गुरुवार, 25 जून 2009

सब कुछ है गांधीमय (रिंग, रिंग रिंगा भाग तीन)

mahatma-gandhi-indian-hero मैं आजादी के बाद की बात कर रहा हूं। उससे पहले भले ही गांधीजी का जीवंत करिश्‍मा रहा होगा लेकिन इसके बाद कैश कराने की प्रवृत्ति के चलते सबकुछ गांधीमय हो चुका है। गांधी टोपी पहनी तो इसलिए कि गांधीजी ने कहा है और उतारकर रख दी तो इसलिए कि गांधीजी खुद नंगे सिर रहते थे। एक तरफ दलितों के उत्‍थान का विचार है तो दूसरी तरफ दलितों से बराबरी की शुद्ध भावना।

देश में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बन चुकी है। इस कारण नहीं कि मनमोहन सिंह की सरकार ने नरेगा में रोजगार दिया और किसानों के कर्जे माफ किए। या अमरीका से संधि की। बल्कि युवा गांधी के अथक प्रयासों से बुढ़ाती कांग्रेस में नई जान आ गर्इ। युवा नेता ने मंत्री बनने के बजाय संगठन में काम करने की सोची है। अब युवाओं के सामने एक ही लक्ष्‍य है, संगठन को मजबूत करना। परीक्षा दो और सफल हो जाओ। इससे कतार में आखिरी खड़े आदमी को भी लाभ होगा। यही तो गांधीजी चाहते थे।

ठीक है देश का नेतृत्‍व जवान लोग करेंगे। स्‍थानीय प्रतिनिधि से लेकर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर युवा ही देश की बागडोर को थामे रहेंगे। तो बूढ़े क्‍या करेंगे?

बूढे चिंतन करेंगे। आज की समस्‍याएं और गांधी। आज की समस्‍याओं पर चिंतन उन्‍हें मुख्‍यधारा का अहसास कराएगा और गांधी युवाओं की समुद्री आंधी से बचाए रखेगा। तो आइए चिंतन करते हैं आज की कुछ समस्‍याओं पर।

आतंकवाद- आप कहेंगे वाह क्‍या विषय चुना है। आतंकवाद की जड़ असंतोष में है। गांधीजी ने संतोषी प्रवृत्ति का पाठ पढ़ाया था। आतंकवादियों को संतोषी होना चाहिए और सुरक्षा बलों को अहिंसक। बाकी रघुपति राघव राजा राम तो हैं ही। कहीं गए थोड़े ना ही हैं। गांधी हमारे दिल में है और राम सर्वव्‍यापी हैं।

दूसरा मुद्दा बेरोजगारी- (कृपया आरक्षण शब्‍द का इस्‍तेमाल कर इसे राजनीतिक रूप देने की कोशिश न करें।) गांधी ने ग्राम स्‍वराज्‍य का मॉडल दिया था। हर गांव आत्‍मनिर्भर हो तो बेरोजगारी की समस्‍या स्‍वत: ही दूर हो जाएगी। इसके लिए केन्‍द्र की ओर मुंह ताकने की जरूरत नहीं है। संयम और ईमानदारी से ग्राम स्‍वराज्‍य भी बन जाएगा और रामराज्‍य भी आ जाएगा।

सांप्रदायिकता: गांधीजी ने कहा था कि सब मनुष्‍य समान हैं। बस अंग्रेजों को भगा दो। बाकी लोग अपने ही हैं। उनके लिए तो पाकिस्‍तान बनना भी एक सदमा था। गांधीजी ने सर्वजन हिताय की बात की थी। इसमें क्‍या हिन्‍दु, क्‍या मुसलमान, क्‍या सिक्‍ख और क्‍या इसाई। उनकी नजर में तो सब बराबर थे। हमें उनसे सीख लेनी चाहिए।

ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर वरिष्‍ठ नेता पद और लाभ का मोह छोड़कर चिंतन कर सकते हैं। अब देश की बागडोर युवा कंधों पर है तो उन्‍हें देखें और सराहें। जब सलाह की जरूरत होगी तो मांग ली जाएगी। तब तक वे चिंतन करें।

वास्‍तव में गांधी ऐसी चीज है जो हर जगह फिट होती है। किसी भी बिंदु पर चिंतन करो। घुमा फिराकर घुसा दो गांधी में। दलित उद्धारक की छवि से लेकर हजार रुपए के नोट तक गांधी एक जैसे हैं। समस्‍याओं के पैदा होने से लेकर उनके समाधान तक गांधी वैसे ही मुस्‍कुराते हुए मिलते हैं। चलिए अगले करिश्‍मे तक यही सही...

रिंग रिंग रिंगा है आभासी आशावाद। फिल्‍म ने पैदा किया। गरीबी दिखाई। घनघोर दिखाई, विद्रुपताओं की पराकाष्‍ठा दिखाई और अंत में भाग्‍य की जीत दिखाई। भारत भाग्‍य विधाता है और गांधी राष्‍ट्रपिता। स्‍वागत कीजिए पांचवी पीढ़ी के युवा नेता का।

शनिवार, 20 जून 2009

राहत की बात - मैं अकेला नहीं हूं :)

अभी सुरेश चिपलूनकर जी  टिप्पणी सम्बन्धी खुराफ़ात के बारे में बता रहे थे तब पहली बार लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। इस कारण नहीं कि वे ज्‍योतिष और वास्‍तु जैसी विधाओं को कोसते रहे हैं। इस विषय पर तो मैंने उनका विरोध किया है। लेकिन उनकी कविता नहीं समझ पाने की स्थिति ने मुझे काफी राहत दी है। अब तक ऐसा लगता था कि दुनिया के अधिकांश पढ़ने लिखने वाले लोग गद्य के अलावा पद्य को आसानी से समझ लेते हैं और सृजन भी कर लेते हैं। इस पोस्‍ट में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें कविता समझ में नहीं आती। दरअसल मुझे भी नहीं आती। :)

इसके बावजूद नेट पर रोजाना पचासों कविताएं नई आती हैं। मौलिक और गहरी। कईयों के तो शब्‍द और वाक्‍य संरचना तक दिमाग के एंटीना को भी छू नहीं पाते। खैर मुझे लगता है मेरे और सुरेश जी के अलावा जहां में और भी होंगे जो सुखनवर न बन पाए हों। वैसे गद्य लिखकर भी मैं भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की परम्‍परा को ही आगे बढ़ा रहा हूं। उन्‍होंने पद्य में अतुकांत का समावेश किया और फिर अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में गद्य को प्रभावी तरीके से शामिल कर दिया। मैं अपने मन की बात सहज होकर कह पा रहा हूं। तब शायद पद्य की इतनी आवश्‍यकता भी नहीं है।

फिर भी उड़न तश्तरी .... को देखता हूं तो कर्मकाण्‍ड की एक बात याद आ जाती है जिसमें बताया गया है कि सरस्‍वती की बीजमंत्र के साथ आराधना करने पर कवित्‍व शक्ति अर्जित की जा सकती है। समीरजी न केवल गद्य में अपनी बात रोचक और गहराई के साथ व्‍यक्‍त करते है और पद्य भी सहज रच लेते हैं। यह मुझमे ईर्ष्‍या भाव जगा देता है।

(मैं यहां द्वेष नहीं कह रहा :))

इसी तरह अनुराग आर्य जी के दिल की बात ही ले लीजिए। वे अपनी बात गद्य के छोटे बड़े टुकड़ों में करते हैं और आखिर में पद्य की तीन या चार लाइने इतनी प्रभावी होती हैं कि पोस्‍ट के नीचे के कमेंट्स में गद्य से अधिक पद्य तालियां बटोरता नजर आता है। यही स्थिति चिट्ठा चर्चा की भी है। अनूपजी पूरी पोस्‍ट लिखने के बाद आखिर में एक लाइना लिखते हैं। यह एक ओर गद्य होता है तो दूसरी ओर लाइन को पूरा करने के चक्‍कर में पद्य जैसा बन जाता है। यह इतनी रोचक होती है कि मैं पूरी पोस्‍ट छोड़कर पहले एक लाइना पर जाता हूं। वहां कुछ दम दिखाई देता है तो बाकी की पोस्‍ट भी पढ़ लेता हूं वरना आगे रवाना। अनूपजी ने कुछ पोस्‍टें तो पूरी ही एक लाइना लिखी हैं। गद्य और पद्य का यह मिलन किसी चिठ्ठा चर्चा में ही हो सकता है। जहां बात समझ नहीं आने पर लिंक पर चटका लगाओ और पहुंच जाओ माजरा समझने के लिए :)

अब सोच रहा हूं कि ऐं, वद् वद् वाग्‍वादिनी के सवा लाख जप करके कवित्‍व शक्ति प्राप्‍त कर ही लेनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां कहा जाता है धिके जित्‍ते धिकन्‍दे यानि जब तक चलता रह सकता है चलने दो। ठीक है गद्य ही सही... :)

 

आखिर में बात लिंक रोड की। जयपुर के राजीव जैन जी ने एक नया ब्‍लॉग शुरू किया है। यहां वे क्‍लासिफिकेशन के आधार पर ब्‍लॉग्‍स जमा रहे हैं। इसमें बीकानेर के ब्‍लॉग में मेरे ब्‍लॉग का पता भी है। इसके अलावा कार्टूनिस्‍टों के ब्‍लॉग, हास्‍य व्‍यंग, लेखकों, तकनीकी आदि ब्‍लॉगों के बारे जानकारी दे रहे हैं। फिलहाल बहुत कम ब्‍लॉग इनकी लिस्‍ट में है लेकिन यह लगातार बढ़ता रहा तो एक दिन रेफरल चिठ्ठा बन जाएगा। राजीव जी को शुभकामनाएं।

गुरुवार, 18 जून 2009

चिडि़या पानी तो पी ले, लेकिन दूब न खाए

प्रकृति की नेमतें मुझे और भी हीनता का अनुभव कराती है जब मैं सोचता हूं कि मेरे घर के बगीचे में रखे पाळसिए यानि मिट्टी के बर्तन में रखे पानी को पीने के लिए चिडि़याएं आएं और पानी पीएं। इससे मेरे घर में चिडि़यों का संगीत गूंजता रहेगा। लेकिन इसके साथ ही मैं चाहता हूं कि वे बगीचे में उगी दूब को न खाएं। प्रकृति तो शायद ऐसा नहीं सोचती। बिना किसी रिटर्न की चाहत मुफ्त में हजारों चीजें उपलब्‍ध करा देती हैं जो जिंदगी को और भी भरपूर बना देती हैं।

अब रजनीगंधा और अनोखी मकड़ी

<KENOX S760  / Samsung S760>

रजनीगंधा में खिला फूल और उस पर सफेद जीव छोटा सा

<KENOX S760  / Samsung S760>

पूरी खूबसूरती के साथ

<KENOX S760  / Samsung S760>

वह जीव मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता

<KENOX S760  / Samsung S760>

मोगरा। इसे हाथी मोगरा भी कहते हैं।

जीव के बारे में किसी को पता हो तो बताइएगा। मैंने तो इसे पहली बार देखा है। यह मकड़ी की तरह दिखाई देता है। सभी फोटो इनलार्ज हो सकते हैं।

one more clear photo


शनिवार, 6 जून 2009

आज ही सांस ली है

पिछले कई दिन से जैसे मशीन ही बन गया था। सुबह आठ बजे दिन शुरू होता और रात को तीन बजे खत्‍म होता। अगले दिन सुबह आठ बजे फिर दिन शुरू हो जाता। पर मजा आ गया।

अतिव्‍यस्‍तता के कारणों में से एक प्रमुख कारण था वास्‍तु की कक्षाएं। समर स्‍कूल में मुझे छह दिन तक वास्‍तु संबंधी कक्षाएं लेने का मौका मिला। अभी से पहले कभी पढ़ाया नहीं और पढ़ा भी ढंग से नहीं। कक्षाएं शुरू होने से पहले ही मुझे बता दिया गया कि मेरी अनौपचारिक कक्षा में एक ऐसे सज्‍जन ने भी पंजीकरण कराया है जो एक स्‍थानीय अखबार में वास्‍तु पर नियमित कॉलम लिखते हैं। सच पूछिए तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। बाकी प्रतिभागी भी धुरंधर थे। कक्षा शुरू होने से पहले अठारह दिन तक लगातार पढ़ता रहा। साथ ही मनन भी करता रहा कि कहां से शुरू किया जाए और कहां तक ले जाया जाए। लेकिन अब तक पढ़ा सबकुछ रिकॉल किया। सारे नोट्स दोबारा संभाले। आखिर वह दिन आ गया।

मैं समय से पहले कक्षा में पहुंचा। लेकिन कक्षा खाली मिली तो इधर-उधर घूमने लगा। थोड़ी देर बार कॉर्डिनेटर को जाकर कहा तो उसने बताया कि सभी प्रतिभागी आ चुके हैं। कक्षा के बाहर ही खड़े होंगे। मैं वापस कक्षा की तरफ दौड़ा तो वहां कुछ वरिष्‍ठ पुरुष और महिलाएं खड़े थे। मैं उन्‍हें नजरअंदाज कर कक्षा में घुस गया और बोर्ड साफ करने लगा। मैं जिस बात को अवोईड करना चाह रहा था वही हुई। सबसे पहले स्‍तंभकार कक्षा में आए। और आते ही मेरा इंटरव्‍यू लेने लगे। पूछा क्‍या आता है आपको वास्‍तु के बारे में। आमतौर पर मैं जवाब देता हूं कि कुछ खास नहीं बस सीख रहा हूं। लेकिन अपनी कक्षा में यह बात कहना और वह भी पहले प्रतिभागी को नुकसानप्रद हो सकता था। सो उनकी बात मैं हंसकर टाल गया और समर स्‍कूल और दूसरे विषयों पर बात करने लगा। थोड़ी देर में उन्‍होंने पूछा कि आपको कितने साल हुए हैं अध्‍ययन करते हुए। मैंने गर्व से बताया कि ग्‍यारह साल हुए हैं। तो वे बोले 'बेटा' मैं 1990 से इस व्‍यवसाय में हूं। मेरी पीठ पर पसीना आ गया। वैसे उस दिन गर्मी भी अधिक थी। :)

खैर एक एक कर सभी प्रतिभागी अंदर आते गए और मैं किसी तरह अपना कांफिडेंस संभाले बैठा रहा। सबसे अच्‍छी बात यह रही कि एक हंसमुख बच्‍ची भी वास्‍तु की कक्षा में थी। मैंने उसी से शुरूआत की। मैंने उससे पूछा क्‍या होता है वास्‍तु। वह मुस्‍कुराई और जो भी उसके मन में आया बोलती गई। मेरा काम आसान हो गया। उसकी गलतियों को सुधारते हुए मेरी गाड़ी चलने लगी। पहले दिन आसानी से डेढ़ घण्‍टे तक मैं वास्‍तु के मूल सिद्धांतों के बारे में बताता रहा और उसी दिन मैंने सभी प्रतिभागियों को वास्‍तु की एक पुस्‍तक भवन भास्‍कर जो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है लाने के लिए कह दिया। यह मेरी पसंदीदा किताब है। फेंग शुई से अछूती और प्राचीन सिद्धांतों से परिपूर्ण। कहीं कोई शंका की गुंजाइश नहीं।

कक्षा खत्‍म होते ही घर आया और किताब को एक बार फिर पूरी पढ़ गया। अब मैं फुल चार्ज था। अगले दिन उन्‍हीं स्‍तंभकार ने दो-तीन बार मुझे टोका लेकिन मैं अपनी रौ में फ्रायड, डेल कारनेगी, स्‍टीफन आर कोवे, एलन पीज और विवेकानन्‍द तक के उद्धरण देते हुए अपनी बात पूरी करता गया और प्रतिभागियों के समक्ष तस्‍वीर स्‍पष्‍ट होती गई। हर किसी के दिमाग में कहीं न कहीं कोई न कोई भ्रांति पहले से थी। अधिकांश ने पहले से वास्‍तु का कुछ न कुछ अध्‍ययन किया हुआ था। अच्‍छी बात यह थी कि किसी ने भवन भास्‍कर नहीं पढ़ी थी। हर रोज एक विषय लेकर उसे पूरा करता और कक्षा के अंत तक किसी ने किसी मॉडल का विश्‍लेषण करता। पांचवे दिन प्रतिभागी परफेक्‍ट मॉडल बनाकर लाए। उन मॉडल्‍स में गलतियां बताई और आखिरी दिन तो दो मॉडल बिल्‍कुल परफेक्‍ट बन गए। हर दिन मेरे और मेरे प्रतिभागियों के चेहरे पर चमक बढ़ती गई। बस एक गड़बड़ हुई कि आखिरी दिन स्‍तंभकार महोदय नहीं आए। कक्षा खत्‍म होने के बाद उनका फोन आया। बोले मैं किसी कारणवश आ नहीं पाया इसलिए माफी चाहता हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं। उस समय मैं कॉर्डिनेटर के पास बैठा था।  उन्‍होंने कहा परीक्षा से डर से नहीं आए होंगे। मैंने कहा परीक्षा की तो कुछ बात ही नहीं थी। तो उन्‍होंने बताया कि हर कोर्स में आखिरी दिन परीक्षा का प्रावधान है। उसमें टॉप रहने वाले विद्यार्थी को पुरस्‍कृत किया जाएगा।

अब बात मेरी समझ में आई कि स्‍तंभकार महोदय को लगा कि मैं परीक्षा लूंगा और फेल कर दूंगा तो उनकी फजीहत होगी लेकिन हकीकत में मुझे परीक्षा के बारे में जानकारी ही नहीं थी। खैर मैंने एक टॉप विद्यार्थी का नाम बता दिया जिसे पुरस्‍कृत किया जाएगा।

इस तरह छह दिन का समय इतना अधिक व्‍यस्‍तता वाला रहा कि न तो ब्‍लॉग पढ़ पाया न लिख पाया। रात को दो बजे के बाद भी बैठता तो केवल केरल पुराण की कोई नई कथा पढ़ने या इक्‍का दुक्‍का दूसरे ब्‍लॉग देखने। इसी दौरान कुर्सी पर ही नींद आ जाती।

खैर आज पुरानी सारी मेल देखी। ज्‍योतिष दर्शन पर लेख डाला और यहां आपबीती सुनाने आ गया। अच्‍छा रहा ये सप्‍ताह...