शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

इन्‍हें फेल कर दो

समीरजी की किसी ने देखा तो नहीं पढ़ा तो मुझे भी अपना एक किस्‍सा याद आ गया। तब मैं सातवीं कक्षा में था। दिनभर खेलना कूदना और धमाचौकड़ी करना। इसके लिए हम पर्याप्‍त दोस्‍त थे। एक मिनट भी शांति नहीं मिलती थी। स्‍कूल से बारह बजे लौटने के बाद रात दस बजे एक एक मिनट का कार्यक्रम पूर्वतय रहता। सो पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता था। अनुज आनन्‍द छठी क्‍लास में था। दोनों की धमाचौकड़ी से परेशान मम्‍मी ऑफिस से लौटने के बाद जमकर गालियां निकालती। गला साफ करने के बाद हाथ भी साफ करतीं। सो मानसिक और शारीरिक ताकत की कीमत और उसे जल्‍द से जल्‍द अतिविकसित करने का ख्‍याल वहीं से आया।

खैर हमारी धींगामुश्ति को देखते हुए ऐन परीक्षा के दिनों में मम्‍मी किन्‍हीं कारणों से पढ़ा नहीं पाई। परीक्षा के बाद उन्‍हें ध्‍यान आया कि बच्‍चों की परीक्षा हो चुकी है। सो उन्‍होंने अधिकृत घोषणा कर दी कि इस साल आनन्‍द और नरेन्‍द्र (मेरा घर का नाम) दोनों फेल होंगे। मिठाईयां बंट गई और शाबासी के न्‍यौते आने लगे। अब हम क्‍या सफाई दें। इम्तिहान में मिले पर्चे लेकर हम लगभग सभी गुणीजनों की सेवा में उपस्‍िथत हुए और पूरा पर्चा हल करके बताया तो हमारी तारीफ भी हुई और सलाह भी मिली कि पहले ही मेहनत करके पाठ याद करते तो परीक्षा में भी ऐसा ही पर्चा हल कर आते। हम कटकर रह जाते। परीक्षा परिणामा आने तक तो खुद हम दोनों को ही यकीन हो गया कि इस बार तो फेल हो गए। किताबें भी नई नहीं दिलाई गई। पिछले साल की किताबें ही जो काम आनी थी।

परिणाम आ गया। घर में सभी लोग इतने आशवस्‍त थे कि कोई भी स्‍कूल नहीं गया। दोस्‍तों को पता था कि सिद्धार्थ हर साल की तरह इस साल भी गिरता पड़ता पास हो जाएगा तो किसी ने रिजल्‍ट शीट में मेरा नाम ढूंढने की भी कोशिश नहीं की। धमाका आनन्‍द ने कर दिया। वह क्‍लास टॉप कर गया। सो उसके मित्र घर आ गए और बता दिया। मम्‍मी ऑफिस गई थी। हम दोनों ही घर में थे। आनन्‍द ने सुना तो मेरा पूछा। दोस्‍तों ने कहा पता नहीं तेरा तो देखा ही नहीं। मैं सन्‍न। किसी तरह तैयार होकर स्‍कूल पहुंचा तो मास्‍टरजी मिल गए। पूछा क्‍या हुआ पास या फेल। मैंने कहा पता नहीं तो उनकी पेशानी पर भी बल पड़ गया। खैर बाबूजी से पूछा तो पता चला कि पिछले सालों की तरह ही पास हो गया था।

अब शाम तो सभी लोग घर पहुंचे तो हम पहले की तरह नाच गा रहे थे। पिछले कुछ दिन से  यह क्रम रुक सा गया था। अब फिर से शुरू हुआ तो मम्‍मी ने कहा कि इन लड़कों को बिल्‍कुल शर्म नहीं है। हमने बताया कि पास हो गए हैं तो मम्‍मी बिगड़ गई। पहले तो विश्‍वास ही नहीं किया और जब विश्‍वास दिलाया तो और भी बड़ा धमाका हुआ। वे अगले दिन सुबह हमारी स्‍कूल के प्रिंसीपल शास्‍त्री जी (उन्‍होंने संस्‍कृत में शास्‍त्री की उपाधि प्राप्‍त की थी सो उनका नाम ही शास्‍त्रीजी पड़ गया था, एक बात और वे औरतों से बात नहीं करते थे, महिला सामने आने पर गर्दन नीचे किए रखते और धीरे धीरे बोलते थे) के पास पहुंच गई। उन्‍होंने उनकी मेज पर धौल मारकर बोलीं इन बच्‍चों को आपने कैसे पास कर दिया। इन दोनों ने पूरे साल पढ़ाई नहीं की। अगर इसी तरह आप पास करते रहे तो इनकी नींव कमजोर रह जाएगी। कैसे भी हो आप इन दोनों को फेल कर दो। अब हैरान होने के बारी शास्‍त्रीजी की थी। उन्‍होंने कहा ठीक है कर दूंगा और किसी तरह मम्‍मी को टाला और शाम तक आ गए मेरे पड़नानाजी के पास जो उनके गुरू रहे थे। मेरे पड़नाना बहुत हंसे। बोले विश्‍वास तो मुझे भी नहीं हो रहा है। उन्‍होंने शास्‍त्रीजी को समझाकर भेजा। अगले दिन पूरी स्‍कूल और सभी रिश्‍तेदारों को यह बात मालूम हो चुकी थी। यह कई दिन तक हंसी मजाक का केन्‍द्र बनी रही। और हमारी हालत... वह तो किसी ने भी नहीं देखी।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

कोने रोकने का खेल

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जब हम लोग छोटे थे तो एक खेल खेलते थे। इस खेल में पाटे पर कुछ बच्‍चे चढ़ जाते। आमतौर पर इसे पांच लोग खेल सकते हैं। जैसा कि आप समझ सकते हैं कि चौकोर पाटे में चार खाने हो सकते हैं। एक बच्‍चा एक कोने में और बाकी तीन दूसरे तीन खानों में। पांचवा बच्‍चा बीच में खड़ा होता। एक बच्‍चा अधिक देर तक अपने स्‍थान पर खड़ा नहीं रह सकता था। यानि उसे कोना छोड़ना होता था और दूसरे कोने वाले से एक्‍सचेंज करना होता। इसी प्रयास के दौरान बीच में खड़ा बच्‍चा खाली हो रहे कोने में धंसकने की कोशिश करता। अगर कोना पकड़ने में सफल होता तो जो पिछड़ता वह बीच में आ जाता। इसे खुणा रोकणी यानि कोना रोकने का खेल कहते हैं।

इस खेल के बाद एक दूसरे खेल में जुड़ा वह था बॉस्‍केटबॉल। मैं तीन कोर्ट पर प्रेक्टिस किया करता था। कॉलेज में, रेलवे ग्राउंड में और पुष्‍करणा स्‍टेडियम में। मुझे तीनों जगह आसानी से प्रवेश मिल जाता था। इसके दो कारण थे। पहला कि मैं किसी ग्रुप का सदस्‍य नहीं था। तो जो भी टीम बनती मुझे आसानी से प्रवेश मिल जाता। खेलने वालों को तो बस खिला‍ड़ी चाहिए। यहां खुणा रोकणी से दूसरी बार साक्षात्‍कार हुआ। हर कोर्ट पर अपने कोने दबाए हुए लोग मिलते। कुछ किनारों पर होते तो कुछ बीच में खड़े भी मिलते। मैं खुद ही बीच में ही रहता। क्‍योंकि तीन कोर्ट में प्रवेश होने के कारण कभी किसी कोने से मोह नहीं रहा। खेल के आखिरी दिनों में मैंने छोटे बच्‍चों को सिखाना शुरू किया और पूर्व में सिखा रहे प्रशिक्षकों की दमनकारी नीतियों से हटकर हर किसी को कोर्ट पर खुला निमंत्रण दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहली बार पुष्‍करणा स्‍टेडियम की टीम जिला स्‍तरीय प्रतियोगिता में तीसरे चक्र तक पहुंची। आमतौर पर उसे प्रवेश ही नहीं मिलता था। पहली सफलता के बाद कई लोगों के कोने असुरक्षित हो गए। मेरा विरोध शुरू हो गया। मेरा ध्‍यान पहली बार कोना पकड़कर खड़े लोगों पर गया। मैंने उन्‍हें समझाने की कोशिश की लेकिन देर हो चुकी थी। मैं चाहे-अनचाहे भीषण वार कर चुका था। एक बार फिर मैंने पूरा पाटा ही छोड़ दिया। यानि ग्राउंड जाना बंद कर दिया। लेकिन एक सोच दिमाग में घर कर गई कि जो लोग जिन किनारों पर खड़े होते हैं उन्‍हें उन किनारों से प्‍यार हो जाता है। जब कोई बाहर से आता है और उन किनारों में कुछ बदलाव करने की कोशिश करता है तो किनारा पकड़कर बैठे लोगों को बहुत तकलीफ होती है।

अब ऐसा ही कुछ खेल ब्‍लॉगिंग में भी दिखाई दे रहा है...

 

...इति

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

फलवर्द्धिका यानि फलौदी यानि फल का बढ़ना

बताया जाता है कि जोधपुर के राठौड़ परिवार से संबंध रखने वाली मां लटियाल यानि उष्‍ट्रवाहिनी माता ने जोधपुर छोड़ दिया और एक अनजाने गंतव्‍य की ओर निकल पड़ी। एक स्‍थान पर आकर खेजड़ी के एक वृक्ष में उनका ऊंट गाड़ी फंस गई। ऐसा फंसी कि बहुत कोशिश करने के बाद भी निकल नहीं पाई। तो पुष्‍करणा ब्राह्मण समुदाय की इस कुलदेवी ने कहा कि इस स्‍थान पर जो व्‍यक्ति साधना करेगा उसके फल में वृद्धि होगी। इस घटना के बाद स्‍थान का नाम पड़ा फलवर्द्धिका। बाद में इसी नाम का अपभ्रंश बना फलौदी। 

फलौदी तहसील के पास खींचन के तीन पानी के छोटे-छोटे स्रोत हैं। जहां साइबेरिया, मंगोलिया और मध्‍य यूरोप से हर साल हजारों की तादाद में प्रवासी कुरजां पक्षी आते हैं। इस पक्षी का जूलोजिकल नाम शीघ्र ही पता लगाकर बताउंगा। खींचन के आस-पासा के करीब पैंतालीस किलोमीटर क्षेत्र में यह पक्षी बिखरे हुए हैं लेकिन सुबह साढ़े छह से साढ़े सात बजे के बीच ये सभी पक्षी खींचन में एकत्रित हो जाते हैं। इसका एक ही कारण है, वह है भोजन। यहां बने एक चुग्‍गाघर में करीब आठ क्विंटल दाना हर रात डाला जाता है। जिसे खाने के लिए कुरजां यहां एकत्र होते हैं। सुबह होते ही चुग्‍गाघर के आस-पास के धोरों पर कुरजां का जमाव शुरू हो जाता है। कुछ देर धोरों पर शौचादि से निवृत होने के बाद कुरजां चुग्‍गाघर का रुख करते हैं पैदल। यानि मॉर्निंग वॉक भी हो गया। इसके बाद कुरजां एक साथ चुग्‍गाघर के चारों ओर तीन चक्‍कर लगाते हैं। दिसम्‍बर में इनकी संख्‍या सर्वाधिक होती है। रविवार की सुबह जब मैं वहां था तो बताया जा रहा था कि अब तो केवल आठ हजार कुरजां ही यहां बचे हैं, शेष अपने वतन को लौट चुके हैं। हम चुग्‍गाघर के बिल्‍कुल सटी हुई बिल्डिंग में डटे हुए थे। तो करीब आठ हजार कुरजां हमारे सिर के ऊपर से तीन चक्‍कर निकाले। कर-कर की आवाज के साथ हजारों पक्षियों के समूह ने हमें नि:शब्‍द कर दिया। हम बस आंखे फैलाए अपने छोटे बडे़ कैमरों से उनकी तस्‍वीरें निकाल रहे थे। ठण्‍ड से हाथ जमे जा रहे थे लेकिन बटन दबाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। जैसे ही सूर्य उदय हुआ मानो काले और सफेद रंग के कुरजां एकदम से सुनहरे रंग में तब्‍दील हो गए।
कुरजां के कुछ और फोटोग्राफ के साथ .... 

यह मेरे द्वारा खींचा गया सबसे अच्‍छा फोटो कहा जा सकता है। शनिवार शाम जब सूर्य अस्‍त हो रहा था तो तालाब, मंदिर, सूर्य और कुरजां को एक साथ कैमरे में कैद करने में सफल हो पाया था। वैसे हमारे साथ पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्‍ता भी थे। उनके खीचें चित्रों के सामने यह मजाक लगता है। उन्‍होंने डूबते सूर्य के बीच में से गुजरते कुरजां को कैद किया। उन्‍होंने अपने फोटो दिखाए तो मैंने अपना कैमरा पीछे छिपा लिया था। :)
यह दृ श्‍य बहुत अधिक बयां करता है। मैं केवल संकेत देना चाहूंगा। चित्र में एक ओर कुरजां हैं जिनके लिए यह चुग्‍गाघर बना है और दाना डाला जाता है। इन्‍हें देखने के लिए टूरिस्‍ट यहां आते हैं। दूसरी ओर कबूतरों का झुण्‍ड है जो दाना देखकर एकत्र होता है। देखने में यह पंचायत बैठी लगती है जहां गोल घेरा बनाए लोग भोजन का प्रसाद ले रहे हैं लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। ध्‍यान से देखने पर बीचों-बीच बैठी बिल्‍ली दिखेगी। अब आप माजरा समझ गए होंगे कि यह गोल घेरा कैसे बना। इस तस्‍वीर को लेकर बाकी बातें फिर कभी। 

अरे नया नया पक्षी विज्ञानी :) 
इसकी तो शक्‍ल भी मुझसे मिलती है। :)
देखकर पहचान जाता हूं कि इनके पर हैं और उड़ भी रहे हैं तो पक्षी ही होंगे :) 


सुनहरी उड़ान यह उस वक्‍त का फोटो है जब कुरजां चुग्‍गाघर के ऊपर चक्‍कर लगा रहे थे। सूरज उदय हो रहा था और दाना चुगने के लिए दूसरे पक्षी भी जमा हो रहे थे। 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

लौटने लगे प्रवासी


जोधपुर के पास फलोदी तहसील में खीचन गाँव में हर साल हजारों प्रवासी कुरजां आते हैं. टूरिस्ट इन प्रवासियों को देखतें हैं और यहाँ के बच्चे टूरिस्टों को

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रिंग रिंग रिंगा.. भाग एक

शुरू से आखिर तक जमाल के पास उम्‍मीद बांधने का कोई आधार नहीं होता। धोबीघाट से झुग्‍गी झोंपडि़यों और सड़कों से ट्रेन की पटरियों तक होता है तो बस संघर्ष खुद को जिंदा बनाए रखने का। भाई सलीम फिर भी सोचता है कि उसे पैसा कमाना है लेकिन जमाल बस जुनून होता है। 
हर काम, हर शब्‍द, हर क्षण, हर बात में जुनून। अब इस अंदर की आग को कैसे पेश किया जाए। भावनाओं का तूफान तैयार कर दिया गया है। किसकी जटाएं इस सैलाब को समेट सकती हैं। तो गढ़ दी गई लतिका। अब समझ में आता है कि क्‍यों इस छोरे के दिल में इतनी आग है। फिल्‍म जिजिविषा से हटकर आ जाती है प्रेम के तीव्र भाव पर। निर्देशक की मजबूरी है। अधिसंख्‍य समुदाय इसी लॉजिक को समझेगा कि लगातार कठिन होती जिंदगी में ऐसा कौनसा दीपक था जो बर्फीले पानी में छोरे को खड़े रहने का साहस दे गया। क्‍या लतिका के प्‍यार में ऐसा कुछ था। 

नहीं मुझे नहीं लगता। 

रिंग रिंग रिंगा... 
रिंग रिंग रिंगा्... 
रिंग रिंग रिंगा... 


नहीं ऐसा नहीं हो सकता। 

ठीक है एक उदाहरण है अभी मेरे पास। शायद कभी ओशो ने सुनाया होगा अपने शिष्‍यों को। वे कहते हैं जब बुद्ध घर से निकले और बीमार, कमजोर और मृत को देख चुके थे तो वे उतनी दुनिया देख चुके थे जितनी कि एक आम पश्चिमी व्‍यक्ति देखता है। फिर बुद्ध ने देखा एक साधू को। बस यहीं अंतर आ गया। इसी दुनिया में रहते हुए दुनिया से निवृत्त रहकर साधना करता है और एक दिन परम पिता में एकाकार होने के लिए चल देता है। पहले सशरीर उसके साथ होता है बाद में शरीर भी छोड़ देता है। 

जमाल सामान्‍य बच्‍चा है। अपनी जिंदगी जी रहा है। पिता का पता नहीं एक दिन मां भी मर जाती है। अब कहां जाए। जहां जिंदा रहा जा सके। भीख मंगवाने वाले से दूर रहना भी जरूरी है। मूर्ख विदेशियों ने गाइड समझ लिया तो अच्‍छा है। इसी से कुछ पैसा कमा लेंगे। हमें कौनसी जमीन खरीदनी है। बस जिंदा रहना है। भाई छोड दे, यार दोस्‍त अलग हो जाए तो भी जिंदगी चलती रहती है। उसी दम पर तेजी से आगे बढ़ती है। कॉल सेंटर का चायवाला कॉल सेंटर के कई एक्‍जीक्‍युटिव्‍स से अधिक जानता है। आग है और लगातार जल रही है। अब एक दिन हू वांट्स टू बी मिलेनियर में पहुंच जाता है। जिंदगी के तीखे उतार चढ़ावों के साथ सवालों का उतार चढ़ाव तारतम्‍यता बैठा लेता है। अब जमाल, जिन्‍दगी और सवाल एक हो जाते हैं। पूछने वाले को अंदाज नहीं है कि सामने जो चायवाला बैठा है उसके पीछे कितनी कहानियां हैं। 

बस एक ही मलाल --- ये राम और अल्‍लाह नहीं होते तो आज जमाल की मां जिन्‍दा होती। 

रिंग रिंग रिंगा... 

मंदी की मार झेल रही दुनिया में झुग्‍गी से बाहर आए भारत की आंखें चमक से भरी हुई है और एक नियंत्रक पूरे जोश के साथ जमाल का स्‍वागत कर रहा है आइए खेलते हैं जमाल ए चायवाल के साथ कौन बनेगा करोड़पति। 

रिंग रिंग रिंगा... 


ये अनिल कपूर और ओबामा की शकल मिलती जुलती है क्‍या... 


रिंग रिंग रिंगा... 

बस एक सेकेण्‍ड के लिए और पकाउंगा-- जिन लोगों ने ओबामा की विजय के बारे में इस ब्‍लॉग पर पढ़ा है तो पिंकी की विजय  के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। विजय का दौर फिर से शुरू हो रहा है।