रविवार, 21 अगस्त 2016

TheAstrologyOnline.Com

Hi,

Welcome 

If you are looking for may old articles you have to follow this link



Or you may find me on



You will find new articles as well.

Thanks!! 


गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

A Billion ideas : What an idea!!

सौ करोड़ विचारों में मेरे दो विचार

पिछले दिनों दिल्‍ली में एक अलहदा ब्‍लॉगर मीट हुई। अलहदा इस कोण से कि एक राजनीतिक पार्टी ब्‍लॉगरों के विचार जानना चाहती थी। कांग्रेस के ए बिलियन आइडियाज (A Billion ideas) के तहत करीब तीस हिंदी पट्टी के ब्‍लॉगरों को दिल्‍ली आमंत्रित किया गया था। खास बात यह रही कि आमंत्रण के साथ एक बात की तस्‍दीक कर दी गई थी कि दिए गए विषयों में आपको विचार तो करना है, लेकिन समस्‍या पैदा होने के कारणों के बजाय समस्‍या के समाधान पर अधिक ध्‍यान देना है। यह अलग बात है कि गोष्‍ठी के दौरान हिंदी में कुछ तंग हाथ वाले संचालक बार बार इसे निदान कह रहे थे। वे चाहते यही थे कि समाधान बताएं जाएं। 

गोष्‍ठी में कुल जमा चार विषय रखे गए थे। इसके बारे में पहले भेजी गई मेल में स्‍पष्‍ट कर दिया गया था। कि चार विषय कौन कौन से होंगे ? 

Broad themes for the event are
- How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
- How to harness the potential of youth for innovation
- How to empower women to have a greater say in the household decision making
- How to increase transparency in the governance at all levels.

इनमें से मैं स्‍पष्‍ट रूप से केवल दो ही विषयों पर बता सकता था। सो उन्‍हीं दोनों विषयों पर मैंने ध्‍यान केन्द्रित किया। पहला था यूथ पावर। यूथ पावर पर मेरे विचार कुछ इस प्रकार थे... 

यूथ पावर
"देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्‍या रोजगार है। अगर युवाओं को अपने मन का काम मिल जाए तो युवाओं की शक्ति का सही उपयोग हो सकता है। अगर हमें ह्यूम सोर्स मैनेजमेंट को देखना है तो चीन की ओर देखना पड़ेगा। चीन ने एक बहुत शानदार काम किया। वर्तमान में भारत में मिल रहे टैबलेट, मोबाइल और लैपटॉप चीन से बनकर आ रहे हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्‍सपोर्टर है। इसका कारण यह नहीं है कि चीन की सरकार ने बड़ी फैक्ट्रियां लगाई या बड़े उद्योगपतियों की सहायता की। बजाय इसके चीन में प्‍लास्टिक और मोबाइल बनाने के सामान को सब्सिडाइज्‍ड किया गया और छोटे उद्यमियों को प्रोत्‍साहित किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि आज चीन में मोबाइल और इस प्रकार के दूसरे गैजेट्स की कॉटेज इंडस्‍ट्री बन गई। छोटे छोटे उद्यमियों को सरकार की इतनी सहायता प्राप्‍त है कि उन्‍हें अपना माल अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में बेचने के लिए किसी प्रकार की अतिरिक्‍त कसरत नहीं करनी पड़ती। वहीं हम अपने देश में देखें तो पता लगता है कि इस प्रकार की इंडस्‍ट्री लगाने के बजाय सरकारें मुफ्त लेपटॉप, टैब और मोबाइल बांट रही है। उत्‍तरप्रदेश और राजस्‍थान में ही राज्‍य सरकारों ने करीब सात लाख टैब का वितरण कर दिया। लेकिन किसी ने भी यहां टैब की उत्‍पादन इकाई स्‍थापित करने पर विचार नहीं किया। हमने चीन से टैब खरीदे और यहां के विद्यार्थियों को बांट दिए। इससे न तो हमें तकनीक के विकास का लाभ मिला न ही स्‍थानीय उद्यमी विकसित हुए। जैसा कि हम जानते हैं कि यह गैजेट्स जल्‍द ही पुराने पड़ने वाले हैं। यानी दो साल बाद इनकी कोई कीमत नहीं रहेगी। तो दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो हमने अपना दोहरा नुकसान किया। सात लाख टैब और मोबाइल के रूप में हम प्‍लास्टिक का कबाड़ खरीदकर एकत्रित करते जा रहे हैं। हमारी सरकार को नव उद्यमियों का सहयोग कर यहां पर भी ऐसी छोटी छोटी एसेंबली यूनिट्स बनानी चाहिए। ताकि स्‍थानीय उद्यमी विकसित हों, बेरोजारों को रोजगार मिले और तकनीक का विकास हो।"

सेक्‍युलर फाइबर
"इस मुद्दे पर मेरा विरोध और विचार एक ही बात है। दरअसल मेरा मानना है कि धर्म नितांत व्‍यक्तिगत विषयवस्‍तु है। सरकार अथवा राज्‍य का इसमें कोई दखल नहीं होना चाहिए। हम धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र हैं। इसका क्‍या अर्थ लगाया जाए। क्‍या सभी धर्मों में राज्‍य और सरकार को टांग फच्‍चर करनी चाहिए या सभी धर्मों को सम्‍मान देते हुए उन्‍हें अपने स्‍तर पर निपटने देने के लिए छोड़ देना चाहिए। एक सरकार सेक्‍युलर हो सकती है जब वह सभी धर्मों का सम्‍मान करे। लेकिन इससे सरकार को धर्म के भीतर छेड़छाड़ करने या लाभ अथवा दंड से प्रभावित करने का अधिकार तब भी सरकार को नहीं मिलता है। ऐसे में किसी सरकार या शासन की जिम्‍मेदारी बनती है कि राज्‍य के किसी भी व्‍यक्ति को धर्म के आधार पर न तो दंडित किया जाए न ही लाभ दिया जाए। ऐसे में सरकार सेक्‍युलर बनी रह सकती है। यह तभी हो सकता है जब राज्‍य की शक्तियों से मिलने वाले हर प्रकार के लाभ और धर्म (या कहें संप्रदाय) को अलग कर दिया जाए। वर्तमान में सरकारें एक तरफ कानून बना रही हैं कि लाउडस्‍पीकर नहीं बजाया जा सकता तो दूसरी तरफ धर्म या संप्रदाय के आधार पर लाउडस्‍पीकर बजाने की छूट दी जा रही है। एक तरफ सरकार धार्मिक स्‍थल की यात्रा के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज जारी कर रही है तो दूसरी ओर कर लगाया जा रहा है। ये दोनों ही स्थितियां एक सेक्‍युलर सरकार के लिए घातक हैं। इससे आम आस्‍थावान नागरिक सरकार को किसी समुदाय विशेष की ओर झुका हुआ मानने लगता है और उसका विश्‍वास राज्‍य पर से उठने लगता है।"


इन दोनों विचारों के अलावा और भी कई मुद्दों पर टेबल शेयर कर रहे साथियों के साथ चर्चा हुई। चर्चा के दौरान कई मुद्दों पर मेरी सहमति बनी तो कई पर मैं सहमत नहीं था। चर्चा के दौरान कई बार लगा कि अलगा व्‍यक्ति मेरे ही विचार बोल रहा है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो दूसरे ब्‍लॉगर्स ने बोला मेरे भी विचार वैसे ही थे, लेकिन कमोबेश ब्‍लॉगरों के दिमाग में आने वाले भविष्‍य की तस्‍वीर दिखाई दे रही थी। भले ही एक पार्टी ने अपने खर्च पर ब्‍लॉगर मीट कराई, लेकिन देश के अलग अलग कोनों में स्‍वांत सुखाय लेखन कर रहे ब्‍लॉगरों ने जब अपने विचार रखे तो एक सार्थक निष्‍कर्ष निकलता दिखाई दिया। इस सार्थक बहस और मीट के लिए मैं कांग्रेस के ए बिलियन आइडियाज प्रोजेक्‍ट को साधूवाद देता हूं। 

ब्‍लॉगर मीट के आयोजकों ने मुझे कहा है कि शीघ्र फोटो भेज दिए जाएंगे। जब फोटो मिलेंगे तो उन्‍हें भी यहां चस्‍पा कर दिया जाएगा... :) 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

बंधे हुए हथियार और आजाद हमलावर

एक दूसरे ग्रह का प्राणी विमान से छिटककर दूर जा गिरा और हमारे यहां बीकानेर में आ फंसा। आधी रात का समय था (अब उड़नतश्‍तरियां तो उसी समय घूमती है ना) एलियन भाई गिरते पड़ते किसी प्रकार दूर धोरे पर पहुंचना चाह रहे थे कि कुत्‍तों की नजर उन पर पड़ गई। एक ने भौंका और बाकियों ने सुर में सुर मिलाकर भौंक का भूकम्‍प ला दिया। कुछ हरावल दस्‍ते के कुत्‍ते को एलियन बाबू पर झपट भी पड़े।

एक बार तो वे कूद फांदकर बच गए। इतने में देखा कि एक आदमी जो दूर से निकल रहा था। (हमारे यहां ऐसे पराई पीड़ा को जानने वालों की भरमार है) उसने एक पत्‍थर उठाया और भद्दी गालियां निकालते हुए कुत्‍तों पर फेंका। कुत्‍ते दूर हट गए। आदम की परछाई हटी नहीं कि कुत्‍ते फिर मैदान में आ डटे। एलियन ने उस आदमी की दोनों गतिविधियों को गौर से देखा। गालियां जो उसने अपने एडवांस ब्रेन में रिकॉर्ड कर ली थी और एक्‍शन हथियार (पत्‍थर) उठाकर मारना। उसने गौर से जमीन की ओर देखा तो उसे बड़ी संख्‍या में हथियार फैले दिखाई दिए। वह बहुत खुश हुआ। 

रिकॉर्ड की हुई आवाज को ज्‍यों का त्‍यों उच्‍चारित करते हुए वह झुका और हथियार को उठाने के लिए जोर लगाया, लेकिन हथियार जमीन में जोर से गड़ा हुआ था। पहले प्रयास में निकला नहीं। उसने और जोर लगाया, लेकिन हथियार निकला नहीं। इस बीच मुंह से ठीक वही आवाज निकालता रहा। कुत्‍ते एक बारगी तो पीछे हट गए, लेकिन जब उन्‍होंने देखा कि इतना अधिक घामड़ आदमी है कि सही पत्‍थर का भी चुनाव नहीं कर पा रहा है और गड़े हुए पत्‍थर पर अपनी अधिक शक्ति जाया कर रहा है तो वे और जोर से भौंकने लगे। काटने वाला कुत्‍ता गश्‍ती पर था नहीं, वरना काट पीट भी शुरू हो सकती थी। 

काफी देर तक कुत्‍तों के भौंकने और एलियन के पत्‍थर निकालने के प्रयास जारी रहे। आखिर एलियन ने आखिरी हथियार अपनाया और छोटी स्टिक निकाली जो झाड़ू में बदल गई। उस पर बैठकर वहां से रवाना हो गया। इस बीच उसने कहा 

"यह ग्रह बहुत खतरनाक है। 
यहां हमलावर आजाद हैं 
और हथियार बांधकर रखे गए हैं।"

कहानी यहां आकर खत्‍म नहीं हो जाती। दरअसल हमारे बाजार की भी कमोबेश यही स्थिति है। मैंने सुना है राज्‍य की अवधारणा कृषि के बाद शुरू हुई। कृषि में इतना उगता था कि खा पी लेने के बाद भी अधिशेष रह जाता था। इस अधिशेष पर कब्‍जे की कोशिश के मद्देनजर ही कुछ लोगों ने सुरक्षा, व्‍यवस्‍था और न्‍याय के लिए राज्‍य का गठन किया गया। अब राज्‍य के मूलभूत कार्यों में यह शामिल है कि राज्‍य का हर व्‍यक्ति इन चीजों के प्रति सहज रहे। आखिर राज्‍य बनाया ही इसीलिए गया कि इन आधारभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो जाए, इसके बाद इंसान आगे बढ़ने का प्रयास करे। लेकिन हो इससे उल्‍टा ही रहा है। हर इंसान इन आधारभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना पूरा जीवन व्‍यतीत कर रहा है। 

अब बात करते हैं सट्टे की। सट्टे की मनोवृत्ति को एक सटोरिए ने बहुत शानदार तरीके समझाया। सुपर बाउल खेल में से कुछ जुआरियों को पकड़कर पुलिस ले जा रही थी। कार्रवाई के दौरान ही बारिश शुरू हो गई। इसी बीच कार में बैठे एक जुआरी ने पुलिस वाले से पूछा कि क्‍या तुम बता सकते हो कि कार की दोनों खिड़कियों की सिरे पर जो बूंदें लटक रही हैं, उनमें से कौनसी बूंद पहले नीचे आ गिरेगी। पुलिसवाला सोचने लगा। इतने में जुआरी हंसा, उसने कहा तुम हमें रोक नहीं सकते। हम कभी भी, कहीं भी, कैसे भी सट्टा कर सकते हैं। 

यही सटोरिए एक दिन हमारे मुक्‍त बाजार के हिमायती सिस्‍टम में वहां घुस गए, जहां आम आदमी भी बुरी तरह प्रभावित होता है। अनाज में। देश के 95 प्रतिशत लोग अन्‍न पर निर्भर हैं। कुछ समुद्री किनारों वाले लोग भले ही मांस मच्‍छी नियमित खाने में खाते होंगे, लेकिन शेष लोग गेहूं, बाजरी, चावल, जौ, मक्‍का और दालों पर ही जिंदा हैं। इन लोगों को यह रोजाना न मिले तो व्‍यवस्‍था बिगड़ सकती है, लेकिन वर्ष इक्‍कीसवी सदी के पहले ही दशक में हमारे सामने बड़े सट्टा बाजार आ चुके थे। इन्‍हें नाम दिया गया कमोडिटी एक्‍सचेंज। एक है नेशनल कमोडिटी एस्‍कचेंज और दूसरा है मल्‍टी कमोडिटी एक्‍सचेंज। इनके अलावा भी कई हैं, लेकिन भारत में ये सबसे बड़े हैं। 

अपने शुरूआती दौर में इन एक्‍सचेंज में ग्‍वार और उड़द जैसी वस्‍तुओं पर अधिक सट्टा हो रहा था, लेकिन बाद में हर चीज को शामिल करते गए। आखिर एक दिन यह स्थिति आई कि किसान भले ही पहले की तरह भूखा मर रहा हो, लेकिन हैजर्स (यह कुलीन सटोरिए होते हैं), सटोरिए और जुआरी भावों को तय कर माल लूटने लगे। नतीजा यह हुआ कि आम उपभोक्‍ता तक पहुंच रही वस्‍तुएं इतनी महंगी हुई कि हाहाकर होने लगा। 

जब किसानों ने देखा कि उन्‍हें बीज मिल रहा है दोगुने दाम में और फसल बिक रही है आधे दाम में तो उन्‍होंने बगावत कर दी। बाजार की स्थिति सामने दिख रही थी। सरकार झुक गई। सरकारी नियंत्रण के तहत फसलों का मूल्‍य तय करने के लिए एक आधारभूत राशि तय करने का प्रयास किया जाता है। जिसे सरकार समर्थन मूल्‍य कहती है। यानी किसानों से कहा जाता है आप तो फसल उगाओ, अगर नहीं बिकी तो कम से कम इस कीमत में तो हम ले ही लेंगे। 

नतीजा यह हुआ कि हर साल समर्थन मूल्‍य में बढ़ोतरी होने लगी। इस तेज बढ़ोतरी के बाद हर बार सट्ट बाजार और अधिक सक्रिय होकर फसलों के दाम और बढ़ाने लगा। नतीजा यह हुआ कि अन्‍न और दूसरे खाद्य पदार्थ और महंगे हुए।

मुक्‍त और नियंत्रित बाजार में ऊपर बताई गई कुत्‍ते और पत्‍थर वाली समस्‍या ही है। यहां कुत्‍ते आजाद हैं और पत्‍थर बंधे हुए हैं। सरकारी नियंत्रण समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने के इतर और कुछ कर नहीं पाता और बाजार सरकारी नियंत्रण की इस बेबसी का जमकर फायदा उठाता है। 

दूसरे देशों को देखें तो वहां या तो पूर्णतया सरकारी नियंत्रण है या पूर्णतया मुक्‍त बाजार है। भारत में दोनों व्‍यवस्‍थाएं होने से आखिर में केवल ट्रेडर और सटोरिया ही फायदे में नजर आ रहा है। या‍ फिर सरकार पर दबाव बनाकर समर्थन मूल्‍य बढ़वाकर अपना माल बेचने वाले बड़े किसान (जो आमतौर पर रसूखदार लोग होते हैं) ही फायदा उठा रहे हैं। 

अगर सरकार नियंत्रण रखती है तो उसे इस प्रकार का नियंत्रण रखना चाहिए कि किसान की जरूरत के मुताबिक उसे फसल का सही दाम मिल जाए और उपभोक्‍ता पर बिचौलियों की कसरतों का दबाव न आए। ऐसे में सरकारी नियंत्रण को सफल कह सकते हैं। वरना बिचौलिए अपना पेट भरते और बढ़ाते रहेंगे, किसान और उपभोक्‍ता अधिक पिसते और मरते रहेंगे। 

या फिर बाजार को ही मुक्‍त कर दिया जाए। जिसे जिस भाव में जो सामान जहां मिल रहा है, वहीं खरीदे। इस खुले बाजार में जो शेर होगा वही चरेगा, न सरकार की जरूरत न नियंत्रण का दबाव। बाजार खुद ब खुद नियंत्रित हो जाएगा। 

वरना पत्‍थर बंधे रहेंगे और कुत्‍ते भौंकते रहेंगे... 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

All we need is feudal system

हमें सामंती या कहें राजशाही तंत्र की ही जरूरत है

कहने को हम 15 अगस्‍त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हो गए, और आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक भाग हैं, लेकिन हकीकत में देखा जाए तो अभी लोकतंत्र आया ही नहीं है। लोकतंत्र के आने में अभी कुछ दशक और लग जाएंगे। तब तक हमें सामंतशाही की जरूरत है। यह बुरा लग सकता है कि आजादी का गला घोंटकर मैं राजशाही का पक्ष ले रहा हूं, लेकिन गौर कीजिए क्‍या हम छद्म सामंतवाद की छाया में नहीं खड़े हैं। राजशाही (feudalism) में जहां कम से कम एक राजा या सामंत होता है जिसे जिम्‍मेदार बनाया या बताया जा सकता और व्‍यवस्‍था के प्रति भी वही जवाबदेह होता है। वर्तमान भारत में सामंतवादी हरकतें अपने चरम पर हैं, लेकिन कोई राजा या सामंत जिम्‍मेदारी लेने के लिए नहीं है। किसी की कोई जिम्‍मेदारी नहीं और सत्‍ता पर काबिज कुछ लोग, कुछ घराने, धन और ताकत का राज।

क्‍या वास्‍तव में हम खुद को धोखे में नहीं रखे हुए हैं। एक नेताजी होते हैं, और उनके पीछे चेलों चपाटों की पूरी फौज। जो उनकी हां में हां मिला रही है। उन नेताजी को कोई बुरा कहने वाला नहीं। अगर कह भी दिया तो नेताजी की मोटी खाल पर कोई असर नहीं। पॉलिटिकल इम्‍युनिटी (Political immunity) लिए नेता, रावण की तरह हंसते हुए लूटते हैं। यह व्‍यवस्‍था कोई बाहर से नहीं आई है। 

संसाधन सीमित हैं 
उन्‍हें बढ़ाने का भी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ। 
आजादी (Freedom) के साठ साल बाद शिक्षा का अधिकार दिया गया
स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा का अधिकार तो अब भी कोई जमीनी हकीकत नहीं रखते। 
पुलिस हमारी सेवा के लिए नहीं बल्कि हमें डंडा दिखाने और भय पैदा करने के लिए है। 
न्‍यायालय के बारे में मान लिया गया है कि न्‍याय में देरी होगी 
भले ही यह कहा जाए कि जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड

राजनीतिक पार्टियां (political parties) बाहरी ताकतों नहीं लादी हैं। इसी व्‍यवस्‍था में शिक्षा और संसाधनों से वंचित लोगों ने अपने अपने क्षेत्रों में उन लोगों का चुनाव किया जो उन क्षेत्रों के लोगों के "काम" आ सके। नतीजा यह हुआ कि काम आने वाला बंदा काम करके ऐसी हैसियत में पहुंच गया कि अपने क्षेत्र में वह शेर है और दूसरी गली में पहुंचते ही दुम दबाए कुत्‍ता। ऐसे में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोई एक जन नेता तैयार होने की कोई सूरत बाकी नहीं रही। 

अब यही क्षेत्रीय लोग मिलकर एक ऐसे नेता का चुनाव करते हैं जो उनके निजी या उनके क्षेत्र के हित साध सके। क्षेत्रीय नेताओं के पास दोहरी चुनौतियां हैं। पहली कि अपने क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखा जाए, तो दूसरी ओर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपना प्रभाव अधिक से अधिक बढ़ाए। नेता बदल गया तो क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व भी खत्‍म हो जाता है। ऐसे में क्षेत्र विशेष की जनता की मजबूरी बन जाती है कि अपने हित साधने के लिए भ्रष्‍टाचार में डूब चुकने के बाद भी उसी नेता का चुनाव कराए जो पहले से राष्‍ट्रीय या राज्‍य स्‍तर पर कुछ रसूख रखता हो। 

इन घटनाओं के साथ राष्‍ट्रीय स्‍तर पर शुरू में एक पार्टी रहती है तो बाद में दूसरी पार्टी लहर के साथ आती है। चूंकि एक पार्टी स्‍वतंत्रता दिलाने के खम भरते हुए पहले से सत्‍ता में है सो उसका विघटन भी धीरे धीरे होता है, जैसे जैसे देश के लोग आजादी की डायलेमा से बाहर निकलते हैं, वैसे वैसे दूसरी पार्टी को बल मिलता है। आखिर एक लहर आती है और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है। 

वही क्षेत्रीय लोग और उसी राज्‍य और राष्‍ट्र स्‍तरीय कमशकश से सामना होता है और दोनों पार्टियों में एक जैसे लोग नजर आने लगते हैं। चूंकि चुनाव खर्चीला है और क्षेत्रीय दबदबा जरूरी चीज है। ऐसे में हर स्‍तर पर भ्रष्‍ट लोगों और भ्रष्‍टाचार का सहारा लिया जाता है। आखिर में दोनों पार्टियां जॉर्ज ओरवेल के सुअरों जैसी दिखाई देने लगती है।

फिलहाल देश की राष्‍ट्रीय राजनीति में ऐसे दो लोग दिखाई दे रहे हैं जो अपने दम पर सत्‍ता और व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का दावा करते हैं। एक हैं गुजरात के मुख्‍यमंत्री भाजपा के नरेन्‍द्र मोदी (Narendra modi) तो दूसरे हैं दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री आप के अरविन्‍द केजरीवाल (Arvind kejriwal)। दोनों ने अपने अपने तरीके से भारत की जनता में यह छवि बनाने का प्रयास किया है कि चाहे सिस्‍टम जैसा भी हो, वे अपने दम पर व्‍यवस्‍था में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं। 

न तो गुजरात भ्रष्‍टाचार से अछूता रहा है न दिल्‍ली का मुख्‍यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल इसे मुक्‍त करा पाए हैं। बस दोनों के पास छवि ही है। इस छवि में ऐसी क्‍या खास बात है। देखते हैं। 

दोनों अपने दम पर व्‍यवस्‍था परिवर्तन का दावा करते हैं 
दोनों खुद को दबंग साबित करते हैं 
दोनों अपने पार्टी पर अपने तरीके की पकड़ रखते हैं 
दोनों के पास सोशल मीडिया और मेन स्‍ट्रीम मीडिया पर प्रभाव डालने की शक्ति है
दोनों सत्‍ता पर काबिज पार्टी को हड़काते हैं 
दोनों के पास पर्याप्‍त धनबल दिखाई देता है 
दोनों के पास जनबल दिखाई देता है 
दोनों के पास अंध भक्‍तों की लंबी कतार है 

एक प्रकार से दोनों जनता की किसी आवाज के बजाय अपनी आवाज अधिक ताकत के साथ जनता तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। क्‍या एक सामंत यही काम नहीं करता। अगर कोई यह समझने की भूल करे कि वामपंथ में सामंतवाद से लड़ने की शक्ति है तो उन्‍हें पहले बने यूएसएसआर को देखना चाहिए, जहां हमेशा यह शिकायत रही कि सभी संसाधनों को मास्‍को में सीमित कर दिया गया है। दूसरी ओर सामंतवाद का सबसे शक्तिशाली उदाहरण खुद चीन है। अगर वहां लोकतंत्र हो तो राजशाही अंदाज में पोलित ब्‍यूरो की बैठक नहीं होती। हां, कुछ मामलों में यह राजतंत्र से अलग है, लेकिन अंतत: सत्‍ता और शक्ति को केन्द्रित करने का ही काम करती है। चाहे वह कुछ लोगों के पास हो, एक समूह विशेष के पास हो या एक पूरी संस्‍था के पास हो। 

भारत (India) में ऐसा पोलित ब्‍यूरो से चलने वाला देश बनाया जाना संभव नहीं है, क्‍योंकि इसके लिए संप्रदायों को दांव पर लगाना पड़ेगा। जो व्‍यवहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में वामपंथी सामंतवाद को अभी छोड़ दें। 

दूसरी ओर लोकतांत्रिक (democracy) सामंतवाद का नतीजा हम 65 सालों से भुगत ही रहे हैं। ऐसे में इस छद्म सामंतवाद को भी विदा करने का वक्‍त आ गया दिखाई देता है। 

तीसरे मिलट्री के हाथ में सत्‍ता देने का औचित्‍य दिखाई नहीं देता है। क्‍योंकि देश का भूभाग इतना विस्‍तृत और बेढ़ब है कि मिलट्री द्वारा इसे शासित किया जाना व्‍यवहारिक रूप से संभव नहीं है। वरना अब तक मिलट्री शासन भी आ सकता था, जैसा पाकिस्‍तान में आता रहा है। 

चौथा सिस्‍टम वही है असली सामंतवाद। कहने, सुनने और पढ़ने में भले ही बुरा लगे, लेकिन नए जमाने के इस दो राजाओं की टक्‍कर और उसके बाद के हालात देखने का अलग की कौतुहल होगा। दोनों में से कोई भी आए, अगर ये लोग अपने इस सामंतवादी चोले को छोड़ दें तो अलग बात है, वरना देश में बड़े परिवर्तनों की बयार शुरू हो सकती है। पिछले दस साल से देश ऐसे लुंज पुंज माहौल में आगे बढ़ रहा है, कि विश्‍व में आई मंदी के दौरान अपनी बचत के जोर से अपने पैरों पर खड़ा देश भी उसका लाभ नहीं उठाया पाया। हमारे लोगों को दुनिया के हर कोने में धमकाया, हड़काया और दबाया जा रहा है। 

नए नेतृत्‍व के बाद कम से कम यह सुकून रहेगा कि पीछे एक बड़ी ताकत खड़ी है जो किसी भी देश और ताकत को धमकाकर हमें उचित सम्‍मान दिला सकती है। 

बुधवार, 8 जनवरी 2014

Hindi Translation of - Is Kejariwal an American agent?

फोर्ड फाउंडेशन, हिवोस, पेनोस और डच दूतावास - 

क्‍या अरविन्‍द केजरीवाल अमरीकी एजेंट है?

यह मूल लेख  Ford Foundation, Hivos, Panos and Dutch Embassy-  Is Kejariwal an American agent? का हिन्‍दी अनुवाद है। Updated as on 26th November 2013

आप पार्टी की पहली वर्षगांठ पर केजरीवाल से 13 सवाल

1. सम्‍पूर्ण परिवर्तन (NGO) कब पंजीकृत हुआ और इस गैर सरकारी संगठन के रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर और अन्‍य जानकारियां मुहैया कराएं?

2. आपका एनजीओ परिवर्तन से यह सम्‍पूर्ण परिवर्तन कब बना?

3. आप लगातार परिर्तन के लिए यह कहते रहे हैं कि परिवर्तन किसी सोसायटी एक्‍ट अथवा ट्रस्‍ट अथवा कंपनी से संबंधित नहीं है। यह आमजन का आंदोलन है। आयकर विभाग के दृष्‍ि टकोण से यह महज एक आम लोगों का संगठन है। क्‍या यह सच है ? 

4. जून 2002 में आपने विभिन्‍न संचार माध्‍यमों के जरिए यह प्रचार किया था कि परिर्तन को दिए जाने वाले सभी प्रकार को दान धारा 80 के तहत करमुक्‍त हैं, और परिवर्तन इनकम टैक्‍स कानून की धारा 12 ए के तहत पंजीकृत है। क्‍या यह भोले भाले लोगों को गुमराह करने वाली बात नहीं है ? 

5. क्‍या आपने दिल्‍ली में परिवर्तन के तहत हुई जनसुनवाई के लिए विश्‍व बैंक से फंड हासिल किया था? अगर हां तो यह फंड किस प्रकार आप तक पहुंचा, जबकि आपका संगठन कहीं पंजीकृत ही नहीं है। 

6. आपके परिवर्तन के कार्य पर टिप्‍पणी करते हुए विश्‍व बैंक ने एक विशेष रिपोर्ट जारी की थी? क्‍या यह सच है। पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें  

7. क्‍या यह सच है कि विश्‍व बैंक की रिपोर्ट के ठीक बाद ही आपका चयन मैग्‍सेसे पुरस्‍कार के लिए किया गया? 

8. क्‍या यह सच है कि रोमन मैग्‍सेसे फाउंडेशन की ओर से तैयार की गई आपकी जीवनी में प्रथम संदर्भ में आपको सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस ऑ‍फ अमरीका) से संबंधित बताया गया था? क्‍या यह महज संयोग था या गलती से संगठन के मुंह से निकला हुआ सत्‍य, जो आपका असली चेहरा दिखाता है? 

9. क्‍या यह सच है कि न्‍यूयार्क विश्‍वविद्यालय की छात्रा शीम्रित ली तुम्‍हारे संगठन कबीर के साथ वर्ष 2009-10 में काम करती थी और उसने तुम्‍हें भारत में रंगभेद आंदोलन जैसा आंदोलन खड़ा करने की सलाह दी थी, जो राजनीतिक बदलाव लेकर आए। क्‍या यह सच है कि वह बाद में मिश्र गई और वहां तहरीर चौक में हुए आंदोलन की साक्षी रही। 

10. क्‍या यह सच है कि तुम सम्‍पूर्ण परिवर्तन एनजीओ के सचिव की हैसियत से दिल्‍ली विद्युत नियामक कमीशन की सलाहकार संस्‍था के सदस्‍य रहे हो। यह कमीशन NOTIFICATION No. F.1(135)/DERC/2000-01/5092 Delhi, the 27th March, 2003 को बनाया गया। इसी आधार पर तो तुम्‍हें दिल्‍ली में विद्युत दरों के गलत तरीके से बढ़ने और गलत मीटर लगाए जाने के लिए दोषी क्‍यों न माना जाए? 

11. क्‍या यह सच है - तुम पारदर्शिता की वकालत करते हो और इसके बावजूद तुमने कबीर और परिवर्तन की वेबसाइट्स बंद कर दी। वह भी तब जब जनता वर्ष 2012 में तुम्‍हें जानने का प्रयास कर रही थी!!

12. क्‍या यह सच है -  अक्‍टूबर 2012 में जब तुम्‍हारे विदेशी संपर्कों यथा फोर्ड फाउंडेशन से संबंधों के बारे में लोगों ने पड़ताल करनी शुरू की तो फोर्ड फाउंडेशन ने भी कबीर और परिवर्तन एजीओ को दिए गए फंड के बारे में पूरी जानकारी हटा ली। ताकि लोगों को पता न चल सके कि तुम्‍हें धन कहां से और कितना मिल रहा है?

13. क्‍या यह सच है कि तुमने विदेशियों से भी धन की मांग की ? डच दूतावास से भी, जबकि भारतीय एनजीओ डच दूतावास से फंड लेना वर्ष 2002 में ही बंद कर चुके हैं, क्‍यों‍कि उस धन को भारत विरोधी गतिविधियों में इस्‍तेमाल किया जाता रहा है। 


मूल ब्‍लॉग लेखक की टिप्‍पणी (Original Piece That appeared on 21st October,2012 raising serious question about Kabir and Kejariwal. Immediately after the blog post was being tweeted, Mr. Transparency Chameleon Kejariwal's site of Kabir was off and all details from Ford Foundation website about Kabir has been hidden , exposing the complicity of Kejariwal and Ford and by extension Kejariwal and the US game-makers.) 

सोमवार, 6 जनवरी 2014

Drinking water : It's Culture and understanding with your body!!

पानी पीना : जिंदगी की जरूरत ही नहीं, जीने का सलीका है

Sidharth joshi: drinking water. Photo Aziz Bhutta
मेरी तीन शारीरिक समस्‍याएं ऐसी थी, जो इतने अर्से से है कि अब तो मैं उनके साथ ही जीने का अभ्‍यस्‍त होने लगा था। पहली गैस (Gastric), दूसरी कोष्‍ठबद्धता (Indigestion) और तीसरी धरण (Dharan)। मुझे इन तीनों समस्‍याओं का समाधान एक साथ एक जगह मिला है। वह भी केवल पानी पीने से... 

              अभी कुछ दिन पहले की बात है कि मेरे एक वरिष्‍ठ साथी ज्‍योतिषी (Astrologer) अपने नए फोन के साथ आए और फोन दिखाते हुए राजीव दीक्षित की वाटर सीरीज चला बैठे। श्री राजीव दीक्षित (Rajiv dixit) की ओजस्‍वी आवाज एक बार शुरू हुई तो न तो मैंने रोका न उन्‍होंने। करीब पैंतीस मिनट के ऑडियो में राजीवजी ने बताया कि महर्षि चरक के शिष्‍य वागभट्टजी ने करीब सात हजार सूत्र लिखे हैं जो हमें स्‍वस्‍थ रहने की शिक्षा देते हैं। इसी के तहत जल से चिकित्‍सा पर जो बातें बताई वे इस ऑडियो में है... 

            हालांकि ऑडियो में और भी कई बातों का समावेश किया गया है, लेकिन जैसा कि हमारी जीवनचर्या है, हम सभी प्रकार के उपायों को एक साथ नहीं अपना सकते। ऐसे में मैंने दो अनुशासन को अपनाने का तुरंत निर्णय किया। 

पहला है खाने के बाद किसी सूरत में पानी नहीं पीना
दूसरा सुबह उठते ही बिना कुल्‍ला किए करीब सवा लीटर पानी पीना। 

पहले पहला प्रयोग खाना खाने के बाद पानी नहीं पीना

इस बाबत राजीवजी ने बताया कि हमारे मुंह में बनने वाले लार (Saliva) का पीएच (Ph) अधिक होता है और अमाशय (Stomach) के भीतर तेज अम्‍ल (Acid) स्रावित होता है, जिसका पीएच 3 तक भी पहुंच सकता है। ऐसे में लार के साथ पेट में गया भोजन अम्‍ल के साथ मिलते ही लवण (Salt) और जल बना देता है। इसे कहते हैं पेट का पानी होना। आयुर्वेद (Ayurveda) में भी पेट पानी की तरह होने पर भी स्‍वस्‍थ बताया गया है। अब जब हम खाना खाने के बाद भरपेट पानी पी लेते हैं तो अम्‍ल और क्षार के मिलने की प्रक्रिया को बाधित कर देते हैं और स्‍वादिष्‍ट से स्‍वादिष्‍ट पकवान भी कीचड़ में तब्‍दील हो जाता है। 
               खाने के ठीक बाद पीया गया यह पानी विष के समान (Poisonous) बताया गया है। यह न केवल अम्‍ल क्षार की अंतर्क्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि पूरी पाचन तंत्र (Digestive system) को सुस्‍त बना देता है। इस कारण जठराग्नि मंद हो जाती है और हमें भूख भी सही तरीके से लगनी बंद हो जाती है। ऐसे में खाने के बाद पानी किसी भी सूरत में पीना ठीक नहीं है। 

(एक स्‍थान पर उन्‍होंने कहा कि खाने के बीच दो घूंट पानी पीने की अनुमति केवल वहां है जहां हम दो प्रकार का अन्‍न ग्रहण कर रहे हों तो दोनों अन्‍न के बीच के समय हम दो घूंट पानी पी सकते हैं।)

दूसरा प्रयोग सुबह उठकर पानी पीना

हमारे मुंह में करीब एक लाख लार ग्रंथियां (Glands) हैं जो लगातार लार का स्राव करती रहती हैं। ये लार केवल भोजन को पचाने का काम नहीं करती, बल्कि शरीर के लिए आवश्‍यक तत्‍वों (Essential elements) को भी लार में ही शामिल कर देती है। (यहां मैं अपने समझने वाली प्रक्रिया को भी शामिल करूंगा) मेरे मेडिकल के दोस्‍त बताते हैं कि हमारी आहार नाल को "गट" (GUT) कहा जाता है। यह गट एक प्रकार का बर्हिचर्म है। यानी जिस प्रकार शरीर के ऊपर की चमड़ी (Skin) शरीर के भीतर के अंगों से विलग रहती है, ठीक उसी प्रकार गट भी शरीर के भीतर के अन्‍य अंगों से अलग रहती है। 

              ऐसे में अगर हमारे शरीर को हमारे पाचन तंत्र में किसी प्रकार की घुसपैठ करनी हो तो वह लार अथवा अन्‍य स्रावी ग्रंथियों के माध्‍यम से ही शरीर से संपर्क कर सकता है। लाइव टच में नहीं रहता। ऐसे में लार में शरीर के लिए आवश्‍यक पोषण एवं उपचारात्‍मक तत्‍वों का शामिल होना स्‍वाभ‍ाविक है। 

               पूरी रात लार ग्रंथियां सक्रियता के साथ काम करती हैं और शरीर के लिए जरूरी तत्‍वों की समीक्षा करके सुबह तक उन्‍हें हमारे मुंह में पहुंचा देती है। हम केवल इतना ही करते हैं कि सुबह उठते ही कुल्‍ला करते हैं और उन सभी जरूरी तत्‍वों को मुंह से बाहर फेंक देते हैं। 

               राजीव दीक्षित कहते हैं यहीं पर सबसे बड़ी भूल होती है। अगर सुबह उठते ही बिना कुल्‍ला किए करीब सवा लीटर पानी स्‍वस्‍थ युवा और पौन लीटर पानी वृद्ध अथवा बच्‍चे पीएं तो वे अपेक्षाकृत अधिक स्‍वस्‍थ रह सकेंगे। वे तो यहां तक उदाहरण देते हैं कि लार का औषधीय महत्‍व इंसानों से अधिक जानवर समझते हैं जो कहीं भी चोट लग जाने पर उसे लगातार चाटते रहते हैं। इससे घाव जल्‍दी भर जाता है। 

इन दोनों बातों में एक बात आवश्‍यक रूप से शामिल है कि कभी भी न तो ठण्‍डा पानी पीओ न गर्म। हमेशा ऐसा पानी पीना (Drinking water) चाहिए जिसका तापमान शरीर के तापमान के बराबर (Body temperature) हो। 

देखने में यह प्रयोग आसान लगता है, लेकिन प्रण लेने के तीसरे ही दिन मुझे जीमण (विवाह समारोह) में जाना था और वहां पर खाने के बाद आइसक्रीम परोसी जा रही थी। मेरा जी जानता है कि मैंने कितनी मुश्किल से खुद को रोककर रखा। लेकिन खुद को रोक पाया क्‍योंकि इसका फायदा मैं अगले ही दिन ले चुका था। 

अब लाभ की बात 
जिस दिन ऑडियो सुना उसी रात खाना खाने के बाद मैंने पानी नहीं पिया। रात को डटकर खाया गया खाना हर पांच मिनट में पानी मांग रहा था और आदत के अनुसार मैं बार-बार चरू (स्‍टील की मटकी) तक पहुंच रहा था, लेकिन किसी प्रकार खुद को रोके रहा। रात साढ़े ग्‍यारह बजे आखिर मैंने पानी पीया। यह बॉडी टैंपरेचर तक गर्म नहीं था, ठण्‍डा पानी था। यह पानी गर्म हुए पेट में पहुंचा तो पहली बार खाना खाने के बाद पानी की ठण्‍डक को पेट में महसूस किया और उसी समय गलती समझ में आ गई। 

                  मैंने धर्मपत्‍नीजी को सारी कथा आदि से अंत तक कह सुनाई। अगले दिन सुबह उठते ही मुझे गुनगुना पानी मिल गया। मैंने सवा लीटर कहा था सो एक आधा लीटर का लोट पेश था और बाकी पानी टोपिए में मेरा इंतजार कर रहा था। कहना आसान है सवा लीटर गुनगुना पानी। अभी पहला लोटा खत्‍म ही किया था कि इंतजार कर रही चाय की ओर भी नहीं देख पाया और सीधा शौच के लिए भागा। पेट आम दिनों के मुकाबले अच्‍छा साफ हुआ। काफी देर तक तो गैस निकलती रही (आप भले ही नाक भौं सिकोड़ें मुझे जो आराम मिला वही बता रहा हूं।) पूरा शरीर हल्‍का हुआ जान पड़ा। अब तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मैं खाने के बाद पानी पी लूं। 

                    पिछले 22 या 23 दिन से यह प्रयोग जारी है। शुरूआती दिनों में पहले कोष्‍ठबद्धता का निवारण हुआ, फिर पेट में भरी गैस का, फिर शरीर में जगह जगह जमा चर्बी की परतें पिघलने लगी। कुछ पेंटें जिनके बटन जवाब देने लगे थे, फिर से सहज हो गई। और तीन चार दिन से तो दूसरे लोग भी अब कहने लगे हैं कि पतला कैसे हो रहा है, कोई चिंता तो नहीं। 

                     यह तो हुए प्रत्‍यक्ष लाभ और एक लाभ ऐसा है जिसे कम लोग समझ पाएंगे। हमारे यहां इसे "धरण" कहते हैं। हर महीने सवा महीने बाद मेरी धरण खिसक जाती थी। ऐसे में पीठ और गर्दन में दर्द की लहरें चलती। गैस के कारण सिरदर्द मेरे लिए आम है, लेकिन धरण का दर्द बर्दाश्‍त के बाहर है। धरण वापस चढ़ाने के लिए मैंने दो लोगों को पकड़ा हुआ है। वे भी मुझसे आजिज आए हुए थे। उनमें से एक कल रात को मिला तो उसे मैंने पूरी कथा बताई। अब मेरी धरण भी बिल्‍कुल सही है। स्‍पष्‍ट तो नहीं कहा जा सकता कि गैस के कारण धरण उतरती है, लेकिन गैस और कोष्‍ठबद्धता के निवारण के साथ मेरी धरण की समस्‍या का भी अब तक तो समाधान हो चुका है। 

                   पेट हल्‍का है, दिमाग खुला है, प्रसन्‍नता हिलोरें ले रही है। अगर कोई राजीव दीक्षित की सीडी सुने और कहे कि आप भी करें तो आप चाहें मान या ना मानें, लेकिन मैंने सुनी है, प्रयोग किए हैं और लाभ प्राप्‍त किए हैं। अब मैं कहता हूं कि कम से कम यह दो प्रयोग करके देखें। आमूलचूल परिवर्ततन आता है। 

यहां मैं लिंक दे रहा हूं जिसमें राजीव दीक्षितजी के वे ऑडियो दिए गए हैं 


उन्‍हें हृदय से नमन। जब वे जीवित थे, तभी इन बातों को सुनना और अपनाना शुरू कर चुका होता तो... खैर। 

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

Kejriwal phenomenon @ a betel shop

पान की दुकान पर केजरीवाल का असर

बुद्धिजीवियों की एक जमात का मानना है कि केजरीवाल का उदय एक प्रकार का प्रतिक्रियावाद या अराजकतावाद है। मौजूद व्‍यवस्‍था से आहत लोग इस व्‍यवस्‍था को चुनौती देने वालों के पक्ष में आ खड़े हुए हैं। लेकिन जमीन देखने के लिए हमारे बीकानेर में पान की दुकान से बेहतर स्‍थान और कोई हो नहीं सकता। सभी बौद्धिक, परा बौद्धिक, अधि भौतिक और अबौद्धिक तक की चर्चाएं इन्‍हीं पान (betel) की दुकानों पर होती हैं। 

इन्‍हीं पान की दुकानों में से एक पर बीती शाम मैं भी उलझ गया। मैं खुद को बद्धि जीवी मानकर वहां उतरा था, लेकिन चर्चा के अंत में लोगों ने स्‍पष्‍ट कर दिया कि न तो मेरे अंदर इतनी बुद्धि है कि केजरीवाल को समझ सकूं न इतना सामर्थ्‍य। मेरे अपने तर्क थे और उन लोगों के अपने। चर्चा कुछ इस प्रकार हुई। 

मैंने कहा - केजरीवाल आम आदमी (Aam Aadmi) का स्‍वांग भरकर मीडिया के जरिए लोगों के सेंटिमेंट भुनाने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए मैंने उदाहरण दिया कि इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में गैले गूंगे चैनल को भी प्रति एक सैकण्‍ड का पांच से दस हजार रुपए वसूलना होता है। ऐसे में पूरे पूरे दिन केजरीवाल के गीत गाने वाले न्‍यूज चैनल्‍स का खर्चा का मुफ्त में चलता होगा। या कोई दैवीय सहायता प्राप्‍त होती है। 

जवाब मिला : मीडिया को भी टीआरपी (TRP) चाहिए। आज हर कोई केजरीवाल को देखना चाहता है। ऐसे में मीडिया की मजबूरी है कि वह केजरीवाल और उसके आंदोलन को दिखाए। अगर चैनलों को खुद को दिखाना है तो केजरीवाल को दिखाना ही पड़ेगा। वरना उस चैनल की टीआरपी धड़ाम से नीचे आ गिरेगी। 

मैंने कहा : केजरीवाल ने आम आदमी के नाम पर जितने आंदोलन किए हैं सभी विफल रहे हैं। केवल जबानी लप्‍पा लप्‍पी (verbal jiggaling) की मुद्रा ही रही है। 

जवाब मिला: अब तक किसने आम आदमी की आवाज उठाई है। भाजपा (BJP) और कांग्रेस (CONGRESS) तो एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। बाकी दल भी अपनी ही रोटियां सेंकने का काम कर रहे हैं। पहली बार कोई आदमी ऐसा आया है, जिसने आम आदमी की बात की है और उसकी ओर से लड़ाई लड़ी है। उसके प्रयास ही काफी हैं। सफलता और विफलता तो ऊपर वाले की देन है। 

मैंने कहा : केजरीवाल कांग्रेस से मिला हुआ है। यह उनकी बी टीम (B Team) है। 

जवाब मिला : कांग्रेस और बीजेपी वाले अपनी रांडी रोणा करते रहेंगे। एक कहेगा दूसरे की बी टीम है और दूसरा कहेगा पहले की बी टीम है। आज केजरीवाल दोनों के भूस भर रहा है। जनता इन भ्रष्‍ट (Currupt) नेताओं की ऐसी तैसी कर देगा। 

मैंने कहा : एक साल पहले आए इस नए नेता के पास न तो देश के लिए वीजन (Vision) है न ही इसका कोई पॉलिटिकल बैकग्राउंड (Political background) है। ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि यह आम आदमी को राहत दिलाने का काम करेगा। 

जवाब मिला: जो पहले से अनुभवी लोग हैं उन्‍होंने कौनसे काम करवा दिए। सब अपना घर भरने में लगे हैं। यह बदलाव की बयार लेकर आया है तो जरूर काम करेगा। कम से कम एक नए आदमी को मौका तो दे रहे हैं। 

मैंने कहा : केजरीवाल बहुत अधिक अकल लगाकर काम कर रहा है। केवल दिल्‍ली (Delhi) में आंदोलन करता है और पूरे देश पर छा जाता है। केवल मैट्रो सिटी (Metro city) के लोगों की भावनाएं ही भुना रहा है। देश के अन्‍य हिस्‍सों में इसका कोई खास असर नहीं है। 

अब लोग तैश में आ गए, बोले: भो##** के गांव गांव तक जाकर केजरीवाल का नाम सुन ले। (एक ने खाजूवाला जो कि सीमा से सटा हुआ कस्‍बा है, दूसरे ने श्रीकोलायत, तीसरे ने लूणकरनसर में चल रही हवा के बारे में जानकारी दी।)

जब मेरे तर्क और क्षमता जवाब दे गए तो पान की दुकान पर मेरी जमकर मलामत की गई। मुझे नेताओं का पिठ्ठू करार दिया गया और बताया गया कि मैं जमीनी हकीकत (Ground realities) से कोसों दूर हूं। अब देश में तेजी से बदलाव आ रहा है और इस बदलाव के रथ को केजरीवाल चला रहा है। जल्‍द ही लोकसभा और ग्राम सरपंच तक के चुनावों में आम आदमी पार्टी ही राज करेगी। हर घर में आज टीवी चैनल है और सब देख रहे हैं कि देश में क्‍या हो रहा है।

मैंने रूंआसा होकर पूछा मोदी (Modi) ? 

जवाब आया: मोदी ने किया होगा गुजरात में काम, लेकिन आज देश को अगर जरूरत है तो केजरीवाल की है। वही देश की लय को सुधार सकता है। वही है आने वाले जमाने की ताजी बयार। वहीं से परिवर्तन की शुरूआत होगी। भाजपा और कांग्रेस तो एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। 

अब मैं सोच रहा हूं कि अगर पान की दुकान से लेकर गांवों (Gaanv) तक अगर केजरीवाल फैल चुका है तो क्‍या मोदी केवल अपनी सोशल मीडिया फौज पर ही राज कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी देख रहा हूं कि बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका केजरीवाल को हृदय से स्‍वीकार कर चुका है और जिस प्रकार अमिताभ बच्‍चन की छोटी मोटी भूलों को भी पर्दे पर उनकी स्‍टाइल में शामिल कर देखा जाता रहा है, उसी प्रकार केजरीवाल के प्रयासों में रही कमियों को इसी प्रकार नजरअंदाज करने का दौर चल रहा है। 

आपको क्‍या लगता है ? 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

Kejriwal's angle : Paradigm shift or hidden agenda "2014"

मुझे पहला आश्‍चर्य तब हुआ तब राजीव शुक्‍ला (Rajiv Shukla) का चैनल पूरे दिन राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के एक भाषण में रही कमी को लेकर उसकी पूंछ फाड़ने का प्रयास करता रहा। यह अजीब मसला था। अब तक जो संस्‍थान जिन लोगों के भरोसे या सही शब्‍द कहें कि कृपा से जी रहा था, वह अचानक हिंदी का पैरोकार बनकर सीधे राहुल गांधी पर ही आक्रमण कर रहा था। 

                उत्‍तर प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka gandhi wadra) और उनके बच्‍चे भी जब सहानुभूति की लहर पैदा करने में विफल रहे तो कांग्रेस को सत्‍ता विरोधी लहर को दबाने का यही एक तरीका समझ में आया कि इस आग की झुलस को विपरीत दिशा की आग से ही काबू में किया जाए।


आग से आग बुझाने की पद्धतियों में से एक फायर ब्रेक (Fire Break) है। यह दो तरह से काम करती है। पहला तो यह कि जंगल या घास के मैदान की आग के बीच अंतराल पैदा किया जाए ताकि ईंधन की आपूर्ति बाधित हो और साथ ही आग जिस दिशा में बढ़ रही हो, उसी दिशा में आगे जाकर फायर लाइन (Fire line) बना दी जाए। यह फायर लाइन रास्‍ते की ऑक्‍सीजन (Oxygen) को खत्‍म कर देती है और पीछे से आ रही आग बीच का गैप होने और ऑक्‍सीजन की कमी के चलते दम तोड़ देती है। इससे बीहड़ या घास का मैदान बचा रह जाता है। राजनीति के इस बीहड़ को बचाने के‍ लिए केजरीवाल फायर ब्रेकर सिद्ध हो सकते हैं। 


मुझे केजरीवाल शुरू से ही फायर ब्रेकर ही दिखाई दिए।  पहली तो उनकी एंट्री ही रजनीकांत (Rajnikant) वाले अंदाज में होती है। अब चूंकि वे सितारा हैसियत के थे नहीं, तो इसके लिए भारत के दक्षिणी पश्चिमी कोने में अपना काम कर रहे अन्‍ना हजारे (Anna hazare) को उठया गया। आम आदमी (Aam Admi) के नाम पर आंदोलन किया गया। एक के बाद दूसरी हस्तियां कतार में आती गई और उनका दोहन कर केजवरीवाल आगे आते रहे। मैं यह नहीं मानता कि शुरू से ही अरविन्‍द केजरीवाल को ही इस काम के लिए नियुक्‍त किया गया होगा, लेकिन प्रमुख लोगों में एक शामिल रहे होंगे। 

                आगे के सूत्रों को खुला छोड़े रखे जाने के लिए जरूरी है कि एक से अधिक विकल्‍प साथ लेकर ही चला जाए। मैं देखता हूं कि केजरीवाल दूसरों को पछाड़ आगे निकलते गए। लोकपाल (Lokpal) के लिए संघर्ष हुआ। इसके बाद अन्‍ना हजारे का कद घटाने वाला गुजरात का चुनाव हुआ। अन्‍ना का कद घटाने वाला इसलिए क्‍योंकि अन्‍ना को लाया ही इसलिए गया था कि भ्रष्‍टाचार या अन्‍य मुद्दों की बात कर वे जनता में अपनी तगड़ी छवि बनाए जो वास्‍तव में सरकार के विरुद्ध दिखाई दे। इसके बाद गुजरात (Gujrat) चुनाव के समय अन्‍ना का परीक्षण किया गया। जिसमें वे बुरी तरह फेल साबित हुए। 

                यही से अरविन्‍द केजरीवाल घटना का उदय शुरू हो गया था। अब पांच राज्‍यों के चुनाव तक यह फायर लाइन अधिक काम नहीं कर पाई। क्‍योंकि मोदी ने भी गुजरात को छोड़कर कहीं और कुछ भी नहीं किया था। हद तो यह है कि उत्‍तर भारत के अधिकांश राज्‍यों में मोदी के आदमी अभी केवल जमीन तैयार करने का काम कर रहे हैं। जैसे उत्‍तरप्रदेश और बिहार में अमित शाह। ऐसे में सीधा मोदी पर हमला बोले जाने की संभावनाएं क्षीण हो गई। 

                अब पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव आते हैं तो अपना आकार बढ़ाने में नाकामयाब रही इस फायरलाइन के पास दिल्‍ली (Delhi) का ही विकल्‍प शेष रहता है। क्‍यों‍कि ये फायर फाइटर देख चुके थे कि दिल्‍ली से बाहर महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में इसी प्रकार का प्रयास बुरी तरफ फ्लॉप सिद्ध हो चुका था। अन्‍य राज्‍यों में भी धरना प्रदर्शन किए गए, लेकिन कहीं से प्रभावी फीडबैक नहीं मिला। 

(राज्‍यों के छोटे छोटे जिलों में से अधिकांश में सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता केजरीवाल एण्‍ड कंपनी के साथ दिखाई दे रहे हैं, क्‍यों? पता नहीं।)

ऐसे में मेन स्‍ट्रीम मीडिया के साथ भावुक होने वाली मैट्रो दिल्‍ली ही सबसे मुफीद जगह हो सकती थी। केजरीवाल ने यही काम किया। दिल्‍ली में पूरी ताकत झोंक दी गई। पूरी ताकत झोंक दी गई, किसकी ? 

                स्‍पष्‍ट तौर पर न भी कहा जाए तो केवल इस तथ्‍य को समझा जा सकता है कि दिल्‍ली में जितने कुल वोट पड़े उसमें करीब सत्रह प्रतिशत वोट तो केवल आखिरी आधे घंटे में पड़े। अब आम आदमी पार्टी को मिले मतों को देखा जाए तो लगता है कि उन सत्रह प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को तो वोट नहीं ही दिया होगा। अगर भाजपा को ही वोट देना होता तो शाम साढ़े चार बजे तक किसका इंतजार करते। खैर, आम आदमी पार्टी के नौ कैंडिडेट करीब एक हजार वोटों के अंतर से जीत गए। 

                अगर केजरीवाल एण्‍ड पार्टी को अब भी फायर ब्रेकर ही समझा जाए तो आम आदमी पार्टी की यह जीत उनके खुद के रास्‍ते में एक बड़ी बाधा बनकर उभर आई है। सत्‍ता का मद खुद केजरीवाल पर भारी पड़ रहा है। क्‍योंकि यह फायर लाइन तो बनाई गई है वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए, लेकिन इसका बड़ा भाग यहीं दिल्‍ली में टूट और बिखर रहा है। ऐसे में अगर हवा विपरीत हो जाती है तो यह फायर लाइन की आग ही फायर फाइटर्स को लील लेगी। 

अब मुझे तीन स्थितियां समझ में आ रही है 

                - वर्ष 2014 के चुनाव के लिए सक्रिय बने रहना है और देशभर में आम आदमी पार्टी की जड़ें फैलानी है तो केजरीवाल को दिल्‍ली की गद्दी छोड़नी पड़ेगी। लेकिन यहां एक समस्‍या यह हो गई है कि सभी प्रमुख लोगों को लोकसभा चुनाव के लिए रोका गया था, अब अधिकांश चुनकर आए लोग ऐसे हैं कि दिल्‍ली की गद्दी उन्‍हें सौप दी जाए तो आम आदमी पार्टी की पहली मुख्‍यमंत्री की कुर्सी ही रजिया गुंडों में वाली हालत में पहुंच जाएगी। ऐसे में खुद केजरीवाल को ही यह भार झेलना पड़ेगा। 

                - दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री की कुर्सी को बचाने में कामयाब होते हैं। ऐसे में 7 मार्च के बाद भी राज्‍य सरकार बनी रहती है और कांग्रेस का समर्थन जारी रहता है तो भाजपा के नए नेतृत्‍व और शक्तिशाली विपक्ष को भी झेलना केजरीवाल की मजबूरी होगी। ऐसे में लोकसभा में मोदी से लड़ने का सपना यहीं कुचलकर खत्‍म हो जाएगा। ऐसे में लोकसभा की बागडोर किसी अन्‍य के हाथ में दी जा सकती है। 

छीन झपट कर और पाले पोसे गए इस सपने को केजरीवाल भी किसी और को नहीं देना चाहेंगे। तब वे सरकार गिराकर और कांग्रेस को गालियां निकालते हुए जनता की सहानुभूति के रथ पर सवार हो सकते हैं।  

                - अगर केजरीवाल दिल्‍ली का मोह छोड़कर सीधे लोकसभा की तैयारी करते हैं और पीछे से दिल्‍ली में कुछ ऐसा वैसा हो जाता है तो उनकी हालत हिलते मंच पर खड़े होकर भाषण दे रहे नेताजी जैसी हो जाएगी। नीचे टांगे धूज रही होगी और ऊपर मुंह से बांग निकल रही होगी। 

दिल्‍ली की कुर्सी हाथ में आने के साथ ही केजरीवाल के मुंह में नेवला आ गया है। केजरीवाल ने इससे बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन डॉ. हर्षवर्द्धन पहले ही दिन यह तय कर चुके थे कि चूंकि जनता ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, सो भाजपा सरकार नहीं बनाएगी। भापजा सरकार बनाती तो केजरीवाल को दोहरी सहायता मिलती। दिखाने के लिए 28 एमएलए होते और बोलने और दोषारोपण के लिए एक और जगह खुल जाती। लेकिन अब जिम्‍मेदारी ही सिर पर आ गिरी है। 

यहीं पर आकर फायर ब्रेकर खुद ब्रेक हो रहा है। 

अब इसे मोदी की किस्‍मत कहें या केजरीवाल की बदकिस्‍मती कि प्रधानमंत्री का सपना देख रहे आम आदमी को दिल्‍ली का ऐसा तख्‍त मिला है जिसके नीचे की सारी चूलें हिली हुई है। अब तक जितना बोला है, उतना कर दिखाना तो शक्तिमान के बस में भी नहीं दिखाई दे रहा। कम से कम लोकसभा चुनाव 2014 तक तो कतई नहीं।

मोदी या कहें भाजपा के लिए जरूरी है कि अब केजरीवाल किसी सूरत में दिल्‍ली की राज्‍य सरकार के ही लिपटे रहें। अगर इस काम में भाजपा विफल रहती है तो आम आदमी पार्टी को पूरे देश में फैलने से कोई रोक नहीं पाएगा। 

मोदी आंधी नहीं सत्‍ता के विरोध का दावानल है 
और एक दावानल केजरीवाल को खड़ा किया जा रहा है। 
जिस बिंदू पर दोनों आमने सामने भिडेंगे वहीं दोनों खत्‍म होंगे।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

Social Network Vs Blogging


वर्ष 2006 में पहली बार ब्‍लॉग (Blog) को देखा और वर्ष 2007 में तो इसकी सवारी ही शुरू कर दी। उन दिनों ऑनलाइन लेखन (Online writing) और आज के ऑनलाइन लेखन में दिन रात का अंतर आ गया है। हालांकि पोस्‍ट करने और तुरंत टिप्‍पणियां (Comments) पाने की लालसा और बलवती ही हुई है, लेकिन पहले जितना सटीकता से लिखा जा रहा था, उतनी सटीकता अब नहीं आ पा रही है। कारण स्‍पष्‍ट है कि अब न तो वैसा आराम है न इंतजार। 

ब्‍लॉग की यह खूबसूरत कमी रही है कि हर बार लिखने से पहले सोचने और फिर उसे एडिट (Edit) करने के लिए हमेशा पर्याप्‍त समय रहा। लिखने की जल्‍दबाजी भी नहीं रही। जो लिख दिया, वह तुरंत लोगों की नजर में नहीं आया तो उसे सुधारने या डिलीट तक कर देने के विकल्‍प हमेशा हाथ में रहे। वहीं सोशल मीडिया (Social) में और खासतौर से कहूं तो फेसबुक (Facebook) पर एक बार विचार पोस्‍ट कर देने के बाद डिलीट करने की फुर्सत तक नहीं मिल पाती और लाइक (Like) व कमेंट का दौर शुरू हो जाता है। फिर सोचते हैं यार इतने लोगों ने तो देख लिया अब डिलीट करने से क्‍या फायदा। 

दूसरी तरफ फेसबुक लेखन ने लेखों की लंबाई को लील लिया है। एक विचार पकने से पहले परोसा जाने लगा है। इसका नतीजा कई बार तो यह भी हो रहा है कि मैं सोच कुछ रहा हूं, लिख कुछ रहा हूं और सर्किल में मौजूद लोग उसका अर्थ कुछ और ही लगा रहे हैं। परिणाम यह होता है कि विचार की भ्रूण हत्‍या (Abortion) ही हो जाती है। अब तेज माध्‍यम विचार करने की प्रवृत्ति को उकसाता है, लेकिन विचारों की इस प्रकार की अकाल मृत्‍यु कई बार क्षुब्‍ध कर देती है। 

ब्‍लॉगिंग के शुरूआती दिनों में एक माह में कुल मिलाकर ही तीन या चार पोस्‍ट से ऊपर मेरा आंकड़ा कभी नहीं गया, लेकिन फेसबुक पर तो रोजाना तीन से चार पोस्‍टें हो रही हैं। कई बार मैं खुद को रोकने का प्रयास करता हूं। सोचता हूं कुछ ठहरकर पहले विचार को पक लेने दिया जाए, लेकिन फिर केवल कौतुहल से ही विचार पोस्‍ट होता है कि देखें लोग इस मुद्दे पर क्‍या सोच रहे हैं। नतीजा यह होता है कि पोस्‍ट का ही कबाड़ा हो जाता है। 

सोशल नेटवर्क की एक खूबसूरती यह है कि यह आपको जनता से बीच अधिक से अधिक परोसे जाने का विकल्‍प पेश कर रहा है लेकिन कमी यह है कि चाहने पर भी आप न तो अपनी पूरी बात लिख सकते हैं न लोगों के पास लंबे ख्‍याल पढ़ने का वक्‍त है। 

ब्‍लॉग के जमाने में ब्‍लॉग अखबारों (Newspapers) के रूप में ब्‍लॉगवाणी (Blogvani) और चिठठाजगत (Chitthajagat) ने हम जैसे कई नौसिखियों को पनाह दे रखी थी। हम कुछ भी पोस्‍ट करते, दो या तीन हजार लोगों के समूह तक वह बात पहुंच जाती थी। इसके चलते दूसरे लेखकों और पाठकों के मिलने का सिलसिला बना रहा। इन दोनों ब्‍लॉग एग्रेगेटरों के बंद हो जाने के बाद तो लगा कि अब यहा समय किसके सहारे व्‍यतीत किया जा सकता है। सो आंशिक पलायन कर गए। 

यहां आंशिक इसलिए कहा क्‍योंकि पिछले तीन साल से फेसबुक पर अतिसक्रिय रहने के बावजूद अब तक न तो ब्‍लॉग का प्रेम कम हो पाया है न ही यहां लिखने की चाह खत्‍म हुई है। अब भी जब तक कुछ ऐसा लिखना होता है, जिसे मैं अर्से बाद फिर से देखना चाहूं, तो यहां लिखने चला आता हूं।

देखता हूं कि फेसबुक पर मेरे ही लिखे लेख कालपात्र में समाते जा रहे हैं। सक्रियता में कुछ कमी हुई नहीं कि लोग भूलने लगते हैं। पहले जहां एक पोस्‍ट को मुश्किल से 100 पाठक मिल पाते थे, वहीं अब हर फेसबुक स्‍टेटस (status) को दो से तीन सौ लोग पढ़ रहे हैं। 

फेसबुक प्रोफाइल (profile) पर इसका पता नहीं लगता, लेकिन फेसबुक पेज तो आपको बता देता है कि इतने लोगों की नजर से आपका लेख अब तक निकल चुका है। अब पाठक किसे नहीं चाहिए। समस्‍या तो तब है जब लिखने का अनुशासन आने से पहले पाठक आपसे रूबरू होना शुरू हो जाएं। 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

being human with Tablet #Better Way

With enlargement of mobiles and reducing size of laptops i already imagine a solution about 7 to 10 inch device. One fine day i search online and find tablet. Its a old story but not end here. As a group of advance computer application yser we discuss about a perfect tab. 

what should a perfect tab must have? It includ screen resolution, grip, style, storage space, ram, gpu, battery capacity and web connectivity. 

So, after a long discussion and time spent we find some special requirements. Here they are

It's a 7 to 9 inch tablet : What we want to purchase.
1. 3G network OR it may compromise with WiFi
2. Screen resolution must be higher than 768 * 976
3. screen density more than 160 dpi 
4. RAM not less than one GB if we find two GB, it will be better
5. internal storage at least 2 GB
6. Processor should be Quad core or Octa Core (as industry moving into it)
7. Battery capacity must be 6000 mAh, if tab size will enlarge to 9 inch than battery capacity must be 7600 mAh
8. clock speed must be higher than 1.5 GHz
9. All major sensors must be installed. ie axis, compass, light, proximity etc.
10. and last the system must have its Stand. 

Although we look for a complete solution for removing laptop completely from the scene and get a shorter device. but we fond several tabs with lot of accessories. Like tab case, keyboard, mouse, speaker and gadgets surrounds us again. 

Now its a better way if we can found a tablet with stand. so we do not have to carry another case for same work.

As an astrologer i want a handy device which have all qualities but less space. When we are at Jataka's home, I am not feel easy to ask them for a charger or a separate table or other supportive gadgets.  All i imagine that go to the spot analyze, use my tool and tell them what to do.  

Some solution i found in my tiny tablet called Vido mini one. it's a Chinese model. I arrange it through a Chinese connection. But it has its own problem like
No Guarantee
No back support
No software support
No additional gadget support
No battery replacement
No upgraded kernel versions etc. 

NOW i search for a human solution for this advance gadget. Hope i will find one. 

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

जन‍प्रतिनिधियों से गलत उम्‍मीदें

कई बार व्‍यवस्‍था को दोष देने का जी करता है, लेकिन जब समस्‍या की तह तक जाने का प्रयास करता हूं और एक पत्रकार के रूप में समाज को देखता हूं तो पाता हूं कि समस्‍याएं कहीं नहीं है, बस जो इच्‍छा का नहीं है वही हो रहा है। उसे समस्‍या का रूप दिया जा रहा है। हो तो वही रहा है जिसकी हम कोशिश कर रहे हैं।

इन दिनों लोकतंत्र का उत्‍सव अपने परवान पर है। भारत को आजाद हुए आधी सदी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन राजतंत्र की उस गुलामियों से हम अब तक आजाद नहीं हो पाए हैं। राजतंत्र में आम जनता पर शासन के लिए शासकों ने राजा में ईश्‍वरीय गुण और संप्रभुता होने का दावा किया और लोगों ने सहजता से उसे मान भी लिया। वहीं लोकतंत्र में एक सरकार बना दी गई, और शासन करने वालों ने मनमर्जी के कानून बनाकर फिर से जनता पर शासन करना शुरू कर दिया। 

दिखाई देने के लिए भले ही हमने ताकत के सूत्रों को बदल दिया है, लेकिन हकीकत देखी जाए तो हम आज भी वहीं हैं। बस शासन करने वाले लोगों के चेहरे बदल गए हैं। इसके लिए हम क्‍यों जिम्‍मेदार हैं, इसका कारण उन असक्षम लोगों में दिखाई देता है, जो काबिल न होते हुए भी काबिल लोगों का हक मारने का प्रयास कर रहे हैं। 

समाज के निर्माण भले ही सुरक्षा के लिए हुआ, लेकिन राज्‍य का विकास अतिरिक्‍त उत्‍पादन को हड़पने के‍ लिए ही हुआ। अब इस राज्‍य को जो भी चलाए, नतीजा वही होगा कि जो अतिरिक्‍त उत्‍पादन होगा, उसे हड़पने के लिए कुछ ताकतें लगातार काम करती रहेंगी। 

चुनावों के दौरान देखता हूं कि लोग अपने नेता का चुनाव कभी अपनी जाति के आधार पर कर रहे हैं तो कभी क्षेत्रीय प्रभुत्‍व के आधार पर। आज नेता बड़ी गाड़ी में बैठकर आता है और दुपहिया वाहन खरीदने तक की हैसियत नहीं रखने वाले लोगों को सपने दिखाकर उन्‍हें लूटने का षड़यंत्र शुरू करता है। हर बार इसका एक नया रूप होता है। पिछले सूत्र फेल होते हैं तो नए सूत्र गढ़ लिए जाते हैं। जनता लालच के भरोसे फिर नेता के पीछे पीछे हो लेती है। 

मैं सोचता हूं यह अनंत काल तक चलेगा, जब तक राज्‍य रहेगा, सत्‍ता रहेगी, संप्रभुता रहेगी, तब तक ऐसा ही चलेगा। सत्‍ता से ऐसी उम्‍मीद करना कि वह जनता के लिए काम करेगी एक मूर्खता है। जब हमने चुनाव ही ऐसे लोगों को किया है जो किसी समूह विशेष के स्‍वार्थ साधने का काम करेंगे तो ऐसे लोगों से सर्वजन हिताय की कैसे उम्‍मीद की जा सकती है।

शनिवार, 21 सितंबर 2013

एथिकल फिशिंग : ऑनलाइन कमाई का तरीका

मैं आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। 



एथिकल फिशिंग


यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं। 

इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया। 

अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें। 

अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। हर बार नया लेख कुछ नए लोगों को आप तक लेकर आता है। ऐसे में अगर आपके ब्‍लॉग पर ईमानदार कंटेंट पड़ा हो तो वह आपकी ओर सहजता से आकर्षित होता है। यह आकर्षण समय के साथ बढ़ा और लोगों के ज्‍योतिष संबंधी जिज्ञासाओं के सवाल सामने आने लगे। 


फांसना और कमाना... 


जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। पत्रकारिता की नौकरी के दौरान इतने पैसे मिलते रहे कि मैंने इस माध्‍यम से कमाने की नहीं सोची। हां, गूगल एडसेंस से कमाने का प्रयास किया, लेकिन यह पेसिव मोड था, सीधे लोगों से पैसे लेने का खयाल ही नहीं आया कभी। हालांकि कुछ लोग फीस ऑफर कर रहे थे, लेकिन मैं उदारतावश मना करता रहा। एक दिन पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है। लोग पहले भी ऐसे पांखडियों के पास जाते रहे हैं और आज भी इनका धंधा पूरी रवानी पर है। इस धंधे में कमाई का सबसे बड़ा जरिया डर है। आपको भविष्‍य के बारे में ऐसी सूचनाएं दी जाती हैं कि आपकी घिग्‍गी बंध जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि महंगे अस्‍पताल में ईलाज के लिए होने वाले खर्च से अधिक लोग ज्‍योतिषी द्वारा बताए गए उपचार में खर्च कर देते हैं। मैं इस चीज को समझता हूं। सो मैंने अपने लेखों के माध्‍यम से इस डर को खत्‍म करने का प्रयास किया। इसी प्रयास का परिणाम है कि आज कालसर्प जैसे योग को नकारना बहुत से ज्‍योतिषियों के लिए आसान हो गया है। 

जब एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है। 

यह बताते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं कि कई जातक ऐसे भी हैं जो वर्ष 2008 में मेरे नि:शुल्‍क विश्‍लेषण लेने वाले जातक थे, जो बाद में आग्रह करके फीस जमा कराने वाले जातक बने। अप्रेल 2011 में मैं इस क्षेत्र में जब प्रोफेशनली आया तो पहले ही खेप में 112 कुण्‍डलियां आई। मैं आल्‍हादित था। लोगों ने विश्‍वास दिला दिया था कि मैं सर्वाइव कर जाउंगा। आज तक उन लोगों से नियमित संपर्क में हूं। कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ अब भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया, विश्‍वास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली।


मैंने यह लेख वर्धा में हो रहे ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया और शायद हिंदी के आयाम को लेकर हो रही गोष्‍ठी के लिए लिखा था। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठीजी ने जिन लोगों को इसमें आमंत्रण के लिए याद किया, उनमें एक मेरा नाम भी था। भले ही मैं एकबारगी जाने के मूड में नहीं था, क्‍योंकि यह औचक था, सो मैंने एक वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर से इस बारे में बात की। उन्‍होंने कहा तुम्‍हें जरूर जाना चाहिए, ताकि तुम्‍हारा एक्‍सपोजर हो। ठीक है मैंने ऊपर दिया गया लेख लिखा और सिद्धार्थ शंकरजी को भेज दिया। उनका जवाब आया... 

मित्र,
आपने लिखा तो कमाल का है। बहुत उपयोगी बात है। लेकिन यह सेमिनार जिन मुद्दों को लेकर आयोजित है उनमें यह फिट नहीं बैठता। आप एक बार सेमिनार की रूपरेखा फिर से देख लीजिए। http://t.co/IEAqRZwZ6F निर्धारित विषयों में से एक चुनकर कुछ लिख डालिए। जल्दी करिए। समय बहुत कम बचा है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

मैंने लेख को सुधारा और कमोबेश उन्‍हीं बातों को रहने देकर ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया को जोड़ दिया... 

मैं  आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। इसमें एक छोर पर ब्‍लॉगिंग है तो दूसरे छोर पर फेसबुक। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। यहां ब्‍लॉगिंग ने मेरे विचारों को मेरे जातकों तक मेरी बात पहुंचाने का काम किया तो फेसबुक ने मेरे अस्तित्‍व की पुष्टि की। हां ट्विटर मेरी अधिक मदद नहीं कर पाया है।
एथिकल फिशिंग
यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं।
            इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया।
            अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें।
            अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। दूसरी तरफ ऑनलाइन माध्‍यम में जब कंसल्‍टेंसी देने वाला व्‍यक्ति आपके सामने नहीं है, तो ठगी की आशंकाएं भी जोर मारने लगती हैं। भले ही ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को पूरी दुनिया में फैला रही थी, लेकिन कहीं यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा था कि जो लेख जिस व्‍यक्ति के ब्‍लॉग पर पढ़ा जा रहा है, वह उसी का लेख है या कहीं से कॉपी पेस्‍ट किया गया मैटर है। ऐसे में ईमेल के जरिए संवाद हो सकता था। फोन की स्थिति पर पहुंचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। ऐसे में सोशल मीडिया और विशेषतौर पर कहें तो फेसबुक हमें जुड़ने के मौके दो प्रकार से देता है। पहला तो यह कि वह आपके, आपके परिवार के, आपके दोस्‍तों के बारे में जानकारी को साझा करता है। दूसरी ओर आपकी लोकेशन और अपेक्षाकृत अधिक तेजी से आ रहे विचार और टिप्‍पणियों को आपके नेटवर्क में जुड़े तकरीबन हर व्‍यक्ति के लिए सुलभ बना देता है। आप देखिए आपका न्‍यूजफीड लगातार आपके दोस्‍तों, जानकारों, रिश्‍तेदारों की हरकतों की जानकारी ही तो दे रहा है। ऐसे में एक ज्‍योतिषी क्‍या कर रहा है, इस बारे में भी इसी न्‍यूज फीड में जानकारी मिलती है। किसी भी घटना या विचार के प्रति उस ज्‍योतिषी का क्‍या नजरिया है, वह भी तुरंत ही पता चलता है। यहां फेक आईडी को बैठाकर काम कराना बहुत मुश्किल है।
भले ही आज कुछ सेलिब्रिटी अपने स्‍थान पर किसी दूसरे को बैठा दें, लेकिन इन घोस्‍ट आईडी के पास इतने अधिकार नहीं होते कि वे तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें। ऐसे में आपके जैनुइन होने पर ही यह संभावना बनती है कि आप तुरत फुरत प्रतिक्रियाएं दे सकें। एक तरफ ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को तेजी से लोगों तक पहुंचा रही है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया आपकी उपस्थिति, आपके अस्तित्‍व, आपके विचारों की पुष्टि कर रही है। अब लोग अपेक्षाकृत अधिक सहजता से आपके करीब आने लगते हैं।
            मैं इसमें एक और तथ्‍य जोड़ना चाहूंगा कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसका बड़ा कारण है कि सही तरीके से प्रवाहमय हिंदी लिखने के लिए आपको खुद ही हर बार लिखना होगा। फिशिंग की पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता। वहीं अग्रेंजी में लिखे जाने पर यह आशंका रहती है कि कहीं पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत कम हो जाती है।
फांसना और कमाना...
जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। मैंने पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है।
            मेरे ब्‍लॉग पर लेख पढ़ने के बाद जातक जब मुझे खोजता है तो मैं आसानी से फेसबुक पर मिल जाता हूं। एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई  के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है।
            हालांकि ब्‍लॉगिंग के जमाने में भी लोगों ने मुझे टेस्‍ट किया और बाद में मेरे क्‍लाइंट बने लेकिन फेसबुक के बाद कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ आज भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।        

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया। अपनी फेसबुक आईडी के माध्‍यम से अपनी पहचान की पुष्टि की, विशवास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली। 

इसके बाद मैं सम्‍मेलन स्‍थल तक पहुंचने के प्रयासों में लग गया। इससे पूर्व वे मुझे टिकट अपने स्‍तर पर ही बना लेने के लिए कह चुके थे। सो जाने से चार पांच दिन पूर्व जब मैं टिकट बनवा रहा था, तो उन्‍हें दोबारा फोन करके पूछा कि क्‍या वापसी के टिकट कन्‍फर्म कराने की जरूरत है। तो उन्‍होंने पूछा क्‍या आपके जाने का कार्यक्रम है क्‍या ? 

यह मेरे लिए नई जानकारी थी। उन्‍होंने बताया कि मेरा लेख रिजेक्‍ट कर दिया गया है। सो जिन लोगों को बुलाया जा रहा है, उन्‍हें यूनिवर्सिटी ने सीधे उनकी ईमेल आईडी पर पत्र भेज दिए हैं। मैंने पूछा क्‍या कारण रहा मेरे लेख को खारिज करने का, तो त्रिपाठीजी ने बताया कि विवि के कोई प्रोफेसर डांगी हैं, उनका यह मानना है कि 

जिस प्रकार का एक्‍सपोजर या कह दें उत्‍पाद प्रदर्शन मैं कर रहा हूं, हिंदी पट्टी अभी उसके लिए तैयार नहीं है... 
मैंने सोचा ओह। 
और कष्‍ट के लिए क्षमा मांगते हुए फोन काट दिया। 

...पता नहीं हिंदी पट्टी किसके लिए तैयार है?

जो भी हो रिजेक्‍शन बुरा लगता है, वह भी बिल्‍कुल गैरजिम्‍मेदाराना तरीके से। मुझे भी बुरा लग रहा है। मैंने सम्‍मेलन में जाने के लिए कोई प्राथमिक प्रयास नहीं किए। फिर नाम से मेल आने पर लेख लिखा, उस लेख को बिना किसी ठोस कारण के रिजेक्‍ट कर दिया गया,‍ जिसकी कोई पुख्‍ता सूचना भी नहीं दी गई। सम्‍मेलन ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया पर हो रहा है। मेरे ब्‍लॉग पर ढाई लाख पाठक आए हैं और सोशल मीडिया में भी दोस्‍तों की ठीक ठाक संख्‍या है। फिर क्‍या कारण है कि मैं त्‍यागने योग्‍य हो गया :( 

रविवार, 4 अगस्त 2013

इतना स्‍वार्थी बन जाएं कि परमार्थी हो जाएं

आपरो घी सौ कोस हालै


               यह मारवाड़ी की एक प्रसिद्ध कहावत है। यह कहावत घी बचाने या उसके इस्‍तेमाल के बारे में नहीं बल्कि सहायता देने और उसके वापस मिलने से संबंधित है। आध्‍यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सृष्टि का हर जीव और अजीव भी एक अदृश्‍य सूत्र से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। ऐसे में अगर आज मैं किसी को छटांक घी भी देता हूं तो वह आगे से आगे सूत्र में बढ़ता रहेगा और एक दिन वापस मुझे ही मिलेगा। यह सहायता का सुख है। 

               एक शोध के मुताबिक जब व्‍यक्ति तनाव में होता है तो दूसरों की सहायता करने में कम रुचि दिखाता है और स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न होने पर सहायता के लिए तत्‍पर नजर आता है। इसे बायस्‍टेंडर प्रभाव कहा जाता है। ऐसी अवस्‍था में इंसान दूसरों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को लेकर लापरवाह हो जाता है। अगर सजगता से सहायता करने की प्रवृत्ति को बचाए रखा जा सके, तो इससे तनाव से बचने में मदद भी मिलती है।

               जब हम किसी की सहायता करते हैं तो वास्‍तव में हम अपनी ही सहायता कर रहे होते हैं। चाहे वह भौतिक साधनों के रूप में हो या ज्ञान। जब भी कोई व्‍यक्ति आपसे कुछ मांगने आता है, तो सृष्टि के नैसर्गिक नियम के अनुसार प्रकृति ने मांगने वाले के रूप में उस व्‍यक्ति का और देने वाले के रूप में आपका चुनाव किया है। अब सहायता करनी है या नहीं करनी है, यह आपकी खुद की इच्‍छा पर निर्भर है। इच्‍छा की यही स्‍वतंत्रता हमें ईश्‍वर द्वारा स्‍थापित पूर्व नियतता से मुक्‍त करती है। एक कहावत के अनुसार आप दूसरों को जो कुछ देते हैं, वह वास्‍तव में आप बचा रहे हैं और जो कुछ आप अपने पास रखते हैं वह वास्‍तव में खो देते हैं। देने के साथ ही आपकी चेतना का विस्‍तार अपनी शरीर से बाहर निकलकर आपकी सहायता के विस्‍तार तक फैल जाता है। जब आप सहायता करने से इनकार कर देते हैं तो आपकी चेतना सिकुड़कर आप के भीतर ही कहीं कुंठित हो जाती है। ऐसे में सहायता करना आपको बढ़ाता है और इनकार करना आपको कुंठित करता है। प्रकृति ने आपकी मदद की है सहायता की इच्‍छा वाले व्‍यक्ति को आप तक पहुंचाने की। आखिर में सहायता करने के बाद यह अहंकार का भाव भी न रखिए कि सहायता आपने की है। बस आपका चुनाव किया गया कि आपके जरिए सहायता की जानी है और इसके बदले में भविष्‍य में आपको भी ऐसी या इससे बेहतर सहायता मिल सकेगी। 

               अगर तर्क की परिभाषा में देखें तो स्‍वार्थ की अति परमार्थ और परमार्थ की अति स्‍वार्थ है। इसे समझने के लिए हमें उदाहरण लेना होगा कि एक व्‍यक्ति चाहता है कि वह स्‍वर्गिक वातावरण में रहे। इसके लिए पहले वह अपने कमरे को दुरुस्‍त करेगा, यदि उसका स्‍वार्थ बढ़ता है तो अपने पूरे घर को संवारेगा, फिर अपनी गली में सुधार करेगा, फिर मोहल्‍ले, गांव, जिले और राज्‍य से होते हुए पूरे देश को सुधारने पर चिंतन करेगा। यदि यह स्‍वार्थ अपने चरम पर पहुंच जाएगा तो वह पूरी पृथ्‍वी पर ही स्‍वर्गिक वातावरण बनाने का प्रयास करेगा। ऐसे में आपका निजी स्‍वार्थ अति हो जाने पर परमार्थ में तब्‍दील हो जाएगा। इस कोण से देखें तो हम जब किसी दूसरे की सहायता कर उसे बेहतर स्थिति में ला रहे हैं तो वास्‍तव में अपने ही स्‍वार्थ के किसी कोण की पूर्ति कर रहे होते हैं। दूसरों की सहायता करने या सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले लोग आम लोगों की तुलना में अधिक स्‍वस्‍थ और सक्रिय रहते हैं। यहां दूसरों की चिंता की नहीं बल्कि दूसरों की सजग सहायता की बात हो रही है। 

               जरूरी नहीं कि सहायता हमेशा ऐसे रूप में हो कि आपको उसकी कीमत ही चुकानी पड़ रही हो। आपके घर में पड़ा कबाड़ हो सकता है आपके खुद के लिए किसी काम का न हो, लेकिन किसी दूसरे व्‍यक्ति के लिए यह उपयोगी सामान सिद्ध हो सकता है। अधिकांश लोग संग्रह की प्रवृत्ति के चलते न तो कबाड़ से छुटकारा पा पाते हैं और न ही उसका उपयोग कोई और कर पाता है। आध्‍यात्मिक स्‍तर पर आपके घर में या कह दें आपकी मिल्कियत के तहत आने वाला हर संसाधन आपकी चेतना के एक हिस्‍से पर काबिज होता है। एक ओर जहां आपके मन में अपने साधनों और वस्‍तुओं के प्रति अधिकार का भाव होता है, वहीं दायित्‍व का बोझ भी आपके उन्‍मुक्‍त मन को बोझिल बनाए रखता है। जब आप अपने पास पड़ी किसी ऐसी वस्‍तु को उस व्‍यक्ति के पास पहुंचाते हैं, जो वस्‍तु का बेहतर उपयोग कर सके, तो आप आपको मानसिक और शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाता है। आपकी चेतना का जो अंश वस्‍तु को लेकर बाधित हो चुका था, वह किसी और को देने के बाद मुक्‍त हो जाता है। आप इस बात से भी संतुष्‍ट रहते हैं कि अमुक व्‍यक्ति इसका सही इस्‍तेमाल करेगा। दूसरी ओर कबाड़ से पैदा हुई नकारात्‍मक ऊर्जा के दुष्‍प्रभाव से भी आप बच जाते हैं। 

               संसाधनों के साथ की जाने वाली सहायता के अलावा शारीरिक रूप से की गई सहायता के भी बहुत मायने हैं। जब आप देने के भाव में होते हैं तो स्‍वार्थ मुख्‍य धारा से हट जाता है। अब आप जो भी काम करते हैं, उसे पूरा मन लगाकर और बिना किसी प्रत्‍युत्‍तर की इच्‍छा के करते हैं। ऐसे में शारीरिक श्रम सामान्‍य श्रम न रहकर ईश्‍वर की आराधना में तब्‍दील हो जाता है। सिक्‍ख और सिंधी गुरुओं ने इंसान की इस नै‍सर्गिक प्रवृत्ति को समझा और गुरुद्वारों और झूलेलाल के मंदिरों में कारसेवकों की भूमिका को बढ़ावा दिया। आज हम ऐसे धार्मिक स्‍थल पर करोड़पति हो चुके व्‍यक्तियों को भी जूते पॉलिश करते और झूठे बर्तन धोते हुए देख सकते हैं। धार्मिक कार्य में उनकी यह शारीरिक सहायता श्रद्धालुओं को न केवल शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाती है, बल्कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में भी सुधार लाती है।

सोमवार, 1 जुलाई 2013

टूटता भारतीय आर्थिक सुरक्षा का कवच

आम भारतीय परिवार की धारणा यही है कि जैसे ही कुछ पैसे बचे सोने की छोटी मोटी रकम बनाकर रख ली जाए। एक ओर परिवार की महिलाएं प्रसन्‍न तो दूसरी ओर परिवार का आर्थिक आधार मजबूत होता रहे। पर, सोने पर आधारित यह आर्थिक सुरक्षा का कवच अब टूटने लगा है। आपके लॉकर में रखा सोना कल तक जहां दस लाख रुपए कीमत का था, आज महज सात लाख रुपए कीमत का रह गया है। इसमें रुपए का गिरना और सोने का टूटना दोनों जिम्‍मेदार हैं। कृषि आधारित हमारे देश का बड़ा तबका यानी करोड़ों परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं।

अर्थव्‍यवस्‍था का सामान्‍य नियम कहता है कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से नियंत्रित होने वाला सोना डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने पर महंगा होना चाहिए। वर्तमान घटनाक्रम पर गौर कीजिए, सोना और रुपया दोनों के दाम साथ-साथ नीचे गिर रहे हैं। यह स्थिति इस आशंका को जन्‍म देती है कि कहीं हम किसी अंतरराष्‍ट्रीय साजिश का शिकार तो नहीं हो रहे।
सोने की कीमतों में वर्ष 2006 के बाद से एक कृत्रिम तेजी का दौर शुरू हो गया था। सोने की कीमतें बढ़ती रहीं। इस वर्ष तो सोने ने वे भाव देखे जो पहले कभी नहीं थे। 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की कीमत पहुंचने पर लगा कि यह एक लाख रुपए तक जाएगा। स्‍थानीय निवेशकर्ताओं ने जमकर सोना खरीदा। आज वही सोना कुछ ही महीने के अंतराल में 25 हजार 500 रुपए के दाम पर आ टिका है। बाजार का अनुमान है कि सोना अभी और गिर सकता है। डॉलर महंगा होने के साथ सोना गिरना हमें दो तरह से नुकसान पहुंचा रहा है। पहले आई तेजी और अब इस कृत्रिम मंदी हमें षड़यंत्र की बू देती है। जैसा कि पूर्व में अमरीकी और यूरोपीय अर्थव्‍यवस्‍था को धक्‍का पहुंचाने के लिए चीन पूर्व में 19 रुपए प्रति बैरल वाले तेल को 147 रुपए प्रति बैरल तक ले गया था और पैट्रोल के बढ़े हुए भावों ने पश्चिमी अर्थतंत्र की कमर तोड़कर रख दी थी। कमोबेश ऐसा ही भारत के साथ भी हो सकता है। संसाधनों के विकास के बाद अब टैंक और तोपों से जमीनी युद्ध होने की आशंका कम हुई है, लेकिन क्‍या हम अर्थयुद्ध लड़ने में सक्षम हैं। अगर नहीं तो हमारा देश इस युद्ध में हारकर टूट भी सकता है। वह युद्ध की अवस्‍था से भी बड़ी भयानक त्रासदी सिद्ध हो सकती है।

पहले यह समझने की जरूरत है कि डॉलर के मुकाबले अगर रुपए का अवमूल्‍यन हो रहा है तो इसमें रूपया दोषी या डॉलर खुद मजबूत हो रहा है। इसके लिए हमें दूसरे देशों की मुद्राओं की तुलना में डॉलर की स्थिति को देखना होगा। चीनी युआन, जापानी येन और यूरोपीय यूरो की तुलना में डॉलर न तो मजबूत हुआ और न ही गिरा है। लेकिन भारतीय रुपया अपने स्‍तर से नीचे आ रहा है। यानी गलती हमारी ही है। हमारी अर्थव्‍यवस्‍था के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्‍वास टूटता जा रहा है। इस कारण देश में प्रत्‍यक्ष और परोक्ष विदेशी निवेश घटता जा रहा है। ऐसा आमतौर पर दो कारणों से होता है। पहला कारण है वर्तमान में चल रही योजनाएं और नीतियां विदेशी निवेशकों के अनुकूल न होना। आज केन्‍द्र सरकार किसी विदेशी कंपनी को यह भरोसा देती है कि यहां आइए और निवेश कीजिए, हम आपको उपयुक्‍त सुविधाएं देंगे, लेकिन कंपनी जब देश में आ जाती है, तो कहीं तृणमूल तो कहीं डीएमके, कहीं जनता दल तो कहीं भाजपा की सरकारें उस विदेशी कंपनी को पूर्व में तय की गई सुविधाएं और साधन मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं होती।

दूसरा बड़ा कारण है सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान। हर साल चुनावों का साल है। विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के संकेत इस तरह नहीं लगते कि जो पार्टी वर्तमान में सरकार चला रही है और नीतियां बना रही है, वह आगे भी जारी रहेगी। अगर सरकार बदलती है तो हो सकता है, नई सरकार पूर्व में बनी नीतियों और विदेशी कंपनियों से किए गए करार पर काम ही न करे। ऐसे में निवेश को खासा नुकसान हो सकता है। ऐसे में निवेशक केवल इंतजार ही कर सकते हैं।

इस बीच हमारी आर्थिक नीति भी अर्थव्‍यवस्‍था को खोखला करती जा रही है। बजाय कि देश में उत्‍पाद तैयार करने के, हम विश्‍व बाजार से तैयार माल खरीद रहे हैं। हालां‍कि हमारे वित्‍त मंत्री सोने को लक्ष्‍य कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में मोबाइल, टैब, लैपटॉप और कम्‍प्‍यूटर के जरिए हम खरबों रुपए की विदेशी मुद्रा चीन को सौंप रहे हैं और कुछ ही महीने में डंप हो जाने वाली तकनीक और प्‍लास्टिक खरीद रहे हैं। क्‍या कारण है कि हम अपने ही देश में इन गैजेट्स को नहीं बना पा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्‍तरप्रदेश सरकार ने स्‍कूली बच्‍चों को टैबलेट बांटे, क्‍या वे देश में बने हुए थे। अब राजस्‍थान सरकार ने पौने चार लाख बच्‍चों को टैबलेट खरीदने के लिए धन दिया है, क्‍या राजस्‍थान में एक भी यूनिट है जो टैब बना सके। हम क्‍यों चीन, जापान और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों को सस्‍ती तकनीक और प्‍लास्टि के पेटे रुपया दे रहे हैं।

कमजोर अर्थव्‍यवस्‍था रुपए को गिरा रही है। ठीक है रुपया गिरता है तो डॉलर के भाव मिलने वाला सोना महंगा होना चाहिए। लेकिन वह भी नहीं हो रहा है। क्‍योंकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार जानता है कि जब भी मंदी का दौर आता है तो भारतीय अपना निवेश सोने में करते हैं और खराब दिनों को आसानी से गुजार लेते हैं। अभी हाल ही में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर आई मंदी का असर भारत पर बहुत कम हुआ, बाकी दूसरे अधिकांश देश इसकी चपेट में आए। इसका बड़ा कारण भारतीयों की बचत करने की आदत रही। अब यही बचत अगर लॉकर में पड़ी पड़ी ही खत्‍म हो जाए, तो हमारा आर्थिक सुरक्षा कवच भी कुछ काम नहीं आएगा।

- सिद्धार्थ जोशी
वरिष्‍ठ उपसंपादक
नेशनल राजस्‍थान