सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

लौटने लगे प्रवासी


जोधपुर के पास फलोदी तहसील में खीचन गाँव में हर साल हजारों प्रवासी कुरजां आते हैं. टूरिस्ट इन प्रवासियों को देखतें हैं और यहाँ के बच्चे टूरिस्टों को

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रिंग रिंग रिंगा.. भाग एक

शुरू से आखिर तक जमाल के पास उम्‍मीद बांधने का कोई आधार नहीं होता। धोबीघाट से झुग्‍गी झोंपडि़यों और सड़कों से ट्रेन की पटरियों तक होता है तो बस संघर्ष खुद को जिंदा बनाए रखने का। भाई सलीम फिर भी सोचता है कि उसे पैसा कमाना है लेकिन जमाल बस जुनून होता है। 
हर काम, हर शब्‍द, हर क्षण, हर बात में जुनून। अब इस अंदर की आग को कैसे पेश किया जाए। भावनाओं का तूफान तैयार कर दिया गया है। किसकी जटाएं इस सैलाब को समेट सकती हैं। तो गढ़ दी गई लतिका। अब समझ में आता है कि क्‍यों इस छोरे के दिल में इतनी आग है। फिल्‍म जिजिविषा से हटकर आ जाती है प्रेम के तीव्र भाव पर। निर्देशक की मजबूरी है। अधिसंख्‍य समुदाय इसी लॉजिक को समझेगा कि लगातार कठिन होती जिंदगी में ऐसा कौनसा दीपक था जो बर्फीले पानी में छोरे को खड़े रहने का साहस दे गया। क्‍या लतिका के प्‍यार में ऐसा कुछ था। 

नहीं मुझे नहीं लगता। 

रिंग रिंग रिंगा... 
रिंग रिंग रिंगा्... 
रिंग रिंग रिंगा... 


नहीं ऐसा नहीं हो सकता। 

ठीक है एक उदाहरण है अभी मेरे पास। शायद कभी ओशो ने सुनाया होगा अपने शिष्‍यों को। वे कहते हैं जब बुद्ध घर से निकले और बीमार, कमजोर और मृत को देख चुके थे तो वे उतनी दुनिया देख चुके थे जितनी कि एक आम पश्चिमी व्‍यक्ति देखता है। फिर बुद्ध ने देखा एक साधू को। बस यहीं अंतर आ गया। इसी दुनिया में रहते हुए दुनिया से निवृत्त रहकर साधना करता है और एक दिन परम पिता में एकाकार होने के लिए चल देता है। पहले सशरीर उसके साथ होता है बाद में शरीर भी छोड़ देता है। 

जमाल सामान्‍य बच्‍चा है। अपनी जिंदगी जी रहा है। पिता का पता नहीं एक दिन मां भी मर जाती है। अब कहां जाए। जहां जिंदा रहा जा सके। भीख मंगवाने वाले से दूर रहना भी जरूरी है। मूर्ख विदेशियों ने गाइड समझ लिया तो अच्‍छा है। इसी से कुछ पैसा कमा लेंगे। हमें कौनसी जमीन खरीदनी है। बस जिंदा रहना है। भाई छोड दे, यार दोस्‍त अलग हो जाए तो भी जिंदगी चलती रहती है। उसी दम पर तेजी से आगे बढ़ती है। कॉल सेंटर का चायवाला कॉल सेंटर के कई एक्‍जीक्‍युटिव्‍स से अधिक जानता है। आग है और लगातार जल रही है। अब एक दिन हू वांट्स टू बी मिलेनियर में पहुंच जाता है। जिंदगी के तीखे उतार चढ़ावों के साथ सवालों का उतार चढ़ाव तारतम्‍यता बैठा लेता है। अब जमाल, जिन्‍दगी और सवाल एक हो जाते हैं। पूछने वाले को अंदाज नहीं है कि सामने जो चायवाला बैठा है उसके पीछे कितनी कहानियां हैं। 

बस एक ही मलाल --- ये राम और अल्‍लाह नहीं होते तो आज जमाल की मां जिन्‍दा होती। 

रिंग रिंग रिंगा... 

मंदी की मार झेल रही दुनिया में झुग्‍गी से बाहर आए भारत की आंखें चमक से भरी हुई है और एक नियंत्रक पूरे जोश के साथ जमाल का स्‍वागत कर रहा है आइए खेलते हैं जमाल ए चायवाल के साथ कौन बनेगा करोड़पति। 

रिंग रिंग रिंगा... 


ये अनिल कपूर और ओबामा की शकल मिलती जुलती है क्‍या... 


रिंग रिंग रिंगा... 

बस एक सेकेण्‍ड के लिए और पकाउंगा-- जिन लोगों ने ओबामा की विजय के बारे में इस ब्‍लॉग पर पढ़ा है तो पिंकी की विजय  के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। विजय का दौर फिर से शुरू हो रहा है। 

रविवार, 25 जनवरी 2009

डर का ठोस कारण

पहली बार ऐसी हॉरर मूवी देखी है जिसमें डर का एक ठोस कारण है। डर पैदा करने वाले का भी और जो लोग डरे हुए हैं उनका भी। फिल्‍म खत्‍म होने के साथ ही डर भी खत्‍म हो गया और हॉल से निकलते वक्‍त दिल और दिमाग दोनों हल्‍के थे।
भारतीय फिल्‍म परम्‍परा में प्रेम और बदला प्रमुख हैं। राज द मिस्‍ट्री कन्‍टीन्‍यूज में पहले तो यही कंफ्यूजन है कि हीरो कौन है। अपने दिमाग के अनुसार तो वही हीरो होता है जिसके पास हीरोइन होती है (नशा पैदा करने वाली नहीं नशे में रहने वाली) और जो हीरोइन और हीरो के मिलने का विरोध करता है वह विलेन होता है। इस मूवी में तो सब गढमढ है। हीरोइन फिल्‍म के शुरू में किसी और के सामने नाचती है और इंटरवेल तक किसी और के साथ गंभीर हो जाती है और अंत में अकेली बैठी नजर आती है।
अब प्रेम का पक्ष तो खत्‍म बचा बदला। हीरो अपने बाप का बदला नहीं लेता बल्कि जिस लक्ष्‍य को लेकर उसका बाप मरा है उस लक्ष्य को पूरा करने की बस गरज होती है। अंत में हीरो के बाप को खुद ही विलेन को मारना पड़ता है।
जो भी हो फिल्‍म में पर्यावरण के प्रति दिखाई गई चिंता और डर पैदा होने का ठोस कारण इसे विशिष्‍ट बना देते हैं। कहानी इतनी दमदार है कि अन्‍य पक्षों की कमजोरी का पता ही नहीं चलता। दर्शक दम साधे कहानी के साथ आगे बढता रहता है। आखिर में जब सबकुछ खुलकर सामने आ जाता है तो तीन घण्‍टे के दौरान पैदा हुआ स्‍ट्रेस भी खत्‍म हो जाता है।
अंत में मेरी सलाह यही है कि फिल्‍म देखनी चाहिए। और हां फिल्‍म में जग्‍गू दादा का अहम रोल है।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

भारतीय सुंदरियों और ओबामा की विजय

बाजार का दबाव किस तरह सत्‍ता को बदल देता है इसका दूसरा उदाहरण मैंने अपनी जिंदगी में देखा है। पहला उदाहरण था भारतीय सुंदरियों का विश्‍व विजयी होना। भारत की उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के ठीक बाद यह घटना हुई। यानि अचानक भारतीय सुंदरियां इतनी सुंदर और समझदार हो गई कि उन्‍होंने गोरी चमड़ी और उनके दीर्घकालीन प्रशिक्षणों तक को धता बजाते हुए विश्‍व की दो सबसे बड़ी स्‍पद्धाओं में ब्रह्माण्‍ड सुंदरी और विश्‍व सुंदरी के खिताब हासिल कर लिए। इसके बाद तो भारत की हर सुंदरी विश्‍व विजय का ख्‍वाब देखने लगी। सभी को पता था कि चेहरे का अधिक महत्‍व नहीं है। सुंदर होने के लिए कुछ कैमिकल्‍स और कुछ प्रशिक्षण की जरूरत है बस। देसी कंपनियों के पास वह कैमिकल नहीं था और विदेशी कंपनियों के लिए विश्‍व स्‍तर की भारतीय सुंदरियों वकालत की। चाहे एड में ही सही। लेकिन असर हुआ और गा‍रनियर से लेकर लोरियाल तक की कंपनियों ने बढ़ते बाजार में जमकर माल बेचा। माल इतना अधिक बिका कि फेयर एण्‍ड लवली को तो अपनी विज्ञापनो में यहां तक लिखना पड़ा कि केरल और तमिलनाडू की सुंदरियों को यह क्रीम गोरा नहीं बना पाएगी।
मुझे यही स्थिति ओबामा की विजय की लगती है। रेड इंडियन्‍स को खदेड़ने के बाद क्‍या आज तक एक भी ऐसा काला आदमी नहीं आया जो इतना बुद्धिमान हो कि वह अमरीकी शासन का नेतृत्‍व कर सके। नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता। आज तक ओबामा से कहीं अधिक बुद्धिमान और श्रेष्‍ठ काले लोगों ने अमेरिका के लिए बहुत कुछ किया होगा और इस देश को आगे बढ़ाने के प्रयासों में कहीं कसर नहीं रखी होगी। अब ऐसा क्‍या हो गया जो ओबामा को शीर्ष पर बिठाना पड़ गया। क्‍या तीसरी दुनिया के देशों से संवाद का यही एक रास्‍ता बचा था, क्‍या मंदी से टूटते अमरीका को किसी काले की जरूरत थी, क्‍या आम आदमी की राष्‍ट्रभक्ति पाने के लिए काले को लाया गया है, यह काला कितने प्रतिशत काला है, किन कालों का नेतृत्‍व करता है। ये सब बातें आपस में गढ़मढ़ होती है और भारतीय होने के नाते चुप रहने की कोशिश करता हूं। क्‍योंकि आखिर ओबामा ने दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक भारत को चुना और पाकिस्‍तान को चेतावनी दी। फिर भी क्‍यों मुझे लगता है वर्णभेद, इस्‍लामी आतंकवाद और बाजार के दबाव ने ओबामा का भाग्‍य पहले ही तय कर दिया था। अब इंसान के रूप में खड़ा यह व्‍यक्ति तो निमित्त मात्र है।

सोमवार, 5 जनवरी 2009

सरजमीने हिन्‍द की औरतों...

आज मैं कह सकता हूं, सरजमीने हिंद की औरतों, तुम्हें सलाम।
ऐसा क्यों । इसका एक मोटा कारण है।

रविवार को मैं जयपुर में था। मौका था राजस्थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्कारों का। बैस्ट कवरेज कैटेगरी में मेरी टीम को राष्ट्रीय स्‍तर पर तीसरा पुरस्कार मिला था। पुरस्कार लेने के बाद हमें अतिरिक्त पुरस्कार के रूप में मिला स्वामीनाथन गुरूमूर्ति का भाषण। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय इकॉनोमी पर स्वामीनाथन के भाषण ने जैसे हमारी (मेरी) आंखें खोल दी।

उन्होंने फैमिली सिस्टम के आधार पर अमरीकी उपभोक्तावाद और बचत के प्रारूप को विस्तार से बताया। आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि अमरीका का इकॉनोमिक डाउनफॉल 80 के दशक में ही शुरू हो चुका था। इसके बाद का काल तो ऐसा था कि अमरीकी लोगों के लिए खर्च करने के लिए जेब भरी होने की जरूरत ही नहीं थी। यानि उधार लो और खर्च कर दो। अब अमरीकी लोगों ने बाजार से पैसा लिया और घूमने फिरने जैसे उपभोग में उसे खर्च कर दिया। चूंकि उनका पैसा और पैसा पैदा नहीं कर रहा था इसलिए रीपेमेंट की स्थितियां बाकी नहीं बची। ऐसे में अमरीकी उपभोक्‍तावाद पूरी तरह उधार लो और खर्च कर दो पर आ गया। अमरीका को सुपर पावर मानने वाले देश उसे ही ऋण देकर पैसे वाला बना रहे थे। आने वाले पैसे का उपभोग अमरीकी करते रहे। एक दिन बिना बचत वाला यह गुब्‍बारा फूट गया।

कुल मिलाकर समझा जाए तो किसी भी देश की अर्थव्‍यवस्‍था आम आदमी की बचत पर निर्भर करती है। और इसी आम आदमी द्वारा खर्च को बढ़ावा दिए जाने पर अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। जिन देशों को अधिक उपभोक्ताओं की जरूरत थी उन्होंने टारगेटेड देश की औरतों को इस प्रकार शिक्षित किया कि वे औरतें घोंसला संभालने वाली चिडि़या की बजाय आदमी का ही दूसरा रूप बन गई और जमकर खरीदारी और निवेश करने लगीं। ऐसे देश तेजी से उपभोक्ता वादी संस्‍कृति के‍ शिकार हुए। इसके विपरीत जापान में न तो पुरुषों में ना ही स्त्रियों में बचत को निकालकर निवेश या खर्च की प्रवृत्ति है। इस कारण बाजार को गति देने के प्रयास के मद्देनजर जब जापान में बचत पर ब्याज को कम किया गया उसके बावजूद वहां बचत की प्रवृत्ति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अब बात करते हैं भारत की

भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो दशक हो रहे हैं। इस दौरान ब्याज की दरों में कमी, शेयर बाजार की तेजी, निवेश के आसान रास्ते और खर्च प्रोत्सातहित करने के लिए अनगिनत स्कीमें लोगों के सामने पेश की गई। इतना सबकुछ होने के बाद जहां भारतीय पुरुष आम पुरुषों की तरह खर्च और निवेश पर ध्यान देने लगे, वहीं भारतीय स्त्रियां अब भी जरूरत की चीजों में ही खर्च कर रही हैं। यानि एक स्‍त्री जब कोई चीज खरीदती है तो उसका मूल कारण यही होता है कि क्‍या इस उत्‍पाद की अभी घर में जरूरत है। इस वजह से जहां कुल जीडीपी का महज दो प्रतिशत शेयर बाजार में है वहीं बचत का प्रतिशत आज भी बहुत ऊँचा बना हुआ है। यह भारतीय स्त्रियों के कारण ही हो सका। धन्य है मेरे देश की स्त्रियां जिनके कारण वैश्विक मंदी के बावजूद आम भारतीय परिवार मंदी की मार से बचा हुआ है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो बिना शोर शराबे और बिना क्रांति का गीत गाए पारम्परिक भारतीय औरत ने बिना पुरुषों को गाली निकाले देश को बचा लिया। सही कहूं तो वे अपने योगदान से अंजान अब भी समाज और अर्थव्यंवस्था की धुरी बनी हुई हैं।

इस लेख में स्‍वामीनाथन गुरूमूर्ति से सुने गए शब्द और कुछ मेरे विचारों का घालेमल हो गया है। उम्मीद है लोग पसंद करेंगे।