पिकासो ने एक सिद्धांत दिया था जिसमें उसने बताया कि हर चीज की सुंदरता उसके घटकों के सही अनुपात में होने से होती है। अगर यह अनुपात गड़बड़ जाए तो सुंदरता कम हो जाती है।
बुधवार, 10 सितंबर 2008
सुंदरता का पैमाना
पिकासो ने एक सिद्धांत दिया था जिसमें उसने बताया कि हर चीज की सुंदरता उसके घटकों के सही अनुपात में होने से होती है। अगर यह अनुपात गड़बड़ जाए तो सुंदरता कम हो जाती है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
बुधवार, 13 अगस्त 2008
छोटे निवेश में अधिक लाभ
बिजनेस में हम इसे स्मार्ट निवेश कह सकत हैं लेकिन यहां मैं पैसों के निवेश के बजाय आध्यात्मिक निवेश की बात करना चाहूंगा। व्यापार से जुड़े सैकड़ों लोगों को मैंने करीब से देखा और समझने की कोशिश की। आध्यात्मिक स्तर पर बणिए (यहां बणिए से तात्पर्य उद्यमी से है) दो प्रकार के होते हैं। एक तो अपने प्रतिष्ठान में देवी-देवता की तस्वीर लगाते हैं और पूजा पाठ का जिम्मा किसी पण्डित को सौंप देते हैं। पण्डित रोजाना सुबह आता है देवताओं की सुध लेता है और चला जाता है। देवता किनारे बैठे रहते हैं। दूसरे वे जो अपना सारा काम भगवान के निमित्त होकर करते हैं। पहली प्रकार के बणियों को मैंने पैंतीस से चालीस साल तक की छोटी उम्र में साइटिका, स्पांडलाइटिस और नर्वस सिस्टम की अन्य बीमारियों से जूझते हुए देखा है। चिकित्सक के पास जाने पर इनका पुख्ता र्इलाज भी नहीं होता। क्योंकि चिकित्सकों को कहना है कि ये बीमारियां शारीरिक होने के बजाय तनाव से अधिक प्रभावित होती हैं।
उद्यमियों को क्या करना चाहिए?
समस्या को इस दृष्टिकोण से देखने के बाद मैंने अपने जानकार उद्यमियों को आध्यात्मिक होने की सलाह दी तो उन्होंने मुझी से पूछा,
क्यों पंडित जी अब धंधा छोड़कर पूजा-पाठ में लगना पड़ेगा।
मैंने जबाव दिया, नहीं।
आध्यात्मिक होने का अर्थ पूजा-पाठ कतई नहीं है। शेयर बाजार में जहां यह कहा जाता है कि ईमानदार दोस्त खोजने की बजाय कुत्ता पाल लेना बेहतर है ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो कि आपकी बात को सुनकर समाधान सुझाए। यहां एक बार फिर में वैज्ञानिकों की खोज का हवाला देते हुए बताना चाहूंगा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि हम अपनी दिनचर्या में अपने दिमाग का महज एक प्रतिशत हिस्सा ही काम में लेते हैं। शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन मस्तिष्क के पास होता है। हमारा आध्यात्मिक रुझान इसी 99 प्रतिशत हिस्से से हमारे लिए अतिरिक्त ऊर्जा और समाधान चुराता है। यानि आध्यात्मिक होकर अपनी सहायता खुद ही कर रहे होते हैं। रहा सवाल पूजा पाठ का यह तो मात्र बाहरी उपांग हैं। वास्तविक रुप से तो हमें उस ईश्वर का ध्यान करना है जो हमें सही रास्ता दिखा सके। आप भी गौर करेंगे तो पाएंगे कि जो लोग ईश्वर की शरण में रहते हैं वे अपनी सामान्य जिन्दगी में तनावों को खुद से दूर रखने में सफल होते हैं। तो सुबह या शाम के समय खुद और ईश्वर में किया गया समय का जरा सा निवेश हमें अच्छा फायदा दिला सकता है।
उद्यमियों को क्या करना चाहिए?
समस्या को इस दृष्टिकोण से देखने के बाद मैंने अपने जानकार उद्यमियों को आध्यात्मिक होने की सलाह दी तो उन्होंने मुझी से पूछा,
क्यों पंडित जी अब धंधा छोड़कर पूजा-पाठ में लगना पड़ेगा।
मैंने जबाव दिया, नहीं।
आध्यात्मिक होने का अर्थ पूजा-पाठ कतई नहीं है। शेयर बाजार में जहां यह कहा जाता है कि ईमानदार दोस्त खोजने की बजाय कुत्ता पाल लेना बेहतर है ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो कि आपकी बात को सुनकर समाधान सुझाए। यहां एक बार फिर में वैज्ञानिकों की खोज का हवाला देते हुए बताना चाहूंगा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि हम अपनी दिनचर्या में अपने दिमाग का महज एक प्रतिशत हिस्सा ही काम में लेते हैं। शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन मस्तिष्क के पास होता है। हमारा आध्यात्मिक रुझान इसी 99 प्रतिशत हिस्से से हमारे लिए अतिरिक्त ऊर्जा और समाधान चुराता है। यानि आध्यात्मिक होकर अपनी सहायता खुद ही कर रहे होते हैं। रहा सवाल पूजा पाठ का यह तो मात्र बाहरी उपांग हैं। वास्तविक रुप से तो हमें उस ईश्वर का ध्यान करना है जो हमें सही रास्ता दिखा सके। आप भी गौर करेंगे तो पाएंगे कि जो लोग ईश्वर की शरण में रहते हैं वे अपनी सामान्य जिन्दगी में तनावों को खुद से दूर रखने में सफल होते हैं। तो सुबह या शाम के समय खुद और ईश्वर में किया गया समय का जरा सा निवेश हमें अच्छा फायदा दिला सकता है।
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Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
रविवार, 6 अप्रैल 2008
स्वतंत्रता की संभावना- भाग पांच
मानसिक गुलामी...
ईश्वर ने हमें पैदा किया तो साथ ही हमारे खाने की भी व्यवस्था की। इस धारणा के साथ हरी घास के मैदान में चरती भेड का चित्रण किया गया। फिर इस भेड को एक रस्सी से बंधा देखा गया और निष्कर्ष निकाला गया कि खूंटे से बंधी रस्सी से बंधी भेड उतनी दूर तक ही चर सकती है जितनी दूर तक रस्सी जाती है। यानि कल्पना करें कि अधिक से अधिक कितनी घास खाई जा सकती है तो लगता कि एक गोल घेरे जितनी घास जिसका व्यास रस्सी के बराबर हो। यहां फिर से पूर्वनियतता आ धमकती है। यानि खूंटा ईश्वर ने लगाया, रस्सी उसने दी और कितना खा सकते हो इसकी आजादी भी। यहां आजादी है लेकिन रस्सी से बंधी आजादी। यह कल्पना भारतीय प्राचीन दर्शन से मेल नहीं खाती जो खुद को ईश्वर का ही अंश बताती है और एक दिन ईश्वर हो जाने का विश्वास भी दिलाती है।
पश्चिमी दार्शनिकों ने हालांकि स्व और ईश्वर दोनों की ही विशद व्याख्या की है लेकिन भारतीय दर्शन ने तो मुक्ति के नाम पर चमत्कार ही कर दिया। हर बंधन का जवाब है। अद्वैतवाद में देखा जाए तो सबकुछ मिथ्या है और इससे परे निकला जा सकता है। द्वैतवाद को देखें तो लगता है कि भले ही सबकुछ मिथ्या न हो लेकिन इससे बाहर निकला जा सकता है। चार्वाक की सुनें तो ऋण लेकर भी जिंदगी को और विशाल बनाया जा सकता है। सांख्य की सुनें तो सृष्टि के साथ ही बंधन दिखाई देता है। इसके परे निकलने पर निर्गुण तक पहुंचा जा सकता है। यानि बच निकलने की संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन मानसिक गुलामी का क्या जो भेड के साथ बंधी रस्सी की शक्ल में लगातार हमारे साथ रहती है।
ईश्वर ने हमें पैदा किया तो साथ ही हमारे खाने की भी व्यवस्था की। इस धारणा के साथ हरी घास के मैदान में चरती भेड का चित्रण किया गया। फिर इस भेड को एक रस्सी से बंधा देखा गया और निष्कर्ष निकाला गया कि खूंटे से बंधी रस्सी से बंधी भेड उतनी दूर तक ही चर सकती है जितनी दूर तक रस्सी जाती है। यानि कल्पना करें कि अधिक से अधिक कितनी घास खाई जा सकती है तो लगता कि एक गोल घेरे जितनी घास जिसका व्यास रस्सी के बराबर हो। यहां फिर से पूर्वनियतता आ धमकती है। यानि खूंटा ईश्वर ने लगाया, रस्सी उसने दी और कितना खा सकते हो इसकी आजादी भी। यहां आजादी है लेकिन रस्सी से बंधी आजादी। यह कल्पना भारतीय प्राचीन दर्शन से मेल नहीं खाती जो खुद को ईश्वर का ही अंश बताती है और एक दिन ईश्वर हो जाने का विश्वास भी दिलाती है।
पश्चिमी दार्शनिकों ने हालांकि स्व और ईश्वर दोनों की ही विशद व्याख्या की है लेकिन भारतीय दर्शन ने तो मुक्ति के नाम पर चमत्कार ही कर दिया। हर बंधन का जवाब है। अद्वैतवाद में देखा जाए तो सबकुछ मिथ्या है और इससे परे निकला जा सकता है। द्वैतवाद को देखें तो लगता है कि भले ही सबकुछ मिथ्या न हो लेकिन इससे बाहर निकला जा सकता है। चार्वाक की सुनें तो ऋण लेकर भी जिंदगी को और विशाल बनाया जा सकता है। सांख्य की सुनें तो सृष्टि के साथ ही बंधन दिखाई देता है। इसके परे निकलने पर निर्गुण तक पहुंचा जा सकता है। यानि बच निकलने की संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन मानसिक गुलामी का क्या जो भेड के साथ बंधी रस्सी की शक्ल में लगातार हमारे साथ रहती है।
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शनिवार, 29 मार्च 2008
स्वतंत्रता की संभावना... भाग चार
आत्मा की स्वतंत्रता की बात से पहले बात आती है मानसिक स्वतंत्रता की। जब तक मनुष्य इस दृष्टिकोण से सोचना शुरू नहीं करता कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता भी है तब तक स्वतंत्रता की अन्य संभावनाओं पर विचार करना व्यर्थ प्रतीत होता है। मोटीवेशनल मेनेजमेंट गुरुओं की सुनें तो लगता है जैसे कि आम आदमी के लिए बनाए गए अधिकांश नियम व्यक्ति को सीमाओं में बांध देते हैं और इसी से स्वतंत्र होने की संभावनाएं खत्म होने लगती है। इसकी परिणिती यह होती है कि व्यक्ति खुद को बंधनों में जकडा हुआ पाता है और कभी स्वतंत्र नहीं होता है। लेकिन विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस को देखा जाए तो मानसिक बंधनों की क्षुद्रता समझ आने लगती है। एक ओर परमहंस हैं जो कि कीचड के बीच भी श्वेत धवल नजर आते हैं। सांसारिकता में इतने सूक्ष्म की मूर्ति से इतना प्यार कर बैठे कि उसे जीवंत कर दिया। माया के जाल में इतने सूक्ष्म हो गए कि जाल का ताना-बाना उन्हें जकड नहीं पाया। अपनी पत्नी को ही मां का दर्जा दे दिया। दूसरी ओर हैं विवेकानन्द, उन्हीं परमहंस के शिष्य। माया के जाल के हर टुकडे से दूर। सांसारिकता त्यागने के बाद भी उन्हें चैन नहीं आया तो अपनी मातृभूमि त्याग दी और हर संबंध को खुद से दूर रखा। यानि अपना कद इतना विशाल कर लिया कि माया का जाल छोटा पड गया। केवल भारतीय और अमरीकी ही नहीं दुनिया का हर मनुष्य उनके लिए भाई या बहन बन गए। तो जीवन बंधनों से बंधा हुआ होकर भी इतना सूक्ष्म हो सकता है कि माया का आवरण बांध न सके और इतना विशाल भी कि आवरण ही छोटा पड जाए। यानि स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकला जाए। यहां दूसरी खोज शुरू होती है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?
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गुरुवार, 6 मार्च 2008
दूसरे दिमाग की आहट
(Listening The Second Mind)
हमने चेतन और अवचेतन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। योग में राजयोग ऐसा सैगमेंट है जो हमें सैकण्ड माइंड तक पहुंचने के लिए सहायता करता है। इसके अलावा तंत्र में भी कई ऐसी तकनीकें हैं जो हमें सैकण्ड माइंड तक लेकर जाती हैं। फिलहाल मैं बात करूंगा साइकोलॉजिकल पद्धति की। साइकोलॉजिस्ट बताते हैं कि हमारे दिमाग की चार अवस्थाएं होती है। उन्हें एल्फा, बीथा, थीटा आदि में बांटा गया है।
एल्फा लेवल तकनीक: सेकण्ड माइंड में उतरने की यह मुझे सबसे सुलभ पद्धति लगती है। इसमें शांत होकर एक बंद कमरे में बैठना होता है। कमर सीधी और आंखें ठीक पैंतालीस डिग्री पर छत की ओर। अब सौ से एक तक उलटी गिनती करनी होती है। धीरे-धीरे। एक तक पहुंचने तक हमारा दिमाग एल्फा लेवल में पहुंच जाता है। तब हमारी श्वास स्थिर और स्वाभाविक हो जाती है। दिमाग की इस अवस्था में पहुंच हुए व्यक्ति को समस्याओं के समाधान भी नजर आते हैं और डिप्रेशन के पेशेंट को अधिक लॉजिकल सोचने का अवसर मिलता है। योग एवं तंत्र संबंधी चर्चा बाद में कभी...
हमने चेतन और अवचेतन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। योग में राजयोग ऐसा सैगमेंट है जो हमें सैकण्ड माइंड तक पहुंचने के लिए सहायता करता है। इसके अलावा तंत्र में भी कई ऐसी तकनीकें हैं जो हमें सैकण्ड माइंड तक लेकर जाती हैं। फिलहाल मैं बात करूंगा साइकोलॉजिकल पद्धति की। साइकोलॉजिस्ट बताते हैं कि हमारे दिमाग की चार अवस्थाएं होती है। उन्हें एल्फा, बीथा, थीटा आदि में बांटा गया है।
एल्फा लेवल तकनीक: सेकण्ड माइंड में उतरने की यह मुझे सबसे सुलभ पद्धति लगती है। इसमें शांत होकर एक बंद कमरे में बैठना होता है। कमर सीधी और आंखें ठीक पैंतालीस डिग्री पर छत की ओर। अब सौ से एक तक उलटी गिनती करनी होती है। धीरे-धीरे। एक तक पहुंचने तक हमारा दिमाग एल्फा लेवल में पहुंच जाता है। तब हमारी श्वास स्थिर और स्वाभाविक हो जाती है। दिमाग की इस अवस्था में पहुंच हुए व्यक्ति को समस्याओं के समाधान भी नजर आते हैं और डिप्रेशन के पेशेंट को अधिक लॉजिकल सोचने का अवसर मिलता है। योग एवं तंत्र संबंधी चर्चा बाद में कभी...
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