सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

किसे याद करूं... ?

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जिंदगी की रफ्तार अपने तरीके से बढ़ती जा रही है। जिन चीजों को पीछे छोड़ता चल रहा हूं, उससे कहीं अधिक तेजी से नई चीजें सामने आ रही हैं। ऐसे में बहुत कुछ छूट जाने के बावजूद उन्‍हें मिस करने का समय ही नहीं निकाल पा रहा हूं। दो दोस्‍त थे, दोनों गुम है। एक जियोग्राफिकल डिस्‍टेंस पर है तो दूसरा साइकोलॉजिकल। एक विषय था फिलासफी, दुनियादारी ने उसे छुड़ा दिया। एक काम था खबरें लेने का वह समय ने छुड़ा दिया। अब जिस रास्‍ते पर दौड़ रहा हूं, लग रहा है और भी बहुत कुछ है जो छूट जाएगा। ये छूटना और नया मिलना न तो दुख दे रहा है न खुशी। बस जैसे तरंग पर सवार हूं और किसी अनजाने रास्‍ते की ओर बढ़ रहा हूं।

एक दोस्‍त जो बहुत दूर रहता है। कुछ दिन पहले दोस्‍त को फोन किया। करीब एक साल बाद। उसने आश्‍चर्य किया कि मैंने कैसे फोन किया। मैंने साफ साफ कहा “कोई दोस्‍ती वाला कोटेशन पढ़ लिया था फेसबुक पर सो तुम्‍हारी याद आ गई।” वह हंस दिया। मैं उसे जानता हूं और वह मुझे। फिलहाल दोनों के पास समय नहीं है। हम दोनों ही सिक थर्टीज के शिकार हो रहे हैं। सत्‍तर साल की कुल जमा उम्र में से आधी जिंदगी कट चुकी है। बाकी बची जिंदगी को संवारने का यह आखिरी मौका लग रहा है। दिमाग की सुनो या दिल की, जो करना है अभी करना है। बाद के लिए कुछ भी नहीं है। कभी साथ बैठकर सोचा करते थे, अभी मस्‍ती करते हैं, फिर काम करेंगे और चालीस की उम्र में रिटायर होकर बैठ जाएंगे। इस गणित के हिसाब से अभी पांच साल और इंतजार है। मुझे डर है कहीं रिटायरमेंट की उम्र आगे न बढ़ जाए।

एक गुरुजी थे। खूब मारते थे। मन में हमेशा गांठ रही कि गुरुजी ने बिना बात मारा। उन दिनों वे प्राइवेट स्‍कूल में टीचर हुआ करते थे। उन्‍हें अपनी जिंदगी से कई तरह के फ्रस्‍ट्रेशन थे। पिछले दिनों पुराने शहर की एक गली से गुजरते हुए मिल गए। मैं अपनी धुन में था, वे अपनी। मुझे रोककर बात की और माफी मांगने के अंदाज में कहा कि अपनी कमजोर मानसिकता के दौर में मैंने तुम्‍हारी जबरन पिटाई कर गलत किया। देखें तो बहुत गंभीर बात थी, वे दिल की गहराइयों से बोल रहे थे। इस क्षण के लिए उन्‍होंने खुद को कितने लंबे समय तक तैयार किया होगा। मुझसे मिलने या मिलने के मौके का इंतजार किया होगा। उन्‍होंने बातचीत भी शुरू की लेकिन मैं अपने काम की धुन में था, आखिर उन्‍होंने बिना माहौल बने ही कह दिया, ताकि उनके जी का बोझ हल्‍का हो जाए। अब सरकारी शिक्षक बनने के बाद जिंदगी थमी हुई है। सो हर बात को सोचने और बार बार विचार करने के लिए समय है। उन्‍होंने सोचा और कह दिया, मेरी ग्राह्यता कम थी, पर संदेश पहुंच गया। मैंने उनकी बात को हल्‍के में लिया और बाइक स्‍टार्ट कर आगे रवाना हो गया। बाद में सोचा पर क्‍या फायदा?

कुछ लड़कियां हैं। प्‍यारी प्‍यारी सी। मेरे ही परिवार की। जब वे बिल्‍कुल नन्‍हीं नन्‍हीं सी थी, तब से मुझे देख रही है। बड़े परिवार की जब भी पार्टी होती तो वे मुझे जबरन हीरो बना देती। बाद में भी उनकी यही इच्‍छा रही कि पार्टी हो तो मैं हीरो की तरह एंट्री करूं और माहौल में जान डाल दूं। कुछ सालों तक यह स्थिति रही भी। बाद में व्‍यस्‍त हो गया। पिछले कुछ सालों में बड़ी पार्टियां हुई। उन बड़ी हो चुकी बालिकाओं को अब भी मुझसे उम्‍मीद थी, लेकिन मैं व्‍यस्‍त हो चुका था। जिंदगी की कई दूसरी उलझने पार्टी से बड़ी हो गई। सो भोज और परिवार के सदस्‍यों से मिल भर लेने के उद्देश्‍य से देरी से पहुंच पाया। कुछ घर लौट चुकी थी तो कुछ सो चुकी थी। जो जाग रही थी, उन्‍होंने उलाहना दिया कि आपका इंतजार किया, हम सब मौज करना चाहते थे, पर यहां कोई नहीं था। पूरी पार्टी थी और कोई नहीं था, यानी मैं नहीं था। मैं हंसकर टाल गया, लेकिन बाद में सोचा कि ओह! मैं ही नहीं था। पहुंचकर भी नहीं था।

सालों पहले डायरी लिखा करता था। उसमें यह भी लिखता कि आज किस किस से मिला। अपने विचार भी सहेजकर रखता था। इन सालों में कई बार विफल प्रयास किए, लेकिन दो या तीन दिन से अधिक डायरी भी नहीं लिख पाया। कुछ पन्‍ने अधूरे से अब भी बिखरे हुए दिख जाते हैं। हर बार नई डायरी होती है। पुरानी खाली डायरियों के अधलिखे पन्‍ने मिल भी जाते हैं तो उन्‍हें फाड़कर रख लेता हूं, कुछ दिन संभाले रखता हूं फिर कहीं उड़कर चले जाते हैं... पुरानी यादों की तरह...

कुछ दोस्‍त हैं, कुछ व्‍यवसायी है, कुछ हमसफर रहे हैं, तो कुछ अब भी पास पास चल रहे हैं, कुछ परिवार के सदस्‍य हैं, कुछ पुराने तो कुछ नए मोहल्‍ले के लोग हैं, कुछ कॉलेज के तो कुछ स्‍कूली दिनों के दोस्‍त हैं, जानकार हैं, मित्र हैं, कुछ भला बुरा चाहने वाले भी हैं। अब तो एक बार में याद भी नहीं आते...

 

जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही है, सोचने भर की फुरसत भी नसीब नहीं हो रही। किसे भूलूं किसे याद रखूं...

रविवार, 30 सितंबर 2012

ग्रेट स्पिनर का बर्बाद होना...

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यह कहानी एक ऐसे स्पिनर की है जिसके टैलेण्‍ट की भ्रूण हत्‍या हो गई। वास्‍तव में यह एक बचाव प्रक्रिया थी या हत्‍या इस बारे में मैं आज तीन दशक बाद भी कंफ्यूज हूं।
***      इस घटना का सही सही दिन मुझे याद नहीं है, लेकिन महज सात या आठ साल की उम्र में एक दिन बीकानेरी भीषण दोपहरी में जब लू बज रही थी, मैं गली में क्रिकेट खेलने में मशगूल था। मुझे बैटिंग करने में अधिक रुचि नहीं थी। बॉलिंग में भी मेरी च्‍वाइस स्पिन की थी। मैंने अपना ओवर पूरा किया और फील्डिंग के लिए नाली के पास जाकर खड़ा हो ही रहा था कि मेरी ममेरी बहिन ने आकर कहा कि बाऊजी बुला रहे हैं। बाऊजी यानी मेरे पड़नाना डॉ. माधोदासजी व्‍यास। मैं उनके पास पहुंचा तो वे कुछ पढ़ रहे थे। चमकती चांद के पीछे सफेद बालों की लट और मोटा चश्‍मा। उन्‍होंने बिना सिर उठाए मुझे पूछा कहां थे। मैंने कहा खेल रहा था। उन्‍होंने दोबारा पूछा क्‍या खेल रहे थे, मैंने जवाब दिया क्रिकेट खेल रहा था।

***      बाऊजी ने सिर को एक तरफ इस तरह झटका जैसे मैं महामूर्खता का काम कर रहा होउं। मैंने पूछा क्‍यों क्रिकेट खेलने में क्‍या समस्‍या है। वे बोले यह कोई खेल नहीं है। यह तो गुलाम देशों को अंग्रेजों का दिया गुलामी का प्रतीक है। हालांकि मैं जाति से जोशी हूं, लेकिन ननिहाल में रहता था, सो आस पास के लोग “जोशी राजा” कहते थे (प्‍यार से कुछ लोग अब भी कहते हैं)। अब एक राजा गुलामी को कैसे सहन कर सकता है। वह भी सात आठ साल का राजा। बात दिल में चुभ गई। मैं अड़ गया, बोला सिद्ध करो। बस यहीं चूक हो गई। हिन्‍दी विभाग के प्रोफेसर रहे डॉ. व्‍यास (बाऊजी) को इसी काम में सबसे ज्‍यादा मजा आता था। उन्‍होंने पूछा बताओ कौन कौनसे देश की टीमें क्रिकेट खेलती हैं। मैंने नाम गिनाए, और बाऊजी ने बताया कि कौनसा देश कब अंग्रेजों का गुलाम बना।

***       मैं भ्रमित हो रहा था कि किसी देश को गुलाम बनाने के बाद क्रिकेट जैसे खेल की छाप छोड़ने की क्‍या जरूरत है। तो बाऊजी ने बताया कि अंग्रेज ग्रेट ब्रिटेन से आए थे, वहां का मौसम अपेक्षाकृत ठण्‍डा है। अंग्रेजों ने दूसरे मुल्‍कों पर कब्‍जे करने शुरू किए तो वहां अपने आदमी भी रखने पड़े। गर्म देशों में ऐसे अंग्रेजों का समय बहुत मुश्किल से निकल पा रहा था। पैसे वसूल करने के बाद उन्‍हें कुछ काम तो करना पड़ता नहीं था, ऐसे में दिन बिताने के लिए उन्‍होंने बेहद धीमे खेल को शुरू किया। क्रिकेट मूल रूप से कई दिन तक चलने वाला खेल था। बाद में इसका एक दिवसीय प्रारूप भी लाया गया।

***       इस तरह मुझे समझ में आया कि अंग्रेजों के समय बिताने (टाइम पास) का खेल हमारे देश का सबसे पॉपुलर खेल बन चुका था। उस समय तक कपिल देव ने वर्ड कप भी जीत लिया था, ऐसे में क्रिकेट का फीवर अपने चरम पर था। बाऊजी ने बताया कि इस खेल में न तो किसी प्रकार का मानसिक विकास होता और न शारीरिक। उनका इशारा पारंपरिक कुश्‍ती और शतरंज की ओर था। उन्‍होंने बताया कि चीन, जापान, अमरीका, फ्रांस जैसे देश या तो आजाद रहे या उन्‍होंने अंग्रेजों की गुलामी को अपने जेहन पर हावी नहीं होने दिया। इसी का परिणाम है कि उन देशों में क्रिकेट की टीमें नहीं हैं। इसके बाद मेरे छोटे से दिमाग में चार पांच सवाल और आए, उनके जवाब भी बाऊजी ने उसी अंदाज में दिए। उसी दिन क्रिकेट से मेरा मन फट गया। अगले दिन टीमें बंट रही थी, तो मैंने साफ मना कर दिया। मैं बोला यह गुलामों का खेल है मैं नहीं खेलूंगा। मैं पहले भी ऐसी सनकी घोषणाएं करता रहा था, सो बिना बहस या मान मुन्‍नौवल के प्रेम से किनारे बैठा दिया गया।

***       इसके बाद मैंने कभी क्रिकेट तो नहीं खेला। इस घटना के करीब बारह साल बाद मैंने दोबारा खेलना शुरू किया। इस बार मैंने आजाद ख्‍याल देश के खेल बॉस्‍केटबॉल का चुनाव किया। हालांकि फिरकी मेरी फितरत रही है सो बॉस्‍केटबॉल को बोर्ड पर फिरकी की तरह घुमाकर काउंट करता था। हालांकि मेरी इस हरकत से कोच बहुत नाराज होते। बोलते जहां खेलने जाओगे वहां ऐसा बोर्ड नहीं मिला तो तुम्‍हारी फिरकी ही हार का कारण बन जाएगी। पर...   

***       यूनिवर्सिटी खेलने के लिए कॉलेज की टीम के साथ रवाना होने से पहले बाऊजी से मिलने गया। उन्‍हें बताया कि मैं खेल में हिस्‍सा लेने हनुमानगढ़ जा रहा हूं। उन्‍होंने पूछा क्‍या खेलते हो, तो मैंने बताया कि बॉस्‍केटबॉल खेलता हूं। उन्‍होंने बारह साल पुराने उसी अंदाज में सिर को झटका और कहा “यह क्‍या खेलते हो? यह तो हब्शियों का खेल है!”

 

मैंने सिर पकड़ लिया। मैं बागी हो चुका था, कहा इस खेल में तो कोई गुलामी की बदबू नहीं है। तो उन्‍होंने कहा कि यह हमारा खेल भी नहीं है। इस बार सावधान रहा। बहस को बढ़ाए बिना बातचीत के रुख को इधर उधर घुमाया और वहां से निकल आया। बाद में चार साल तक इस खेल को जी भरकर खेला। लेकिन आज भी सोचता हूं कि अगर बाऊजी की बात नहीं सुनता को अच्‍छा स्पिनर बन सकता था, अगर सुन ली तो वास्‍तव में एक गुलामों के खेल को अलविदा कहकर अच्‍छा किया?

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

विकल्‍प और छद्म विकल्‍प!!

बहुत बार लोगों को यह कहते हुए सुनता हूं कि मैंने फलां निर्णय लिया तो आज इस स्थिति में हूं। या फलां निर्णय लेता तो आज उस स्थिति में होता। दूसरी ओर यह भी कि ईश्‍वर को यही मंजूर था। हकीकत क्‍या है, निर्णय मैं लेता हूं या ईश्‍वर लेता है। यह एक पुराना और गंभीर सवाल है।
mmm पहली स्थिति पर गौर करते हैं जब मैं यह कहता हूं कि मैंने निर्णय लिया। इस स्थिति में मेरे पास निर्णय लेने के लिए विकल्‍पों की जरूरत होगी। एक सामान्‍य मध्‍यमवर्गीय परिवार में जन्‍म लेने के बाद मेरे पास तय विकल्‍प चुनाव की एक पूर्व निर्धारित शृंखला होने की संभावना बहुत अधिक होती है। अगर परिवार किसी व्‍यवसाय में लगा है तो मैं भी उसी व्‍यवसाय या वैसे ही किसी व्‍यवसाय के बारे में सोचूंगा और यदि परिवार के अधिकांश सदस्‍य नौकरीपेशा है तो मुझे जीवनयापन का वही सबसे सुरक्षित तरीका नजर आएगा। ऐसे में विकल्‍पों का सामना करने से बहुत पहले ही मेरी कंडीशनिंग हो चुकी होती है। यानी सोचने का तरीका पूर्व निर्धारित हो चुका होता है। किसी व्‍यक्ति विशेष की मानसिक कंडीशनिंग का कोई भी आधार हो सकता है। कई बार एक तो कई बार एक से अधिक आधार भी हो सकते हैं।
पारिवारिक मूल्‍यों के तौर पर
सामाजिक सम्‍बन्‍धों के जरिए
राजनैतिक परिदृश्‍य से उपजी
किसी बदले की भावना
प्रेम की अवस्‍था से
धार्मिक विश्‍वास के कारण
आर्थिक स्थिति से प्रभावित
अथवा किसी भी प्रकार की तीव्र अथवा नाजुक भावनाएं
mmm हम मान सकते हैं कि किसी भी घटना या परिस्थिति के प्रति व्‍यक्ति के विचार करने अथवा निर्णय करने का कोण विशिष्‍ट ही रहेगा। बहुत कम संभावना है कि कोई व्‍यक्ति घटनाओं का निरपेक्ष अथवा साक्षी भाव से विश्‍लेषण कर पाए। कई बार तो तर्क भी इतना अधिक हावी होता है कि व्‍यक्ति निर्णय करने में अतितार्किक होकर सटीक निर्णय से भटक जाता है। ये कारण हमें बताते हैं कि कभी भी किसी भी स्थिति में लिए गए निर्णय को सौ प्रतिशत सही करार नहीं दिया जा सकता। हां, यह जरूर है कि निर्णयों की शृंखला हमें एक विशेष रास्‍ते की ओर लेकर जाती है। कई बार निर्णयों का परिणाम पूर्व में तय होता है तो कई बार बाद में इसके परिणाम सामने आते हैं। जो भी स्थिति हो, एक बार निर्णय लेने के बाद आगे की स्थिति के लिए हमें तैयार रहना होता है। उदाहरण के तौर पर पहला तो इस लेख को लिखने का निर्णय और बाद में इसे प्रकाशित करने का निर्णय। इसके आगे की स्थितियों के बारे में मैं खुद तय नहीं कर सकता कि पाठकों की इसके प्रति क्‍या प्रतिक्रिया होगी अथवा कोई इसे पढ़ेगा भी कि नहीं।
mmm हमारे निर्णयों के साथ साथ प्रकृति के खुद के निर्णय भी होते हैं। वे बिल्‍कुल प्राकृतिक होते हैं। हम कोई भी कार्य करते हैं तो वह कार्य संपन्‍न होने के साथ एक केओस (याद्रच्छिक अव्‍यवस्‍था) पैदा करता है। मानवीय या पशुवत व्‍यवहारों के इतर प्रकृति सृष्टि के कार्यों में न्‍यूनतम केओस पैदा करने की प्रवृत्ति होती है। यानी प्रकृति जो कार्य करेगी, उस कार्य का संतुलन इस प्रकार होगा कि अव्‍यवस्‍था कम से कम पैदा हो। जिन कारणों से हम अधिक केओस पैदा कर रहे हैं, उन कारणों को समेटते हुए प्रकृति स्‍वाभाविक रूप से संतुलन को बनाए रखती है। ऐसे में निर्णयों का टकराव एक नई व्‍यवस्‍था पैदा करता है।
mmm जो लोग ईश्‍वर को मानते हैं उनके अनुसार दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह सभी ईश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार हो रहा है। ईश्‍वर ने सारी व्‍यवस्‍था पहले से निर्धारित कर रखी है। हम जो कुछ करते हैं, जिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, जिन लोगों से मिलते हैं, जिन लोगों से स्‍नेह होता है, जिन लोगों से वैर होता है, सबकुछ पूर्व निर्धारित है। मेरा लेख लिखना और आपका मेरे ब्‍लॉग तक पहुंचकर पढ़ना महज संयोग नहीं बल्कि पूर्व निर्धारित है।
mmm जो लोग इच्‍छा स्‍वातंत्र्य (freedom of will) को मानते हैं उनके अनुसार या तो कुछ भी पूर्व निर्धारित नहीं है, अथवा पूर्व निर्धारित होने के बावजूद मनुष्‍य अपनी इच्‍छा के अनुसार परिस्थितियों को बदल सकता है। जो लोग ईश्‍वरवाद को मानते हैं और साथ ही इच्‍छा स्‍वतंत्रता के भी हामी हैं, उन्‍हें यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि इच्‍छा कि कितनी स्‍वतंत्रता मिली हुई है। क्‍योंकि ईश्‍वर की बनाई सृष्टि जिसमें सबकुछ अगर पूर्व निर्धारित है तो सुई की नोक के बराबर का परिवर्तन भी कई युगों या शताब्दियों में बड़ा परिवर्तन पैदा कर सकता है। मसलन इच्‍छा स्‍वातंत्र्य को मानने वाला व्‍यक्ति किसी एक चूहे को मरने से बचा लेता है। वह चूहा किसी चुहिया के साथ मिलकर बाकी बचे जीवन में कई दर्जन बच्‍चे पैदा करता है। कई सौ सालों में पैदा होने और मरने के क्रम पूरे होने के बावजूद “ईश्‍वर की इच्‍छा के विपरीत” कई हजार या लाख चूहे अधिक मात्रा में बच जाएंगे, जो हर साल लाखों टन अनाज का सत्‍यानाश कर सकते हैं। नष्‍ट हुए अनाज का प्रभाव किसान, ट्रेडर, उपभोक्‍ता पर पड़ेगा। इस तरह पूरी व्‍यवस्‍था में प्रभावी बदलाव सिद्ध होगा। क्‍या ईश्‍वर अपनी व्‍यवस्‍था में इतना बड़ा छेद रहने देंगे?
mmm अब वापस आते हैं विकल्‍प की ओर, क्‍या हम विकल्‍प का चुनाव करने के लिए इतने आजाद हैं कि पूर्व निर्धारित व्‍यवस्‍था को ध्‍वंस करने जितने बड़े निर्णय कर सकें। यदि हां, तो प्रकृति की नैसर्गिक व्‍यवस्‍था कैसे बनी रहेगी। अगर हम विकल्‍प चुनने के लिए आजाद नहीं है तो क्‍या हम छद्म विकल्‍पों का चुनाव कर रहे हैं। mmm