शनिवार, 21 फ़रवरी 2009
कुरजां के साथ एक दिन
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009
इन्हें फेल कर दो
समीरजी की किसी ने देखा तो नहीं पढ़ा तो मुझे भी अपना एक किस्सा याद आ गया। तब मैं सातवीं कक्षा में था। दिनभर खेलना कूदना और धमाचौकड़ी करना। इसके लिए हम पर्याप्त दोस्त थे। एक मिनट भी शांति नहीं मिलती थी। स्कूल से बारह बजे लौटने के बाद रात दस बजे एक एक मिनट का कार्यक्रम पूर्वतय रहता। सो पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता था। अनुज आनन्द छठी क्लास में था। दोनों की धमाचौकड़ी से परेशान मम्मी ऑफिस से लौटने के बाद जमकर गालियां निकालती। गला साफ करने के बाद हाथ भी साफ करतीं। सो मानसिक और शारीरिक ताकत की कीमत और उसे जल्द से जल्द अतिविकसित करने का ख्याल वहीं से आया।
खैर हमारी धींगामुश्ति को देखते हुए ऐन परीक्षा के दिनों में मम्मी किन्हीं कारणों से पढ़ा नहीं पाई। परीक्षा के बाद उन्हें ध्यान आया कि बच्चों की परीक्षा हो चुकी है। सो उन्होंने अधिकृत घोषणा कर दी कि इस साल आनन्द और नरेन्द्र (मेरा घर का नाम) दोनों फेल होंगे। मिठाईयां बंट गई और शाबासी के न्यौते आने लगे। अब हम क्या सफाई दें। इम्तिहान में मिले पर्चे लेकर हम लगभग सभी गुणीजनों की सेवा में उपस्िथत हुए और पूरा पर्चा हल करके बताया तो हमारी तारीफ भी हुई और सलाह भी मिली कि पहले ही मेहनत करके पाठ याद करते तो परीक्षा में भी ऐसा ही पर्चा हल कर आते। हम कटकर रह जाते। परीक्षा परिणामा आने तक तो खुद हम दोनों को ही यकीन हो गया कि इस बार तो फेल हो गए। किताबें भी नई नहीं दिलाई गई। पिछले साल की किताबें ही जो काम आनी थी।
परिणाम आ गया। घर में सभी लोग इतने आशवस्त थे कि कोई भी स्कूल नहीं गया। दोस्तों को पता था कि सिद्धार्थ हर साल की तरह इस साल भी गिरता पड़ता पास हो जाएगा तो किसी ने रिजल्ट शीट में मेरा नाम ढूंढने की भी कोशिश नहीं की। धमाका आनन्द ने कर दिया। वह क्लास टॉप कर गया। सो उसके मित्र घर आ गए और बता दिया। मम्मी ऑफिस गई थी। हम दोनों ही घर में थे। आनन्द ने सुना तो मेरा पूछा। दोस्तों ने कहा पता नहीं तेरा तो देखा ही नहीं। मैं सन्न। किसी तरह तैयार होकर स्कूल पहुंचा तो मास्टरजी मिल गए। पूछा क्या हुआ पास या फेल। मैंने कहा पता नहीं तो उनकी पेशानी पर भी बल पड़ गया। खैर बाबूजी से पूछा तो पता चला कि पिछले सालों की तरह ही पास हो गया था।
अब शाम तो सभी लोग घर पहुंचे तो हम पहले की तरह नाच गा रहे थे। पिछले कुछ दिन से यह क्रम रुक सा गया था। अब फिर से शुरू हुआ तो मम्मी ने कहा कि इन लड़कों को बिल्कुल शर्म नहीं है। हमने बताया कि पास हो गए हैं तो मम्मी बिगड़ गई। पहले तो विश्वास ही नहीं किया और जब विश्वास दिलाया तो और भी बड़ा धमाका हुआ। वे अगले दिन सुबह हमारी स्कूल के प्रिंसीपल शास्त्री जी (उन्होंने संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की थी सो उनका नाम ही शास्त्रीजी पड़ गया था, एक बात और वे औरतों से बात नहीं करते थे, महिला सामने आने पर गर्दन नीचे किए रखते और धीरे धीरे बोलते थे) के पास पहुंच गई। उन्होंने उनकी मेज पर धौल मारकर बोलीं इन बच्चों को आपने कैसे पास कर दिया। इन दोनों ने पूरे साल पढ़ाई नहीं की। अगर इसी तरह आप पास करते रहे तो इनकी नींव कमजोर रह जाएगी। कैसे भी हो आप इन दोनों को फेल कर दो। अब हैरान होने के बारी शास्त्रीजी की थी। उन्होंने कहा ठीक है कर दूंगा और किसी तरह मम्मी को टाला और शाम तक आ गए मेरे पड़नानाजी के पास जो उनके गुरू रहे थे। मेरे पड़नाना बहुत हंसे। बोले विश्वास तो मुझे भी नहीं हो रहा है। उन्होंने शास्त्रीजी को समझाकर भेजा। अगले दिन पूरी स्कूल और सभी रिश्तेदारों को यह बात मालूम हो चुकी थी। यह कई दिन तक हंसी मजाक का केन्द्र बनी रही। और हमारी हालत... वह तो किसी ने भी नहीं देखी।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009
कोने रोकने का खेल
जब हम लोग छोटे थे तो एक खेल खेलते थे। इस खेल में पाटे पर कुछ बच्चे चढ़ जाते। आमतौर पर इसे पांच लोग खेल सकते हैं। जैसा कि आप समझ सकते हैं कि चौकोर पाटे में चार खाने हो सकते हैं। एक बच्चा एक कोने में और बाकी तीन दूसरे तीन खानों में। पांचवा बच्चा बीच में खड़ा होता। एक बच्चा अधिक देर तक अपने स्थान पर खड़ा नहीं रह सकता था। यानि उसे कोना छोड़ना होता था और दूसरे कोने वाले से एक्सचेंज करना होता। इसी प्रयास के दौरान बीच में खड़ा बच्चा खाली हो रहे कोने में धंसकने की कोशिश करता। अगर कोना पकड़ने में सफल होता तो जो पिछड़ता वह बीच में आ जाता। इसे खुणा रोकणी यानि कोना रोकने का खेल कहते हैं।
इस खेल के बाद एक दूसरे खेल में जुड़ा वह था बॉस्केटबॉल। मैं तीन कोर्ट पर प्रेक्टिस किया करता था। कॉलेज में, रेलवे ग्राउंड में और पुष्करणा स्टेडियम में। मुझे तीनों जगह आसानी से प्रवेश मिल जाता था। इसके दो कारण थे। पहला कि मैं किसी ग्रुप का सदस्य नहीं था। तो जो भी टीम बनती मुझे आसानी से प्रवेश मिल जाता। खेलने वालों को तो बस खिलाड़ी चाहिए। यहां खुणा रोकणी से दूसरी बार साक्षात्कार हुआ। हर कोर्ट पर अपने कोने दबाए हुए लोग मिलते। कुछ किनारों पर होते तो कुछ बीच में खड़े भी मिलते। मैं खुद ही बीच में ही रहता। क्योंकि तीन कोर्ट में प्रवेश होने के कारण कभी किसी कोने से मोह नहीं रहा। खेल के आखिरी दिनों में मैंने छोटे बच्चों को सिखाना शुरू किया और पूर्व में सिखा रहे प्रशिक्षकों की दमनकारी नीतियों से हटकर हर किसी को कोर्ट पर खुला निमंत्रण दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहली बार पुष्करणा स्टेडियम की टीम जिला स्तरीय प्रतियोगिता में तीसरे चक्र तक पहुंची। आमतौर पर उसे प्रवेश ही नहीं मिलता था। पहली सफलता के बाद कई लोगों के कोने असुरक्षित हो गए। मेरा विरोध शुरू हो गया। मेरा ध्यान पहली बार कोना पकड़कर खड़े लोगों पर गया। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन देर हो चुकी थी। मैं चाहे-अनचाहे भीषण वार कर चुका था। एक बार फिर मैंने पूरा पाटा ही छोड़ दिया। यानि ग्राउंड जाना बंद कर दिया। लेकिन एक सोच दिमाग में घर कर गई कि जो लोग जिन किनारों पर खड़े होते हैं उन्हें उन किनारों से प्यार हो जाता है। जब कोई बाहर से आता है और उन किनारों में कुछ बदलाव करने की कोशिश करता है तो किनारा पकड़कर बैठे लोगों को बहुत तकलीफ होती है।
अब ऐसा ही कुछ खेल ब्लॉगिंग में भी दिखाई दे रहा है...
...इति
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
फलवर्द्धिका यानि फलौदी यानि फल का बढ़ना
यह मेरे द्वारा खींचा गया सबसे अच्छा फोटो कहा जा सकता है। शनिवार शाम जब सूर्य अस्त हो रहा था तो तालाब, मंदिर, सूर्य और कुरजां को एक साथ कैमरे में कैद करने में सफल हो पाया था। वैसे हमारे साथ पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्ता भी थे। उनके खीचें चित्रों के सामने यह मजाक लगता है। उन्होंने डूबते सूर्य के बीच में से गुजरते कुरजां को कैद किया। उन्होंने अपने फोटो दिखाए तो मैंने अपना कैमरा पीछे छिपा लिया था। :)
यह दृ श्य बहुत अधिक बयां करता है। मैं केवल संकेत देना चाहूंगा। चित्र में एक ओर कुरजां हैं जिनके लिए यह चुग्गाघर बना है और दाना डाला जाता है। इन्हें देखने के लिए टूरिस्ट यहां आते हैं। दूसरी ओर कबूतरों का झुण्ड है जो दाना देखकर एकत्र होता है। देखने में यह पंचायत बैठी लगती है जहां गोल घेरा बनाए लोग भोजन का प्रसाद ले रहे हैं लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। ध्यान से देखने पर बीचों-बीच बैठी बिल्ली दिखेगी। अब आप माजरा समझ गए होंगे कि यह गोल घेरा कैसे बना। इस तस्वीर को लेकर बाकी बातें फिर कभी।
अरे नया नया पक्षी विज्ञानी :)
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सोमवार, 9 फ़रवरी 2009
लौटने लगे प्रवासी
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