बुधवार, 10 दिसंबर 2008
यही है वो मंदिर
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
सोमवार, 17 नवंबर 2008
बीकानेर की पाटा संस्कृति
भारत के बीकानेर शहर और इटली के उदीने शहर में एक समानता है और एक चीज दोनों शहर आपस में बांटते हैं।
जो चीज समान है वह है पाटा... इसके बारे में अभी बताता हूं और क्या बांटते हैं वह लेख के आखिर में बताउंगा।
जो लोग बीकानेर के हैं या कुछ समय बीकानेर में रह चुके हैं उन्हें अजीब लगेगा कि इस विषय पर मैं कैसे लिख रहा हूं लेकिन मुझे पाटे पर लिखने का ख्याल कल रात को ही आया। हिन्दुस्तान टाइम्स के स्पेशल कोरस्पोंडेंट श्रीनंद झा, जो किसी पॉलिटिकल कवरेज के लिए बीकानेर आए थे, मुझसे फोन पर पूछा कि ये पाटा क्या होता है। मैंने जवाब में सवाल ही पूछा कि आपको इस बारे में किसने बता दिया?
उन्होंने कहा बता दिया किसी ने। क्या आप मुझे दिखाकर लाएंगे। मैंने कहा काम से फारिग होते ही आपको ले चलूंगा। उन्होंने समय पूछा तो मैंने बताया रात दस बजे ठीक रहेगा। वे अगले दिन की उम्मीद कर रहे थे और मेरे रात के दस बजे के प्रपोजल को सुनकर पशोपेश में पड़ गए। फोन की दूसरी ओर तक कुछ देर की शांति के बाद उन्होंने कहा ठीक है, चलते हैं। मुझे काम निपटाने में कुछ अधिक समय लग गया। रात साढे़ दस के बाद ही मैं उनकी आरटीडीसी की होटल तक पहुंच पाया। वे इंतजार कर रहे थे। उनका विचार था कि फोटोग्राफर को भी साथ ले लेंगे तो काम हाथों-हाथ निपट जाएगा। मैंने कहा तीन लोग चलेंगे तो कार लेनी पड़ेगी। पुराने शहर की तंग गलियों में कार मुश्किल से चल पाएगी, तो बाइक पर चलना ठीक रहेगा। फोटोग्राफर अगले दिन सुबह भी फोटो ले सकता है।
कुछ देर के डिस्कशन के बाद मेरी बात मान ली गई। झा को लेकर मैं शहर के मुख्य मार्गों से होता हुआ पुराने शहर की ओर बढ़ रहा था तो पहली बार मुझे शहर के बाहरी इलाके और तंग गलियों वाले पुराने शहर में अन्तर शिद्दत से महसूस हुआ।
अब पाटों की बात-
निकलने से पहले श्रीनन्दजी ने मुझसे थोड़ा ब्रीफ करने के लिए कहा। शुरुआती तौर पर मैंने जो बताया उसे झा ने कुछ इस तरह से समझा कि पाटा एक तरह का बड़ा दीवान होता है जो मोहल्ले के बीचों-बीच लगा होता है। इस पर कई लोग बैठते हैं। उनका सवाल था कि लोग करते क्या हैं पाटे पर? उनके लिए विषय नया था और मेरे लिए यह सवाल नया था। मैंने कहा सबकुछ। यानि हर तरह की गतिविधि पाटे से जुड़ी होती है। उन्होंने पूछा पाटे पर बैठते कौन लोग हैं। मैंने बताया हर तरह के पाटे पर अलग तरह के लोग नजर आएंगे। गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही थी। झा को लगा चलकर देख लेना ठीक रहेगा वरना ये युवा पत्रकार उन्हें और उलझा देगा।
ऐसा दिखता है पाटा-

यह है आचार्यों के चौक का पाटा-
बीकानेर के तकरीबन हर मोहल्ले में पाटा है या कहूं कि पाटे हैं। पाटे पाटा का बहुवचन है। हर पाटे का अपना इतिहास है। मोहल्ले के बीचों-बीच शीशम की टनों लकड़ी से बना यह ऊँचा ‘दीवान’ सामाजिक कार्यों की धुरी बनता है।
खैर हम लोगों ने आचार्यों के चौक पहुंचकर पाटे पर बैठे लोगों से सीधे बातचीत शुरू कर दी। पहले मैंने मारवाड़ी में बोलते हुए बैठे लोगों को बताया कि ये झा सा’ब हैं और दिल्ली से हिस्दुस्तान टाइम्स अख़बार से आए हैं। अपने पाटे के बारे में जानना चाहते हैं। इसके बाद आधे घण्टे से अधिक लम्बे समय तक लोग बोल रहे थे। इसमें वर्ड बैंक के पूर्व निदेशक और वर्तमान राजस्थान सरकार के वित्तीय सलाकार विजय शंकर व्यास, विभिन्न शोधों के तेरह पेटेंट हासिल कर चुके हर नारायण आचार्य और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अपने तख्त पर बैठा चुका पाटा मानो खुद बोल रहा था। कैसे हर सामाजिक कार्यों में पाटा लोगों को एक स्थान पर एकत्रित करता है, बुजुर्गों की शामें और रातें तक इस पर गुजरती हैं, युवाओं की बीवीओं को सौत लगने वाला पाटा कई सौ सालों की स्मृति संजोए आने वाली पीढ़ी को, बीती हुई पीढ़ी के साथ मौहल्ले के बीचों-बीच बैठकर देखता है। झा केवल हां-हां में सिर हिला रहे थे और उत्साहित बड़े-बूढ़े, अधेड़ और जवान लोग लगातार बोल रहे थे। कोई आधे घण्टे बाद मैंने यह कहकर झा को मुक्ति दिलाई कि इन्हें भट्टड़ों के चौक का पाटा भी देखना है। लोगों ने निकलते हुए कहा वहां तो आपको ज्योतिषियों की पूरी जमात मिल जाएगी। झा एक बारगी अचकचा गए। मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि खुद ही देख लीजिए पूरी रात जगने वाले पाटे को।
भट्टड़ों के चौक का पाटा
यह पाटा पूरी रात जगता है। दिन में बड़े-बूढ़े इस पर बैठते हैं और जैसे-जैसे रात ढ़लती है यहां ज्योतिषियों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। रात नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक एक ज्योतिषी जाता है तो दूसरा आता है। धुरी में रहते हैं पंडित राजेन्द्र व्यास उर्फ ममू भईजी। कई बार वे आस-पास या कलकत्ता गए हुए होते हैं तो यह गहमा-गहमी कम होती है। लेकिन हमारा भाग्य प्रबल था। ममू वहीं मिल गए पाटे पर। अपने शिष्यों के साथ लैपटॉप पर किसी कुण्डली का विश्लेषण कर रहे थे। मैंने झा साहब का परिचय दिया तो उन्होंने गोत्र तक पूछ डाले। किसी समय मैं भी ममू के दरबार का हिस्सा रहा हूं। सो उनका स्वभाव जानता हूं। मैंने झा को ममू के हवाले कर किनारे हो गया। पाटा संस्कृति का दूसरा आयाम देखने के बाद झा बस नोट करते जा रहे थे। दो दिन पूर्व दिवंगत हुए आचार्यराज के बारे में पूरी जानकारी ली।
इसके बाद शुरू हुआ ज्योतिष का काम। बिना झा की कुण्डली देखे ममू ने प्रश्न कुण्डली बनाकर झा को उनके जीवन और परिवार के बारे में कई बातें बताई। जब झा को विश्वास हो गया तो उनसे जन्म समय और तारीख लेकर कुण्डली बनाई। इसके बाद तो ममू ने कई पन्ने खोलकर रख दिए। करीब डेढ़ घण्टे इसी पाटे पर व्यतीत हुए। यहां से देर रात रवाना होने के बाद मैंने झा से कहा कि बाकी पाटे मैं केवल आपको दिखा देता हूं। स्टोरी इन दो जगहों के आधार पर ही बन जानी चाहिए। झा सहमत थे। मैंने उन्हें मोहता चौक, कीकाणी व्यासों का चौक, हर्षों का चौक आदि स्थानों पर पाटे दिखाए और अंत में ले गया दम्माणी चौक के छतरी वाले पाटे पर। पूरे समय झा चुपचाप बस देखते रहे। बाद में देर रात जब मैं उनको वापस होटल छोड़ने गया तो उन्होंने धन्यवाद जैसी कुछ औपचारिकताओं के अलावा पाटे के बारे में कहा...
अद्भुद्
अब दूसरी बात बीकानेर और उदीने शहर टैस्सीटोरी के रूप में एक हस्ती को बांटते हैं। कुछ उनकी क्योंकि यह हस्ती वहां पैदा हुई और कुछ हमारी क्योंकि जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा उन्होंने बीकानेर में रहकर काम किया और यहीं दिवंगत हुए। उनके बारे में विशद चर्चा फिर कभी...
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
बुधवार, 5 नवंबर 2008
बहुत दिनों बाद
ऑक्ल्ट का छात्र होने के नाते मेरा भी इस मेले के प्रति रुझान रहता है। एक दो बार तो मैंने वहां पूरा दिन इसी आशा में बिताया कि काश कहीं कोई पहुंचा हुआ नाथ साधू मिल जाए लेकिन अभी तक तो निराशा ही हाथ लगी है। इस बार कोशिश करूंगा कि रिपोर्टिंग के लिहाज से कोलायत के मेले में शिरकत करूं।
अब बात वापस ब्लॉगिंग की। पिछले कुछ दिनों में मैंने लिखना कम क्या किया सभी धड़ाधड़ लिखने लगे। अमित जी, आमिर भाई, वाजपेयी जी सभी लगे हैं धमाधम, पुण्य प्रसूनजी को भी देखा । लगा चलो कहीं तो हम भी आगे हैं। अब सभी लोग आ चुके हैं तो हम भी कुछ लिख मारते हैं शायद लोग पढ़ें। टाइफाइड ने तो पूरा सिस्टम ही बिगाड़ दिया। अच्छी स्पीड बनी हुई थी। अब तो घण्टे दो घण्टे बैठ पा रहा हूं। सारा समय दूसरों को पढ़ने में ही खर्च हो जाता है। लिखने लायक सोचता हूं तब तक सिस्टम को बंद करने का मन होने लगता है। आज बस इतना ही...
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रविवार, 21 सितंबर 2008
स्थितप्रज्ञता या मूढ़ता? कुछ लोचा तो है...

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बुधवार, 17 सितंबर 2008
हर व्यवस्था एक समय तक ही परिहार्य होती है
इस बीच वैचारिक स्तर पर कई उतार चढ़ाव आए। कभी सोचता था कि क्या लगातार लिख पाउंगा तो कभी सोचा कि मुझे पढ़ने वाले लोग कौन होंगे, कभी व्यवस्तताओं के लम्बे दौर (जो आमतौर पर दो या तीन दिन के होते) मुझे फिर से ब्लॉगिंग के प्रति अजनबी बना देते। कुल मिलाकर तीखे क्षणें से गुजरता रहा। हो सकता है मैंने दूरी महज दो या तीन किलोमीटर ही तय की हो लेकिन तीखे क्षणों के उतार चढ़ाव ने इस दूरी को कई सौ किलोमीटर तक फैला दिया।
इसी यात्रा में टिप्पणी ऐसी चीज थी जिसने मुझे हमेशा हतोत्साहित किया। भले ही वह अच्छी हो लेकिन मेरे विचारों के अनुरूप टिप्पणियां मुझे कम ही मिली। सही कहूं तो एक भी नहीं मिली। तो कौन लोग हैं जो मुझे पढ़ रहे हैं। इसका खुलासा हुआ मेरे ज्योतिष दर्शन ब्लॉग पर लगाए गए एक बॉक्स से। जिसे मैं प्रश्न डिब्बा कहता हूं। इसे मैंने किसी दूसरी साइट पर थोड़ा सा स्पेस लेकर बनाया है। इस डिब्बे को लगाने के दूसरे तीसरे दिन से ही प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई। एक महीने में सौ से अधिक सवाल। वह भी मेरे विषय से संबंधित। हां, इनमें से कुछ निजी सवाल थे तो कुछ ऐसे सवाल भी थे जो मुझे विषय को और अधिक गंभीरता से समझने में मदद करते। ब्लॉगिंग के अलावा दूसरा रास्ता है साइट का। एक पत्रकार होने के कारण मेरे पास इतना समय नहीं था कि खुद अपनी साइट डवलप कर लूं और इतना पैसा भी नहीं था कि किसी से डवलप करा लूं। सो इसी माध्यम से चिपका हूं। ब्लॉग के जरिए प्रश्नों की बौछार और टिप्पणियों में वही सूनापन देखकर मुझे टिप्पणी और भी अधिक निस्सार नजर आने लगी।
मेरे दिमाग में किसी टिप्पणी देने वाले का अपमान करने या उनके अब तक किए गए अथक प्रयासों को झुठलाने का इरादा कतई नहीं है। लेकिन हर व्यवस्था एक समय तक ही परिहार्य होती है। आज जब गूगल एनालिटिक जैसे टूल उपलब्ध हैं यह जानने के लिए कि कितने लोग कितनी देर के लिए आपके ब्लॉग पर आए तो फिर टिप्पणी देने और उसके लिए आग्रह करने की जरूरत कहां रह जाती है। पिछली रात न तो मैं किसी अवसाद में था न ही इस बारे में मेरे दिमाग में कोई कुंठा है लेकिन समीर भाई को भी यह बात समझनी होगी कि सभी टिप्पणीकार उनकी तरह मलंग नहीं होते कि पढ़ा और छोटा सा संकेत देकर निकल लिए। अब जो लोग टिप्पणी दे रहे हैं वे न तो अधिकांश विषयों को समझते हैं और ना ही इसे स्वीकार करने की उनमें ईमानदारी है। हां टिप्पणी के साथ अपना लिंक देना नहीं भूलते। मैंने कभी नहीं कहा कि समीर भाई को टिप्पणियों की आवश्यकता है। वे इतना रोचक लिखते हैं कि मैं टिप्पणी करूं या नहीं उनके ब्लॉग का चक्कर जरूर लगा आता हूं। यह सोचकर ही कि कुछ सीखने को मिलेगा। मैंने तो उनकी जय ही बोली है। व्यंग तो उन लोगों पर है जो दूसरे ब्लॉगर की किसी पोस्ट पर जाते हैं। एक ऐसी टिप्पणी छोड़ते हैं जो या तो समीर भाई की टिप्पणी जैसी दिखाई देती (यानि छोटी सी, लेकिन सारगर्भित नहीं) या ऐसी कि पोस्ट से टिप्पणी का संबंध बिठाने में ही घण्टाभर लग जाए। इसके बाद टिप्पणी के अंत में खुद का लिंक जोड़ा हुआ होता है। इस प्रवृत्ति को ही मैंने तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्हारी पीठ खुजाता हूं वाली शैली कहा है।
मैंने अपनी बात स्पष्ट की, यह मेरे दिमाग की हलचल थी।
अब भी कोई गिला शिकवा हो तो कहा सुना माफ करें...
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