का। अब तक बारह ब्‍लॉग का सदस्‍य बन चुका हूं। कभी कभी सोचता हूं पता नहीं क्‍यों लिख मार रहा हूं।
  2. तारों की छांव में नींद ली- जमकर ली। अब तक तो बीकानेर में संभव है कि तारों की छांव में सोया जा सके। कुछ सालों बाद घर में कैटेलिटिक कन्‍वर्टर लगा लूंगा और एयरटाइट कमरे में सोउंगा, प्रदूषण से बचने के लिए।
  3. संगीत बैन्ड में कोई वाद्य यंत्र बजाया- एक बार बजाया, फिर उपस्थित श्रोतागणों ने मुझे बजाया, उसके बाद भूलकर भी कुछ नहीं बजाया।
  4. अमेरिका के हवाई द्वीपों की सैर करी- उसकी खोज हो चुकी है क्‍या। यानि अब कुछ भी नहीं बचा है एक्‍सप्‍लोरेशन के‍ लिए। यह ख्‍याल ही मुझे डिप्रेस कर देता है।
  5. उल्का वर्षा देखी - हां देखी, और हर बार कुछ कुछ होता है स्‍टाइल में विश मांगी। कुछ पूरी भी हो गई। जैसे कम से कम आज कोई गाली न दे।
  6. औकात से अधिक दान दिया - किसकी औकात, मेरी या दान लेने वाले की।
  7. डिज़नीलैन्ड की सैर करी - एम्‍युजमेंट पार्क के नाम पर एक बार अप्‍पूघर गया था दिल्‍ली में, उसकी यादें आज तक ताजा है। माइ फेयर लेडी से उतरने के बाद जी भरकर कै की।
  8. पर्वत पर चढ़ाई करी - मेरी पत्‍नी ने की है, कई बार वे रौ में आ जाती हैं तो उनके साथ ही कर लेता हूं। दो चार घण्‍टे लगते हैं। चाय की चाय और पहाड़ की चढ़ाई मुफ्त।
  9. प्रेयिंग मैन्टिस (praying mantis) कीड़े को हाथ में पकड़ा - यह टिड्डे, जोंक, हैलीकॉप्‍टर, सांप, केंचुए, कॉकरोच से अलग होता है क्‍या।
  10. सोलो गाना गाया - हें हें हें हें।
  11. बंजी जंप करी - दिल ने की है शरीर की बाकी है।
  12. पेरिस गए - इसे भी खोज लिया गया। दुख की बात है।
  13. समुद्र में बिजली का तूफ़ान देखा - रेत के समुद्र में घटोलिए आते हैं। बिजली बादलों में होती है धोरों में नहीं। सो घटोलिए देखे हैं। बहुत शानदार नजारा होता है।
  14. कोई कला शुरुआत से अपने आप सीखी - हां, सीखी, ज्‍योतिष, लोग इसे मूर्ख बनाने की कला कहते हैं।
  15. किसी बच्चे को गोद (adopt) लिया - एक कुत्‍ते का बच्‍चा लिया था, दुख के साथ कहता हूं उसे ढंग से पाल नहीं पाया। अब वो किसी और के पास है और मुझे पहचानने से इनकार करता है।
  16. कुतुब मीनार को देखा- देखा, वहां लिखे लोगों के प्रेम पत्रों को देखा, वैसे इस इमारत से इतना प्रभावित हुआ कि कुछ लम्‍बे लोगों को कुतुबमीनार बोल दिया। आज तक उनके संबंध वापस सुधरे नहीं हैं।
  17. अपने लिए सब्ज़ी उगाई - मैंने तो नहीं मेरी पत्‍नी ने  उगाए, बैंगन, कल ही उसका साग खाया था। अब किचन गार्डन में भिंडी का इंतजार है।
  18. फ्रांस में मोनालिसा देखी - हां, क्‍या वो गर्भवती थी ?
  19. रात के सफ़र में ट्रेन में नींद ली - हां, एक बार, जब सामान लेडीज कपार्टमेंट में था और मैं थर्डक्‍लास में था, तब।
  20. तकिए द्वारा लड़ाई की- हां, करता रहा हूं,... तकिया माने?
  21. सड़क पर किसी अंजान व्यक्ति से लिफ़्ट ली - मांगी पर मिली नहीं।
  22. स्वस्थ होते हुए भी ऑफिस से बीमारी के लिए छुट्टी ली - अभी अभी छुट्टियों से लौटा हूं। बॉस बहुत नाराज हैं। सहकर्मी ईर्ष्‍या कर रहे हैं। :)
  23. बर्फ़ का किला बनाया  - बर्फ ? रेत का किला बनाया। हवा के झोंके से ढह गया।
  24. मेमने को गोद में उठाया  -  ..... वह तो ..
  25. बिना किसी वस्त्र के नग्न ही पानी में उतरे (तरण ताल, नदी, तालाब, समुद्र अथवा बाथ टब इत्यादि में) ही ही ही ही, इस सवाल में बाथरूम नहीं जुड़ सकता क्‍या।
  26. मैराथन रेस में दौड़ लगाई - हां, पीएमटी पांच बार दी, हर बार फेल होता रहा, मैराथन हारने का सा अनुभव रहा।
  27. वेनिस में गोन्डोला (एक तरह की नाव) में सवारी करी - ये इतनी जगहें ढूंढ कैसे ली गई, अभी तो मैंने अपनी यात्रा शुरू भी नहीं की है। कहां कहां जाउंगा।
  28. पूर्ण ग्रहण देखा - परिवार के विरोध के बावजूद देखा, हमारे यहां माना जाता है कि ग्रहण देखने से बच्‍चे पगला जाते हैं, अब तो सब लोग मानने भी लगे हैं कि मेरे ऊपर ग्रहण का कुछ असर है।
  29. सूर्योदय अथवा सूर्यास्त देखा- सालों पहले देखा था, छत पर सो रहा था,  सूर्योदय देखकर सोचा कि जल्‍दी दिन उग आया अभी कुछ नींद और खींच सकता था। और सूर्यास्‍त भी देखा तो सोचा कि पूरी ताकत से काम किया लेकिन दिन छोटा रह गया।
  30. हाफ कोर्ट से काउंट किया बॉस्‍केटबॉल में –  हां किया, मैं खुद अब तक सनाके में हूं कि बॉल बॉस्‍केट में पहुंची कैसे।
  31. समुद्र पर्यटन (cruise) पर गए - हां, ऊंट पर बैठकर।
  32. नियाग्रा फॉल्स स्वयं देखा - कम्‍प्यूटर पर ही देखा। ऑनलाइन। स्‍वयं देखा, ...
  33. पूर्वजों की जन्मभूमि देखने गए - अब तक वहीं जमा हूं।
  34. किसी कबीले के रहन सहन को नज़दीक से देखा - कबीलाई संस्‍कृति अब भी है बस अंदाज बदल गए हैं। कबीलों का शहरीकरण कह सकते हैं। एक मुखिया और बाकी प्रजा। संयुक्‍त परिवार भी एक कबीला ही होता है।
  35. अपने आप एक नई भाषा स्वयं सीखी- हां, सितारों की भाषा सीखी, पहले तो उन्‍हें सुन भी पाता था, अब केवल संकेत बचे हैं। ज्ञान बढ़ेगा तो और भी मूढ़ हो जाउंगा।
  36. इतना धन अर्जित किया कि पूर्णतया संतुष्ट हुए - कमाने से पहले ही संतुष्‍ट था, अब तो असंतुष्‍टता बढ़ रही है।
  37. पिसा की झुकती मीनार (Leaning Tower) देखी - गिरती देखी, कई पीसा की मीनारें, तब सोचा, तुलसी नर का क्‍या बड़ा समय बड़ा बलवान।
  38. रॉक क्लाइम्बिंग करी - बस देखता रहा, की नहीं, ओशो याद आ गए, वे कहते थे, साक्षी भाव से देखो, काया तो कष्‍ट देने से साक्षी भाव अपना लेना अधिक सहज है।
  39. कैरीओकी (karaoke) गाया - हें, हें, हें हें, कितनी बार करना है पता नहीं,
  40. किसी अंजान को रेस्तरां में खाना खिलाया - हां, टीना के साथ, टीना यानि देयर इज नो अल्‍टरनेटिव।
  41. अफ़्रीका गए - लोगों को एस्‍प्‍लोरेशन के अलावा और कोई काम नहीं है क्‍या।
  42. चांदनी रात में धोरों की सैर करी - हां, और गाना भी सुना, मोरिया आछो बोल्‍यो रे धरती रात मां। छनन, छन चूडि़यां, छमक गई रे बालमा..
  43. एम्बुलेन्स में ले जाया गया - हां, अपेंडिक्‍स का ऑपरेशन था, उस समय सबकी जान सूखी हुई थी और मैं आराम से लेटा हुआ सबको देख रहा था। इमरजेंसी ऑपरेशन हुआ।
  44. अपनी तस्वीर बनवाई (फोटो नहीं) - कई दिन से एक आर्टिस्‍ट को कह रहा हूं, लेकिन न मुझे समय मिल रहा है न उसे।
  45. बरसात में चुंबन लिया/दिया - हें हें रेगिस्‍तान में बारिश ही कम होती है, प्रायिकता के सिद्धांत के अनुसार बरसात और चुंबन को मिलाया जाए तो संभावनाएं बहुत क्षीण हो जाती है, सो हमने तो बारिश का इंतजार नहीं किया।
  46. मिट्टी में खेले- और किसमें खेलते।
  47. ड्राईव-इन सिनेमा देखा - यह क्‍या होता है।
  48. किसी फिल्म में नज़र आए - कई बार कोशिश की, लेकिन हीरो लोग ही डर जाते हैं, मेरी ओर इशारा करके निकलवा देते हैं यूनिट से।
  49. चीन की बड़ी दीवार देखी - आप महंगाई और सुविधाओं के बीच की बात कर रहे हैं।
  50. अपना व्यवसाय आरंभ किया- हां दो महीने किया और पता चला कि गलत धंधे में हैं, सो बंद कर दिया।
  51. मार्शल आर्ट की क्लास में भाग लिया - खुदा कसम, जब जब ठुकाई हुई तब तब प्रण किया कि मार्शल आर्ट सीखेंगे, लेकिन यह तमन्‍ना आज  तक तो पूरी नहीं हुई है।
  52. रूस गए - जो ऊपर की तरफ है। नहीं।
  53. लंगर/भंडारे में लोगों को खाना परोसा - हां, आनन्‍द आया।
  54. ब्वॉय स्कॉऊट पॉपकार्न अथवा गर्ल स्कॉऊट कुकीज़ बेची - इससे अधिक भी कई काम कर चुका हूं।
  55. समुद्र में व्हेल देखने गए - नहीं लेकिन भूत देखने के लिए गया हूं। ऐसी जगहों पर रातें बिताई है जहां लोग दिन में भी नहीं जाना चाहते।
  56. खामखा बिना वजह किसी ने फूल दिए - हां,
  57. रक्त दान किया - किया लेकिन काम नहीं आया।
  58. नाज़ी कॉन्सनट्रेशन कैम्प देखा - मेरे घर में था, अब बंद हो गया है। आपको भी दिखाता कुछ साल पहले।
  59. खुद का दिया बैंक चैक बाऊंस हुआ - मेरी शक्‍ल ऐसी है कि लोग चैक ही स्‍वीकार नहीं करते।
  60. बचपन के किसी मनपसंद खिलौने को बचा के रखा- नहीं, पहले ही उसका बंटवारा हो गया था। एक कैलकुलेटर है। पर वह बचपन का नहीं टीन एज का है।
  61. राज घाट पर गांधी समाधि देखी - हां देखी, तीन बार, घण्‍टों वहीं बैठा रहा। क्‍योंकि बाहर गर्मी ज्‍यादा थी और वहां सुकून मिल रहा था।
  62. कैवियार (मछली के अंडों का अचार) खाया - शाकाहारी होने का यही नुकसान है कि जयपुर जाकर आमलेट खाना पड़ता है।
  63. रजाई का कवर सिला - हां और भी बहुत कुछ ऐसा किया है। मिट्टी से बर्तन भी मांझे हैं।
  64. चांदनी चौक गए- हां, :) हां
  65. घने जंगल में सैर की- जंगल ? कहां है।
  66. नौकरी से निकाले गए - नहीं, अब तक तो मैं खुद ही छोड़ता रहा हूं। मैं मालिक को मौका ही नहीं देता। :)
  67. हड्डी टूटी - कई बार। मांस भी फटा है और टांके भी आए हैं।
  68. तेज़ रफ़्तार मोटरसाइकल की सवारी करी- एक बार 120 की रफ्तार से अपनी पल्‍सर चला चुका हूं। अब तक की तो यह लिमिट है। अगली बार सर्विसिंग के बाद 130 पर चलाने की कोशिश करूंगा।
  69. अपनी किताब छपवाई - इतना लिख लेता तो कलेक्‍टर नहीं बन जाता। पूरे छात्र जीवन में नोट्स ही नहीं बनाए। अब ब्‍लॉगिंग ने लिखना सिखाया है।
  70. नई नवेली गाड़ी खरीदी - नहीं हमेशा उपहार में ही मिली है। पर मिली नई नवेली।
  71. अखबार में फोटो छपी - कई बार।
  72. नव वर्ष की पूर्व संध्या की मध्यरात्रि किसी अंजान का चुंबन लिया - क्‍यों बताउं।
  73. राष्ट्रपति भवन की सैर करी - हां,
  74. किसी जानवर का शिकार कर खाया - शाकाहारी हूं भाई।
  75. चिकन पॉक्स झेला- हां,
  76. किसी की जान बचाई - ऊपरवाला ही बचाता है। लेकिन मुझे वहम है कि कुछ लोगों की बचा चुका हूं।
  77. जज अथवा जूरी बन निर्णय सुनाया (किसी प्रतियोगिता में या न्यायालय में)- अब तक तो प्रतियोगी ही बना हूं।
  78. किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मुलाकात करी - कई लोगों से मिला हूं। वे सामान्‍य हाड मांस के पुतले लगते हैं। उन्‍हें देखकर भाग्‍य पर अधिक भरोसा होने लगता है।
  79. बुक क्लब की सदस्यता ली - कई जगह, अभी भी सदस्‍य हूं।
  80. किसी अज़ीज़ को खोया - हां पिंकू को खोया, मेरा कुत्‍ता था, मैं उससे प्‍यार करता हूं।
  81. शिशु का पिता बना - यह ऐसा अनुभव है जिसे बयां नहीं किया जा सकता।
  82. किसी कानूनी मुकदमे में शरीक हुए/रहे - एक मुकदमे का हिस्‍सा तो पिछले सत्‍ताईस साल से हूं
  83. सेल फोन के मालिक हैं/रहे - हां, कॉल कीजिएगा। 09413156400
  84. मधुमक्खी ने डंक मारा- हां, कई बार, लोहे की चाबी से रगड़ा तो दुरुस्‍त हुआ।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

आखातीज के कुछ क्षण








आखातीज पर बीकानेर मे जमकर पतंगबाजी हुई। 
देखिए कुछ तस्‍वीरें। 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

रिंग रिंग रिंगा- भाग दो

शहर से गांव और पश्चिम से भारत की ओर

मार्केटिंग के लोग अपने क्षेत्र के सर्वाधिक जुमले से हमेशा बचने की कोशिश करते हैं। और यह जुमला है कि मार्केट सेचुरेट हो चुका है। यानि वे अपने मालिकों को बताते हैं कि आपका ब्रांडेड बासी माल यहां और नहीं बिक सकता। लेकिन शीर्ष प्रबंधन कभी यह बात सुनना नहीं चाहता, तो पलटवार के लिए एक और सवाल होता है कि जब और माल नहीं बिक सकता तो लाखों रूपए और इंसेटिव डकारने वाले भारी भरकम स्‍टाफ की क्‍या जरूरत है।

मार्केटिंग प्रोफेशनल्‍स को सवाल और सवाल का जवाब दोनों पता है सो वे इस जुमले से पर्याप्‍त दूरी बनाए रखते हैं और विकल्‍प के रूप में दूसरा पैंतरा फेंकते हैं वह है नया बाजार। यानि बड़े बाजार से ध्‍यान हटाकर छोटे बाजारों का रुख किया जाए। अब ब्रांडेड एसी और एडीडास के शो रूम तहसील स्‍तर पर खुलने लगते हैं। फसल से आया पैसा महंगे ब्रांडों की भेंट चढ़ने लगता है। गांव करै ज्‍यां गैली करे। यानि एक जैसा करता है वैसा ही दूसरा करता  है और अंत में पूरा गांव उसमें लग जाता है। इस तरह मार्केटिंग के लोग शहर से गांव की ओर भागते हैं। नया बाजार ब्रांडेड बासी माल को और कुछ दिन बेच लेता है। मिलें बंद करने का संकट और स्‍टाफ को हटाने का काम कुछ दिन के लिए टल जाता है।

यह है सामान्‍य ज्ञान- अब मुझे याद आ रहा है स्‍लमडॉग का रिंग रिंग रिंगा। यानि भारतीय कन्‍याओं को बचाने के लिए स्‍वयं अमरीका ही आ खड़े होने की कोशिश करेगा। भले ही उसकी हालत अभी कटोरा लेकर हमारे दरवाजे पर आने की है लेकिन आएगा मसीहा बनकर।

पश्चिम की मीडिया ने फर्श से अर्श पर पहुंचे लोगों और उनके संबंधियों के साथ पश्चिम में इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन्‍स किए होंगे। लेकिन इस बार भारत आकर इस तरह का स्टिंग ऑपरेशन किया और एक भरे पूरे मुल्‍क की इज्‍जत को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस तरह उछाल दिया मानो सोमालिया के गृह युद्ध के बाद का दृश्‍य भारत में बना हुआ हो। कमाल तो तब होगा जब बिके हुए नेतागण देश की समस्‍याओं का समाधान भी पश्चिम के विशेषज्ञों से कराने लगेंगे। तब उन लोगों की पंचायती बढ़ेगी। और तभी हमें महसूस होगी असली आर्थिक और राजनैतिक परतंत्रता।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

एक और गधे की कहानी

मेरे एक वरिष्‍ठ साथी ने मुझे एक गधे की कहानी सुनाई। कहानी मैंने कई दिन पहले सुनी लेकिन अब भी मेरे दिमाग में यह कहानी घूम रही है। सो अब इसे अपने ब्‍लॉग पर डाल रहा हूं। 

एक गांव में एक धोबी के पास एक गधा था। उस धोबी के घर के पास एक सूखा हुआ गहरा कुआं था। रोजाना गधा कुएं के पास से गुजरता। एक दिन गधा कुएं में गिर गया। उस समय धोबी घाट पर था। गधे की किसी ने सुध नहीं ली। वह शाम तक कुएं में गिरा कहराता रहा। शाम को मालिक घर आया तो उसने देखा कि गधा कुएं में गिर चुका है। अड़ोस पड़ोस के लोग एकत्रित हो गए। सबने मिलकर निर्णय किया इस घरों के बीच खुदा हुआ यह सूख कुआं खतरनाक हो सकता है सो इसे भर दिया जाए। गांव वालों ने मिट्टी लाकर कुएं में डालनी शुरू की। यह गधा कृष्‍ण चंदर के गधे की तरह इंसानों की बातों को समझने वाला था।बस इसमें अधिक अक्‍ल यह थी कि कभी इंसानों की बोली नहीं बोलता था। उसने सुना कि उसे जिंदा दफन करने की तैयारी हो रही है। पहले पहल तो वह गधा खूब रेंका और अपनी ही भाषा में चिल्‍लाता रहा कि हरामखोर धोबी मैंने जिन्‍दगीभर तेरी गुलामी की तूं उसकी यह सिला दे रहा है। 
लेकिन गधे की बात किसी ने नहीं सुनी। कुएं को भरना शुरु कर दिया गया। जैसे जैसे कुएं में मिट्टी गिरती गई गधा चतुराई से मिट्टी के ढेर पर चढ़ता रहा। घण्‍टों की मशक्‍कत के बाद गांव वालों ने कुएं को मिट्टी से भर दिया। ढेर पर चढ़ता हुआ गधा भी ऊपर तक आ गया। अपने गधे को सुरक्षित देख मालिक चिल्‍लाया कि मेरा गधा वापस आ गया। लेकिन अब तक गधे का मन भी फिर चुका था। उसने अपने ही मालिक को दुल्‍लती मारी और बोला कौनसा मालिक कैसा मालिक। मुझे तो तुम कुएं में ही दफन कर रहे थे। 
ऐसा कहकर गधा चला गया और मालिक देखता रह गया। कुछ गधे अब भी बड़े संस्‍थानों में काम कर रहे हैं। जब वे कुएं में गिरेंगे तो उन्‍हें निकालने के बजाय उन पर मिट्टी ही डाली जाएगी। :) 

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

दो कम्‍युनिस्‍ट दो विचार

कम्‍युनिज्‍म जब अपने स्‍वर्णकाल में था तब भारत के कई साम्‍यवादी विचारधारा वाले नेताओं को रूस बुलाया गया था। उसी खेप में मेरे ताऊजी शिवकिशन जोशी भी रूस जाकर आए थे। अपने जीवनकाल में मार्क्‍स के अंधभक्‍त बने रहे। हर सवाल का मार्क्‍सवादी जवाब उनके पास हमेशा तैयार रहता। किसी भी घटना या स्‍टेटमेंट को वे वर्ग संघर्ष से जोड़ देते। सुनने वाला बस मुंह बाए देखता रहता। उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान में लेफ्ट को कई बार सफलता भी मिली है। श्‍योपत सिंह ने तो जैसे इतिहास ही रच दिया था। 

ग्‍लोबलाइजेशन के बाद मार्क्‍सवाद नीचे आ रहा था और युवाओं की बजाय पुराने घिसे पिटे लोग ही अधिक नजर आते थे। ज्‍यादातर साम्‍यवादी कुण्‍डली मिलान कर विवाह कर चुके थे और घर के कोनों में मंदिर भी स्‍थापित कर चुके थे। मार्क्‍स के बाद इन साम्‍यवादियों को बस ऊपरवाले से ही चमत्‍कार की उम्‍मीद बाकी थी। ऐसे में एक दिन मेरे ताऊजी अपने कुछ साथियों के साथ प्रख्‍यात ज्‍योतिषी के पास पहुंचे और उन्‍हें आगामी एक महीने के सभी मांगलिक दिनों की जानकारी मांगी। ज्‍योतिषी भी हैरान कि कामरेड ज्‍योतिष में कब से विश्‍वास करने लगे। उन्‍होंने दो चार तिथियां बताई। लेकिन कामरेड सभी तिथियों की मांग कर रहे थे। कुछ देर तो ज्‍योतिषी महाशय ने संयम बनाए रखा फिर चिढ़ गए। बोले भाई कामरेडों आप लोगों को कब से मुहूर्त की जरूरत पड़ने लगी। तो कामरेड भी मुस्‍कुरा दिए। बोले हमारे एक बड़े नेता यहां आने वाले हैं। और हम चाहते हैं कि कोई बड़ा भवन किराए पर लेना चाहते हैं। एक दो तिथियां बताई तो भवन वालों ने बुकिंग हुई होने का कहकर उन्‍हें टाल दिया। इसलिए वे पता करना चाह रहे थे कि कौन-कौनसे दिन मांगलिक हैं जिनमें अच्‍छे काम होने हैं। ताकि उन दिनों को टालकर बाकी दिनों पर विचार कर आम सहमति से दिन तय करने की कोशिश की जाए। 
ज्‍योतिष महाशय ने यह सुना तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। पांचांग तो छोड़ दिया और कामरेडों को भद्दी गालियां देने लगे। मेरे ताऊजी साथ में थे सो उन्‍होंने किसी तरह पंडितजी को शांत किया और किसी दूसरे ज्‍योतिषी से तारीखें निकलवाई। 

पिछले दिनों कामरेडों की दूसरी शक्‍ल भी देखने को मिली। एमपी का चुनाव लड़ रहे एक कामरेड को पता चला कि बीकानेर में एक हनुमान मंदिर है। उनका नाम है पॉलिटिकल बाबा। उनका आशीर्वाद मिलने से बेड़ा पार हो जाता है। साथ ही उन्‍हें यह सूचना भी पहुंचा दी गई थी कि भाजपा के प्रत्‍याशी यहां पहले ही आशीर्वाद लेने पहुंच चुके हैं। सो कामरेड अपने दल बल के साथ आए हनुमान बाबा का आशीर्वाद लेने। बातचीत में तो वे यही कहते रहे कि यह क्रांतिकारियों की धरती है लेकिन दबे स्‍वर में यह भी स्‍वीकार कर रहे थे कि जात पांत के असर को तो देखना ही पड़ेगा। बाबा के दर्शन के बाद कामरेड ने मंदिर के पास ही रहने वाले एक ज्‍योतिषी महाराज का आतिथ्‍य भी स्‍वीकार किया। वही ओज, वही तेज और उतने ही तेज स्‍वर में विचारों का संप्रेषण। मुझे ताऊजी याद आ गए। लेकिन एक अलग रूप में। पता नहीं कहां है मार्क्‍स और उसका वर्ग संघर्ष... 
यह थी दो कामरेड और दो विचारों की एक तस्‍वीर। 

मंगलवार, 24 मार्च 2009

एक माइक्रोपोस्‍ट...

वायदा बाजार 
किसानों और निर्यातकों के भले के लिए शुरू हुआ 
अब न किसानों को सही भाव मिलते हैं न निर्यातकों को
सटोरिए पूरी व्‍यवस्‍था पर हावी हैं 

ब्‍लॉगिंग 
इससे कैसे, कब, क्‍यों और कहां जुडे 
कब नियमित लिखना शुरू किया
कौन हमारे लेखन को प्रभावित करता है 
अगली पोस्‍ट में क्‍या लिखना है कौन बताएगा 
किसके फायदे के लिए यह किया जा रहा है 
और किसे इसका फायदा हो रहा है। 

शनिवार, 14 मार्च 2009

गुजरना तूफान से तूफान का...

इन दिनों दूसरों के लिखे ब्‍लॉग लगातार पढ़ रहा हूं। एक साल बाद कुछ लोग ऐसे मिले हैं जिन्‍हें पढ़कर लगता है ठीक है कुछ देर रुकते हैं कहीं और से भी रोशनी आ रही है। इन दिनों एक ब्‍लॉग का तो बस फैन ही हो गया हूं। इस ब्‍लॉग के लेखक को तो मैं नहीं जानता लेकिन इस ब्‍लॉग की हर पोस्‍ट को अच्‍छी तरह पढ़ चुका हूं। ब्‍लॉग का नाम है


इसमें निशान्‍त मिश्र जी ऐसी सुंदर कथाएं संग्रह की हैं कि दिल चाहता है उनके हाथ चूम लूं। हर एक कथा एक तूफान की तरह दिमाग में घुसती है और पहले से चल रहे तूफान से टकरा जाती है। विचारों का प्रवाह पहले से ही रोलर कोस्‍टर पर बिठाए रखता है। इसके साथ निशांतजी के झोंके जैसे उद्वेलित कर देते हैं। हर पोस्‍ट पढ़ने के बाद कुछ देर के लिए कम्‍प्‍यूटर बंद कर देता हूं। सोचने का मसाला जो मिल जाता है। काफी देर सोचने के बाद दिमाग इतना शांत हो जाता है कि कुछ और लिखने का जी ही नहीं चाहता। मैं इस ब्‍लॉग को ट्रैक्‍यूलाइजर ब्‍लॉग कहूंगा। जहां अधिकांश ब्‍लॉग भड़ास निकालने या पानी में हलचल बढ़ाने का काम कर रहे हैं वहीं ये प्रेरक कथाएं दिल और दिमाग को कुछ देर की शांति दे जाती हैं। मेरे ब्‍लॉग पर आने वाले सभी पाठकों को निवेदन करूंगा कि एक बार निशांतजी के ब्‍लॉग पर अवश्‍य जाएं। वहां हर किसी के लिए कुछ खास जरूर मिलेगा। 

गुरुवार, 12 मार्च 2009

राम राम सा

होली से पहले सोचा था कि इस बार खूब लिखूंगा होली के बारे में लेकिन फाग की तरंग ऐसी चढ़ी कि लिखना ही भूल गया। आज होली की हुडदंग खत्‍म हुई तो दो बातें लिखनी जरूरी समझी। पहली इलोजी का रूदन और दूसरी रम्‍मत या तमाशा। 
होलिका दहन के बारे में दोबारा बताने के बजाय मैं बताना चाहूंगा इलोजी के प्रेम के बारे में। साधिका होली का विवाह इलोजी से हो चुका था लेकिन गौना नहीं हुआ था। भक्‍त प्रहलाद को मारने की गरज से होलिका ने अपने नियमित अग्निस्‍नान के दौरान प्रहलाद को साथ लिया लेकिन संतों और साधुओं के नग्‍न नृत्‍य ने होलिका का ध्‍यान बंटा दिया और वे जलकर खाक हो गई। होलिका के राख हो जाने के बाद र्इलोजी घटनास्‍थल पर पहुंचते हैं और शरीर के  राख लपेटकर रूदन करते हैं। बाद में इसी होली की राख से कुंवारी कन्‍याएं गौरी पूजन करती हैं। आखिर में गौरी और  ईसर का मिलन होता है। ऐसा माना जाता है कि गौरी और ईसर पूर्व जन्‍म में होलिका और ईलोजी थे। बीकानेर में एक मोहल्‍ला है जिसका नाम है साले की होली। यहां बीकानेर की सबसे बड़ा होलिका दहन होता है। इसकी आग की लपटें करीब अस्‍सी फीट ऊपर तक जाती हैं। शहर के करीब हर हिस्‍से के लोग इस होली को देखने आते हैं। इसके अलावा इस होली की एक खास बात और है वह यह है कि इस होलिका के दहन को  ईलोजी सामने बैठकर देखते हैं। यहां के मोहतों के चौक से ईलोजी को पूरे ठाठ बाट से लाया जाता है। ईलोजी के पहुंचने के बाद ही होलिका दहन शुरू होता है। 

अब बात रम्‍मतों की। मेरी रम्‍मतों वाली पोस्‍ट पढ़ने के बाद जालौर के श्रीमधुसूदनजी  व्‍यास का फोन आया मेरे पास। उन्‍होंने बताया कि बीकानेर और जैसलमेर में जिस लोकनाट्य को रम्‍मत कहा जाता है राजस्‍थान के अन्‍य शहरों में उसी रम्‍मत को तमाशा कहा जाता है। राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में होली के  दूसरे दिन से हाडी रानी, अमरसिंह राठौड़ और फक्‍कड़दाता की रम्‍मतें शुरु हो जाती हैं। जबकि बीकानेर में होली से सात दिन पहले ये लोकनाट्य शुरू होते हैं और होलिका दहन से एक दिन पहले तक चलते हैं। धुलण्‍डी के दूसरे दिन तो सबकुछ शांत हो जाता है। जीवन फिर से पहले जैसा हो जाता है। हां, ठीक अगले दिन कुछ लोग राम राम के लिए निकलते हैं। बच्‍चों को पगेलागणा के बदले आशीर्वाद और पैसे मिलते हैं और बड़ों को आशीर्वाद और मिठाई। 

कल पोस्‍ट करूंगा होली से संबंधित कुछ फोटो...