शनिवार, 29 मार्च 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना... भाग चार

आत्मा की स्वतंत्रता की बात से पहले बात आती है मानसिक स्वतंत्रता की। जब तक मनुष् इस दृष्टिकोण से सोचना शुरू नहीं करता कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता भी है तब तक स्वतंत्रता की अन् संभावनाओं पर विचार करना व्यर्थ प्रतीत होता है। मोटीवेशनल मेनेजमेंट गुरुओं की सुनें तो लगता है जैसे कि आम आदमी के लिए बनाए गए अधिकांश निय व्यक्ति को सीमाओं में बांध देते हैं और इसी से स्वतंत्र होने की संभावनाएं खत् होने लगती है। इसकी परिणिती यह होती है कि व्यक्ति खुद को बंधनों में जकडा हुआ पाता है और कभी स्वतंत्र नहीं होता है। लेकिन विवेकानन् और रामकृष् परमहंस को देखा जाए तो मानसिक बंधनों की क्षुद्रता समझ आने लगती है। एक ओर परमहंस हैं जो कि कीचड के बीच भी श्वेत धवल नजर आते हैं। सांसारिकता में इतने सूक्ष् की मूर्ति से इतना प्यार कर बैठे कि उसे जीवंत कर दिया। माया के जाल में इतने सूक्ष् हो गए कि जाल का ताना-बाना उन्हें जकड नहीं पाया। अपनी पत्नी को ही मां का दर्जा दे दिया। दूसरी ओर हैं विवेकानन्, उन्हीं परमहंस के शिष्य। माया के जाल के हर टुकडे से दूर। सांसारिकता त्यागने के बाद भी उन्हें चैन नहीं आया तो अपनी मातृभूमि त्याग दी और हर संबंध को खुद से दूर रखा। यानि अपना कद इतना विशाल कर लिया कि माया का जाल छोटा पड गया। केवल भारतीय और अमरीकी ही नहीं दुनिया का हर मनुष् उनके लिए भाई या बहन बन गए। तो जीवन बंधनों से बंधा हुआ होकर भी इतना सूक्ष् हो सकता है कि माया का आवरण बांध सके और इतना विशाल भी कि आवरण ही छोटा पड जाए। यानि स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकला जाए। यहां दूसरी खोज शुरू होती है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

गुरुवार, 6 मार्च 2008

दूसरे दिमाग की आहट

(Listening The Second Mind)
हमने चेतन और अवचेतन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। योग में राजयोग ऐसा सैगमेंट है जो हमें सैकण् माइंड तक पहुंचने के लिए सहायता करता है। इसके अलावा तंत्र में भी कई ऐसी तकनीकें हैं जो हमें सैकण् माइंड तक लेकर जाती हैं। फिलहाल मैं बात करूंगा साइकोलॉजिकल पद्धति की। साइकोलॉजिस् बताते हैं कि हमारे दिमाग की चार अवस्थाएं होती है। उन्हें एल्फा, बीथा, थीटा आदि में बांटा गया है।
एल्फा लेवल तकनीक: सेकण् माइंड में उतरने की यह मुझे सबसे सुलभ पद्धति लगती है। इसमें शांत होकर एक बंद कमरे में बैठना होता है। कमर सीधी और आंखें ठीक पैंतालीस डिग्री पर छत की ओर। अब सौ से एक तक उलटी गिनती करनी होती है। धीरे-धीरे। एक तक पहुंचने तक हमारा दिमाग एल्फा लेवल में पहुंच जाता है। तब हमारी श्वास स्थिर और स्वाभाविक हो जाती है। दिमाग की इस अवस्था में पहुंच हुए व्यक्ति को समस्याओं के समाधान भी नजर आते हैं और डिप्रेशन के पेशेंट को अधिक लॉजिकल सोचने का अवसर मिलता है। योग एवं तंत्र संबंधी चर्चा बाद में कभी...

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग तीन

ईश्‍वरवादी धर्मों में स्‍वतंत्रता की संभावना
ईश्वरवादी धर्म वे हैं जो वेदों को मानते हैं। यह दर्शन विषय की भाषा है। ईश्वर की व्युत्पत्ति कुछ इस तरह होती है कि वह सबकुछ जानने वाला है और सभी कुछ नियंत्रित रखता है। यानि सृष्टि में जो कुछ हो रहा है वह पूर्व नियत है। इंसान केवल खिलौना मात्र है। जो इस सृष्टि में परम पित परमात्मा के इशारे पर सुख दुख का खेल खेलते रहते हैं।
आप गहराई में सोचेंगे तो लगेगा कि सारे प्रयास फिजूल है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे किया जा सके क्योंकि सबकुछ तो ईश्वर ही कर रहा है। अमिताभ बच्चन की फिल् अक् में भी खलनायक भी यही कहता है मैं कुछ नहीं करता जो करता है वह करता है मैं नहीं कहता गीता में लिखा है। यानि कत् भी किया तो ईश्वर की मर्जी से और सजा भुगती तो वह भी ईश्वर की मर्जी से। ज्योतिष भी कुछ ऐसा ही कहती है। इंसान के पैदा होने के साथ ही उसके आगामी जीवन का खाका बनकर तैयार हो जाता है। यानि वह कितना पढेगा, कब शादी होगी, पत्नी कैसी होगी, बच्चे कितने और क्या होंगे, व्यवसाय करेगा या नौकरी, जिंदगी में कितना सफल होगा। सबकुछ।
दोनों बातें मिलकर परेशान कर देती है कि जब सबकुछ पूर्वनियत है तो मनुष् के स्वतंत्र होने की क्या संभावना है। क्या ऐसे ही एक के बाद दूसरी योनि में प्रवेश करता रहेगा और जीवन भोगता रहेगा। कभी मनुष् तो कभी चींटी, कभी हाथी तो कभी चिडिया।
मनुष् में स्वतंत्र होने की संभावना विद्यमान है। कैसे मैं नहीं जानता लेकिन विवेकानन् ने कहा कि स्वतंत्र हुआ जा सकता है, ओशो भी कहते हैं पुरातन भारतीय मनीषीयों ने भी कहा है। ईश्वरवादी धर्म के इस बंधन को त्यागने के लिए धर्म को त्याग भी दूं तो मैं नहीं जानता कि मुक्ति का रास्ता क्या है
शायद बुद्ध जानते थे, शंकराचार्य ने पहचाना था, शायद कृष् कुछ इशारा कर रहे थे। किसकी सुनूं और किधर जाउं यह यक्षप्रश् सदा दिमाग में घूमता रहता है। आपके भी घूमता होगा कि इन बंधनों से कैसे निकला जाए...

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग दो

व्‍यवस्‍था बिगाडती है ऑरेकल
मुझे बताने पर याद आया कि मैट्रिक्‍स का पूरा किस्‍सा लिख दिया और ऑरेकल को भूल गया। मैमोरी एक्‍सपर्ट्स तो कहते हैं कि हम कुछ भी नहीं भूलते। तो क्‍या मैं ऑरेकल को लिखना नहीं चाहता था या फिर सचमुच भूल गया।

मैं दोबारा से शुरू करता हूं। किस्‍सा यह है कि मैट्रिक्‍स यानि कपिल मुनि की प्रकृति या शंकराचार्य की माया के प्रमुख किरदारों के केन्‍द्र में है नियो। स्‍वयं व्‍यक्ति। इसे सिखाया जाता है शंका करना। इंसान थोडा बहुत शंकालु हमेशा होता है लेकिन शंका की पराकाष्‍ठा यह होती है कि वह विश्‍वास करने से डरने लगता है कि सबकुछ वास्‍तविक है। मैट्रिक्‍स में ऑरेकल उस अविश्‍वास का प्रतीक है जो वर्तमान व्‍यवस्‍था को बिगाडने का काम करती है। पहली बार में तो मुझे समझ में ही नहीं आया कि व्‍यवस्‍था को बिगाडने वाली इकाई को इतना अधिक महत्‍व क्‍यों दिया जा रहा है कि उसे सबकुछ पता है।
शंकर के दर्शन के साथ जोडने पर मुझे समझ में आया कि मैं कौन हूं इस शंका के साथ जो यात्रा शुरू होती है वह आगे बढते हुए ऑरेकल तक जाती है। यानि परम अविश्‍वास। हर व्‍यवस्‍था पर। नितान्‍त अराजक। लेकिन फिल्‍म में तो उसे बहुत शांत दिखाया गया है और साथ में सुरक्षा प्रहरी भी दिया है। यही सुरक्षा प्रहरी नियो को लेकर जाता है ऑरेकल के पास। सीरीज के पहले भाग में ऑरेकल का रोल स्‍पष्‍ट नहीं होता है और नियो भी उसे शक की निगाह से देखता है। दूसरे भाग में तो स्थिति को स्‍पष्‍ट किया जाता है ऑरेकल को बदले हुए रूप में दिखाकर। इस बार तात्‍कालिक व्‍यवस्‍था के प्रति और अधिक शंकालू हो चुके नियो ऑरेकल को पहचान कर भी नहीं पहचान पाते। फिल्‍म की सीरीज देखने के दौरान मुझे लगा कि नियो (फिल्‍म देखते समय दर्शक आमतौर पर खुद को हीरो के साथ जोड लेता है) या कह सकते हैं मैं ऑरेकल को पसन्‍द नहीं करता। शायद यही कारण रहा होगा कि पिछली पोस्‍ट में मैं ऑरेकल के व्‍यक्तित्‍व को ही नजरअंदाज कर गया।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2008

अनुशासन और कुछ भी चलता है

हिटलर बहुत कडे अनुशासन में रहता था और पूरी जिन्‍दगी उसने बहुत सलीके और ध्‍यान से काटी। हद तो यह थी कि बहुत पहले ही उसने मीन कैम्‍फ नाम से अपने जीवन का एक नक्‍शा तैयार किया और लगातार उस पर चलता रहा। छोटा सा कद बुलंद हौंसले और उन्‍हें पूरा करने के लिए भयंकर अनुशासन। ओशो ने एक जगह लिखा कि क्‍या होता कि अगर हिटलर कुछ संगीत सुन लेता, कुछ नृतय कर लेता और कुछ समय छुट्टियां मना लेता। मैंने इन शब्‍दों को पढा तो एक बार लगा कि ओशो सही कह रहे हैं लेकिन भाग्‍य या दुर्भाग्‍य उन्‍हीं दिनों में मुझे अनुशासन का पाठ पढाया जा रहा था।
बहुत कुछ खो देने के विश्‍वास के साथ मैं भी एक सैट फारमेट में अनुशासन की सीख ले रहा था। तब मुझे महसूस हुआ कि कुछ हासिल करना है तो अनुशासन बहुत जरूरी है। यह भी तब आता है जब सत्‍य हो। सत्‍यता के साथ समझौता कर लोग अनुशासन में ढील लेते हैं और परिणाम में असफलता हाथ लगती है। यह कुछ कुछ दाल के हलवा बनाने जैसा काम है। दाल का हलवा बनाते समय हम पिसी हुई दाल को सेंकना शुरू करते हैं तो खुशबू आने तक सेंकते रहते है पूरे अनुशासन के साथ, इसके बाद घी डालते समय पूरी ईमानदारी बरतते हैं और जब तक हलवा तैयार नहीं हो जाता तब तक उसे चम्‍मच से बिना थके बिना रुके हिलाते रहते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी थोडी भी ढिलाई रहे तो...
दाल कच्‍ची रह जाएगी
घी की कमी से हलवा सूखा सूखा बनेगा
या फिर अधिक फीका या अधिक मीठा
यानि दाल का हलवा बिल्‍कुल सही बनाना हो तो पूरा अनुशासन और पूरी ईमानदारी चाहिए। बिना मिलावट
यही कुछ सफलता के साथ भी है।

सोचो अगर दाल का हलवा बनाते समय यह सोच दिमाग में हो कि सब कुछ चलता है...