मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग तीन

ईश्‍वरवादी धर्मों में स्‍वतंत्रता की संभावना
ईश्वरवादी धर्म वे हैं जो वेदों को मानते हैं। यह दर्शन विषय की भाषा है। ईश्वर की व्युत्पत्ति कुछ इस तरह होती है कि वह सबकुछ जानने वाला है और सभी कुछ नियंत्रित रखता है। यानि सृष्टि में जो कुछ हो रहा है वह पूर्व नियत है। इंसान केवल खिलौना मात्र है। जो इस सृष्टि में परम पित परमात्मा के इशारे पर सुख दुख का खेल खेलते रहते हैं।
आप गहराई में सोचेंगे तो लगेगा कि सारे प्रयास फिजूल है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे किया जा सके क्योंकि सबकुछ तो ईश्वर ही कर रहा है। अमिताभ बच्चन की फिल् अक् में भी खलनायक भी यही कहता है मैं कुछ नहीं करता जो करता है वह करता है मैं नहीं कहता गीता में लिखा है। यानि कत् भी किया तो ईश्वर की मर्जी से और सजा भुगती तो वह भी ईश्वर की मर्जी से। ज्योतिष भी कुछ ऐसा ही कहती है। इंसान के पैदा होने के साथ ही उसके आगामी जीवन का खाका बनकर तैयार हो जाता है। यानि वह कितना पढेगा, कब शादी होगी, पत्नी कैसी होगी, बच्चे कितने और क्या होंगे, व्यवसाय करेगा या नौकरी, जिंदगी में कितना सफल होगा। सबकुछ।
दोनों बातें मिलकर परेशान कर देती है कि जब सबकुछ पूर्वनियत है तो मनुष् के स्वतंत्र होने की क्या संभावना है। क्या ऐसे ही एक के बाद दूसरी योनि में प्रवेश करता रहेगा और जीवन भोगता रहेगा। कभी मनुष् तो कभी चींटी, कभी हाथी तो कभी चिडिया।
मनुष् में स्वतंत्र होने की संभावना विद्यमान है। कैसे मैं नहीं जानता लेकिन विवेकानन् ने कहा कि स्वतंत्र हुआ जा सकता है, ओशो भी कहते हैं पुरातन भारतीय मनीषीयों ने भी कहा है। ईश्वरवादी धर्म के इस बंधन को त्यागने के लिए धर्म को त्याग भी दूं तो मैं नहीं जानता कि मुक्ति का रास्ता क्या है
शायद बुद्ध जानते थे, शंकराचार्य ने पहचाना था, शायद कृष् कुछ इशारा कर रहे थे। किसकी सुनूं और किधर जाउं यह यक्षप्रश् सदा दिमाग में घूमता रहता है। आपके भी घूमता होगा कि इन बंधनों से कैसे निकला जाए...

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग दो

व्‍यवस्‍था बिगाडती है ऑरेकल
मुझे बताने पर याद आया कि मैट्रिक्‍स का पूरा किस्‍सा लिख दिया और ऑरेकल को भूल गया। मैमोरी एक्‍सपर्ट्स तो कहते हैं कि हम कुछ भी नहीं भूलते। तो क्‍या मैं ऑरेकल को लिखना नहीं चाहता था या फिर सचमुच भूल गया।

मैं दोबारा से शुरू करता हूं। किस्‍सा यह है कि मैट्रिक्‍स यानि कपिल मुनि की प्रकृति या शंकराचार्य की माया के प्रमुख किरदारों के केन्‍द्र में है नियो। स्‍वयं व्‍यक्ति। इसे सिखाया जाता है शंका करना। इंसान थोडा बहुत शंकालु हमेशा होता है लेकिन शंका की पराकाष्‍ठा यह होती है कि वह विश्‍वास करने से डरने लगता है कि सबकुछ वास्‍तविक है। मैट्रिक्‍स में ऑरेकल उस अविश्‍वास का प्रतीक है जो वर्तमान व्‍यवस्‍था को बिगाडने का काम करती है। पहली बार में तो मुझे समझ में ही नहीं आया कि व्‍यवस्‍था को बिगाडने वाली इकाई को इतना अधिक महत्‍व क्‍यों दिया जा रहा है कि उसे सबकुछ पता है।
शंकर के दर्शन के साथ जोडने पर मुझे समझ में आया कि मैं कौन हूं इस शंका के साथ जो यात्रा शुरू होती है वह आगे बढते हुए ऑरेकल तक जाती है। यानि परम अविश्‍वास। हर व्‍यवस्‍था पर। नितान्‍त अराजक। लेकिन फिल्‍म में तो उसे बहुत शांत दिखाया गया है और साथ में सुरक्षा प्रहरी भी दिया है। यही सुरक्षा प्रहरी नियो को लेकर जाता है ऑरेकल के पास। सीरीज के पहले भाग में ऑरेकल का रोल स्‍पष्‍ट नहीं होता है और नियो भी उसे शक की निगाह से देखता है। दूसरे भाग में तो स्थिति को स्‍पष्‍ट किया जाता है ऑरेकल को बदले हुए रूप में दिखाकर। इस बार तात्‍कालिक व्‍यवस्‍था के प्रति और अधिक शंकालू हो चुके नियो ऑरेकल को पहचान कर भी नहीं पहचान पाते। फिल्‍म की सीरीज देखने के दौरान मुझे लगा कि नियो (फिल्‍म देखते समय दर्शक आमतौर पर खुद को हीरो के साथ जोड लेता है) या कह सकते हैं मैं ऑरेकल को पसन्‍द नहीं करता। शायद यही कारण रहा होगा कि पिछली पोस्‍ट में मैं ऑरेकल के व्‍यक्तित्‍व को ही नजरअंदाज कर गया।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2008

अनुशासन और कुछ भी चलता है

हिटलर बहुत कडे अनुशासन में रहता था और पूरी जिन्‍दगी उसने बहुत सलीके और ध्‍यान से काटी। हद तो यह थी कि बहुत पहले ही उसने मीन कैम्‍फ नाम से अपने जीवन का एक नक्‍शा तैयार किया और लगातार उस पर चलता रहा। छोटा सा कद बुलंद हौंसले और उन्‍हें पूरा करने के लिए भयंकर अनुशासन। ओशो ने एक जगह लिखा कि क्‍या होता कि अगर हिटलर कुछ संगीत सुन लेता, कुछ नृतय कर लेता और कुछ समय छुट्टियां मना लेता। मैंने इन शब्‍दों को पढा तो एक बार लगा कि ओशो सही कह रहे हैं लेकिन भाग्‍य या दुर्भाग्‍य उन्‍हीं दिनों में मुझे अनुशासन का पाठ पढाया जा रहा था।
बहुत कुछ खो देने के विश्‍वास के साथ मैं भी एक सैट फारमेट में अनुशासन की सीख ले रहा था। तब मुझे महसूस हुआ कि कुछ हासिल करना है तो अनुशासन बहुत जरूरी है। यह भी तब आता है जब सत्‍य हो। सत्‍यता के साथ समझौता कर लोग अनुशासन में ढील लेते हैं और परिणाम में असफलता हाथ लगती है। यह कुछ कुछ दाल के हलवा बनाने जैसा काम है। दाल का हलवा बनाते समय हम पिसी हुई दाल को सेंकना शुरू करते हैं तो खुशबू आने तक सेंकते रहते है पूरे अनुशासन के साथ, इसके बाद घी डालते समय पूरी ईमानदारी बरतते हैं और जब तक हलवा तैयार नहीं हो जाता तब तक उसे चम्‍मच से बिना थके बिना रुके हिलाते रहते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी थोडी भी ढिलाई रहे तो...
दाल कच्‍ची रह जाएगी
घी की कमी से हलवा सूखा सूखा बनेगा
या फिर अधिक फीका या अधिक मीठा
यानि दाल का हलवा बिल्‍कुल सही बनाना हो तो पूरा अनुशासन और पूरी ईमानदारी चाहिए। बिना मिलावट
यही कुछ सफलता के साथ भी है।

सोचो अगर दाल का हलवा बनाते समय यह सोच दिमाग में हो कि सब कुछ चलता है...

रविवार, 17 फ़रवरी 2008

रसायनिक प्रेम

मुझे इस टॉपिफ पर लिखने से पहले काफी सोचना पडा। हर बार लगता कि किसी एक विषय की ओर झुक गया तो दूसरा विषय खुद को उपेक्षित महसूस करेगा। बहुत सोचने के बाद लिखने का मानस बना चुका हूं तो लिखूंगा ही


प्रेम और रसायन का आपस में संबंध में यह एक सामान्‍य जानकारी है। जो लोग विज्ञान में रुचि रखते हैं उन्‍हें यह जानकारी है कि दो लोग जब प्‍यार करते हैं तो दिमाग में दो प्रकार के रसायनों की भरमार होती है। करीब आते वक्‍त ऑक्‍सीटोसिन और दूर जाते वक्‍त डोपामिन। इस तरह तो विज्ञान की पुस्‍तकों में नहीं लिखा है। पुस्‍तक में तो लिखा है कि रोलर कोस्‍टर राइट के दौरान ऑक्‍सीटोसिन लडने की ताकत देता है और इसके स्‍त्राव के ठीक बाद डोमामिन का सीक्रेशन होता है। डोपामिन के साए में दो प्रेमियों का प्‍यार पलता है। यह तो हुई विज्ञान की बात।
तो मैं क्‍या कहना चाह रहा हूं। कुछ दिन पहले वैलेन्‍टाइन डे आकर गया। यानि आया और चला गया। मैं रुटीन के काम कर रहा था। मेरी पत्‍नी रूटीन के काम कर रही थी और बाकी मेरे जान-पहचान के लोग भी अपना रूटीन का काम कर रहे थे। संत वेलेन्‍टाइन की इससे अधिक तौहीन और क्‍या हो सकती है कि हमने अपना काम काज छोडकर उसके पीछे नहीं भागे। बसंती बयार में सर्दी जुकाम का डर था और बाजार में निकलने पर खर्च का। कुल मिलाकर हमने दोनो जेब और दिमाग दोनों के स्‍त्राव रोक लिए। इससे क्‍या....
अब जब मेरे स्‍त्राव रुके तो ध्‍यान आया कि प्‍यार पर सोचा जाए। विद्वजनों मैने कहीं पढा कि आदमी तीन जगह पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है। गोद में बैठे बच्‍चे के साथ, गोद में रखे शीशे के साथ और गोद में पसरी प्रेमिका के साथ। तीनों अवस्‍थाओं में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। उस समय वह जो हरकतें करता है अगर उनकी वीडियो रिकार्डिंग कराकर उसे वापस दिखाई जाए तो शायद वह जमीन में गढ जाए।
शेक्‍सपीयर ने भी इसे समझ लिया था। तभी उसने कहा कि प्रेमी मीठी बेवकूफिया करते हैं और उनके अलावा सभी लोगों को ये बेवकूफियां दिखती है।
तो सज्‍जनों मैंने और आप जैसे बहुत से लोगों ने बुद्धिमानी से पैसे और रसायन बचाए लेकिन जीवन का रस भी इसी के साथ लुप्‍त हो गया।
अब सोचता हूं कि काश स्‍त्राव को नहीं रोकता और खुद ही क्‍यों न बह जाता उसके साथ ही
रस तो बना रहता चाहे रासायनिक ही क्‍यों न हो...

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

तंत्र और तांत्रिक क्रियाएं

तंत्र को ज्‍योतिष से अधिक गूढ विषय माना जाता है। आज मैं आपके समक्ष तंत्र का दूसरा ही पक्ष पेश करने की कोशिश करूंगा। इस पक्ष को जानने के बाद शायद आपके दिमाग से तांत्रिक के नाम पर उभरने वाली छवि में कुछ बदलाव आए जिसमें एक काले, लाल या गेरूए कपडे पहने एक आदमी होता है। लम्‍बे बाल, दाढी और रहस्‍यमयी आवाज के साथ दूसरी दुनिया से सम्‍पर्क बनाने की कोशिश करते तांत्रिक की बजाय मैं शुरुआत करता हूं तंत्र से
तंत्र क्‍या है?
किसी विशेष परस्थिति को बनाने के लिए एक व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता होती है। यह व्‍यवस्‍था कोई व्‍यक्ति भी कर सकता है और इसके लिए पूरा सिस्‍टम भी बनाया जा सकता है। इसी सिस्‍टम को गूढ भाषा के साथ तंत्र कहा जाता है। बस इतना ही।
नहीं जनाब यह तो शुरूआत है सिस्‍टम या तंत्र को समझने की। यहां से हम जान सकते हैं कि तंत्र क्‍या है इसमें प्रवेश कैसे किया जा सकता है। मैं आपको कोई काम बताउं और आप उस काम को सोचने की बजाय करके देखें तो यह भी सिस्‍टम ही है। कैसे... याद करें मैंने आपको एक प्रयोग बताया कि जिसमें घर के एकांत स्‍थान पर ध्‍यान करना था कि आप छत के किसी कोने से खुद को देख रहे हैं।
इसमें जब आप खुद यह कार्य करके देखते हैं तो आपको कुछ रियलाइज होता है यानि एक विशिष्‍ट अनुभूति जो सिर्फ अपने संबंध में आपको ही हो सकती है। अगर आपने यह प्रयोग किया है तो जान सकते हैं कि आप एक अलग अंदाज में अलग वातावरण में पहुंच जाते हैं। यानि आपने तांत्रिक क्रिया के साथ अपने सैकण्‍ड माइंड में दस्‍तक दी और उसे सुना भी। कुछ इसी तरह से वह ढोंगी तांत्रिक भी करता है। अंतर इतना है कि वह अपने सैकण्‍ड माइंड में उतरकर वर्तमान परिस्थितियों की गणना अवचेतन से करता है और आपके प्रश्‍नों का माकूल जवाब देने में सफल होता है। आप कोशिश करें तो आप भी अपने सैकण्‍ड माइंड (अंतरमन) में उतरकर वही जवाब हासिल कर सकते हैं।

यहां एक सवाल- यह कैसे होता है
हर व्‍यक्ति के पास अपने सवालों के जवाब होते हैं।

इस पर एक और सवाल- फिर उलझनें क्‍यों होती है
क्‍योंकि जो जवाब है हम उसका सामना करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते

अगला सवाल- जवाब पाने का क्‍या तरीका है
जवाब – तांत्रिक हो जाइए

ऐसा करने से आपके पास जवाब को स्‍वगत हासिल नहीं करने की सुविधा उपलब्‍ध रहती है। जब आप अपने अंतरमन में तंत्र की सहायता से उतर चुके होते हैं तो वहां सवालों के जवाब भी सामने होते हैं और संभावित परिणाम भी।
क्‍या किया जाए तांत्रिक होने के लिए
सबसे आसान तरीका तो यह है कि अपने अंतरमन की हमेशा सुनो। एक बार सुनने में तो कोई समस्‍या नहीं है लेकिन हमेशा शब्‍द के साथ यह क्रिया लगभग असंभव हो जाती है। दूसरा तरीका धार्मिक हो जाने का है। हम अपने ईष्‍ट के समक्ष बहुत कम झूठे होते हैं।
क्‍योंकि जैसा देव वैसा पूजारी और जैसा पूजारी वैसा देव
यहां किसी प्रकार का अहंकार या छिपाव नहीं होता और आप आसानी से अपने सवालों के जवाब पा जाते हैं
और अंत में तरीका बचता है ध्‍यान का
इसके बारे में कल बात करेंगे...