शनिवार, 14 मार्च 2009

गुजरना तूफान से तूफान का...

इन दिनों दूसरों के लिखे ब्‍लॉग लगातार पढ़ रहा हूं। एक साल बाद कुछ लोग ऐसे मिले हैं जिन्‍हें पढ़कर लगता है ठीक है कुछ देर रुकते हैं कहीं और से भी रोशनी आ रही है। इन दिनों एक ब्‍लॉग का तो बस फैन ही हो गया हूं। इस ब्‍लॉग के लेखक को तो मैं नहीं जानता लेकिन इस ब्‍लॉग की हर पोस्‍ट को अच्‍छी तरह पढ़ चुका हूं। ब्‍लॉग का नाम है


इसमें निशान्‍त मिश्र जी ऐसी सुंदर कथाएं संग्रह की हैं कि दिल चाहता है उनके हाथ चूम लूं। हर एक कथा एक तूफान की तरह दिमाग में घुसती है और पहले से चल रहे तूफान से टकरा जाती है। विचारों का प्रवाह पहले से ही रोलर कोस्‍टर पर बिठाए रखता है। इसके साथ निशांतजी के झोंके जैसे उद्वेलित कर देते हैं। हर पोस्‍ट पढ़ने के बाद कुछ देर के लिए कम्‍प्‍यूटर बंद कर देता हूं। सोचने का मसाला जो मिल जाता है। काफी देर सोचने के बाद दिमाग इतना शांत हो जाता है कि कुछ और लिखने का जी ही नहीं चाहता। मैं इस ब्‍लॉग को ट्रैक्‍यूलाइजर ब्‍लॉग कहूंगा। जहां अधिकांश ब्‍लॉग भड़ास निकालने या पानी में हलचल बढ़ाने का काम कर रहे हैं वहीं ये प्रेरक कथाएं दिल और दिमाग को कुछ देर की शांति दे जाती हैं। मेरे ब्‍लॉग पर आने वाले सभी पाठकों को निवेदन करूंगा कि एक बार निशांतजी के ब्‍लॉग पर अवश्‍य जाएं। वहां हर किसी के लिए कुछ खास जरूर मिलेगा। 

गुरुवार, 12 मार्च 2009

राम राम सा

होली से पहले सोचा था कि इस बार खूब लिखूंगा होली के बारे में लेकिन फाग की तरंग ऐसी चढ़ी कि लिखना ही भूल गया। आज होली की हुडदंग खत्‍म हुई तो दो बातें लिखनी जरूरी समझी। पहली इलोजी का रूदन और दूसरी रम्‍मत या तमाशा। 
होलिका दहन के बारे में दोबारा बताने के बजाय मैं बताना चाहूंगा इलोजी के प्रेम के बारे में। साधिका होली का विवाह इलोजी से हो चुका था लेकिन गौना नहीं हुआ था। भक्‍त प्रहलाद को मारने की गरज से होलिका ने अपने नियमित अग्निस्‍नान के दौरान प्रहलाद को साथ लिया लेकिन संतों और साधुओं के नग्‍न नृत्‍य ने होलिका का ध्‍यान बंटा दिया और वे जलकर खाक हो गई। होलिका के राख हो जाने के बाद र्इलोजी घटनास्‍थल पर पहुंचते हैं और शरीर के  राख लपेटकर रूदन करते हैं। बाद में इसी होली की राख से कुंवारी कन्‍याएं गौरी पूजन करती हैं। आखिर में गौरी और  ईसर का मिलन होता है। ऐसा माना जाता है कि गौरी और ईसर पूर्व जन्‍म में होलिका और ईलोजी थे। बीकानेर में एक मोहल्‍ला है जिसका नाम है साले की होली। यहां बीकानेर की सबसे बड़ा होलिका दहन होता है। इसकी आग की लपटें करीब अस्‍सी फीट ऊपर तक जाती हैं। शहर के करीब हर हिस्‍से के लोग इस होली को देखने आते हैं। इसके अलावा इस होली की एक खास बात और है वह यह है कि इस होलिका के दहन को  ईलोजी सामने बैठकर देखते हैं। यहां के मोहतों के चौक से ईलोजी को पूरे ठाठ बाट से लाया जाता है। ईलोजी के पहुंचने के बाद ही होलिका दहन शुरू होता है। 

अब बात रम्‍मतों की। मेरी रम्‍मतों वाली पोस्‍ट पढ़ने के बाद जालौर के श्रीमधुसूदनजी  व्‍यास का फोन आया मेरे पास। उन्‍होंने बताया कि बीकानेर और जैसलमेर में जिस लोकनाट्य को रम्‍मत कहा जाता है राजस्‍थान के अन्‍य शहरों में उसी रम्‍मत को तमाशा कहा जाता है। राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में होली के  दूसरे दिन से हाडी रानी, अमरसिंह राठौड़ और फक्‍कड़दाता की रम्‍मतें शुरु हो जाती हैं। जबकि बीकानेर में होली से सात दिन पहले ये लोकनाट्य शुरू होते हैं और होलिका दहन से एक दिन पहले तक चलते हैं। धुलण्‍डी के दूसरे दिन तो सबकुछ शांत हो जाता है। जीवन फिर से पहले जैसा हो जाता है। हां, ठीक अगले दिन कुछ लोग राम राम के लिए निकलते हैं। बच्‍चों को पगेलागणा के बदले आशीर्वाद और पैसे मिलते हैं और बड़ों को आशीर्वाद और मिठाई। 

कल पोस्‍ट करूंगा होली से संबंधित कुछ फोटो... 

गुरुवार, 5 मार्च 2009

रुत आई पपैया थारे बोलण री

रुत आई रे पपैय्या थारै बोलण री रुत आई रे...

महज दस दिन में सर्द हवाएं जैसे गायब हो गई हैं। दिन की तल्‍ख धूप के बाद रेत के धोरों से ठण्‍डी होकर आई हवाएं माहौल में मद घोल देती हैं। ऐसी ही शीतल बयार और शांत वातावरण के बीच चंग की आवाज दूर तक सुनाई देती है और बोल ऐसे कि कदम खुद रुक जाएं। चंग के साथ छमछमों की आवाज थिरकने को मजबूर कर देते हैं। इस बीच बीकानेर में इन दिनों चल रही है होली के धमाल की तैयारी। एक ओर होली की छेड़छाड़ की तैयारियां चल रही हैं वहीं रम्‍मतों और स्‍वांग ने शहर की रंगत ही बदलकर रख दी है। दिन में मानों शहर सोया रहता है और रात ढलते ही गली मोहल्‍ले जीवंत हो उठते हैं।

पहले बात रम्‍मतों की

जहां तक मेरी जानकारी है रम्‍मत का रिवाज केवल बीकानेर में ही है। यहां होली से करीब सात दिन पहले रम्‍मतें शुरू हो जाती है। इनमें प्रमुख हैं हड़ाऊ मैरी, फक्‍कड़ दाता और अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत। रम्‍मत वास्‍तव में एक प्रकार का लोकनाट्य है। इसमें मोहल्‍ले के बीचों बीच स्थित पाटे जिनका उल्‍लेख मैं पहले कर चुका हूं, पर एक नाटक का मंचन किया जाता है। इसमें कलाकार बाहर से नहीं बुलाए जाते बल्कि गली मोहल्‍लों के ही कलाकार पाटे पर पहुंचते हैं और पूरी रात नाटक का मंचन चलता है। लेकिन पाटे पर चढ़ने की राह इतनी आसान भी नहीं होती। पहले सर्वसम्‍मति से कलाकार तय होते हैं। हफ्तों और महीनों पहले इसका अभ्‍यास शुरू हो जाता है। और जब कलाकार मंच पर होते हैं तो एक एक पेज तक के डॉयलॉग एक सांस में बोल जाते हैं। ऐसा बहुत कम ही हुआ है कि कोई कलाकार स्‍टेज पर अपना डॉयलॉग भूला हो। 

हड़ाऊ मैरी की रम्‍मत जहां प्रेम कहानी है वहीं अमर सिंह राठौड़ की रम्‍मत वीर रस से ओतप्रोत होती है। इन नाटकों को लिखा भी स्‍थानीय लोगों ने ही है। रम्‍मत के दौरान ही ख्‍याल भी गाए जाते हैं। ख्‍याल एक प्रकार से तत्‍तकालीन सामाजिक और राजनैतिक व्‍यवस्‍थ पर कटाक्ष होते हैं। स्‍थानीय नेता और जनप्रतिनिधि भी कई बार इन समारोहों में मौजूद रहते हैं और ख्‍याल के दौरान हुए कटाक्ष को हंसते हुए झेलते हैं। उनके पास सिवाय बड़े बूढ़ों के पैर छूने के और कोई ईलाज नहीं होता।

फागणिया फुटबॉल और स्‍वांग

यह भी बीकानेर की अनूठी परम्‍परा है। यहां के पुष्‍करणा स्‍टेडियम में होली से पहले एक दिन फागणिया फुटबॉल भी खेली जाएगी। जिसमें बराक ओबामा से ओबामा बिन लादेन तक सभी शिरकत करेंगे। अस्‍पताल का रोगी और कुंवारी कन्‍या के पीछे भागता साधू भी नजर आ जाएगा। हां जी यह है फागणिया फुटबॉल और जिन लोगों को आप देखेंगे वे होंगे स्‍वांग। यानि बहूरूपिए। बीकानेर के गली मोहल्‍लों में ये स्‍वांग अभी दे दिखाई देने लगे हैं। कई बार तो अजीब स्थिति तब होती है जब अपने काम से जा रहे आदमी को अचानक पीछे से एक युवती आकर दबोच लेती है। आदमी सचेत हुआ तो उसे पता चल जाएगा कि यह युवती का स्‍वांग किए लड़का है तो वापस सहज हो जाएगा वरना बुरी तरह झेंपेगा। कई आदमी तो इतना अच्‍छा स्‍वांग रचाते हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि आदमी है कि औरत। अच्‍छी तरह साफ की गई दाड़ी और गहनों से लदे आदमी की मर्दानगी वेषभूषा में पूरी तरह छिप जाती है।

होली के गीतों और गेवर पर बात अगली पोस्‍ट में ....

यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे

एक  सूचना 


प्रसिद्ध साहित्‍यकार यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र नहीं रहे। हजार घोड़ों का सवार सहित सवा सौ पुस्‍तकें लिखने वाले यादवेन्‍द्र शर्मा चंद्र ने मीरा पुरस्‍कार सहित तमाम प्रकार के पुरस्‍कार लिए और अंत तक सादा जीवन जीया। अपनी पत्‍नी जिसे वे भट्टाचार्य के नाम से पुकारते थे, के साथ अंतिम दिनों तक बीकानेर स्थित अपने ही छोटे से घर में रह रहे थे। पिछले दिनों तबियत बिगड़ने पर उन्‍हें एम्‍स ले जाया गया। वहां एक महीने के इलाज के बाद बीकानेर के पीबीएम अस्‍पताल लाया गया। जहां दो-तीन दिन आईसीयू में भर्ती रहने के बाद उन्‍होंने इस ग्रह को अलविदा कह दिया। हिन्‍दी के अलावा मायड़ भाषा में उनके किए कार्यों को लोग लम्‍बे समय तक याद रखेंगे। जनकवि हरीश भादाणी, चिंतक नन्‍दकिशोर आचार्य सहित साहित्‍य से जुड़े तमाम लोगों को साहित्‍य के बड़े भाई के निधन पर शोक हुआ है। मेरा उनसे परिचय इतना था कि बचपन में एक बार उनके घर गया तो उन्‍होंने खुद की लिखी कहानियों की एक छोटी सी किताब मुझे भेंट की थी। इसके बाद कभी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी।

देश में बीकानेर को पहचान और सम्‍मान दिलाने वाले चंद्र की आत्‍मा को ईश्‍वर शांति दे।

उनकी एक पुस्‍तक मरु केसरी की झलकी देख सकते हैं।

बुधवार, 4 मार्च 2009

ऐसो बंसी बजाइ रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...

बीकाणे में जमा होली का रंग
कहते हैं बीकानेर में होली गुजरने के छह महीने तक उसका असर बना रहता है और छह महीने पहले होली की रंगत शुरू हो जाती है। यहां के व्‍यासों को तो साल के किसी भी दिन होली की तरंग में आने की बाकायदा छूट मिली हुई है। वे कभी भी कुछ भी कर सकते हैं। अब जब होली में कुछ ही दिन बाकी बचे हैं तो होली की रंगत परवान पर चढ़ चुकी है। तंग गलियों, खुले मोहल्‍लों और शहर की फसील से सटी चाय-पान की दुकानों पर होली के रसिए शाम ढलते ही एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। डफ (चंग) के साथ के साथ रसियों की फौज जैसे मस्‍ती का माहौल बनाती है, उसे देखकर आने जाने वाले भी रुककर कुछ देर संगीत का आनन्‍द लेते हैं। 

ऐसो बंसी बजई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे...
महलां मांई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो.. 

रात गहराने के साथ धोरों से लिपटकर आई बयार फिजा में कुछ ऐसी मस्‍ती घोल देती है कि आठ से साठ सभी मस्‍ती की तरंग में झूमने लगते हैं। बीकानेर में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की खेलणी सप्‍तमी के दिन से होली की अधिकारिक घोषणा हो जाती है। यानि इस दिन से होली की मजाक, गीत और तराने हर कहीं सुनाई देने लगते हैं। अब किसी ने बुरा माना तो वह खुद बुरा बन जाएगा। तैयार रहिए होली की मजाक के लिए। 
अगली पोस्‍ट में बताउंगा होली की रम्‍मतों और गीतों के बारे में...