रविवार, 16 मई 2010

सूनी-सूनी अक्षय तृतीया

आज मैं अपने अनुज आनन्‍द के साथ शहर की तंग गलियों के बीच घूम रहा था तो कुछ पुराने घर दिखाई दिए। अपने नानी के खाली पड़े घर के करीब से गुजरते हुए भी उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। पास ही एक घर में हम कुछ दिन किराए पर रहे थे, उसकी छत पर आज दूसरे लोग दिखाई दिए। परकोटे में शहर खाली पड़ा था। गलियों और मोहल्‍लों में छाया सूनापन जैसे दिल में उतर गया।

आज अक्षय तृतीया थी, सुबह चार बजे लोग छतों पर चढ़ गए और दिन ढलने पर नीचे उतरे। करीब पच्‍चीस साल तक मेरा भी यही क्रम रहा, लेकिन इस साल कब अक्षय तृतीया आ गई और गुजर गई पता ही नहीं चला। पंद्रह सौ पैतालीस विक्रम संवत में राव बीका ने बीकानेर शनिवार के दिन अक्षय तृतीया पर बीकानेर रियासत की नींव रखी थी। इसी दिन को लोग स्‍थापना दिवस के रूप में 523 साल बाद भी उसी जोश और उमंग के साथ मना रहे हैं।

जिन घरों के करीब से गुजरा था वहां की छतों की खूब यादें जेहन में उमड़ रही हैं। अक्षय तृतीया से पंद्रह दिन पहले से ही मेरे जैसे नौसिखिए पतंगबाजी करनी शुरू कर देते थे।

...बोई काट्या हे,

उडा रे उडा,

थारी नाकड़ ऊपर

घूम रयो, घूमाय रयो

उडा रे उडा....

सालों-साल छत पर चढ़े हुए कई अनुभवों से गुजरा। पहले सिर्फ पतंगबाजी करने के लिए छत पर चढ़ता था। बाद में आस-पड़ोस की सुंदर कन्‍याएं भी देखने लगा। उसके बाद ज्‍योतिष के अध्‍ययन के दौरान हवा का रुख देखता रहता था। तीन-चार साल तक उसी आधार पर खरी-खोटी भविष्‍यवाणियां भी की। कुछ सही रही तो कुछ सिरे से ही गलत हो गई। दोस्‍तों से लड़ाई और दुश्‍मनों से दोस्‍ती तक के काम छतों पर निपट जाते। कभी सी-28 या बरेली का सॉलिड मांझा हाथ लग जाता तो, अश्‍वमेघ यज्ञ शुरू हो जाता। हवा की दिशा की सारी पतंगे काटने तक चुपचाप पेच लड़ाते जाते और अंत में पूरी ताकत से चिल्‍लाते.. बोई काट्या हे...

इस साल ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीती रात ऑफिस में काम की अधिकता के चलते देर से घर पर आया, फिर देर तक सोता रहा, फिर गर्मी बढ़ गई। मौसम विभाग में लगे थर्मामीटर में पारा 45:5 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया। छतों पर इससे तीन डिग्री तक अधिक तापमान होता है। यानि 49 के करीब। ऐसी गर्मी पहले भी रहती थी, लेकिन महसूस नहीं होती थी, लेकिन आज तो छत पर चढ़ने की हिम्‍मत ही नहीं कर पाया। शाम को अकेला छत पर चढ़ा। दोस्‍त तो सारे बीकानेर छोड़ चुके हैं। भाई को शौक नहीं रहा। सो दो-तीन पतंगें उड़ाकर नीचे चला आया। अब पोस्‍ट लिख रहा हूं। मैं सोचता था, पतंग उड़ाने वाले खुद भी ऊंची उड़ाने भरते हैं, लेकिन आज लगा जैसे जमाना ठहर गया हो...

काश अगली आखातीत कुछ मस्‍त गुजरे...

रविवार, 2 मई 2010

और मैं बन गया इल्‍ली

मैं सच्‍ची मुच्‍ची इल्‍ली बन गया था। जब तक मुझे अपनी गलती का तब तक तो मैं पेस्टिसाइड से त्रस्‍त इल्‍ली की तरह तड़प रहा था। बहुत साल पहले शरद जोशी का व्‍यंग्‍य पढ़ा था, जीप में सवार इल्लियां, तब चने के खेत में घूम रहे सरकारी अधिकारियों पर कटाक्ष करते हुए शरद जोशी ने उन्‍हें फसल को तबाह करने वाली इल्लियों की संज्ञा दी थी। तब पढ़ते हुए मुझे सरकारी अधिकारियों से घृणा होने लगी थी, लेकिन बाद में मैंने भी वही गलती की...

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हुआ यूं कि, कुछ साल पहले हमारे एक वरिष्‍ठ साथी के अवकाश पर जाने के कारण मुझे यहां राष्‍ट्रीय शुष्‍क बागवानी संस्‍थान की रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी दी गई। मैंने सोचा शोध संस्‍थान है तो निश्‍चय ही शोध संबंधी अच्‍छी खबरें मिलेंगी। सो पहले दिन ही पूरे जोश से पहुंच गया और प्रधान वैज्ञानिक के कमरे में बैठकर काफी देर तक उनसे कभी यह कभी वह पूछता रहा। पता नहीं अधिकारी ने क्‍या समझा, उन्‍होंने बातों के बीच मुझे बताया कि हमने बेर की सैकड़ों किस्‍में विकसित की हैं। और इन दिनों उनमें से काफी में फल आए हुए हैं। चलिए मैं आपको दिखा देता हूं।

वैज्ञानिक महोदय मुझे लेकर पहुंच गए संस्‍थान के रिसर्च फील्‍ड में, जहां बेर की छोटी-बड़ी झाडि़यों पर लाल, पीले बेर लगे हुए थे। कुछ बिल्‍कुल बेर थे, तो कुछ नींबू जितने और कुछ छोटे सेव के आकार के भी थे। मैं उनके बारे में कुछ जानकारी लेता, उन्‍होंने झाड़ी के सबसे अच्‍छे बेर उतारकर मुझे दिए। मैंने मना कर दिया...

लेकिन उनका आग्रह चलता रहा, कुछ देर बाद ही बेर के स्‍वाद और क्‍वालिटी के बखान के साथ आग्रह प्रबल हो गया, मैंने बेर खाने शुरू कर दिए। करीब पंद्रह प्रजातियों के तीस से अधिक बेर खाने के बाद रिपोर्ट लेकर ऑफिस आ गया।

अभी स्‍टोरी बना ही रहा था कि पेट में दर्द शुरू हो गया। कुछ देर तक मैंने इग्‍नोर किया, लेकिन दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था। कुछ देर में तो ऐसी ऐंठन हुई कि सीधा भी बैठ नहीं पा रहा था। आखिर उठा और पास के मेडिकल स्‍टोर पर जाकर पेटदर्द की दवा ली। इसके बाद भी घंटेभर तक ऐंठन वाला दर्द बना रहा। रात आठ बजे तक मेरी स्थिति में कुछ सुधार हुआ।

अब सोचने का मौका मिल रहा था। कुछ देर सोचने के बाद मेरी हंसी छूट गई। हमारे वरिष्‍ठ साथी ने पूछा क्‍या हुआ तो मैंने कहा आज मैं इल्‍ली बन गया था। शरद जोशी की इल्लियां जीप में सवार होकर चने को खराब करने पहुंची थी, भले ही मैंने ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचाया लेकिन काम तो वैसा ही किया था।

आज ये किस्‍सा ध्‍यान में दोबारा इसलिए आया कि पिछले दिनों मुझे राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र की बीट सौंपी गई, पहली विजिट में ही वहां के पीआरओ ने मुझे कैमल मिल्‍क से बनी आइसक्रीम खिलाने का ऑफर दिया... इल्‍ली वाला किस्‍सा ध्‍यान में आते ही मैंने आइसक्रीम के लिए सख्‍ती से मना कर दिया...

वह पीआरओ अब भी सोच रहा है कि मैं केन्‍द्र से नाराज हूं जबकि मैं इल्‍ली बनने से बचने की कोशिश कर रहा हूं...

पता नहीं भलमानस में या आग्रह नहीं टाल पाने के कारण कितने लोग इल्‍ली बन जाते होंगे... क्‍या आप भी बने हैं कभी इल्‍ली... 

गुरुवार, 25 मार्च 2010

सर्वाधिक मूर्खताएं - माइक्रोपोस्‍ट

इंसान तीन जगहों पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है

बच्‍चे के साथ

शीशे के सामने

और प्रेमिका के साथ उसके सामने...