बुधवार, 10 दिसंबर 2008

यही है वो मंदिर

राजस्‍थान के अधिकांश लोगों के लिए इस मंदिर की चर्चा करना घावों को कुरेद देने जैसा काम है। अभी कुछ दिन पहले जोधपुर गया। सालों बाद और शादी के बाद तो पहली बार जोधपुर जाना हुआ। वहां पत्‍नीजी साथ थीं। पहुंचने के कुछ ही मिनटों के भीतर वे पता कर आईं कि यहां कोई ऐसा मंदिर है जहां कुछ भी मांगों मिल जाता है। वैसे वे मांग-तांग में विश्‍वास नहीं करती लेकिन बहुत ज्‍यादा मांगना हो तो वे किसी स्‍थापित भगवान का गला पकड़ती हैं और मांग लेती है। कभी मिल जाता है तो ठीक वरना इन रोड साइड भगवानों की नि:स्‍सारता का तो उन्‍हें भान है ही। खैर मेरे दिमाग में घूमने का प्‍लान था और पत्‍नीजी के दिमाग में उस मंदिर जाने का। एक ऑटो वाले को पकड़ा और घूमने की जगह पूछी। वह बिना प्‍लान सीधे मेहरानगढ़ ले गया। गढ़ में प्रवेश से पहले ही वहां गढ़ की प्राचीरों के ऊपर मं‍डराती चीलें दिखाई दी। मैंने सोचा राजशाही का कत्‍ल हुए साठ साल से ज्‍यादा समय हो गया अब ये चीलें किसका मांस ढूंढ रही हैं। हम ऊपर चढ़ते गए। गढ़ के अन्‍दर की कुछ महिलाएं कठपुतलियां बेच रही थीं। कान्‍हा (मेरा बेटा) उत्‍सुकता से उनके पास चला गया। उनमें से एक से मैंने पूछा गढ़ में आगे क्‍या है। तो उसने बताया आगे चामूण्‍डा माता का मंदिर है। मेरे दिमाग में एक मिनट के लिए भी ख्‍याल नहीं आया था कि हम उसी देवी के पास जा रहे हैं जिसने कुछ ही दिन पहले सैकड़ों जवान लड़कों की बलि ली है। पीठ में सिरहन दौड़ गई। एक उत्‍सुकता थी देखने की सो कुछ तेजी से आगे बढ़ा। साथिन ने पूछा क्‍यों जी ये वही मंदिर है जहां मनौतियां सौ प्रतिशत पूरी होती है। मैं एक बारगी कुछ बोल नहीं पाया। एक ओर पत्‍नी का उत्‍साह तो दूसरी ओर दिमाग में चल रहा तूफान। मैंने धीरे-धीरे बोलते हुए बताया ये वही मंदिर है जहां सैकड़ो युवा कुचलकर मर गए थे। अब श्रीमतीजी के पांव भी ठिठक गए। माहौल बिल्‍कुल काला-काला सा नजर आने लगा। एक-दूसरे को हिम्‍मत देते हुए आगे बढ़े और निज मंदिर तक आए। हम दोनों ही कुछ नहीं बोल रहे थे। मंदिर से लौटते वक्‍त उन्‍होंने कहा मुझे तो केवल चीत्‍कार का ही अनुभव हुआ। वापस लौटते समय दोनों शांत थे। कान्‍हा समझ नहीं रहा था कि जब घूमने आए हैं तो खुश क्‍यों नहीं है।


किले के ऊपर का नजारा

सोमवार, 17 नवंबर 2008

बीकानेर की पाटा संस्‍कृति


भारत के बीकानेर शहर और इटली के उदीने शहर में एक समानता है और एक चीज दोनों शहर आपस में बांटते हैं।

जो चीज समान है वह है पाटा... इसके बारे में अभी  बताता हूं और क्‍या बांटते हैं वह लेख के आखिर में बताउंगा।

जो लोग बीकानेर के हैं या कुछ समय बीकानेर में  रह चुके हैं उन्‍हें अजीब लगेगा कि इस विषय पर मैं कैसे लिख रहा हूं लेकिन मुझे  पाटे पर लिखने का ख्‍याल कल रात को ही आया। हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स के स्‍पेशल कोरस्‍पोंडेंट  श्रीनंद झा, जो किसी पॉलिटिकल कवरेज के लिए बीकानेर आए थे, मुझसे फोन पर पूछा कि ये पाटा क्‍या  होता है। मैंने जवाब में सवाल ही पूछा कि आपको इस बारे में किसने बता दिया?

उन्‍होंने  कहा बता दिया किसी ने। क्‍या आप मुझे दिखाकर लाएंगे। मैंने कहा काम से फारिग होते  ही आपको ले चलूंगा। उन्‍होंने समय पूछा तो मैंने बताया रात दस बजे ठीक रहेगा। वे  अगले दिन की उम्‍मीद कर रहे थे और मेरे रात के दस बजे के प्रपोजल को सुनकर पशोपेश  में पड़ गए। फोन की दूसरी ओर तक कुछ देर की शांति के बाद उन्‍होंने कहा ठीक है, चलते हैं। मुझे काम निपटाने में कुछ अधिक समय लग गया। रात साढे़ दस के बाद ही मैं  उनकी आरटीडीसी की होटल तक पहुंच पाया। वे इंतजार कर रहे थे। उनका विचार था कि  फोटोग्राफर को भी साथ ले लेंगे तो काम हाथों-हाथ निपट जाएगा। मैंने कहा तीन लोग  चलेंगे तो कार लेनी पड़ेगी। पुराने शहर की तंग गलियों में कार मुश्किल से चल पाएगी, तो बाइक पर चलना ठीक रहेगा। फोटोग्राफर अगले दिन सुबह भी फोटो ले सकता है।

कुछ देर के डिस्‍कशन के बाद मेरी बात मान ली गई।  झा को लेकर मैं शहर के मुख्‍य मार्गों से होता हुआ पुराने शहर की ओर बढ़ रहा था तो  पहली बार मुझे शहर के बाहरी इलाके और तंग गलियों वाले पुराने शहर में अन्‍तर शिद्दत से महसूस हुआ।

अब पाटों की बात-

निकलने से पहले श्रीनन्‍दजी ने मुझसे थोड़ा ब्रीफ करने के लिए कहा। शुरुआती तौर पर मैंने जो बताया उसे झा ने कुछ इस तरह से समझा कि पाटा एक तरह का बड़ा दीवान होता है जो मोहल्‍ले के बीचों-बीच लगा होता है। इस पर कई लोग बैठते हैं। उनका सवाल था कि लोग करते क्‍या हैं पाटे पर? उनके लिए विषय नया था और मेरे लिए यह सवाल नया था। मैंने कहा सबकुछ। यानि हर तरह की गतिविधि पाटे से जुड़ी होती है। उन्‍होंने पूछा पाटे पर बैठते कौन लोग हैं। मैंने बताया हर तरह के पाटे पर अलग तरह के लोग नजर आएंगे। गुत्‍थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही थी। झा को लगा चलकर देख लेना ठीक रहेगा वरना ये युवा पत्रकार उन्‍हें और उलझा देगा।

ऐसा दिखता है पाटा-


यह है आचार्यों के चौक का पाटा-

बीकानेर के तकरीबन हर मोहल्‍ले में पाटा है या कहूं कि पाटे हैं। पाटे पाटा का बहुवचन है। हर पाटे का अपना इतिहास है। मोहल्‍ले के बीचों-बीच शीशम की टनों लकड़ी से बना यह ऊँचा ‘दीवान’ सामाजिक कार्यों की धुरी बनता है।

खैर हम लोगों ने आचार्यों के चौक पहुंचकर पाटे पर बैठे लोगों से सीधे बातचीत शुरू कर दी। पहले मैंने मारवाड़ी में बोलते हुए बैठे लोगों को बताया कि ये झा सा’ब हैं और दिल्‍ली से हिस्‍दुस्‍तान टाइम्‍स अख़बार से आए हैं। अपने पाटे के बारे में जानना चाहते हैं। इसके बाद आधे घण्‍टे से अधिक लम्‍बे समय तक लोग बोल रहे थे। इसमें वर्ड बैंक के पूर्व निदेशक और वर्तमान राजस्‍थान सरकार के वित्‍तीय सलाकार विजय शंकर व्‍यास, विभिन्‍न शोधों के तेरह पेटेंट हासिल कर चुके हर नारायण आचार्य और उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों को अपने तख्‍त पर बैठा चुका पाटा मानो खुद बोल रहा था। कैसे हर सामाजिक कार्यों में पाटा लोगों को एक स्‍थान पर एकत्रित करता है, बुजुर्गों की शामें और रातें तक इस पर गुजरती हैं, युवाओं की बीवीओं को सौत लगने वाला पाटा कई सौ सालों की स्‍मृति संजोए आने वाली पीढ़ी को, बीती हुई पीढ़ी के साथ मौहल्‍ले के बीचों-बीच बैठकर देखता है। झा केवल हां-हां में सिर हिला रहे थे और उत्‍साहित बड़े-बूढ़े, अधेड़ और जवान लोग लगातार बोल रहे थे। कोई आधे घण्‍टे बाद मैंने यह कहकर झा को मुक्ति दिलाई कि इन्‍हें भट्टड़ों के चौक का पाटा भी देखना है। लोगों ने निकलते हुए कहा वहां तो आपको ज्‍योतिषियों की पूरी जमात मिल जाएगी। झा एक बारगी अचकचा गए। मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि खुद ही देख लीजिए पूरी रात जगने वाले पाटे को।  

भट्टड़ों के चौक का पाटा

यह पाटा पूरी रात जगता है। दिन में बड़े-बूढ़े इस पर बैठते हैं और जैसे-जैसे रात ढ़लती है यहां ज्‍योतिषियों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। रात नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक एक ज्‍योतिषी जाता है तो दूसरा आता है। धुरी में रहते हैं प‍ंडित राजेन्‍द्र व्‍यास उर्फ ममू भईजी। कई बार वे आस-पास या कलकत्‍ता गए हुए होते हैं तो यह गहमा-गहमी कम होती है। लेकिन हमारा भाग्‍य प्रबल था। ममू वहीं मिल गए पाटे पर। अपने शिष्‍यों के साथ लैपटॉप पर किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण कर रहे थे। मैंने झा साहब का परिचय दिया तो उन्‍होंने गोत्र तक पूछ डाले। किसी समय मैं भी ममू के दरबार का हिस्‍सा रहा हूं। सो उनका स्‍वभाव जानता हूं। मैंने झा को ममू के हवाले कर किनारे हो गया। पाटा संस्‍कृति का दूसरा आयाम देखने के बाद झा बस नोट करते जा रहे थे। दो दिन पूर्व दिवंगत हुए आचार्यराज के बारे में पूरी जानकारी ली।

इसके बाद शुरू हुआ ज्‍योतिष का काम। बिना झा की कुण्‍डली देखे ममू ने प्रश्‍न कुण्‍डली बनाकर झा को उनके जीवन और परिवार के बारे में कई बातें बताई। जब झा को विश्‍वास हो गया तो उनसे जन्‍म समय और तारीख लेकर कुण्‍डली बनाई। इसके बाद तो ममू ने कई पन्‍ने खोलकर रख दिए। करीब डेढ़ घण्‍टे इसी पाटे पर व्‍यतीत हुए। यहां से देर रात रवाना होने के बाद मैंने झा से कहा कि बाकी पाटे मैं केवल आपको दिखा देता हूं। स्‍टोरी इन दो जगहों के आधार पर ही बन जानी चाहिए। झा सहमत थे। मैंने उन्‍हें मोहता चौक, कीकाणी व्‍यासों का चौक, हर्षों का चौक आदि स्‍थानों पर पाटे दिखाए और अंत में ले गया दम्‍माणी चौक के छतरी वाले पाटे पर। पूरे समय झा चुपचाप बस देखते रहे। बाद में देर रात जब मैं उनको वापस होटल छोड़ने गया तो उन्‍होंने धन्‍यवाद जैसी कुछ औपचारिकताओं के अलावा पाटे के बारे में कहा...

अद्भुद् 


अब दूसरी बात बीकानेर और उदीने शहर टैस्‍सीटोरी के रूप में एक हस्‍ती को बांटते हैं। कुछ उनकी क्‍योंकि यह हस्‍ती वहां पैदा हुई और कुछ हमारी क्‍योंकि जिन्‍दगी का अधिकांश हिस्‍सा उन्‍होंने बीकानेर में रहकर काम किया और यहीं दिवंगत हुए। उनके बारे में विशद चर्चा फिर कभी..

बुधवार, 5 नवंबर 2008

बहुत दिनों बाद

पिछले कई दिनों से सही कहूं तो चालीस दिन बाद फिर से ब्‍लॉग पर लौटा हूं। इस बीच गंगा, यमुना और हमारे यहां सरस्‍वती में बहुत सा पानी बह गया है। गंगा यमुना का पानी तो समुद्र तक पहुंच गया लेकिन सरस्‍वती का पानी पता नहीं कहां गया। कुछ दिन बाद बीकानेर में कोलायत का मेला भरेगा। इसमें दूर दूर से नाथ साधू भी आएंगे। लम्‍बे समय से कोलायत को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अभी तक तो सफलता नहीं मिली है। अच्‍छा ही है नंगी-अधनंगी हालत में बैठे नाथ साधुओं से विदेशी पर्यटकों की जितनी दूरी बनी रहे अच्‍छा है। कपिल मुनि की तपोभूमि पर गर्मी से सर्दी के संधिकाल में लगने वाले इस मेले के प्रति क्षेत्र के लोगों का खासा रुझान होता है। हमारे बीकानेर में तो कहा जाता है कि श्रीकोलायत के कपिल सरोवर का पानी छिड़ने के बाद ही ठण्‍ड की शुरूआत होती है। इससे पहले तक तो पंखे चलते रहते हैं घरों में।
ऑक्‍ल्‍ट का छात्र होने के नाते मेरा भी इस मेले के प्रति रुझान रहता है। एक दो बार तो मैंने वहां पूरा दिन इसी आशा में बिताया कि काश कहीं कोई पहुंचा हुआ नाथ साधू मिल जाए लेकिन अभी तक तो निराशा ही हाथ लगी है। इस बार कोशिश करूंगा कि रिपोर्टिंग के लिहाज से कोलायत के मेले में शिरकत करूं।
अब बात वापस ब्‍लॉगिंग की। पिछले कुछ दिनों में मैंने लिखना कम क्‍या किया सभी धड़ाधड़ लिखने लगे। अमित जी, आमिर भाई, वाजपेयी जी सभी लगे हैं धमाधम, पुण्‍य प्रसूनजी को भी देखा । लगा चलो कहीं तो हम भी आगे हैं। अब सभी लोग आ चुके हैं तो हम भी कुछ लिख मारते हैं शायद लोग पढ़ें। टाइफाइड ने तो पूरा सिस्‍टम ही बिगाड़ दिया। अच्‍छी स्‍पीड बनी हुई थी। अब तो घण्‍टे दो घण्‍टे बैठ पा रहा हूं। सारा समय दूसरों को पढ़ने में ही खर्च हो जाता है। लिखने लायक सोचता हूं तब तक सिस्‍टम को बंद करने का मन होने लगता है। आज बस इतना ही...

रविवार, 21 सितंबर 2008

स्थितप्रज्ञता या मूढ़ता? कुछ लोचा तो है...

गुणीजनों ने बताया कि जब समस्‍याएं चारों ओर से घेर ले और चिंताएं हावी होने लगे। दिमाग का अधिकांश हिस्‍सा तब तात्‍कालिक समसयाओं में उलझा हो और सामने दिख रहे परिवर्तन का हल समझ में न आए तो कुछ देर के लिए शांत बैठो। खुद को छोड़ दो। जो होता है हो जाने दो। देखते रहो साक्षी भाव से। विचारों के प्रवाह में बाधा लाने की बजाय एकाग्र होओ किसी एक बिन्‍दु पर चाहे वह हृदय के भीतर का आकाश और उसके भीतर के आकाश और उसके भीतर खिले कमल पर ही क्‍यों न हो। एक बिन्‍दू लेकर उसमें डूब जाओ, तब आएगी स्थिरता। पहले विचार आएगा, जो बाद में ध्‍यान बनेगा, उससे धारणा बनेगी और धारण सिद्ध होकर समाधि बनेगी। यानि स्थित प्रज्ञत आएगी। 

शिष्‍ट सवाल दागता है: हे गुरूदेव क्‍या होता है स्थितप्रज्ञता में ?

गुरूजी:  हैं ? 

ये स्थितप्रज्ञ स्थिति क्‍या है। 

अब गुरूजी ने स्‍वाद ले भी रखा है तो कैसे समझाए कि अदरक मी‍ठी है या खट्टी, नमकीन है या फीकी। 

खैर गुरू तो गुरू ठहरे मोर पकड़ने का तरीका भी बताएंगे तो कुछ इस तरह कि पहले पीछे से जाकर उसकी आंखों पर डामर लगा दो उसे दिखाई देना बंद जाए तो झट से पकड़ लो। आगे कोई सवाल नहीं। 

सो शिष्‍ य को बताया कि यह नो माइंड स्‍टेज है। 

यानि ?  चेले का सवाल का क्रम चालू है 

हे शिष्‍य (गुरू का चेहरे में ललासी आ रही है, शिष्‍य खुश हो रहा है कि गुरूजी के चेहरे का तेज बढ़ रहा है, श्रद्धावश आवाज की तल्‍खी को महसूस नहीं कर रहा) जब दिमाग में कोई विचार न आए तो वह स्थिति स्थितप्रज्ञता की है। भेजा विचारशून्‍य हो जाता है। नए विचार आने बंद हो जाते हैं। 

शिष्‍य समझने की फिराक में नो माइंड होकर बैठ जाता है। 

एक दो दिन से अपने दिमाग की भी हालत कुछ ऐसी ही है। हमेशा दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है लेकिन अभी कुछ भी नहीं आ रहा। अब सोच रहा हूं कि यह स्थिति नो माइंड की है या नेवर माइंड की। दिमाग में विचार नहीं आ रहे। यानि कुछ तो लोचा है। अब ये किससे पता लगवाया जाए कि मैं स्थितप्रज्ञ हो रहा हूं या मूढ़। 

बुधवार, 17 सितंबर 2008

हर व्‍यवस्‍था एक समय तक ही परिहार्य होती है

लगता है एक अर्सा हो गया हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के साथ। मैं पुराने लोगों को देखूं तो लगता है जैसे कल ही यहां आया हूं लेकिन पिछले आठ महीने से लगातार कुछ न कुछ ब्‍लॉ‍ग के बहाने करता रहा हूं। इंटरनेट के टूल, भड़ास की सदस्‍यता, अपने इस पुराने ब्‍लॉग पर दिमाग की हलचल को डालने, ज्‍योतिष का नया ब्‍लॉग शुरू करके उसमें लगातार विचारों का निवेश करके और जयपुर के राजीव जैन से एक रात की चैटिंग के बाद कहावतों का ब्‍लॉग शुरू करने के प्रयासों को इकठ्ठा किया जाए तो लम्‍बी पारी दिख सकती है।

इस बीच वैचारिक स्‍तर पर कई उतार चढ़ाव आए। कभी सोचता था कि क्‍या लगातार लिख पाउंगा तो कभी सोचा कि मुझे पढ़ने वाले लोग कौन होंगे, कभी व्‍यवस्‍तताओं के लम्‍बे दौर (जो आमतौर पर दो या तीन दिन के होते) मुझे फिर से ब्‍लॉगिंग के प्रति अजनबी बना देते। कुल मिलाकर तीखे क्षणें से गुजरता रहा। हो सकता है मैंने दूरी महज दो या तीन किलोमीटर ही तय की हो लेकिन तीखे क्षणों के उतार चढ़ाव ने इस दूरी को कई सौ किलोमीटर तक फैला दिया।

इसी यात्रा में टिप्‍पणी ऐसी चीज थी जिसने मुझे हमेशा हतोत्‍साहित किया। भले ही वह अच्‍छी हो लेकिन मेरे विचारों के अनुरूप टिप्‍पणियां मुझे कम ही मिली। सही कहूं तो एक भी नहीं मिली। तो कौन लोग हैं जो मुझे पढ़ रहे हैं। इसका खुलासा हुआ मेरे ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग पर लगाए गए एक बॉक्‍स से। जिसे मैं प्रश्‍न डिब्‍बा कहता हूं। इसे मैंने किसी दूसरी साइट पर थोड़ा सा स्‍पेस लेकर बनाया है। इस डिब्‍बे को लगाने के दूसरे तीसरे दिन से ही प्रश्‍नों की बौछार शुरू हो गई। एक महीने में सौ से अधिक सवाल। वह भी मेरे विषय से संबंधित। हां, इनमें से कुछ निजी सवाल थे तो कुछ ऐसे सवाल भी थे जो मुझे विषय को और अधिक गंभीरता से समझने में मदद करते। ब्‍लॉगिंग के अलावा दूसरा रास्‍ता है साइट का। एक पत्रकार होने के कारण मेरे पास इतना समय नहीं था कि खुद अपनी साइट डवलप कर लूं और इतना पैसा भी नहीं था कि किसी से डवलप करा लूं। सो इसी माध्‍यम से चिपका हूं। ब्‍लॉग के जरिए प्रश्‍नों की बौछार और टिप्‍पणियों में वही सूनापन देखकर मुझे टिप्‍पणी और भी अधिक निस्‍सार नजर आने लगी।

मेरे दिमाग में किसी टिप्‍पणी देने वाले का अपमान करने या उनके अब तक किए गए अथक प्रयासों को झुठलाने का इरादा कतई नहीं है। लेकिन हर व्‍यवस्‍था एक समय तक ही परिहार्य होती है। आज जब गूगल एनालिटिक जैसे टूल उपलब्‍ध हैं यह जानने के लिए कि कितने लोग कितनी देर के लिए आपके ब्‍लॉग पर आए तो फिर टिप्‍पणी देने और उसके लिए आग्रह करने की जरूरत कहां रह जाती है। पिछली रात न तो मैं किसी अवसाद में था न ही इस बारे में मेरे दिमाग में कोई कुंठा है लेकिन समीर भाई को भी यह बात समझनी होगी कि सभी टिप्‍पणीकार उनकी तरह मलंग नहीं होते कि पढ़ा और छोटा सा संकेत देकर निकल लिए। अब जो लोग टिप्‍पणी दे रहे हैं वे न तो अधिकांश विषयों को समझते हैं और ना ही इसे स्‍वीकार करने की उनमें ईमानदारी है। हां टिप्‍पणी के साथ अपना लिंक देना नहीं भूलते। मैंने कभी नहीं कहा कि समीर भाई को टिप्‍पणियों की आवश्‍यकता है। वे इतना रोचक लिखते हैं कि मैं टिप्‍पणी करूं या नहीं उनके ब्‍लॉग का चक्‍कर जरूर लगा आता हूं। यह सोचकर ही कि कुछ सीखने को मिलेगा। मैंने तो उनकी जय ही बोली है। व्‍यंग तो उन लोगों पर है जो दूसरे ब्‍लॉगर की किसी पोस्‍ट पर जाते हैं। एक ऐसी टिप्‍पणी छोड़ते हैं जो या तो समीर भाई की टिप्‍पणी जैसी दिखाई देती (यानि छोटी सी, लेकिन सारगर्भित नहीं) या ऐसी कि पोस्‍ट से टिप्‍पणी का संबंध बिठाने में ही घण्‍टाभर लग जाए। इसके बाद टिप्‍पणी के अंत में खुद का लिंक जोड़ा हुआ होता है। इस प्रवृत्ति को ही मैंने तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्‍हारी पीठ खुजाता हूं वाली शैली कहा है।

मैंने अपनी बात स्‍पष्‍ट की, यह मेरे दिमाग की हलचल थी।

अब भी कोई गिला शिकवा हो तो कहा सुना माफ करें...