बुधवार, 29 अप्रैल 2009

आखातीज के कुछ क्षण








आखातीज पर बीकानेर मे जमकर पतंगबाजी हुई। 
देखिए कुछ तस्‍वीरें। 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

रिंग रिंग रिंगा- भाग दो

शहर से गांव और पश्चिम से भारत की ओर

मार्केटिंग के लोग अपने क्षेत्र के सर्वाधिक जुमले से हमेशा बचने की कोशिश करते हैं। और यह जुमला है कि मार्केट सेचुरेट हो चुका है। यानि वे अपने मालिकों को बताते हैं कि आपका ब्रांडेड बासी माल यहां और नहीं बिक सकता। लेकिन शीर्ष प्रबंधन कभी यह बात सुनना नहीं चाहता, तो पलटवार के लिए एक और सवाल होता है कि जब और माल नहीं बिक सकता तो लाखों रूपए और इंसेटिव डकारने वाले भारी भरकम स्‍टाफ की क्‍या जरूरत है।

मार्केटिंग प्रोफेशनल्‍स को सवाल और सवाल का जवाब दोनों पता है सो वे इस जुमले से पर्याप्‍त दूरी बनाए रखते हैं और विकल्‍प के रूप में दूसरा पैंतरा फेंकते हैं वह है नया बाजार। यानि बड़े बाजार से ध्‍यान हटाकर छोटे बाजारों का रुख किया जाए। अब ब्रांडेड एसी और एडीडास के शो रूम तहसील स्‍तर पर खुलने लगते हैं। फसल से आया पैसा महंगे ब्रांडों की भेंट चढ़ने लगता है। गांव करै ज्‍यां गैली करे। यानि एक जैसा करता है वैसा ही दूसरा करता  है और अंत में पूरा गांव उसमें लग जाता है। इस तरह मार्केटिंग के लोग शहर से गांव की ओर भागते हैं। नया बाजार ब्रांडेड बासी माल को और कुछ दिन बेच लेता है। मिलें बंद करने का संकट और स्‍टाफ को हटाने का काम कुछ दिन के लिए टल जाता है।

यह है सामान्‍य ज्ञान- अब मुझे याद आ रहा है स्‍लमडॉग का रिंग रिंग रिंगा। यानि भारतीय कन्‍याओं को बचाने के लिए स्‍वयं अमरीका ही आ खड़े होने की कोशिश करेगा। भले ही उसकी हालत अभी कटोरा लेकर हमारे दरवाजे पर आने की है लेकिन आएगा मसीहा बनकर।

पश्चिम की मीडिया ने फर्श से अर्श पर पहुंचे लोगों और उनके संबंधियों के साथ पश्चिम में इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन्‍स किए होंगे। लेकिन इस बार भारत आकर इस तरह का स्टिंग ऑपरेशन किया और एक भरे पूरे मुल्‍क की इज्‍जत को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस तरह उछाल दिया मानो सोमालिया के गृह युद्ध के बाद का दृश्‍य भारत में बना हुआ हो। कमाल तो तब होगा जब बिके हुए नेतागण देश की समस्‍याओं का समाधान भी पश्चिम के विशेषज्ञों से कराने लगेंगे। तब उन लोगों की पंचायती बढ़ेगी। और तभी हमें महसूस होगी असली आर्थिक और राजनैतिक परतंत्रता।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

एक और गधे की कहानी

मेरे एक वरिष्‍ठ साथी ने मुझे एक गधे की कहानी सुनाई। कहानी मैंने कई दिन पहले सुनी लेकिन अब भी मेरे दिमाग में यह कहानी घूम रही है। सो अब इसे अपने ब्‍लॉग पर डाल रहा हूं। 

एक गांव में एक धोबी के पास एक गधा था। उस धोबी के घर के पास एक सूखा हुआ गहरा कुआं था। रोजाना गधा कुएं के पास से गुजरता। एक दिन गधा कुएं में गिर गया। उस समय धोबी घाट पर था। गधे की किसी ने सुध नहीं ली। वह शाम तक कुएं में गिरा कहराता रहा। शाम को मालिक घर आया तो उसने देखा कि गधा कुएं में गिर चुका है। अड़ोस पड़ोस के लोग एकत्रित हो गए। सबने मिलकर निर्णय किया इस घरों के बीच खुदा हुआ यह सूख कुआं खतरनाक हो सकता है सो इसे भर दिया जाए। गांव वालों ने मिट्टी लाकर कुएं में डालनी शुरू की। यह गधा कृष्‍ण चंदर के गधे की तरह इंसानों की बातों को समझने वाला था।बस इसमें अधिक अक्‍ल यह थी कि कभी इंसानों की बोली नहीं बोलता था। उसने सुना कि उसे जिंदा दफन करने की तैयारी हो रही है। पहले पहल तो वह गधा खूब रेंका और अपनी ही भाषा में चिल्‍लाता रहा कि हरामखोर धोबी मैंने जिन्‍दगीभर तेरी गुलामी की तूं उसकी यह सिला दे रहा है। 
लेकिन गधे की बात किसी ने नहीं सुनी। कुएं को भरना शुरु कर दिया गया। जैसे जैसे कुएं में मिट्टी गिरती गई गधा चतुराई से मिट्टी के ढेर पर चढ़ता रहा। घण्‍टों की मशक्‍कत के बाद गांव वालों ने कुएं को मिट्टी से भर दिया। ढेर पर चढ़ता हुआ गधा भी ऊपर तक आ गया। अपने गधे को सुरक्षित देख मालिक चिल्‍लाया कि मेरा गधा वापस आ गया। लेकिन अब तक गधे का मन भी फिर चुका था। उसने अपने ही मालिक को दुल्‍लती मारी और बोला कौनसा मालिक कैसा मालिक। मुझे तो तुम कुएं में ही दफन कर रहे थे। 
ऐसा कहकर गधा चला गया और मालिक देखता रह गया। कुछ गधे अब भी बड़े संस्‍थानों में काम कर रहे हैं। जब वे कुएं में गिरेंगे तो उन्‍हें निकालने के बजाय उन पर मिट्टी ही डाली जाएगी। :) 

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

दो कम्‍युनिस्‍ट दो विचार

कम्‍युनिज्‍म जब अपने स्‍वर्णकाल में था तब भारत के कई साम्‍यवादी विचारधारा वाले नेताओं को रूस बुलाया गया था। उसी खेप में मेरे ताऊजी शिवकिशन जोशी भी रूस जाकर आए थे। अपने जीवनकाल में मार्क्‍स के अंधभक्‍त बने रहे। हर सवाल का मार्क्‍सवादी जवाब उनके पास हमेशा तैयार रहता। किसी भी घटना या स्‍टेटमेंट को वे वर्ग संघर्ष से जोड़ देते। सुनने वाला बस मुंह बाए देखता रहता। उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान में लेफ्ट को कई बार सफलता भी मिली है। श्‍योपत सिंह ने तो जैसे इतिहास ही रच दिया था। 

ग्‍लोबलाइजेशन के बाद मार्क्‍सवाद नीचे आ रहा था और युवाओं की बजाय पुराने घिसे पिटे लोग ही अधिक नजर आते थे। ज्‍यादातर साम्‍यवादी कुण्‍डली मिलान कर विवाह कर चुके थे और घर के कोनों में मंदिर भी स्‍थापित कर चुके थे। मार्क्‍स के बाद इन साम्‍यवादियों को बस ऊपरवाले से ही चमत्‍कार की उम्‍मीद बाकी थी। ऐसे में एक दिन मेरे ताऊजी अपने कुछ साथियों के साथ प्रख्‍यात ज्‍योतिषी के पास पहुंचे और उन्‍हें आगामी एक महीने के सभी मांगलिक दिनों की जानकारी मांगी। ज्‍योतिषी भी हैरान कि कामरेड ज्‍योतिष में कब से विश्‍वास करने लगे। उन्‍होंने दो चार तिथियां बताई। लेकिन कामरेड सभी तिथियों की मांग कर रहे थे। कुछ देर तो ज्‍योतिषी महाशय ने संयम बनाए रखा फिर चिढ़ गए। बोले भाई कामरेडों आप लोगों को कब से मुहूर्त की जरूरत पड़ने लगी। तो कामरेड भी मुस्‍कुरा दिए। बोले हमारे एक बड़े नेता यहां आने वाले हैं। और हम चाहते हैं कि कोई बड़ा भवन किराए पर लेना चाहते हैं। एक दो तिथियां बताई तो भवन वालों ने बुकिंग हुई होने का कहकर उन्‍हें टाल दिया। इसलिए वे पता करना चाह रहे थे कि कौन-कौनसे दिन मांगलिक हैं जिनमें अच्‍छे काम होने हैं। ताकि उन दिनों को टालकर बाकी दिनों पर विचार कर आम सहमति से दिन तय करने की कोशिश की जाए। 
ज्‍योतिष महाशय ने यह सुना तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। पांचांग तो छोड़ दिया और कामरेडों को भद्दी गालियां देने लगे। मेरे ताऊजी साथ में थे सो उन्‍होंने किसी तरह पंडितजी को शांत किया और किसी दूसरे ज्‍योतिषी से तारीखें निकलवाई। 

पिछले दिनों कामरेडों की दूसरी शक्‍ल भी देखने को मिली। एमपी का चुनाव लड़ रहे एक कामरेड को पता चला कि बीकानेर में एक हनुमान मंदिर है। उनका नाम है पॉलिटिकल बाबा। उनका आशीर्वाद मिलने से बेड़ा पार हो जाता है। साथ ही उन्‍हें यह सूचना भी पहुंचा दी गई थी कि भाजपा के प्रत्‍याशी यहां पहले ही आशीर्वाद लेने पहुंच चुके हैं। सो कामरेड अपने दल बल के साथ आए हनुमान बाबा का आशीर्वाद लेने। बातचीत में तो वे यही कहते रहे कि यह क्रांतिकारियों की धरती है लेकिन दबे स्‍वर में यह भी स्‍वीकार कर रहे थे कि जात पांत के असर को तो देखना ही पड़ेगा। बाबा के दर्शन के बाद कामरेड ने मंदिर के पास ही रहने वाले एक ज्‍योतिषी महाराज का आतिथ्‍य भी स्‍वीकार किया। वही ओज, वही तेज और उतने ही तेज स्‍वर में विचारों का संप्रेषण। मुझे ताऊजी याद आ गए। लेकिन एक अलग रूप में। पता नहीं कहां है मार्क्‍स और उसका वर्ग संघर्ष... 
यह थी दो कामरेड और दो विचारों की एक तस्‍वीर।