मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

फलवर्द्धिका यानि फलौदी यानि फल का बढ़ना

बताया जाता है कि जोधपुर के राठौड़ परिवार से संबंध रखने वाली मां लटियाल यानि उष्‍ट्रवाहिनी माता ने जोधपुर छोड़ दिया और एक अनजाने गंतव्‍य की ओर निकल पड़ी। एक स्‍थान पर आकर खेजड़ी के एक वृक्ष में उनका ऊंट गाड़ी फंस गई। ऐसा फंसी कि बहुत कोशिश करने के बाद भी निकल नहीं पाई। तो पुष्‍करणा ब्राह्मण समुदाय की इस कुलदेवी ने कहा कि इस स्‍थान पर जो व्‍यक्ति साधना करेगा उसके फल में वृद्धि होगी। इस घटना के बाद स्‍थान का नाम पड़ा फलवर्द्धिका। बाद में इसी नाम का अपभ्रंश बना फलौदी। 

फलौदी तहसील के पास खींचन के तीन पानी के छोटे-छोटे स्रोत हैं। जहां साइबेरिया, मंगोलिया और मध्‍य यूरोप से हर साल हजारों की तादाद में प्रवासी कुरजां पक्षी आते हैं। इस पक्षी का जूलोजिकल नाम शीघ्र ही पता लगाकर बताउंगा। खींचन के आस-पासा के करीब पैंतालीस किलोमीटर क्षेत्र में यह पक्षी बिखरे हुए हैं लेकिन सुबह साढ़े छह से साढ़े सात बजे के बीच ये सभी पक्षी खींचन में एकत्रित हो जाते हैं। इसका एक ही कारण है, वह है भोजन। यहां बने एक चुग्‍गाघर में करीब आठ क्विंटल दाना हर रात डाला जाता है। जिसे खाने के लिए कुरजां यहां एकत्र होते हैं। सुबह होते ही चुग्‍गाघर के आस-पास के धोरों पर कुरजां का जमाव शुरू हो जाता है। कुछ देर धोरों पर शौचादि से निवृत होने के बाद कुरजां चुग्‍गाघर का रुख करते हैं पैदल। यानि मॉर्निंग वॉक भी हो गया। इसके बाद कुरजां एक साथ चुग्‍गाघर के चारों ओर तीन चक्‍कर लगाते हैं। दिसम्‍बर में इनकी संख्‍या सर्वाधिक होती है। रविवार की सुबह जब मैं वहां था तो बताया जा रहा था कि अब तो केवल आठ हजार कुरजां ही यहां बचे हैं, शेष अपने वतन को लौट चुके हैं। हम चुग्‍गाघर के बिल्‍कुल सटी हुई बिल्डिंग में डटे हुए थे। तो करीब आठ हजार कुरजां हमारे सिर के ऊपर से तीन चक्‍कर निकाले। कर-कर की आवाज के साथ हजारों पक्षियों के समूह ने हमें नि:शब्‍द कर दिया। हम बस आंखे फैलाए अपने छोटे बडे़ कैमरों से उनकी तस्‍वीरें निकाल रहे थे। ठण्‍ड से हाथ जमे जा रहे थे लेकिन बटन दबाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। जैसे ही सूर्य उदय हुआ मानो काले और सफेद रंग के कुरजां एकदम से सुनहरे रंग में तब्‍दील हो गए।
कुरजां के कुछ और फोटोग्राफ के साथ .... 

यह मेरे द्वारा खींचा गया सबसे अच्‍छा फोटो कहा जा सकता है। शनिवार शाम जब सूर्य अस्‍त हो रहा था तो तालाब, मंदिर, सूर्य और कुरजां को एक साथ कैमरे में कैद करने में सफल हो पाया था। वैसे हमारे साथ पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्‍ता भी थे। उनके खीचें चित्रों के सामने यह मजाक लगता है। उन्‍होंने डूबते सूर्य के बीच में से गुजरते कुरजां को कैद किया। उन्‍होंने अपने फोटो दिखाए तो मैंने अपना कैमरा पीछे छिपा लिया था। :)
यह दृ श्‍य बहुत अधिक बयां करता है। मैं केवल संकेत देना चाहूंगा। चित्र में एक ओर कुरजां हैं जिनके लिए यह चुग्‍गाघर बना है और दाना डाला जाता है। इन्‍हें देखने के लिए टूरिस्‍ट यहां आते हैं। दूसरी ओर कबूतरों का झुण्‍ड है जो दाना देखकर एकत्र होता है। देखने में यह पंचायत बैठी लगती है जहां गोल घेरा बनाए लोग भोजन का प्रसाद ले रहे हैं लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। ध्‍यान से देखने पर बीचों-बीच बैठी बिल्‍ली दिखेगी। अब आप माजरा समझ गए होंगे कि यह गोल घेरा कैसे बना। इस तस्‍वीर को लेकर बाकी बातें फिर कभी। 

अरे नया नया पक्षी विज्ञानी :) 
इसकी तो शक्‍ल भी मुझसे मिलती है। :)
देखकर पहचान जाता हूं कि इनके पर हैं और उड़ भी रहे हैं तो पक्षी ही होंगे :) 


सुनहरी उड़ान यह उस वक्‍त का फोटो है जब कुरजां चुग्‍गाघर के ऊपर चक्‍कर लगा रहे थे। सूरज उदय हो रहा था और दाना चुगने के लिए दूसरे पक्षी भी जमा हो रहे थे। 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

लौटने लगे प्रवासी


जोधपुर के पास फलोदी तहसील में खीचन गाँव में हर साल हजारों प्रवासी कुरजां आते हैं. टूरिस्ट इन प्रवासियों को देखतें हैं और यहाँ के बच्चे टूरिस्टों को

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रिंग रिंग रिंगा.. भाग एक

शुरू से आखिर तक जमाल के पास उम्‍मीद बांधने का कोई आधार नहीं होता। धोबीघाट से झुग्‍गी झोंपडि़यों और सड़कों से ट्रेन की पटरियों तक होता है तो बस संघर्ष खुद को जिंदा बनाए रखने का। भाई सलीम फिर भी सोचता है कि उसे पैसा कमाना है लेकिन जमाल बस जुनून होता है। 
हर काम, हर शब्‍द, हर क्षण, हर बात में जुनून। अब इस अंदर की आग को कैसे पेश किया जाए। भावनाओं का तूफान तैयार कर दिया गया है। किसकी जटाएं इस सैलाब को समेट सकती हैं। तो गढ़ दी गई लतिका। अब समझ में आता है कि क्‍यों इस छोरे के दिल में इतनी आग है। फिल्‍म जिजिविषा से हटकर आ जाती है प्रेम के तीव्र भाव पर। निर्देशक की मजबूरी है। अधिसंख्‍य समुदाय इसी लॉजिक को समझेगा कि लगातार कठिन होती जिंदगी में ऐसा कौनसा दीपक था जो बर्फीले पानी में छोरे को खड़े रहने का साहस दे गया। क्‍या लतिका के प्‍यार में ऐसा कुछ था। 

नहीं मुझे नहीं लगता। 

रिंग रिंग रिंगा... 
रिंग रिंग रिंगा्... 
रिंग रिंग रिंगा... 


नहीं ऐसा नहीं हो सकता। 

ठीक है एक उदाहरण है अभी मेरे पास। शायद कभी ओशो ने सुनाया होगा अपने शिष्‍यों को। वे कहते हैं जब बुद्ध घर से निकले और बीमार, कमजोर और मृत को देख चुके थे तो वे उतनी दुनिया देख चुके थे जितनी कि एक आम पश्चिमी व्‍यक्ति देखता है। फिर बुद्ध ने देखा एक साधू को। बस यहीं अंतर आ गया। इसी दुनिया में रहते हुए दुनिया से निवृत्त रहकर साधना करता है और एक दिन परम पिता में एकाकार होने के लिए चल देता है। पहले सशरीर उसके साथ होता है बाद में शरीर भी छोड़ देता है। 

जमाल सामान्‍य बच्‍चा है। अपनी जिंदगी जी रहा है। पिता का पता नहीं एक दिन मां भी मर जाती है। अब कहां जाए। जहां जिंदा रहा जा सके। भीख मंगवाने वाले से दूर रहना भी जरूरी है। मूर्ख विदेशियों ने गाइड समझ लिया तो अच्‍छा है। इसी से कुछ पैसा कमा लेंगे। हमें कौनसी जमीन खरीदनी है। बस जिंदा रहना है। भाई छोड दे, यार दोस्‍त अलग हो जाए तो भी जिंदगी चलती रहती है। उसी दम पर तेजी से आगे बढ़ती है। कॉल सेंटर का चायवाला कॉल सेंटर के कई एक्‍जीक्‍युटिव्‍स से अधिक जानता है। आग है और लगातार जल रही है। अब एक दिन हू वांट्स टू बी मिलेनियर में पहुंच जाता है। जिंदगी के तीखे उतार चढ़ावों के साथ सवालों का उतार चढ़ाव तारतम्‍यता बैठा लेता है। अब जमाल, जिन्‍दगी और सवाल एक हो जाते हैं। पूछने वाले को अंदाज नहीं है कि सामने जो चायवाला बैठा है उसके पीछे कितनी कहानियां हैं। 

बस एक ही मलाल --- ये राम और अल्‍लाह नहीं होते तो आज जमाल की मां जिन्‍दा होती। 

रिंग रिंग रिंगा... 

मंदी की मार झेल रही दुनिया में झुग्‍गी से बाहर आए भारत की आंखें चमक से भरी हुई है और एक नियंत्रक पूरे जोश के साथ जमाल का स्‍वागत कर रहा है आइए खेलते हैं जमाल ए चायवाल के साथ कौन बनेगा करोड़पति। 

रिंग रिंग रिंगा... 


ये अनिल कपूर और ओबामा की शकल मिलती जुलती है क्‍या... 


रिंग रिंग रिंगा... 

बस एक सेकेण्‍ड के लिए और पकाउंगा-- जिन लोगों ने ओबामा की विजय के बारे में इस ब्‍लॉग पर पढ़ा है तो पिंकी की विजय  के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। विजय का दौर फिर से शुरू हो रहा है। 

रविवार, 25 जनवरी 2009

डर का ठोस कारण

पहली बार ऐसी हॉरर मूवी देखी है जिसमें डर का एक ठोस कारण है। डर पैदा करने वाले का भी और जो लोग डरे हुए हैं उनका भी। फिल्‍म खत्‍म होने के साथ ही डर भी खत्‍म हो गया और हॉल से निकलते वक्‍त दिल और दिमाग दोनों हल्‍के थे।
भारतीय फिल्‍म परम्‍परा में प्रेम और बदला प्रमुख हैं। राज द मिस्‍ट्री कन्‍टीन्‍यूज में पहले तो यही कंफ्यूजन है कि हीरो कौन है। अपने दिमाग के अनुसार तो वही हीरो होता है जिसके पास हीरोइन होती है (नशा पैदा करने वाली नहीं नशे में रहने वाली) और जो हीरोइन और हीरो के मिलने का विरोध करता है वह विलेन होता है। इस मूवी में तो सब गढमढ है। हीरोइन फिल्‍म के शुरू में किसी और के सामने नाचती है और इंटरवेल तक किसी और के साथ गंभीर हो जाती है और अंत में अकेली बैठी नजर आती है।
अब प्रेम का पक्ष तो खत्‍म बचा बदला। हीरो अपने बाप का बदला नहीं लेता बल्कि जिस लक्ष्‍य को लेकर उसका बाप मरा है उस लक्ष्य को पूरा करने की बस गरज होती है। अंत में हीरो के बाप को खुद ही विलेन को मारना पड़ता है।
जो भी हो फिल्‍म में पर्यावरण के प्रति दिखाई गई चिंता और डर पैदा होने का ठोस कारण इसे विशिष्‍ट बना देते हैं। कहानी इतनी दमदार है कि अन्‍य पक्षों की कमजोरी का पता ही नहीं चलता। दर्शक दम साधे कहानी के साथ आगे बढता रहता है। आखिर में जब सबकुछ खुलकर सामने आ जाता है तो तीन घण्‍टे के दौरान पैदा हुआ स्‍ट्रेस भी खत्‍म हो जाता है।
अंत में मेरी सलाह यही है कि फिल्‍म देखनी चाहिए। और हां फिल्‍म में जग्‍गू दादा का अहम रोल है।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

भारतीय सुंदरियों और ओबामा की विजय

बाजार का दबाव किस तरह सत्‍ता को बदल देता है इसका दूसरा उदाहरण मैंने अपनी जिंदगी में देखा है। पहला उदाहरण था भारतीय सुंदरियों का विश्‍व विजयी होना। भारत की उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के ठीक बाद यह घटना हुई। यानि अचानक भारतीय सुंदरियां इतनी सुंदर और समझदार हो गई कि उन्‍होंने गोरी चमड़ी और उनके दीर्घकालीन प्रशिक्षणों तक को धता बजाते हुए विश्‍व की दो सबसे बड़ी स्‍पद्धाओं में ब्रह्माण्‍ड सुंदरी और विश्‍व सुंदरी के खिताब हासिल कर लिए। इसके बाद तो भारत की हर सुंदरी विश्‍व विजय का ख्‍वाब देखने लगी। सभी को पता था कि चेहरे का अधिक महत्‍व नहीं है। सुंदर होने के लिए कुछ कैमिकल्‍स और कुछ प्रशिक्षण की जरूरत है बस। देसी कंपनियों के पास वह कैमिकल नहीं था और विदेशी कंपनियों के लिए विश्‍व स्‍तर की भारतीय सुंदरियों वकालत की। चाहे एड में ही सही। लेकिन असर हुआ और गा‍रनियर से लेकर लोरियाल तक की कंपनियों ने बढ़ते बाजार में जमकर माल बेचा। माल इतना अधिक बिका कि फेयर एण्‍ड लवली को तो अपनी विज्ञापनो में यहां तक लिखना पड़ा कि केरल और तमिलनाडू की सुंदरियों को यह क्रीम गोरा नहीं बना पाएगी।
मुझे यही स्थिति ओबामा की विजय की लगती है। रेड इंडियन्‍स को खदेड़ने के बाद क्‍या आज तक एक भी ऐसा काला आदमी नहीं आया जो इतना बुद्धिमान हो कि वह अमरीकी शासन का नेतृत्‍व कर सके। नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता। आज तक ओबामा से कहीं अधिक बुद्धिमान और श्रेष्‍ठ काले लोगों ने अमेरिका के लिए बहुत कुछ किया होगा और इस देश को आगे बढ़ाने के प्रयासों में कहीं कसर नहीं रखी होगी। अब ऐसा क्‍या हो गया जो ओबामा को शीर्ष पर बिठाना पड़ गया। क्‍या तीसरी दुनिया के देशों से संवाद का यही एक रास्‍ता बचा था, क्‍या मंदी से टूटते अमरीका को किसी काले की जरूरत थी, क्‍या आम आदमी की राष्‍ट्रभक्ति पाने के लिए काले को लाया गया है, यह काला कितने प्रतिशत काला है, किन कालों का नेतृत्‍व करता है। ये सब बातें आपस में गढ़मढ़ होती है और भारतीय होने के नाते चुप रहने की कोशिश करता हूं। क्‍योंकि आखिर ओबामा ने दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक भारत को चुना और पाकिस्‍तान को चेतावनी दी। फिर भी क्‍यों मुझे लगता है वर्णभेद, इस्‍लामी आतंकवाद और बाजार के दबाव ने ओबामा का भाग्‍य पहले ही तय कर दिया था। अब इंसान के रूप में खड़ा यह व्‍यक्ति तो निमित्त मात्र है।