शनिवार, 21 सितंबर 2013

एथिकल फिशिंग : ऑनलाइन कमाई का तरीका

मैं आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। 



एथिकल फिशिंग


यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं। 

इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया। 

अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें। 

अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। हर बार नया लेख कुछ नए लोगों को आप तक लेकर आता है। ऐसे में अगर आपके ब्‍लॉग पर ईमानदार कंटेंट पड़ा हो तो वह आपकी ओर सहजता से आकर्षित होता है। यह आकर्षण समय के साथ बढ़ा और लोगों के ज्‍योतिष संबंधी जिज्ञासाओं के सवाल सामने आने लगे। 


फांसना और कमाना... 


जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। पत्रकारिता की नौकरी के दौरान इतने पैसे मिलते रहे कि मैंने इस माध्‍यम से कमाने की नहीं सोची। हां, गूगल एडसेंस से कमाने का प्रयास किया, लेकिन यह पेसिव मोड था, सीधे लोगों से पैसे लेने का खयाल ही नहीं आया कभी। हालांकि कुछ लोग फीस ऑफर कर रहे थे, लेकिन मैं उदारतावश मना करता रहा। एक दिन पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है। लोग पहले भी ऐसे पांखडियों के पास जाते रहे हैं और आज भी इनका धंधा पूरी रवानी पर है। इस धंधे में कमाई का सबसे बड़ा जरिया डर है। आपको भविष्‍य के बारे में ऐसी सूचनाएं दी जाती हैं कि आपकी घिग्‍गी बंध जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि महंगे अस्‍पताल में ईलाज के लिए होने वाले खर्च से अधिक लोग ज्‍योतिषी द्वारा बताए गए उपचार में खर्च कर देते हैं। मैं इस चीज को समझता हूं। सो मैंने अपने लेखों के माध्‍यम से इस डर को खत्‍म करने का प्रयास किया। इसी प्रयास का परिणाम है कि आज कालसर्प जैसे योग को नकारना बहुत से ज्‍योतिषियों के लिए आसान हो गया है। 

जब एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है। 

यह बताते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं कि कई जातक ऐसे भी हैं जो वर्ष 2008 में मेरे नि:शुल्‍क विश्‍लेषण लेने वाले जातक थे, जो बाद में आग्रह करके फीस जमा कराने वाले जातक बने। अप्रेल 2011 में मैं इस क्षेत्र में जब प्रोफेशनली आया तो पहले ही खेप में 112 कुण्‍डलियां आई। मैं आल्‍हादित था। लोगों ने विश्‍वास दिला दिया था कि मैं सर्वाइव कर जाउंगा। आज तक उन लोगों से नियमित संपर्क में हूं। कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ अब भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया, विश्‍वास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली।


मैंने यह लेख वर्धा में हो रहे ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया और शायद हिंदी के आयाम को लेकर हो रही गोष्‍ठी के लिए लिखा था। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठीजी ने जिन लोगों को इसमें आमंत्रण के लिए याद किया, उनमें एक मेरा नाम भी था। भले ही मैं एकबारगी जाने के मूड में नहीं था, क्‍योंकि यह औचक था, सो मैंने एक वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर से इस बारे में बात की। उन्‍होंने कहा तुम्‍हें जरूर जाना चाहिए, ताकि तुम्‍हारा एक्‍सपोजर हो। ठीक है मैंने ऊपर दिया गया लेख लिखा और सिद्धार्थ शंकरजी को भेज दिया। उनका जवाब आया... 

मित्र,
आपने लिखा तो कमाल का है। बहुत उपयोगी बात है। लेकिन यह सेमिनार जिन मुद्दों को लेकर आयोजित है उनमें यह फिट नहीं बैठता। आप एक बार सेमिनार की रूपरेखा फिर से देख लीजिए। http://t.co/IEAqRZwZ6F निर्धारित विषयों में से एक चुनकर कुछ लिख डालिए। जल्दी करिए। समय बहुत कम बचा है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

मैंने लेख को सुधारा और कमोबेश उन्‍हीं बातों को रहने देकर ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया को जोड़ दिया... 

मैं  आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। इसमें एक छोर पर ब्‍लॉगिंग है तो दूसरे छोर पर फेसबुक। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। यहां ब्‍लॉगिंग ने मेरे विचारों को मेरे जातकों तक मेरी बात पहुंचाने का काम किया तो फेसबुक ने मेरे अस्तित्‍व की पुष्टि की। हां ट्विटर मेरी अधिक मदद नहीं कर पाया है।
एथिकल फिशिंग
यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं।
            इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया।
            अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें।
            अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। दूसरी तरफ ऑनलाइन माध्‍यम में जब कंसल्‍टेंसी देने वाला व्‍यक्ति आपके सामने नहीं है, तो ठगी की आशंकाएं भी जोर मारने लगती हैं। भले ही ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को पूरी दुनिया में फैला रही थी, लेकिन कहीं यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा था कि जो लेख जिस व्‍यक्ति के ब्‍लॉग पर पढ़ा जा रहा है, वह उसी का लेख है या कहीं से कॉपी पेस्‍ट किया गया मैटर है। ऐसे में ईमेल के जरिए संवाद हो सकता था। फोन की स्थिति पर पहुंचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। ऐसे में सोशल मीडिया और विशेषतौर पर कहें तो फेसबुक हमें जुड़ने के मौके दो प्रकार से देता है। पहला तो यह कि वह आपके, आपके परिवार के, आपके दोस्‍तों के बारे में जानकारी को साझा करता है। दूसरी ओर आपकी लोकेशन और अपेक्षाकृत अधिक तेजी से आ रहे विचार और टिप्‍पणियों को आपके नेटवर्क में जुड़े तकरीबन हर व्‍यक्ति के लिए सुलभ बना देता है। आप देखिए आपका न्‍यूजफीड लगातार आपके दोस्‍तों, जानकारों, रिश्‍तेदारों की हरकतों की जानकारी ही तो दे रहा है। ऐसे में एक ज्‍योतिषी क्‍या कर रहा है, इस बारे में भी इसी न्‍यूज फीड में जानकारी मिलती है। किसी भी घटना या विचार के प्रति उस ज्‍योतिषी का क्‍या नजरिया है, वह भी तुरंत ही पता चलता है। यहां फेक आईडी को बैठाकर काम कराना बहुत मुश्किल है।
भले ही आज कुछ सेलिब्रिटी अपने स्‍थान पर किसी दूसरे को बैठा दें, लेकिन इन घोस्‍ट आईडी के पास इतने अधिकार नहीं होते कि वे तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें। ऐसे में आपके जैनुइन होने पर ही यह संभावना बनती है कि आप तुरत फुरत प्रतिक्रियाएं दे सकें। एक तरफ ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को तेजी से लोगों तक पहुंचा रही है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया आपकी उपस्थिति, आपके अस्तित्‍व, आपके विचारों की पुष्टि कर रही है। अब लोग अपेक्षाकृत अधिक सहजता से आपके करीब आने लगते हैं।
            मैं इसमें एक और तथ्‍य जोड़ना चाहूंगा कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसका बड़ा कारण है कि सही तरीके से प्रवाहमय हिंदी लिखने के लिए आपको खुद ही हर बार लिखना होगा। फिशिंग की पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता। वहीं अग्रेंजी में लिखे जाने पर यह आशंका रहती है कि कहीं पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत कम हो जाती है।
फांसना और कमाना...
जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। मैंने पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है।
            मेरे ब्‍लॉग पर लेख पढ़ने के बाद जातक जब मुझे खोजता है तो मैं आसानी से फेसबुक पर मिल जाता हूं। एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई  के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है।
            हालांकि ब्‍लॉगिंग के जमाने में भी लोगों ने मुझे टेस्‍ट किया और बाद में मेरे क्‍लाइंट बने लेकिन फेसबुक के बाद कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ आज भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।        

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया। अपनी फेसबुक आईडी के माध्‍यम से अपनी पहचान की पुष्टि की, विशवास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली। 

इसके बाद मैं सम्‍मेलन स्‍थल तक पहुंचने के प्रयासों में लग गया। इससे पूर्व वे मुझे टिकट अपने स्‍तर पर ही बना लेने के लिए कह चुके थे। सो जाने से चार पांच दिन पूर्व जब मैं टिकट बनवा रहा था, तो उन्‍हें दोबारा फोन करके पूछा कि क्‍या वापसी के टिकट कन्‍फर्म कराने की जरूरत है। तो उन्‍होंने पूछा क्‍या आपके जाने का कार्यक्रम है क्‍या ? 

यह मेरे लिए नई जानकारी थी। उन्‍होंने बताया कि मेरा लेख रिजेक्‍ट कर दिया गया है। सो जिन लोगों को बुलाया जा रहा है, उन्‍हें यूनिवर्सिटी ने सीधे उनकी ईमेल आईडी पर पत्र भेज दिए हैं। मैंने पूछा क्‍या कारण रहा मेरे लेख को खारिज करने का, तो त्रिपाठीजी ने बताया कि विवि के कोई प्रोफेसर डांगी हैं, उनका यह मानना है कि 

जिस प्रकार का एक्‍सपोजर या कह दें उत्‍पाद प्रदर्शन मैं कर रहा हूं, हिंदी पट्टी अभी उसके लिए तैयार नहीं है... 
मैंने सोचा ओह। 
और कष्‍ट के लिए क्षमा मांगते हुए फोन काट दिया। 

...पता नहीं हिंदी पट्टी किसके लिए तैयार है?

जो भी हो रिजेक्‍शन बुरा लगता है, वह भी बिल्‍कुल गैरजिम्‍मेदाराना तरीके से। मुझे भी बुरा लग रहा है। मैंने सम्‍मेलन में जाने के लिए कोई प्राथमिक प्रयास नहीं किए। फिर नाम से मेल आने पर लेख लिखा, उस लेख को बिना किसी ठोस कारण के रिजेक्‍ट कर दिया गया,‍ जिसकी कोई पुख्‍ता सूचना भी नहीं दी गई। सम्‍मेलन ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया पर हो रहा है। मेरे ब्‍लॉग पर ढाई लाख पाठक आए हैं और सोशल मीडिया में भी दोस्‍तों की ठीक ठाक संख्‍या है। फिर क्‍या कारण है कि मैं त्‍यागने योग्‍य हो गया :( 

रविवार, 4 अगस्त 2013

इतना स्‍वार्थी बन जाएं कि परमार्थी हो जाएं

आपरो घी सौ कोस हालै


               यह मारवाड़ी की एक प्रसिद्ध कहावत है। यह कहावत घी बचाने या उसके इस्‍तेमाल के बारे में नहीं बल्कि सहायता देने और उसके वापस मिलने से संबंधित है। आध्‍यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सृष्टि का हर जीव और अजीव भी एक अदृश्‍य सूत्र से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। ऐसे में अगर आज मैं किसी को छटांक घी भी देता हूं तो वह आगे से आगे सूत्र में बढ़ता रहेगा और एक दिन वापस मुझे ही मिलेगा। यह सहायता का सुख है। 

               एक शोध के मुताबिक जब व्‍यक्ति तनाव में होता है तो दूसरों की सहायता करने में कम रुचि दिखाता है और स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न होने पर सहायता के लिए तत्‍पर नजर आता है। इसे बायस्‍टेंडर प्रभाव कहा जाता है। ऐसी अवस्‍था में इंसान दूसरों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को लेकर लापरवाह हो जाता है। अगर सजगता से सहायता करने की प्रवृत्ति को बचाए रखा जा सके, तो इससे तनाव से बचने में मदद भी मिलती है।

               जब हम किसी की सहायता करते हैं तो वास्‍तव में हम अपनी ही सहायता कर रहे होते हैं। चाहे वह भौतिक साधनों के रूप में हो या ज्ञान। जब भी कोई व्‍यक्ति आपसे कुछ मांगने आता है, तो सृष्टि के नैसर्गिक नियम के अनुसार प्रकृति ने मांगने वाले के रूप में उस व्‍यक्ति का और देने वाले के रूप में आपका चुनाव किया है। अब सहायता करनी है या नहीं करनी है, यह आपकी खुद की इच्‍छा पर निर्भर है। इच्‍छा की यही स्‍वतंत्रता हमें ईश्‍वर द्वारा स्‍थापित पूर्व नियतता से मुक्‍त करती है। एक कहावत के अनुसार आप दूसरों को जो कुछ देते हैं, वह वास्‍तव में आप बचा रहे हैं और जो कुछ आप अपने पास रखते हैं वह वास्‍तव में खो देते हैं। देने के साथ ही आपकी चेतना का विस्‍तार अपनी शरीर से बाहर निकलकर आपकी सहायता के विस्‍तार तक फैल जाता है। जब आप सहायता करने से इनकार कर देते हैं तो आपकी चेतना सिकुड़कर आप के भीतर ही कहीं कुंठित हो जाती है। ऐसे में सहायता करना आपको बढ़ाता है और इनकार करना आपको कुंठित करता है। प्रकृति ने आपकी मदद की है सहायता की इच्‍छा वाले व्‍यक्ति को आप तक पहुंचाने की। आखिर में सहायता करने के बाद यह अहंकार का भाव भी न रखिए कि सहायता आपने की है। बस आपका चुनाव किया गया कि आपके जरिए सहायता की जानी है और इसके बदले में भविष्‍य में आपको भी ऐसी या इससे बेहतर सहायता मिल सकेगी। 

               अगर तर्क की परिभाषा में देखें तो स्‍वार्थ की अति परमार्थ और परमार्थ की अति स्‍वार्थ है। इसे समझने के लिए हमें उदाहरण लेना होगा कि एक व्‍यक्ति चाहता है कि वह स्‍वर्गिक वातावरण में रहे। इसके लिए पहले वह अपने कमरे को दुरुस्‍त करेगा, यदि उसका स्‍वार्थ बढ़ता है तो अपने पूरे घर को संवारेगा, फिर अपनी गली में सुधार करेगा, फिर मोहल्‍ले, गांव, जिले और राज्‍य से होते हुए पूरे देश को सुधारने पर चिंतन करेगा। यदि यह स्‍वार्थ अपने चरम पर पहुंच जाएगा तो वह पूरी पृथ्‍वी पर ही स्‍वर्गिक वातावरण बनाने का प्रयास करेगा। ऐसे में आपका निजी स्‍वार्थ अति हो जाने पर परमार्थ में तब्‍दील हो जाएगा। इस कोण से देखें तो हम जब किसी दूसरे की सहायता कर उसे बेहतर स्थिति में ला रहे हैं तो वास्‍तव में अपने ही स्‍वार्थ के किसी कोण की पूर्ति कर रहे होते हैं। दूसरों की सहायता करने या सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले लोग आम लोगों की तुलना में अधिक स्‍वस्‍थ और सक्रिय रहते हैं। यहां दूसरों की चिंता की नहीं बल्कि दूसरों की सजग सहायता की बात हो रही है। 

               जरूरी नहीं कि सहायता हमेशा ऐसे रूप में हो कि आपको उसकी कीमत ही चुकानी पड़ रही हो। आपके घर में पड़ा कबाड़ हो सकता है आपके खुद के लिए किसी काम का न हो, लेकिन किसी दूसरे व्‍यक्ति के लिए यह उपयोगी सामान सिद्ध हो सकता है। अधिकांश लोग संग्रह की प्रवृत्ति के चलते न तो कबाड़ से छुटकारा पा पाते हैं और न ही उसका उपयोग कोई और कर पाता है। आध्‍यात्मिक स्‍तर पर आपके घर में या कह दें आपकी मिल्कियत के तहत आने वाला हर संसाधन आपकी चेतना के एक हिस्‍से पर काबिज होता है। एक ओर जहां आपके मन में अपने साधनों और वस्‍तुओं के प्रति अधिकार का भाव होता है, वहीं दायित्‍व का बोझ भी आपके उन्‍मुक्‍त मन को बोझिल बनाए रखता है। जब आप अपने पास पड़ी किसी ऐसी वस्‍तु को उस व्‍यक्ति के पास पहुंचाते हैं, जो वस्‍तु का बेहतर उपयोग कर सके, तो आप आपको मानसिक और शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाता है। आपकी चेतना का जो अंश वस्‍तु को लेकर बाधित हो चुका था, वह किसी और को देने के बाद मुक्‍त हो जाता है। आप इस बात से भी संतुष्‍ट रहते हैं कि अमुक व्‍यक्ति इसका सही इस्‍तेमाल करेगा। दूसरी ओर कबाड़ से पैदा हुई नकारात्‍मक ऊर्जा के दुष्‍प्रभाव से भी आप बच जाते हैं। 

               संसाधनों के साथ की जाने वाली सहायता के अलावा शारीरिक रूप से की गई सहायता के भी बहुत मायने हैं। जब आप देने के भाव में होते हैं तो स्‍वार्थ मुख्‍य धारा से हट जाता है। अब आप जो भी काम करते हैं, उसे पूरा मन लगाकर और बिना किसी प्रत्‍युत्‍तर की इच्‍छा के करते हैं। ऐसे में शारीरिक श्रम सामान्‍य श्रम न रहकर ईश्‍वर की आराधना में तब्‍दील हो जाता है। सिक्‍ख और सिंधी गुरुओं ने इंसान की इस नै‍सर्गिक प्रवृत्ति को समझा और गुरुद्वारों और झूलेलाल के मंदिरों में कारसेवकों की भूमिका को बढ़ावा दिया। आज हम ऐसे धार्मिक स्‍थल पर करोड़पति हो चुके व्‍यक्तियों को भी जूते पॉलिश करते और झूठे बर्तन धोते हुए देख सकते हैं। धार्मिक कार्य में उनकी यह शारीरिक सहायता श्रद्धालुओं को न केवल शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाती है, बल्कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में भी सुधार लाती है।

सोमवार, 1 जुलाई 2013

टूटता भारतीय आर्थिक सुरक्षा का कवच

आम भारतीय परिवार की धारणा यही है कि जैसे ही कुछ पैसे बचे सोने की छोटी मोटी रकम बनाकर रख ली जाए। एक ओर परिवार की महिलाएं प्रसन्‍न तो दूसरी ओर परिवार का आर्थिक आधार मजबूत होता रहे। पर, सोने पर आधारित यह आर्थिक सुरक्षा का कवच अब टूटने लगा है। आपके लॉकर में रखा सोना कल तक जहां दस लाख रुपए कीमत का था, आज महज सात लाख रुपए कीमत का रह गया है। इसमें रुपए का गिरना और सोने का टूटना दोनों जिम्‍मेदार हैं। कृषि आधारित हमारे देश का बड़ा तबका यानी करोड़ों परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं।

अर्थव्‍यवस्‍था का सामान्‍य नियम कहता है कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से नियंत्रित होने वाला सोना डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने पर महंगा होना चाहिए। वर्तमान घटनाक्रम पर गौर कीजिए, सोना और रुपया दोनों के दाम साथ-साथ नीचे गिर रहे हैं। यह स्थिति इस आशंका को जन्‍म देती है कि कहीं हम किसी अंतरराष्‍ट्रीय साजिश का शिकार तो नहीं हो रहे।
सोने की कीमतों में वर्ष 2006 के बाद से एक कृत्रिम तेजी का दौर शुरू हो गया था। सोने की कीमतें बढ़ती रहीं। इस वर्ष तो सोने ने वे भाव देखे जो पहले कभी नहीं थे। 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की कीमत पहुंचने पर लगा कि यह एक लाख रुपए तक जाएगा। स्‍थानीय निवेशकर्ताओं ने जमकर सोना खरीदा। आज वही सोना कुछ ही महीने के अंतराल में 25 हजार 500 रुपए के दाम पर आ टिका है। बाजार का अनुमान है कि सोना अभी और गिर सकता है। डॉलर महंगा होने के साथ सोना गिरना हमें दो तरह से नुकसान पहुंचा रहा है। पहले आई तेजी और अब इस कृत्रिम मंदी हमें षड़यंत्र की बू देती है। जैसा कि पूर्व में अमरीकी और यूरोपीय अर्थव्‍यवस्‍था को धक्‍का पहुंचाने के लिए चीन पूर्व में 19 रुपए प्रति बैरल वाले तेल को 147 रुपए प्रति बैरल तक ले गया था और पैट्रोल के बढ़े हुए भावों ने पश्चिमी अर्थतंत्र की कमर तोड़कर रख दी थी। कमोबेश ऐसा ही भारत के साथ भी हो सकता है। संसाधनों के विकास के बाद अब टैंक और तोपों से जमीनी युद्ध होने की आशंका कम हुई है, लेकिन क्‍या हम अर्थयुद्ध लड़ने में सक्षम हैं। अगर नहीं तो हमारा देश इस युद्ध में हारकर टूट भी सकता है। वह युद्ध की अवस्‍था से भी बड़ी भयानक त्रासदी सिद्ध हो सकती है।

पहले यह समझने की जरूरत है कि डॉलर के मुकाबले अगर रुपए का अवमूल्‍यन हो रहा है तो इसमें रूपया दोषी या डॉलर खुद मजबूत हो रहा है। इसके लिए हमें दूसरे देशों की मुद्राओं की तुलना में डॉलर की स्थिति को देखना होगा। चीनी युआन, जापानी येन और यूरोपीय यूरो की तुलना में डॉलर न तो मजबूत हुआ और न ही गिरा है। लेकिन भारतीय रुपया अपने स्‍तर से नीचे आ रहा है। यानी गलती हमारी ही है। हमारी अर्थव्‍यवस्‍था के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्‍वास टूटता जा रहा है। इस कारण देश में प्रत्‍यक्ष और परोक्ष विदेशी निवेश घटता जा रहा है। ऐसा आमतौर पर दो कारणों से होता है। पहला कारण है वर्तमान में चल रही योजनाएं और नीतियां विदेशी निवेशकों के अनुकूल न होना। आज केन्‍द्र सरकार किसी विदेशी कंपनी को यह भरोसा देती है कि यहां आइए और निवेश कीजिए, हम आपको उपयुक्‍त सुविधाएं देंगे, लेकिन कंपनी जब देश में आ जाती है, तो कहीं तृणमूल तो कहीं डीएमके, कहीं जनता दल तो कहीं भाजपा की सरकारें उस विदेशी कंपनी को पूर्व में तय की गई सुविधाएं और साधन मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं होती।

दूसरा बड़ा कारण है सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान। हर साल चुनावों का साल है। विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के संकेत इस तरह नहीं लगते कि जो पार्टी वर्तमान में सरकार चला रही है और नीतियां बना रही है, वह आगे भी जारी रहेगी। अगर सरकार बदलती है तो हो सकता है, नई सरकार पूर्व में बनी नीतियों और विदेशी कंपनियों से किए गए करार पर काम ही न करे। ऐसे में निवेश को खासा नुकसान हो सकता है। ऐसे में निवेशक केवल इंतजार ही कर सकते हैं।

इस बीच हमारी आर्थिक नीति भी अर्थव्‍यवस्‍था को खोखला करती जा रही है। बजाय कि देश में उत्‍पाद तैयार करने के, हम विश्‍व बाजार से तैयार माल खरीद रहे हैं। हालां‍कि हमारे वित्‍त मंत्री सोने को लक्ष्‍य कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में मोबाइल, टैब, लैपटॉप और कम्‍प्‍यूटर के जरिए हम खरबों रुपए की विदेशी मुद्रा चीन को सौंप रहे हैं और कुछ ही महीने में डंप हो जाने वाली तकनीक और प्‍लास्टिक खरीद रहे हैं। क्‍या कारण है कि हम अपने ही देश में इन गैजेट्स को नहीं बना पा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्‍तरप्रदेश सरकार ने स्‍कूली बच्‍चों को टैबलेट बांटे, क्‍या वे देश में बने हुए थे। अब राजस्‍थान सरकार ने पौने चार लाख बच्‍चों को टैबलेट खरीदने के लिए धन दिया है, क्‍या राजस्‍थान में एक भी यूनिट है जो टैब बना सके। हम क्‍यों चीन, जापान और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों को सस्‍ती तकनीक और प्‍लास्टि के पेटे रुपया दे रहे हैं।

कमजोर अर्थव्‍यवस्‍था रुपए को गिरा रही है। ठीक है रुपया गिरता है तो डॉलर के भाव मिलने वाला सोना महंगा होना चाहिए। लेकिन वह भी नहीं हो रहा है। क्‍योंकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार जानता है कि जब भी मंदी का दौर आता है तो भारतीय अपना निवेश सोने में करते हैं और खराब दिनों को आसानी से गुजार लेते हैं। अभी हाल ही में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर आई मंदी का असर भारत पर बहुत कम हुआ, बाकी दूसरे अधिकांश देश इसकी चपेट में आए। इसका बड़ा कारण भारतीयों की बचत करने की आदत रही। अब यही बचत अगर लॉकर में पड़ी पड़ी ही खत्‍म हो जाए, तो हमारा आर्थिक सुरक्षा कवच भी कुछ काम नहीं आएगा।

- सिद्धार्थ जोशी
वरिष्‍ठ उपसंपादक
नेशनल राजस्‍थान