रविवार, 17 फ़रवरी 2008

रसायनिक प्रेम

मुझे इस टॉपिफ पर लिखने से पहले काफी सोचना पडा। हर बार लगता कि किसी एक विषय की ओर झुक गया तो दूसरा विषय खुद को उपेक्षित महसूस करेगा। बहुत सोचने के बाद लिखने का मानस बना चुका हूं तो लिखूंगा ही


प्रेम और रसायन का आपस में संबंध में यह एक सामान्‍य जानकारी है। जो लोग विज्ञान में रुचि रखते हैं उन्‍हें यह जानकारी है कि दो लोग जब प्‍यार करते हैं तो दिमाग में दो प्रकार के रसायनों की भरमार होती है। करीब आते वक्‍त ऑक्‍सीटोसिन और दूर जाते वक्‍त डोपामिन। इस तरह तो विज्ञान की पुस्‍तकों में नहीं लिखा है। पुस्‍तक में तो लिखा है कि रोलर कोस्‍टर राइट के दौरान ऑक्‍सीटोसिन लडने की ताकत देता है और इसके स्‍त्राव के ठीक बाद डोमामिन का सीक्रेशन होता है। डोपामिन के साए में दो प्रेमियों का प्‍यार पलता है। यह तो हुई विज्ञान की बात।
तो मैं क्‍या कहना चाह रहा हूं। कुछ दिन पहले वैलेन्‍टाइन डे आकर गया। यानि आया और चला गया। मैं रुटीन के काम कर रहा था। मेरी पत्‍नी रूटीन के काम कर रही थी और बाकी मेरे जान-पहचान के लोग भी अपना रूटीन का काम कर रहे थे। संत वेलेन्‍टाइन की इससे अधिक तौहीन और क्‍या हो सकती है कि हमने अपना काम काज छोडकर उसके पीछे नहीं भागे। बसंती बयार में सर्दी जुकाम का डर था और बाजार में निकलने पर खर्च का। कुल मिलाकर हमने दोनो जेब और दिमाग दोनों के स्‍त्राव रोक लिए। इससे क्‍या....
अब जब मेरे स्‍त्राव रुके तो ध्‍यान आया कि प्‍यार पर सोचा जाए। विद्वजनों मैने कहीं पढा कि आदमी तीन जगह पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है। गोद में बैठे बच्‍चे के साथ, गोद में रखे शीशे के साथ और गोद में पसरी प्रेमिका के साथ। तीनों अवस्‍थाओं में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। उस समय वह जो हरकतें करता है अगर उनकी वीडियो रिकार्डिंग कराकर उसे वापस दिखाई जाए तो शायद वह जमीन में गढ जाए।
शेक्‍सपीयर ने भी इसे समझ लिया था। तभी उसने कहा कि प्रेमी मीठी बेवकूफिया करते हैं और उनके अलावा सभी लोगों को ये बेवकूफियां दिखती है।
तो सज्‍जनों मैंने और आप जैसे बहुत से लोगों ने बुद्धिमानी से पैसे और रसायन बचाए लेकिन जीवन का रस भी इसी के साथ लुप्‍त हो गया।
अब सोचता हूं कि काश स्‍त्राव को नहीं रोकता और खुद ही क्‍यों न बह जाता उसके साथ ही
रस तो बना रहता चाहे रासायनिक ही क्‍यों न हो...

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

तंत्र और तांत्रिक क्रियाएं

तंत्र को ज्‍योतिष से अधिक गूढ विषय माना जाता है। आज मैं आपके समक्ष तंत्र का दूसरा ही पक्ष पेश करने की कोशिश करूंगा। इस पक्ष को जानने के बाद शायद आपके दिमाग से तांत्रिक के नाम पर उभरने वाली छवि में कुछ बदलाव आए जिसमें एक काले, लाल या गेरूए कपडे पहने एक आदमी होता है। लम्‍बे बाल, दाढी और रहस्‍यमयी आवाज के साथ दूसरी दुनिया से सम्‍पर्क बनाने की कोशिश करते तांत्रिक की बजाय मैं शुरुआत करता हूं तंत्र से
तंत्र क्‍या है?
किसी विशेष परस्थिति को बनाने के लिए एक व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता होती है। यह व्‍यवस्‍था कोई व्‍यक्ति भी कर सकता है और इसके लिए पूरा सिस्‍टम भी बनाया जा सकता है। इसी सिस्‍टम को गूढ भाषा के साथ तंत्र कहा जाता है। बस इतना ही।
नहीं जनाब यह तो शुरूआत है सिस्‍टम या तंत्र को समझने की। यहां से हम जान सकते हैं कि तंत्र क्‍या है इसमें प्रवेश कैसे किया जा सकता है। मैं आपको कोई काम बताउं और आप उस काम को सोचने की बजाय करके देखें तो यह भी सिस्‍टम ही है। कैसे... याद करें मैंने आपको एक प्रयोग बताया कि जिसमें घर के एकांत स्‍थान पर ध्‍यान करना था कि आप छत के किसी कोने से खुद को देख रहे हैं।
इसमें जब आप खुद यह कार्य करके देखते हैं तो आपको कुछ रियलाइज होता है यानि एक विशिष्‍ट अनुभूति जो सिर्फ अपने संबंध में आपको ही हो सकती है। अगर आपने यह प्रयोग किया है तो जान सकते हैं कि आप एक अलग अंदाज में अलग वातावरण में पहुंच जाते हैं। यानि आपने तांत्रिक क्रिया के साथ अपने सैकण्‍ड माइंड में दस्‍तक दी और उसे सुना भी। कुछ इसी तरह से वह ढोंगी तांत्रिक भी करता है। अंतर इतना है कि वह अपने सैकण्‍ड माइंड में उतरकर वर्तमान परिस्थितियों की गणना अवचेतन से करता है और आपके प्रश्‍नों का माकूल जवाब देने में सफल होता है। आप कोशिश करें तो आप भी अपने सैकण्‍ड माइंड (अंतरमन) में उतरकर वही जवाब हासिल कर सकते हैं।

यहां एक सवाल- यह कैसे होता है
हर व्‍यक्ति के पास अपने सवालों के जवाब होते हैं।

इस पर एक और सवाल- फिर उलझनें क्‍यों होती है
क्‍योंकि जो जवाब है हम उसका सामना करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते

अगला सवाल- जवाब पाने का क्‍या तरीका है
जवाब – तांत्रिक हो जाइए

ऐसा करने से आपके पास जवाब को स्‍वगत हासिल नहीं करने की सुविधा उपलब्‍ध रहती है। जब आप अपने अंतरमन में तंत्र की सहायता से उतर चुके होते हैं तो वहां सवालों के जवाब भी सामने होते हैं और संभावित परिणाम भी।
क्‍या किया जाए तांत्रिक होने के लिए
सबसे आसान तरीका तो यह है कि अपने अंतरमन की हमेशा सुनो। एक बार सुनने में तो कोई समस्‍या नहीं है लेकिन हमेशा शब्‍द के साथ यह क्रिया लगभग असंभव हो जाती है। दूसरा तरीका धार्मिक हो जाने का है। हम अपने ईष्‍ट के समक्ष बहुत कम झूठे होते हैं।
क्‍योंकि जैसा देव वैसा पूजारी और जैसा पूजारी वैसा देव
यहां किसी प्रकार का अहंकार या छिपाव नहीं होता और आप आसानी से अपने सवालों के जवाब पा जाते हैं
और अंत में तरीका बचता है ध्‍यान का
इसके बारे में कल बात करेंगे...

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावनाएं- भाग एक

जन्‍म-मृत्‍यु के चक्र को नियति मान भी लिया जाए तो मोक्ष मनुष्‍य की इच्‍छा स्‍वातंत्रय (freedom of will) का परिचायक है।
कपिल मुनि ने सांख्‍य दर्शन में जिस निरपेक्ष पुरुष का और शंकराचार्य ने अद्वैतवाद में जिस निगुर्ण, निराकार और निर्लिप्‍त ब्रह्म का उल्‍लेख किया है उस सामानन्‍तर सत्‍ता से एक आम इंसान अपने प्रयासों से कैवल्‍य अवस्‍था प्राप्‍त कर जुड जाता है। फिर उसे सांसारिक बंधन गौण लगने लगते हैं। पश्चिमी मान्‍यता में ऐसा कुछ नहीं है जो भौतिक जगत को चुनौती दे सके।
एक बार ओशो ने इसे बहुत खूबसूरती के साथ पेश किया था। उन्‍होंने कहा कि भारत मे बुद्ध ने देखा कि एक गरीब, दूसरा रोगी, तीसरा मृत और चौथा सन्‍यासी है। पश्चिम के लोग इस सन्‍यास को समझ नहीं पाए इसलिए वहां कोई योगी नहीं हुआ।
पश्चिम के अनुसार जो कुछ है सब यहीं पर है। ऐसे में हॉलीवुड की एक फिल्‍म मैट्रिक्‍स प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक पश्चिमी भौतिकवाद के बीच अद्भुद् सांमजस्‍य पेश करती है।

मैट्रिक्‍स मेरी नजर में:

इस फिल्‍म के पात्रों के नाम भी कुछ इस तरह है जो मौजूदा इंसानों का संबंध दूसरी दुनिया से जोडते हैं।

नियो: metaphysical world का प्रतिनिधित्‍व करता है। ट्रिनिटी: भौतिक और अध्‍यात्मिक जगत के बीच संचरण में नियो की सहायता करती है और अंत में उसका साथ भी छूट जाता है।
मारफीयस: यह जानता है कि नियो होता है और उसे कैसे बाहर निकाला जाता है।
एजेन्‍ट स्मिथ: भौतिक जगत पर कब्‍जा करने वाले लोग, इन्‍हें वायरस माना गया है।
कम्‍प्‍यूटर वर्ड: माया के आवरण से ढकी सृष्टि को दिखाने का प्रयास

पूरी फिल्‍म को एक इंसान के दिमाग और उसके चारों ओर के वातावरण के साथ देखा जाए तो महसूस होता है कि गूढ बातों को कितनी सुंदरता के साथ पेश किया गया है। एक आम इंसान कि तरह “मिस्‍टर एडम्‍स” पैदा होता है, पढ लिखकर (पहले से तैयार सिस्‍टम में) एक बडी कंपनी में मुलाजिम हो जाता है। स्‍वाभावित चारित्रिक कमजोरियों- डर और लालच के साथ जिंदगी गुजार रहा होता है कि एक दिन:
मारफीयस (अंतचेतना) का संदेश आता है जिसमें माया को तोडकर निकल जाने का भाव होता है। शुरू में मिस्‍टर एडम्‍स डरता है लेकिन ट्रिनिटी और अन्‍य गुणों के साए में वह माया का जाल तोडकर दूसरी ‘वास्‍तविक’ दुनिया में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद शुरू होताह एक और संघर्ष-
विश्‍वास करने का: माया के आवरण से ढकी सृष्टि में क्‍या वास्‍तविक है और क्‍या भ्रम इस बारे में निर्णय करना कतिपय मुश्किल है। लोगों, वस्‍तुओं और घटनाओं पर कितना यकीन किया जा सकता है और कितना अविश्‍वास यह भी स्‍पष्‍ट नहीं होता। 

इस बारे में एक झेन गुरू की कहानी भी है: एक झेन गुरू एक खूबसूरत सुबह जागे और जोर-जोर से रोने लगे। शिष्‍य सकते में आ गए कि क्‍या हो गया गुरूजी को। पूछा क्‍यों रो रहे हैं गुरूजी। तो जवाब मिला कि मैं सपने में तितली बन गया था और खिली धूप में उपवन में फूलों रस चूसता घूम रहा था। इस पर शिष्‍यों की जान में जान आई। किसी समझदार शिष्‍य ने कहा गुरूजी वह तो स्‍वप्‍न था। यह जवाब सुनकर तो गुरूजी दहाड मारकर रोने लगे। बोले मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि वह स्‍वप्‍न था कि यह स्‍वप्‍न है। इस कहानी में वर्तमान पर अविश्‍वास करने के बजाय जो वास्‍तविक है उस पर विश्‍वास करने की कोशिश की गई है। भारतीय दर्शन में भी जाग्रत अवस्‍था से तुरीय अवस्‍था तक चेतना के कई स्‍तर बताए गए हैं।

अब वापस मैट्रिक्‍स में चलते हैं: यहां मारफीयस भी मिस्‍टर एडम्‍स को नियो बनाने में जुटते हैं और नियो को विश्‍वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन इस प्रयास में भी भौतिक रुख कायम रहता है। पता नहीं दर्शको को समझाने के लिए या फिर पश्चिमी मान्‍यता के कारण। कुछ भी हो मारफीयस का प्रयास रंग लाता है और नियो खुद में विश्‍वास करने लगता है। भारतीय दर्शन में इस अवस्‍था को कहते हैं

अहम् ब्रह्मास्मि यानि मैं ही ब्रह्म हूं।
इसके बाद नियो के सामने कम्‍प्‍यूटर वर्ड (माया के आवरण वाली दुनिया) धूमिल होने लगती है। अंतत: नियो माया के जाल को तोड देता है। भौतिक और सांसारिक नियमों के टूटने के साथ ही नियो उडने लगता है, गोलियों को रोकने लगता है और बिना साधनों के दोनों दुनियाओं में भ्रमण करने लगता है।
... स्‍वतंत्रता की संभावनाएं...

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

दिल से ईश्‍वर तक ले जाने वाले गीत

हमेशा दर्शन और अध्‍यात्‍म के बारे में चिंतन करने वाले लोग (हो सकता है मेरे जैसे हों लेकिन) इस बारे में बहुत अच्‍छा नहीं सोचते। चलिए मैं आपके साथ सोचने की कोशिश करता हूं। पिछले कुछ दिनों में मैने गानों के बारे में सोचा। जो दिल, प्रेयसी और विरह के प्रेम से पगे थे। इसमें खास क्‍या है। सुनकर आपको सुखद आश्‍चर्य होगा कि जो भी गाने हिट हैं वे सभी ईश्‍वर पर फिट बैठते हैं।
भईया यह कैसे।
बताता हूं
एक गाना सोचो जो आपने सुना और दिल को छू गया।
मन हूंम हूंम करे घबराए घन धम धम करे गरजाए
इक बूंद कहीं पानी की अखियों से बरसाए
इस गाने में पिया से विरह की पीडा कूटकर भरी हुई है लेकिन गरीब प्रियतमा अपने प्रिय से कहती है

तोरी ऊंची डारी मैने पंख लिए कटवाए

इसे पूरी तरह ईश्‍वर के विरह में कलपती आत्‍मा के लिए माना जा सकता है। एक क्षण ऐसा आया कि इस आत्‍मा को उसका साथ कुछ देर के लिए मिल गया और नन्‍ही आत्‍मा उसके प्रेम में उलझ गई अब जब निरंकुश निराकार ईश्‍वर ऊपर बैठा देख रहा है तो आत्‍मा कहती है नैतिक रूप से तुम्‍हारी डारी बहुत ऊंची है और मैने शरीर में फंसकर अपने पर कटवा लिए हैं। न उडा जा सकता है और न रहा जा रहा हे।

बहुत कारुण

एक और गाना लेते है
पंख होते तो उड आती रे रसिया ओ बालमा तुझे दिल के दाग दिखलाती रे...

कुंठा बढाती शिक्षा

सैकडो साल पहले अरस्‍तू ने एक बार कहा कि कोई नहीं जानता कि बच्‍चों को अच्‍छा कैसे बनाया जाए। यकीन मानिए तब से अब तक हजारों लोग लाखों घण्‍टे लगाकर इस बारे में शोध कर चुके हैं लेकिन इसका कोई निश्चित जवाब नहीं खोजा जा चुका है। शिक्षा के कई स्‍तर है। एक ओर रविन्‍द्रनाथ का प्रयोग है जिसमें युवक-युवतियों को पेडों के नीचे बैठाकर प्रेमपूर्ण माहौल में पढाया जाता था। समस्‍या तब आई जब प्रेमपूर्ण वातावरण में युवकों और युवतियों को प्रेम तो बढने लगा लेकिन पढाई के बारे में कुछ कहना मुश्किल रह गया।
ठीक है
इसके साथ ही चल रहा था मैकाले का प्रयोग
इसमें कक्षा लोअर किंडर गार्डन से लगाकर मास्‍टर ऑफ द सब्‍जेक्‍ट तक की पढाई थी लेकिन एक अत्‍यंत मेधावी बालक चार साल की उम्र से बाईस साल की उम्र तक पढकर भी इंसान बन जाए इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है। इस पद्धति की खासियत यह है कि यह पडाव दर पडाव होती है और हर साल आपको कुछ हासिल कर लेने का सुख सौभाग्‍य प्रदान करती है ऐसे में कोई अभिभावक या फिर विद्यार्थी साल दर साल मिल रही इस संतुष्टि को कैसे अलविदा कह सकता है। सरकार के लिए भी यह अधिक सहूलियत की चीज है कि पहले से तैयार सिस्‍टम को बनाए रखा जाए इसमें सोचने की जरूरत भी नहीं पडती।
अब बात रही कुंठा की
मान लिया शिक्षा की हर संभव पद्धति को लागू किया जाए और विद्वान से विद्वान लोग तैयार किए जाएं लेकिन ये लोग आखिर करते क्‍या हैं
मैं किसी रेंटिंग के चक्‍कर में न पडूं तो आपको बता सकता हूं कि यह पढाई बनाती है
अध्‍यापक
वकील
चिकित्‍सक
सेल्‍समैन
प्रशासनिक अधिकारी
इंजीनियर
और तीन चार जोड लीजिए लिस्‍ट खत्‍म हो जाएगी
तो मैं क्‍या कहना चाह रहा हूं
सही सवाल
मैं बता रहा हूं कि उक्‍त सभी कार्य नौकरीपेशा लोगों के हैं जो नहीं है वे स्‍वरोजगार के लिए उन्‍मुक्‍त करते हैं। यानि या तो रोजगार के लिए किसी का मुंह देखो या फिर जिंदगीभर मेहनत करके रोटी कमाओ
अमीर कैसे बनोगे, संतुष्‍ट कैसे होवोगे, शांत कैसे होवोगे, क्‍या पैसे के पीछे भागते रहोगे, लम्‍बी छुट्टियां कब मनाओगे, अपने मन का काम कब करोगे

आखिरी सवाल ज्‍यादा चुभोने वाला है इस जिन्‍दगी में मन का काम क्‍या होता है जो काम है वही करना पडेगा यही नियति है जिन्‍दगी ने इसी ओर धक्‍का मारा है तो इसी ओर जाएंगे जिन्‍दगी जब तक दूसरी बार धक्‍का नहीं मारेगी तब तक कैसे परिवर्तन हो सकता है। परिवर्तन के लिए परिस्थितियां जरूरी है।
अब आई बात समझ में देश, काल, समाज और अर्थ यानि पैसा तय करता है कि हम किस ओर जाएंगे न कि हमारी इच्‍छा। यानि ईश्‍वरवादी धर्मो के अनुसार सबकुछ पूर्वनियत है और यह सही है।
अब मेरी सोच यह है कि स्‍वतंत्रता की संभावना (freedom of will) कहां है। सबकुछ तो धक्‍के से चल रहा है।
वर्तमान में हमें मिल रही शिक्षा केवल इस धक्‍के को समझने और झेलने की क्षमता देती है ऐसे में कुंठा परत दर परत दिमाग में घर करती जाती है और आखिरी परिणाम होता है कि हम अपनी शक्तियों को भूलकर हथियार डाल देते हैं। इसे समझने के लिए मैं आपको एक प्रयोग करने के लिए आमंत्रित करूंगा
अपने घर के शांत स्‍थान पर कुछ देर के लिए आंखें बंद करके बैंठें और कल्‍पना करें कि आप कमरे के ही किसी ऊपरी कोने से खुद को देख रहे हैं अब बताएं कि क्‍या आपको दिखाई देने वाला व्‍यक्ति वही है जिसकी छवि आपने बचपन में अपने मन में गढी थी यदि नहीं तो कुंठाएं सिर उठा चुकी है।
अगला प्रयोग
परिस्थितियों से कितना लड सकते हैं
ऊपर बताई अवस्‍था में ही बैठे रहें और सोचें कि यह व्‍यक्ति अपने मन की करने के लिए कितने दिनों के लिए वर्तमान स्थिति से गायब हो सकता है हट सकता है बिना कमाए बिना किसी की चिंता किए बिना कोई व्‍यवस्‍था किए
इस लेख को पढकर एक बार हो सकता है आपको डिप्रेशन महसूस हो लेकिन परतें खुलने लगेंगी
श्‍ोष कल...