गुरुवार, 5 मार्च 2009

रुत आई पपैया थारे बोलण री

रुत आई रे पपैय्या थारै बोलण री रुत आई रे...

महज दस दिन में सर्द हवाएं जैसे गायब हो गई हैं। दिन की तल्‍ख धूप के बाद रेत के धोरों से ठण्‍डी होकर आई हवाएं माहौल में मद घोल देती हैं। ऐसी ही शीतल बयार और शांत वातावरण के बीच चंग की आवाज दूर तक सुनाई देती है और बोल ऐसे कि कदम खुद रुक जाएं। चंग के साथ छमछमों की आवाज थिरकने को मजबूर कर देते हैं। इस बीच बीकानेर में इन दिनों चल रही है होली के धमाल की तैयारी। एक ओर होली की छेड़छाड़ की तैयारियां चल रही हैं वहीं रम्‍मतों और स्‍वांग ने शहर की रंगत ही बदलकर रख दी है। दिन में मानों शहर सोया रहता है और रात ढलते ही गली मोहल्‍ले जीवंत हो उठते हैं।

पहले बात रम्‍मतों की

जहां तक मेरी जानकारी है रम्‍मत का रिवाज केवल बीकानेर में ही है। यहां होली से करीब सात दिन पहले रम्‍मतें शुरू हो जाती है। इनमें प्रमुख हैं हड़ाऊ मैरी, फक्‍कड़ दाता और अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत। रम्‍मत वास्‍तव में एक प्रकार का लोकनाट्य है। इसमें मोहल्‍ले के बीचों बीच स्थित पाटे जिनका उल्‍लेख मैं पहले कर चुका हूं, पर एक नाटक का मंचन किया जाता है। इसमें कलाकार बाहर से नहीं बुलाए जाते बल्कि गली मोहल्‍लों के ही कलाकार पाटे पर पहुंचते हैं और पूरी रात नाटक का मंचन चलता है। लेकिन पाटे पर चढ़ने की राह इतनी आसान भी नहीं होती। पहले सर्वसम्‍मति से कलाकार तय होते हैं। हफ्तों और महीनों पहले इसका अभ्‍यास शुरू हो जाता है। और जब कलाकार मंच पर होते हैं तो एक एक पेज तक के डॉयलॉग एक सांस में बोल जाते हैं। ऐसा बहुत कम ही हुआ है कि कोई कलाकार स्‍टेज पर अपना डॉयलॉग भूला हो। 

हड़ाऊ मैरी की रम्‍मत जहां प्रेम कहानी है वहीं अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत वीर रस से ओतप्रोत होती है। इन नाटकों को लिखा भी स्‍थानीय लोगों ने ही है। रम्‍मत के दौरान ही ख्‍याल भी गाए जाते हैं। ख्‍याल एक प्रकार से तत्‍तकालीन सामाजिक और राजनैतिक व्‍यवस्‍थ पर कटाक्ष होते हैं। स्‍थानीय नेता और जनप्रतिनिधि भी कई बार इन समारोहों में मौजूद रहते हैं और ख्‍याल के दौरान हुए कटाक्ष को हंसते हुए झेलते हैं। उनके पास सिवाय बड़े बूढ़ों के पैर छूने के और कोई ईलाज नहीं होता।

फागणिया फुटबॉल और स्‍वांग

यह भी बीकानेर की अनूठी परम्‍परा है। यहां के पुष्‍करणा स्‍टेडियम में होली से पहले एक दिन फागणिया फुटबॉल भी खेली जाएगी। जिसमें बराक ओबामा से ओबामा बिन लादेन तक सभी शिरकत करेंगे। अस्‍पताल का रोगी और कुंवारी कन्‍या के पीछे भागता साधू भी नजर आ जाएगा। हां जी यह है फागणिया फुटबॉल और जिन लोगों को आप देखेंगे वे होंगे स्‍वांग। यानि बहूरूपिए। बीकानेर के गली मोहल्‍लों में ये स्‍वांग अभी दे दिखाई देने लगे हैं। कई बार तो अजीब स्थिति तब होती है जब अपने काम से जा रहे आदमी को अचानक पीछे से एक युवती आकर दबोच लेती है। आदमी सचेत हुआ तो उसे पता चल जाएगा कि यह युवती का स्‍वांग किए लड़का है तो वापस सहज हो जाएगा वरना बुरी तरह झेंपेगा। कई आदमी तो इतना अच्‍छा स्‍वांग रचाते हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि आदमी है कि औरत। अच्‍छी तरह साफ की गई दाड़ी और गहनों से लदे आदमी की मर्दानगी वेषभूषा में पूरी तरह छिप जाती है।

होली के गीतों और गेवर पर बात अगली पोस्‍ट में ....

यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे

एक  सूचना 


प्रसिद्ध साहित्‍यकार यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे। हजार घोड़ों का सवार सहित सवा सौ पुस्‍तकें लिखने वाले यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र ने मीरा पुरस्‍कार सहित तमाम प्रकार के पुरस्‍कार लिए और अंत तक सादा जीवन जीया। अपनी पत्‍नी जिसे वे भट्टाचार्य के नाम से पुकारते थे, के साथ अंतिम दिनों तक बीकानेर स्थित अपने ही छोटे से घर में रह रहे थे। पिछले दिनों तबियत बिगड़ने पर उन्‍हें एम्‍स ले जाया गया। वहां एक महीने के इलाज के बाद बीकानेर के पीबीएम अस्‍पताल लाया गया। जहां दो-तीन दिन आईसीयू में भर्ती रहने के बाद उन्‍होंने इस ग्रह को अलविदा कह दिया। हिन्‍दी के अलावा मायड़ भाषा में उनके किए कार्यों को लोग लम्‍बे समय तक याद रखेंगे। जनकवि हरीश भादाणी, चिंतक नन्‍दकिशोर आचार्य सहित साहित्‍य से जुड़े तमाम लोगों को साहित्‍य के बड़े भाई के निधन पर शोक हुआ है। मेरा उनसे परिचय इतना था कि बचपन में एक बार उनके घर गया तो उन्‍होंने खुद की लिखी कहानियों की एक छोटी सी किताब मुझे भेंट की थी। इसके बाद कभी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी।

देश में बीकानेर को पहचान और सम्‍मान दिलाने वाले चंद्र की आत्‍मा को ईश्‍वर शांति दे।

उनकी एक पुस्‍तक मरु केसरी की झलकी देख सकते हैं।

बुधवार, 4 मार्च 2009

ऐसो बंसी बजाइ रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...

बीकाणे में जमा होली का रंग
कहते हैं बीकानेर में होली गुजरने के छह महीने तक उसका असर बना रहता है और छह महीने पहले होली की रंगत शुरू हो जाती है। यहां के व्‍यासों को तो साल के किसी भी दिन होली की तरंग में आने की बाकायदा छूट मिली हुई है। वे कभी भी कुछ भी कर सकते हैं। अब जब होली में कुछ ही दिन बाकी बचे हैं तो होली की रंगत परवान पर चढ़ चुकी है। तंग गलियों, खुले मोहल्‍लों और शहर की फसील से सटी चाय-पान की दुकानों पर होली के रसिए शाम ढलते ही एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। डफ (चंग) के साथ के साथ रसियों की फौज जैसे मस्‍ती का माहौल बनाती है, उसे देखकर आने जाने वाले भी रुककर कुछ देर संगीत का आनन्‍द लेते हैं। 

ऐसो बंसी बजई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...
महलां मांई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो.. 

रात गहराने के साथ धोरों से लिपटकर आई बयार फिजा में कुछ ऐसी मस्‍ती घोल देती है कि आठ से साठ सभी मस्‍ती की तरंग में झूमने लगते हैं। बीकानेर में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की खेलणी सप्‍तमी के दिन से होली की अधिकारिक घोषणा हो जाती है। यानि इस दिन से होली की मजाक, गीत और तराने हर कहीं सुनाई देने लगते हैं। अब किसी ने बुरा माना तो वह खुद बुरा बन जाएगा। तैयार रहिए होली की मजाक के लिए। 
अगली पोस्‍ट में बताउंगा होली की रम्‍मतों और गीतों के बारे में... 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

कुछ दिन पहले एक साल हो गया

मुझे सक्रिय रूप से ब्‍लॉग में लिखते हुए कुछ दिन पहले एक साल हो गया है। मुझे ठीक से याद नहीं कि पहला दिन कौनसा था लेकिन फरवरी 2008 में मैंने लेख लिखने शुरू कर दिए थे। अपनी ब्‍लॉगर प्रोफाइल देखता हूं तो पता चलता है कि मैं ब्‍लॉगिंग से जुलाई 2006 से जुड़ा हुआ हूं। लेकिन तब मैंने एकाध पोस्‍ट लिखी और लम्‍बे समय तक चुप हो गया। एक तो पत्रकारिता में बुरी तरह उलझा हुआ था दूसरे कुछ ही दिन में मेरा पुत्र कान्‍हा पैदा हो गया था। सो जिन्‍दगी ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि अब तक रोलर कोस्‍टर राइड कर रहा हूं। हां, छोटे शहर की अपने तरह की राइड है, लेकिन है तेज ही।

मेरा पहला ब्‍लॉग यही दिमाग की हलचल था। शुरू में पता नहीं था कि क्‍या लिखें कैसे लिखें। तो मैंने अपने ब्‍लॉग का नाम दिया था दर्शन और अध्‍यात्‍म। फिलासाफी में एमए किया था तो सोचा कि अब तक पढ़ने के बाद चर्चा से तैयार हुआ ज्ञान नेट पर बिखेरा जाए। कुछ ही दिन में गलती पता चल गई और लगा कि कई धुरंधर लोग मुझसे अधिक कूटा-छाना हुआ पेश कर रहे हैं तो फिर रुक गया। इसी दौरान एक और ब्‍लॉग बना लिया ज्‍योतिष दर्शन। इसमें मेरे पास ढेर सा मसाला था जिसे मैं नेट पर शेयर कर सकता था। लिखना शुरू किया तो दिशा नहीं थी। शुरू में तो एग्रेगेटर्स से भी नहीं जुड़ा था सो मैं लिखता और लोगों को घर बुलाकर नेट चलाकर दिखाता और लेख पढ़वाता था। बाद में धीरे-धीरे इंटरनेट की यु‍‍टीलिटीज के बारे में जानकारी एकत्रित की। हर दिन कुछ नया सीखता। टैम्‍पलेट, एचटीएमएल, यूनीकोड फोंट, हिन्‍दी टूल जैसी सैकड़ों चीजें सीखी। आज की तारीख में महज गूगल के ही 27 टूल इस्‍तेमाल कर रहा हूं। इस दौरान ही वर्डप्रेस पर भी गया। वहां ज्‍योतिषी नाम से एक ब्‍लॉग बनाया। लेकिन वह अधिक सफल नहीं हुआ। बाद में मैंने इसे बदलकर ज्‍योतिष प्रवेशिका कर दिया। समय आने पर इसमें बहुत सा मैटर पेल सकूंगा।

ज्‍योतिष दर्शन और दिमाग की हलचल के बाद नम्‍बर आया भड़ास का। पत्रकारों के इस ब्‍लॉग में पहले सदस्‍यता के लिए मेल नहीं करनी पड़ती थी। यह सबके लिए खुला था। मैंने लॉगइन किया और बन गया सदस्‍य। शुरू में कुछ लिखना भी शुरू किया लेकिन बाकी लोग इतना भीषण लिख रहे थे कि मेरी हिम्‍मत ही नहीं होती थी उस स्‍तर पर जाने और वैसा लिखने की। धुरंधर लोगों के बीच बस पाठक के रूप में शामिल रहा। अब इस ब्‍लॉग में कुछ सुधार हुआ है सो लिखने का मन करने लगा है। शीघ्र ही कुछ बिंदुओं के साथ भड़ास पर लिखना शुरू करूंगा। हां इस कम्‍युनिटी ब्‍लॉग पर लगे मेरे ब्‍लॉग के लिंक से बहुत से लोग मेरे पास आए। यह जानकारी मुझे दी गूगल एनालिटिक्‍स ने।

इसके बाद बना मेरे अंचल की कहावतें ब्‍लॉग। जयपुर के ब्‍लॉगर राजीव जैन से चैट के दौरान में लगातार लोकोक्तियां इस्‍तेमाल कर रहा था। उन्‍होंने मुझे प्रोत्‍साहित किया और एक कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनाने के लिए कहा। बातचीत के दौरान ही मैंने वह ब्‍लॉग बना दिया। कहावतें नाम से यूआरएल भी मिल गया। पहली ही रात इस ब्‍लॉग के दो सदस्‍य बन चुके थे। बाद में और लोग भी जुड़े। आज इसके 19 लेखक हैं। कुछ लेखक तो नियमित रूप से इसमें लिखते हैं तो कुछ ने एक समय विशेष में लिखा। इन दिनों उनकी कहावतें नहीं आ रही। लेकिन इस खूबसूरत ब्‍लॉग में हर लेखक का योगदान अमूल्‍य है। एक मॉडरेटर के रूप में मुझे जो लोगों का प्रेम और विश्‍वास मिला उसे शब्‍दों में व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता।

कहावतें ब्‍लॉग के बाद पिछले दिनों अपनी भाषा में कुछ करने का मन हुआ। हालांकि इससे पहले अविनाश वाचस्‍पति जी मुझे सलाह दे चुके थे कि अधिक संख्‍या में ब्‍लॉग बनाओगे तो उनमें नियमित रूप से लिखने में कठिनाई होगी। पर यहां समस्‍या यह है कि हर विषय और स्‍वाद के अनुसार ब्‍लॉग तो अलग रखना ही पड़ेगा। वरना एक ही ब्‍लॉग में खिचड़ी बन जाएगी। सो अपनी मातृभाषा के लिए कुछ करने के उद्देश्‍य से शुरू किया आपणी मायड़ ब्‍लॉग। इस ब्‍लॉग में शुरू में मैंने वैद्य सत्‍यनारायणजी व्‍यास सा की कविताएं प्रस्‍तुत की हैं। उनके नायक नायिका भेद को भी ब्‍लॉग में उतारने के बाद मैं आपणी मायड़ में बीकानेर में मायड़ भाषा को लेकर हो रही गतिविधियों को परोसने का प्रयास करूंगा। आज-कल में न सही दो पांच या दस साल में यह महत्‍वपूर्ण ऑनलाइन दस्‍तावेज बन जाएगा।

भड़ास और कहावतें के अलावा नुक्‍कड़, भारतीय शिक्षा और भारतीय ज्‍योतिषी कम्‍युनिटी ब्‍लॉगों का भी सदस्‍य हूं। लेकिन इनमें मैंने बहुत नहीं लिखा है। नुक्‍कड़ में तो अब तक एक भी लेख नहीं लिख पाया हूं। कहते हुए शरमा तो रहा हूं लेकिन एक ब्‍लॉग मैंने अंग्रेजी में भी बनाया। इसे बनाने के दो कारण थे। पहला तो यह कि कई हिन्‍दी ब्‍लॉगर्स ने मुझसे पूछा कि आपको गूगल एडसेंस ने कैसे जोड़ लिया हमें तो वह अनसपोर्टेड लैंग्‍वेज कहकर छिटका देता है। यही समस्‍या मेरे साथ भी आई थी। मैंने अपने स्‍तर पर गूगल एडसेंस से बातचीत की और उन्‍हें एड देने के लिए मना लिया। बाद में गूगल ने एड तो दिए लेकिन सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही देता रहा। तब मैंने दूसरे ब्‍लॉगर्स को बताने के लिए और गूगल एडसेंस को चेक करने के लिए अंग्रेजी में 99 ka pher नाम से ब्‍लॉग बनाया। इसमें मैंने पैसा कमाने के तरीके बताने शुरू किए। हालांकि अब तक मैंने केवल यही बताया है कि एडसेंस से कैसे वार्ता की जाए कि वे एड देने के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉगर को रजिस्‍टर कर लें। चार लेख से आगे यह ब्‍लॉग बढ़ नहीं पाया है। इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि पैसा कमाने के प्रति मेरी बहुत अधिक रूचि नहीं है। एडसेंस से एड लेना प्रतिष्‍ठा का विषय बना तो ले लिए। दूसरा कारण अंग्रेजी में हाथ तंग होना तो है ही। :)

इस तरह एक साल का समय कुछ ऐसे बीता कि पता ही नहीं चला कि कब एक साल हो गया। बस लिखता गया और बढ़ता गया। मुझे लगता है कि आज जो लेख लिखा है यह मुझे पांच साल बाद लिखना चाहिए। उम्‍मीद करता हूं कि फरवरी 2013 में एक बार फिर मैं ऐसा लेख लिखूं जिसमें बहुत सारी यादें हों। वैसे यादें तो अब तक की भी हैं। मसलन स्‍त्री की सुंदरता के विषय में लिखने के बाद महिला ब्‍लॉगरों से झाड़ खाना, टिप्‍पणी पर लिखकर समीर भाई को छेड़ देना, भड़ास पर मन नहीं लगने की बात कहकर हलचल पैदा करना। लेकिन कहीं भी मेरा मंतव्‍य ऐसा नहीं था कि हलचल पैदा करूं। हां, वे सभी हलचलें मेरे दिमाग में जरूर थीं।

अब तक सभी ब्‍लॉगरों से सहयोग, प्‍यार, आशीर्वाद और विचार मिले हैं। आशा करता हूं कि आगे भी मिलते रहेंगे...

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

कुरजां के साथ एक दिन