गुरुवार, 18 जून 2009

चिडि़या पानी तो पी ले, लेकिन दूब न खाए

प्रकृति की नेमतें मुझे और भी हीनता का अनुभव कराती है जब मैं सोचता हूं कि मेरे घर के बगीचे में रखे पाळसिए यानि मिट्टी के बर्तन में रखे पानी को पीने के लिए चिडि़याएं आएं और पानी पीएं। इससे मेरे घर में चिडि़यों का संगीत गूंजता रहेगा। लेकिन इसके साथ ही मैं चाहता हूं कि वे बगीचे में उगी दूब को न खाएं। प्रकृति तो शायद ऐसा नहीं सोचती। बिना किसी रिटर्न की चाहत मुफ्त में हजारों चीजें उपलब्‍ध करा देती हैं जो जिंदगी को और भी भरपूर बना देती हैं।

अब रजनीगंधा और अनोखी मकड़ी

<KENOX S760  / Samsung S760>

रजनीगंधा में खिला फूल और उस पर सफेद जीव छोटा सा

<KENOX S760  / Samsung S760>

पूरी खूबसूरती के साथ

<KENOX S760  / Samsung S760>

वह जीव मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता

<KENOX S760  / Samsung S760>

मोगरा। इसे हाथी मोगरा भी कहते हैं।

जीव के बारे में किसी को पता हो तो बताइएगा। मैंने तो इसे पहली बार देखा है। यह मकड़ी की तरह दिखाई देता है। सभी फोटो इनलार्ज हो सकते हैं।

one more clear photo


शनिवार, 6 जून 2009

आज ही सांस ली है

पिछले कई दिन से जैसे मशीन ही बन गया था। सुबह आठ बजे दिन शुरू होता और रात को तीन बजे खत्‍म होता। अगले दिन सुबह आठ बजे फिर दिन शुरू हो जाता। पर मजा आ गया।

अतिव्‍यस्‍तता के कारणों में से एक प्रमुख कारण था वास्‍तु की कक्षाएं। समर स्‍कूल में मुझे छह दिन तक वास्‍तु संबंधी कक्षाएं लेने का मौका मिला। अभी से पहले कभी पढ़ाया नहीं और पढ़ा भी ढंग से नहीं। कक्षाएं शुरू होने से पहले ही मुझे बता दिया गया कि मेरी अनौपचारिक कक्षा में एक ऐसे सज्‍जन ने भी पंजीकरण कराया है जो एक स्‍थानीय अखबार में वास्‍तु पर नियमित कॉलम लिखते हैं। सच पूछिए तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। बाकी प्रतिभागी भी धुरंधर थे। कक्षा शुरू होने से पहले अठारह दिन तक लगातार पढ़ता रहा। साथ ही मनन भी करता रहा कि कहां से शुरू किया जाए और कहां तक ले जाया जाए। लेकिन अब तक पढ़ा सबकुछ रिकॉल किया। सारे नोट्स दोबारा संभाले। आखिर वह दिन आ गया।

मैं समय से पहले कक्षा में पहुंचा। लेकिन कक्षा खाली मिली तो इधर-उधर घूमने लगा। थोड़ी देर बार कॉर्डिनेटर को जाकर कहा तो उसने बताया कि सभी प्रतिभागी आ चुके हैं। कक्षा के बाहर ही खड़े होंगे। मैं वापस कक्षा की तरफ दौड़ा तो वहां कुछ वरिष्‍ठ पुरुष और महिलाएं खड़े थे। मैं उन्‍हें नजरअंदाज कर कक्षा में घुस गया और बोर्ड साफ करने लगा। मैं जिस बात को अवोईड करना चाह रहा था वही हुई। सबसे पहले स्‍तंभकार कक्षा में आए। और आते ही मेरा इंटरव्‍यू लेने लगे। पूछा क्‍या आता है आपको वास्‍तु के बारे में। आमतौर पर मैं जवाब देता हूं कि कुछ खास नहीं बस सीख रहा हूं। लेकिन अपनी कक्षा में यह बात कहना और वह भी पहले प्रतिभागी को नुकसानप्रद हो सकता था। सो उनकी बात मैं हंसकर टाल गया और समर स्‍कूल और दूसरे विषयों पर बात करने लगा। थोड़ी देर में उन्‍होंने पूछा कि आपको कितने साल हुए हैं अध्‍ययन करते हुए। मैंने गर्व से बताया कि ग्‍यारह साल हुए हैं। तो वे बोले 'बेटा' मैं 1990 से इस व्‍यवसाय में हूं। मेरी पीठ पर पसीना आ गया। वैसे उस दिन गर्मी भी अधिक थी। :)

खैर एक एक कर सभी प्रतिभागी अंदर आते गए और मैं किसी तरह अपना कांफिडेंस संभाले बैठा रहा। सबसे अच्‍छी बात यह रही कि एक हंसमुख बच्‍ची भी वास्‍तु की कक्षा में थी। मैंने उसी से शुरूआत की। मैंने उससे पूछा क्‍या होता है वास्‍तु। वह मुस्‍कुराई और जो भी उसके मन में आया बोलती गई। मेरा काम आसान हो गया। उसकी गलतियों को सुधारते हुए मेरी गाड़ी चलने लगी। पहले दिन आसानी से डेढ़ घण्‍टे तक मैं वास्‍तु के मूल सिद्धांतों के बारे में बताता रहा और उसी दिन मैंने सभी प्रतिभागियों को वास्‍तु की एक पुस्‍तक भवन भास्‍कर जो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है लाने के लिए कह दिया। यह मेरी पसंदीदा किताब है। फेंग शुई से अछूती और प्राचीन सिद्धांतों से परिपूर्ण। कहीं कोई शंका की गुंजाइश नहीं।

कक्षा खत्‍म होते ही घर आया और किताब को एक बार फिर पूरी पढ़ गया। अब मैं फुल चार्ज था। अगले दिन उन्‍हीं स्‍तंभकार ने दो-तीन बार मुझे टोका लेकिन मैं अपनी रौ में फ्रायड, डेल कारनेगी, स्‍टीफन आर कोवे, एलन पीज और विवेकानन्‍द तक के उद्धरण देते हुए अपनी बात पूरी करता गया और प्रतिभागियों के समक्ष तस्‍वीर स्‍पष्‍ट होती गई। हर किसी के दिमाग में कहीं न कहीं कोई न कोई भ्रांति पहले से थी। अधिकांश ने पहले से वास्‍तु का कुछ न कुछ अध्‍ययन किया हुआ था। अच्‍छी बात यह थी कि किसी ने भवन भास्‍कर नहीं पढ़ी थी। हर रोज एक विषय लेकर उसे पूरा करता और कक्षा के अंत तक किसी ने किसी मॉडल का विश्‍लेषण करता। पांचवे दिन प्रतिभागी परफेक्‍ट मॉडल बनाकर लाए। उन मॉडल्‍स में गलतियां बताई और आखिरी दिन तो दो मॉडल बिल्‍कुल परफेक्‍ट बन गए। हर दिन मेरे और मेरे प्रतिभागियों के चेहरे पर चमक बढ़ती गई। बस एक गड़बड़ हुई कि आखिरी दिन स्‍तंभकार महोदय नहीं आए। कक्षा खत्‍म होने के बाद उनका फोन आया। बोले मैं किसी कारणवश आ नहीं पाया इसलिए माफी चाहता हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं। उस समय मैं कॉर्डिनेटर के पास बैठा था।  उन्‍होंने कहा परीक्षा से डर से नहीं आए होंगे। मैंने कहा परीक्षा की तो कुछ बात ही नहीं थी। तो उन्‍होंने बताया कि हर कोर्स में आखिरी दिन परीक्षा का प्रावधान है। उसमें टॉप रहने वाले विद्यार्थी को पुरस्‍कृत किया जाएगा।

अब बात मेरी समझ में आई कि स्‍तंभकार महोदय को लगा कि मैं परीक्षा लूंगा और फेल कर दूंगा तो उनकी फजीहत होगी लेकिन हकीकत में मुझे परीक्षा के बारे में जानकारी ही नहीं थी। खैर मैंने एक टॉप विद्यार्थी का नाम बता दिया जिसे पुरस्‍कृत किया जाएगा।

इस तरह छह दिन का समय इतना अधिक व्‍यस्‍तता वाला रहा कि न तो ब्‍लॉग पढ़ पाया न लिख पाया। रात को दो बजे के बाद भी बैठता तो केवल केरल पुराण की कोई नई कथा पढ़ने या इक्‍का दुक्‍का दूसरे ब्‍लॉग देखने। इसी दौरान कुर्सी पर ही नींद आ जाती।

खैर आज पुरानी सारी मेल देखी। ज्‍योतिष दर्शन पर लेख डाला और यहां आपबीती सुनाने आ गया। अच्‍छा रहा ये सप्‍ताह...

गुरुवार, 21 मई 2009

जो ब्‍लॉगर मुझे प्रभावित करते हैं - चिठ्ठा चर्चा

पिछले कई दिन से लिखने के बजाय पढ़ने का क्रम बना हुआ है। नेट पर बैठता हूं। पहले अपने पसंदीदा ब्‍लॉग्‍स को खोलकर पढ़ता हूं। फिर वहां मिली कडि़यों से आगे बढ़ता जाता हूं। दो चार या छह घण्‍टे तक यही क्रम चलता है। इस दौरान लगा कि कई चिठ्ठे बहुत अच्‍छे हैं। मुख्‍यतया कंटेट के मामले में। सोचा अन्‍य पाठकों को भी बताया जाए। अब इसका लहजा स्‍वत: ही चिठ्ठा चर्चा जैसा बन रहा है। देखिएगा।

केरल पुराण   बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायणजी एक के बाद दूसरी केरल की शानदार कहानियां सुना रहे हैं। बीच-बीच में एक दो दिन का गैप आता है तो लगता है अंतराल में सदियां बीत गई। हर कहानी बहुत शानदार। और अनुवाद लगातार निखरता जा रहा है। कई कथाएं तो छह या सात खण्‍डों में भी हैं। रसास्‍वादन कीजिएगा।

लिख डाला में शाहिद मिर्जाजी  यह बिल्‍कुल लॉटरी लगने जैसा अनुभव है। शाहिद मिर्जा जी को जो लोग जानते हैं। यानि लाखों लोगों को पता है कि उनका लेखन कैसा रहा है। उनकी पत्‍नी वर्षा भम्‍भाणी मिर्जा जी ने अपने ब्‍लॉग लिख डाला में उनका एक लेख पिछले दिनों प्रकाशित किया। सालों पहले लिखा गया लेख आज भी उतना ही सटीक है। इसे कालजयी कृति कह सकते हैं। देखिएगा...

Life is beautiful  इस ब्‍लॉग के बारे में शायद रविरतलामीजी ने बताया था। रंगीन चित्रों में कला से अधिक जीवन ढूंढने की कोशिश करता यह ब्‍लॉग वाकई शानदार है। हर पोस्‍ट में पिछली पोस्‍ट से अधिक सशक्‍त अभिव्‍यक्ति दिखाई देती है। हैं बस चित्र ही...

ज्‍योतिष की सार्थकता पंडित डीके शर्माजी अब तक सॉफ्ट अंदाज में अपनी बातें कहते रहे हैं। उनके ताजे लेख में तो उन्‍होंने विज्ञान की सबसे एडवांस शाखा अंतरिक्ष विज्ञान के समक्ष ही चुनौती पेश कर दी है। मेरा मतान्‍तर यह है कि ज्‍योतिष को ज्‍योतिष ही रहने दिया जाए उसे विज्ञान सिद्ध करने के चक्‍कर में अधिक कचरा होता है। क्‍यों न अब विज्ञान को ही ज्‍येातिष के पैमाने पर परखने का प्रयास किया जाए।

निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग  निशांत मिश्राजी ने जेन कथाओं के साथ इस ब्‍लॉग की शुरुआत की। शुरू में छोटी छोटी कहानियां आ रही थी। बाद में कुछ बड़ी और बहुत बड़ी पोस्‍टें भी आई। लेकिन अब भी छोटी प्रेरक कथाओं का क्रम चालू है। हर रोज इस ब्‍लॉग पर एक तो ऐसी कथा होती ही है। कभी सुनी हुई तो कभी बिल्‍कुल नई। पिकासो और आइंस्‍टाइन के वृत्‍तांत को कमाल के हैं। इसे फीड रीडर से नियमित पढ़ा जा सकता है। मैं इस ब्‍लॉग का फैन हूं।

संजय व्यासजी ये जोधपुर के हैं। पिछले दिनों पहली बार इनके ब्‍लॉग पर गया और एक अभिशप्‍त कस्‍बे की कहानी पढ़कर इनका मुरीद हो गया। अब गूगल फ्रेंड कनेक्‍ट के माध्‍यम से इनसे जुड़ गया हूं और आगे नियमित पढ़ने की कोशिश करूंगा। आप भी इन्‍हें पढ़ सकते हैं। इनके लेखन में ताजे पानी का अहसास होता है।

डॉ अनुराग आर्य इनके ब्‍लॉग पर पहले भी जाता रहा हूं लेकिन पिछली पोस्‍ट में अनुराग जी ने क्‍लीन बोल्‍ड कर दिया। तर्जुमा था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव' और इसका सुधार था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव- इट हैपंस' आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं। आप जब भी वहां पहुंचेंगे तो अपने छात्र जीवन और उन दोस्‍तों को जरूर याद करेंगे जो बेगरज आपके यार रहे हैं।

बस इतना ही... बाकी के बारे में फिर कभी बताउंगा। ब्‍लॉग के लिंक उठाना और उन्‍हें एक एक कर जमाना वाकई कठिन काम है। चिठ्ठा चर्चा नियमित रूप से करने वालों को साधुवाद। :)

बुधवार, 20 मई 2009

याद आई फैशन परेड

पिछले दिनों मेरे नानीजी श्रीमती राधादेवी हर्ष जयपुर से बीकानेर आई। अपने आवश्‍यक काम निपटाने के दौरान एक दिन मुझे पुराने घर बुलाया और मुझे एक शर्ट दिया। लाल चौकड़ी वाला। यह शर्ट मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में  पहनता था। मैंने मुस्‍कुराते हुए पूछा ये फैशन परेड के लिए है क्‍या ?

तो नानीजी भी हंस पड़ी बोली तुम्‍हें नहीं दे रही, कान्‍हे की मां को दे देना। यह सामान्‍य काम था। मोटरसाइकिल में शर्ट की थैली को अटका लिया। घर आया तो याद आया कि शर्ट पड़ा है। मैंने बताया कि कान्‍हे के लिए नानीजी ने कोई शर्ट भेजा है वह मेरा पुराना शर्ट है। कान्‍हे की मां दौड़ी- दौड़ी बाहर गई और शर्ट ले आई। हाथों-हाथ कान्‍हे को पहनाकर दिखाया। उस समय कान्‍हे और उसकी मां की आंखों की चमक देखने लायक थी। पता नहीं पुरुष हूं इसलिए या मूढ हूं इसलिए, मुझे कभी समझ नहीं आया कि पुराना शर्ट कुतूहल कैसे पैदा कर सकता है। जो भी हो मुझे अपनी फैशन परेड याद आ गई।

फैशन टीवी के जमाने से बहुत साल पहले मेरे घर में फैशन परेड का जमाना आ गया था। साल में दो बार यह परेड होती। रंगबिरंगे कपड़े, जमा जमाया रैम्‍प और केवल जज। हां जी जितने दर्शक होते उतने ही जज होते। एकाध आया-गया भी अपनी राय जरूर भेंट चढ़ा जाता। बस तकलीफ तब होती जब अनफिट कपड़ों में हमें फिट करने का प्रयास किया जाता। सर्दियां खत्‍म होकर गर्मियां शुरु हो या गर्मियां खत्‍म होकर सर्दियां शुरू हो। नानीजी पुराने कपड़े निकालकर बैठ जाती और मुझे और भाई आनन्‍द को एक एक कर आवाज देती। बीते मौसम में कम बार पहने हुए कपड़े, मामा के कपड़े और मामा के मामा के कपड़े और कई साल पहले सिलाई हुए कपड़े। सब एक जगह पड़े होते। पैंट की हाफपेंट बनती और शर्ट की बंडी। कुल मिलाकर कपड़ों में हमें फिट किया जाता। अब ये कपड़े दुरुस्‍त भी लग रहे हैं या नहीं इसे देखने के लिए अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक चलना होता और वहां से लौटना होता। ड्रेस डिजाइन, कांबिनेशन, लैंथ, चालू फैशन को किसी तरह मैच करने का प्रयास किया जाता। गर्मी की छुट्टियों में नानीजी (जो खुद अध्‍यापिका थी) हमारी तरह पूरी तरह फ्री होती। तो, किसी भी सुबह यह क्रम शुरू हो जाता और अगले कई दिन तक जारी रहता। इस दौरान जा पहचान के लोग, रिश्‍तेदार और मामाओं के दोस्‍त तक मिलने के लिए आते। हर किसी की अपनी राय होती। किसी को रंग की फिक्र होती तो किसी को डिजाइन की, कोई कांबिनेशन पर ध्‍यान देता तो कोई बचत के प्रति जागरुक दिखाई देता। पचासों ड्रेस ट्राई करने के बाद पांच-सात ड्रेस ऐसी होती जिनको कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के लिए रख लिया जाता और अधिकतम राय जुटाने के प्रयास किए जाते। इसी क्रम में सात ड्रेस को उनचास बार पहनकर दिखाना पड़ता और रैम्‍प वही रहता। अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक। कई दिनों तक चलने वाले इस क्रम में अगर हम दोनों में से कोई 'बागी' हो जाता तो उसकी खैर नहीं। नानीजी झल्‍ला जाते। कहते मैं इतनी मेहनत से इन बच्‍चों के लिए यह काम कर रही हूं और इन्‍हें कदर ही नहीं है। हम हारकर फिर से परेड में जुट जाते।

 

हमारी बगिया में खिला एक और सुंदर फूल

<KENOX S760  / Samsung S760>

मुझे इसका नाम पता नहीं है। यह आकार में काफी छोटा है और हमारा माली इसे फुलवारी कहता है। किसी को पता हो तो बताने की कृपा करें।

मंगलवार, 12 मई 2009

जब अवार्ड लेकर आया था।


जनवरी में राजस्‍थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्‍कारों में बीकानेर की जस्‍ट टीम को मिला बैस्‍ट स्‍पेशल कवरेज कैटेगरी में अवार्ड। लेने मुझे भेजा गया था। चित्र में दाएं से दूसरे आगे बैठे हुए पत्रकारों में से एक।