शनिवार, 11 जुलाई 2009

ब्‍लॉग साहित्‍य नहीं है। कन्‍फर्म.

मैंने दो प्रवृत्तियां स्‍पष्‍ट तौर पर देखी हैं। पहली जो परिवर्तन हो रहा है उसे स्‍वीकार नहीं करना और दूसरी कि जो नया है उसे पुराने के भीतर फिट करने का प्रयास करना।

अपनी बात कहने से पहले एक किस्‍सा सुनाना चाहता हूं। कुछ दिन पहले हमारे ग्रुप में बात हो रही थी। कुछ महीने पहले कह सकते हैं। ग्रुप के सभी लोगों के पास ऑरिजिनल विंडो एक्‍स पी सर्विस पैक थ्री था। सभी खुश थे और उसी की बातें कर रहे थे। मैंने बीच में तीर चलाया कि रवि रतलामी ने अपने ब्‍लॉग में बताया है कि माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज सेवन जारी किया है। ग्रुप में सभी लोगों ने ऐसे मुंह बिचकाया जैसे मैंने कोई बचकानी बात कह दी हो। मैंने दोबारा स्‍ट्रेस किया। तो कुछ साथी भड़क गए। बोले अब तक जितना कस्‍टमाइजेशन किया है उसका क्‍या होगा। नई विंडो आएगी तो सबकुछ दोबारा करना पड़ेगा। मोझिला जैसे ब्राउजर को दोबारा टूल करना भी टेढा काम है। बाकी छोटे मोटे सब मिलाकर कम से कम पचास सॉफ्टवेयर दोबारा डालने पड़ेंगे और अपडेट भी लेने पड़ेंगे।

मैं यह बात समझता था लेकिन उम्र के जिस दौर से गुजर रहा हूं हर नई चीज पर जल्‍दी पहुंचने की कोशिश में लगा हूं। सो मैं विंडो सेवन ट्राइ करने के लिए तैयार था। लेकिन अगर ग्रुप में एक भी बंदा मेरे साथ न हुआ तो फंसने पर सहायता मिलने की बजाय लानतें ही मिलती। अब मैंने पैंतरा फेंका। मैंने कहा कि वे लोग कितने बेवकूफ हैं जो अब तक विंडो 98 से चिपके हुए हैं। उन्‍हें न तो ग्राफिक्‍स का आनन्‍द आता है न यूनिकोड के जरिए हिन्‍दी लिखने का कुछ अनुभव है। मेरी इस बात पर सभी लोग प्रसन्‍न हो गए। हम लोग सचमुच आनन्‍द ले रहे थे। माहौल रिलेक्‍स हुआ तो मैंने कहा यदि हमने विंडो सेवन के प्रति रिजिडिटी दिखाई तो थोड़े दिन बाद हमारी हालत भी 98 वालों की तरह हो जाएगी। अब हर किसी का माथा ठनक गया। आधे घण्‍टे तक कैंटीन के बाहर धूप में चाय और सिगरेट चल रही थी। वातावरण नि:शब्‍द हो चुका था। वहां से उठे तो दो साथी सेवन डाउनलोड करने के लिए तैयार हो गए। रात को अनलिमिटेड मिलता है सो अगले दिन सुबह ही कॉल आ गई कि डाउनलोड कर लिया है ले जाना। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। अब इसे इस्‍तेमाल कर रहा हूं तो अपने निर्णय पर गर्व होता है।

अब आता हूं मुद्दे पर ब्‍लॉग को साहित्‍य कहने वाले लोगों की भी कमोबेश यही स्थिति है। दरअसल किसी ने घर में एसी लगाया है तो वह साहित्‍य का हिस्‍सा कैसे हुआ। कोई पुराने ग्रंथ की बातों का अनुवाद पेश कर रहा है तो वह साहित्‍य कैसे हुआ। कोई किसी मुद्दे को लेकर चिंतन कर रहा है, कोई खबर की जुगाली कर रहा है, कोई भाषा को दुरुस्‍त करने की बात कर रहा है, कोई घर परिवार के सदस्‍यों की बात कर रहा है, कोई सुंदर तस्‍वीरें पेश कर रहा है, किसी को देश की चिंता है, किसी को गलत भाषा के उपयोग की, कोई अपने पुराने साथियों को याद कर रहा है तो कोई तकनीक के बारे में जानकारी दे रहा है। इन सबमें साहित्‍य का भी एक भाग शामिल है लेकिन सबकुछ साहित्‍य नहीं है। और न ही इसे होना चाहिए। हम लोगों को प्रकाशन का एक नया माध्‍यम मिला है। अपनी बात, अपनी भावनाएं और अपनी समझ दूसरे लोगों तक पहंचाने का जरिया मिला है। इसे किसी एक शब्‍द या विधा से जोड़ देना वैसा ही है जैसे किसी नए ईजाद किए गए उपकरण पर बल्‍ब या बाइसाइकिल जैसा टैग लगा देना।

एक पत्रकार होने के नाते मैं कह सकता हूं कि ब्‍लॉग का सबसे महत्‍वपूर्ण बिंदु यह है कि आपके विचारों और प्रकाशन के बीच कोई माध्‍यम नहीं है। यह बहुत बड़ी बात होती है। जिन लोगों ने पहले अपनी रचनाएं प्रकाशित कराई है उनसे पूछिए कि एक रचना को प्रकाशन के प्रोसेस में कितना इंतजार और मॉडरेशन झेलना पड़ता था। जो लोग आकाशवाणी में बोले हैं वे जानते हैं कि शब्‍द और समय की सीमाएं कई बार विषय का ही गला घोंट देती हैं। टीवी से जुड़े लोगों को पता है कि विचार और उसके संप्रेषण के बीच हमेशा बाजार खड़ा मिलता है। ऐसे में हर दृष्टि से सृजकों को स्‍वतंत्र कर देने वाले माध्‍यम को मैं साहित्‍य नहीं मान सकता। साहित्‍य तो इसका एक बहुत छोटा अंश है।

मेरा निजी अनुभव बताता है कि इंटरनेट पर जहां सैक्‍स सबसे ज्‍यादा बिक रहा है वहां मनोरंजन पाठक, दर्शक या श्रोता की पहली शर्त है। उसे आनन्‍द आएगा तो वह रुकेगा। वरना आगे बढ़ चलेगा। यह टीवी तो नहीं है जो आधे घण्‍टे के सीरियल में बीस मिनट तक कमर्शियल झेलना ही पड़ेगा। इस माध्‍यम ने जिनता सर्जकों को आजाद किया है उतना ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को भी।

आगे समय है इस आजाद वैश्विक गांव में अपनी पहचान बनाने का। अधिक से अधिक लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हमें इतनी सशक्‍त और प्रभावी बात करनी होगी कि पढ़ने वाला रुक जाए, सुनने वाला थम जाए और देखने वाला ठगा सा रह जाए। खुद के खर्च पर रचनाएं छापने वाले लोगों से यह माध्‍यम बहुत आगे निकल चुका है।

बाकी देखते हैं दुनिया इसे किस नजर से देखती है...

रविवार, 5 जुलाई 2009

मैं संक्रामक हो गया हूं !!

अब मैं कह सकता हूं कि मैं संक्रामक ब्‍लॉगर हो गया हूं। पिछले चार-पांच महीने में कई लोगों को ब्‍लॉग शुरू करवा दिए हैं। इनमें से कुछ ब्‍लॉग तो अच्‍छे खासे चल भी रहे हैं। मुझसे बातचीत करने वाले लोग कहते हैं कि थोड़ी देर की बात के बाद ही मैं ब्‍लॉग-ब्‍लॉग बोलने लगता हूं। पहले पोस्‍ट लिखकर पब्लिश करता और लोगों को घर लाकर वह पोस्‍ट पढ़ाता था। अब जहां भी जाता हूं वहां जीमेल अकाउंट बनवाता हूं और ब्‍लॉग शुरू करा देता हूं। मेरे कई  दोस्‍त तो मेरी इस संक्रामक बीमारी के कारण मुझसे कटे-कटे भी रहने लगे हैं। :)

इस संक्रमण का सबसे पहला शिकार थे मेरे सीनियर अनुराग हर्ष जी। उन्‍होंने अपने नाम से ही अपना ब्‍लॉग शुरू किया। अब एक पोस्‍ट लिखते है। मुझे दिखाते हैं और ब्‍लॉगवाणी पर अपने पाठकों के आंकड़े देखते हैं। दूसरा नम्‍बर रहा पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्‍ता का। उन्‍होंने अपना फोटो ब्‍लॉग WORLD WITH MY EYES बनाया। पहले ही महीने में 55 पोस्‍ट ठेल दी। मैंने कहा बंधुवर कभी कभार हैडिंग भी लिख दिया करो। अब वे हैडिंग लिखकर पोस्‍ट में फोटो ठेलते हैं। इससे आगे अभी मैंने बताया नहीं है सो आगे कुछ करते भी नहीं हैं। तीसरा नम्‍बर कह सकते हैं जूलॉजी के लेक्‍चरर डॉ. प्रताप कटारिया का। उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग desert wildlifer में लिखना तो शुरू कर दिया लेकिन पहली पोस्‍ट मेरे सामने लिखने के बाद आज तक वापस और कुछ लिखा नहीं है। इसके बाद मैंने ट्राइ किया स्‍तंभकार विनय कौड़ा पर। वे कहते तो हैं ब्‍लॉग शुरू करने के लिए लेकिन करते नहीं हैं। अगली मुलाकात में उन्‍हें ब्‍लॉगर बना ही दूंगा। इसके अलावा फूटी आंख नाम से भी एक ब्‍लॉग शुरू करवा चुका हूं। लेखक ज्ञान संतोषजी अपना नाम नहीं बताना चाहते सो उनका नाम नहीं दे रहा। हां अभी तक उन्‍होंने कोई पोस्‍ट नहीं लिखी है लेकिन शीघ्र ही वे एक कुत्‍्ते का इंटरव्‍यू छापेंगे।

पिछले दिनों जयपुर गया था। वहां मेरे एक दूर के मामाजी हैं डॉ शिव हर्ष। उन्‍होंने बीसेक सालों तक अमरीका में हार्ट सर्जन के तौर प्रेक्टिस की और अब वापस जयपुर आकर रहने लगे हैं। उनके कम्‍प्‍यूटर में कुछ खराबी आई थी। उसे दुरुस्‍त कराने के लिए मुझे बुलाया। कम्‍प्‍यूटर तो हाथों-हाथ ठीक नहीं हुआ लेकिन उनका ब्‍लॉग पहले ही बन गया। आप भी देखिएगा भारत में ह्रदय रोग के कारणों और निवारणों पर उनका ब्‍लॉग हार्ट सिम्‍पलीफाइड। यह ब्‍लॉग अंग्रेजी में ही सही लेकिन है केवल भारतीयों के लिए। डॉ शिव पांच दिन में दो पोस्‍ट ठेल चुके हैं और इसी रफ्तार से आगे बढ़ने वाले हैं। आप वहां पहुंचकर उनकी हौंसला आफजाई कर सकते हैं।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

चल मालिश करा के आते हैं!!?

छोटी काशी बीकानेर में हमेशा ही कुछ न कुछ धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। कुछ बड़े तो कुछ छोटे। एक बार एक महाराज आए। प्रखर जी महाराज। उन्‍होंने बीकानेर के धरणीधर महादेव मंदिर में 1008 कुण्‍डीय महायज्ञ शुरू किया था। एक महीने तक मंदिर के पास की सूखी हुई तलाई में होने वाले कार्यक्रम के लिए तलाई को पूरी तरह बालू मिट्टी से ढंक दिया गया। एक बड़ा सभागार बनाया गया। अस्‍थाई सभागार बड़ा मनोरम था। पास ही प्रखरजी महाराज की कुटिया भी बनाई गई। हजारों लोग तलाई का बदला हुआ रूप देखने पहुंचने लगे। बीकानेर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के 1008 जोड़ों ने इस महायज्ञ के लिए पंजीकरण करा लिया था। आयोजन शुरू होने से पहले उसका जबरदस्‍त प्रचार किया गया कि यज्ञ में धन की आहूति देने वाले लोगों को गजब का पुण्‍य मिलेगा। लोगों ने दान देने में कोई कसर नहीं रखी और प्रखर जी महाराज और उनके चेलों ने बटोरने में।

आयोजन शुरू हो गया। हम चूंकि पढ़े लिखे प्रबुद्ध लोगों के परिवार से थे। इसलिए आयोजन से पर्याप्‍त दूरी बनाए हुए थे। फिर भी कौतुहलवश एक बार जाकर देख आए थे कि कैसा दिख रहा आयोजन स्‍थल। अभी आयोजन को शुरू हुए पांच-सात दिन ही हुए थे कि मेरा दोस्‍त प्रभु आया बोला प्रखर जी महाराज के यहां मालिश कराई क्‍या? वह हमेशा ही मुझे हैरान करता रहा है। इस बार तो अति हो गई। मैंने पूछा प्रखरजी महाराज ने यज्ञ के साथ मसाज पार्लर भी खोला है। वो बोला नहीं प्रखर जी महाराज के साथ एक विदेशी शिष्‍य है। उसने शक्तिपात की कला सीखी है। उससे शक्तिपात के बारे में बात करना। तो वह मालिश कर देगा। मेरे लिए यह नई जानकारी थी। मुझे असमंजस में देखकर प्रभु बोला चल मेरे साथ मालिश करा के आते हैं। मैं यंत्रवत् उसके साथ निकल पड़ा। शाम का समय था। यज्ञ की आहूतियां अपने अंतिम चरण में थी। पूरा वातावरण संहिता के श्‍लोकों से गुंजायमान हो रहा था। प्रखरजी महाराज स्‍थानीय जनप्रतिनिधियों को समझा रहे थे कि वे लोग दस करोड़ रुपए एकत्रित करके उन्‍हें दें तो वे बीकानेर में एक वैदिक स्‍कूल स्‍थापित कर सकते हैं। जिसमें सुरम्‍य वातावरण में पढ़ाई संभव हो सकेगी। बड़े-बड़े लोग बैठे थे इसलिए बीच में बोलना उचित नहीं लगा लेकिन मन में आया कि सुरम्‍य वातावरण की इतनी बड़ी कीमत की क्‍या जरूरत है। हम आगे बढ़ गए। कुटिया के पास ही विदेशी शिष्‍य कुछ लोगों को शक्तिपात की जानकारी दे रहे थे लेकिन बीकानेर के मारवाड़ी लोगों को बात पल्‍ले नहीं पड़ रही थी। प्रभु और मैं भी झुण्‍ड में जाकर बैठ गए। कुछ देर में भीड़ कम हुई तो प्रभु ने भगवाधारी विदेशी शिष्‍य को अंग्रेजी में बताया कि मैं दर्शन का विद्यार्थी हूं और शक्तिपात के बारे में जानना चाहता हूं। कुछ देर तक बोझिल ज्ञान से सराबोर करने के बाद जब मैं झपकी लेने की स्‍टेज में आ चुका था तो अचानक उन विदेशी भगवाधारी साधू महाराज ने मेरा सिर सामने से पकड़ा और अपने घुटनों की ओर झुका दिया। वे व्रजासन में बैठे थे। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उन्‍होंने सिर से लेकर मेरी पीठ के आखिरी हिस्‍से तक तेजी से अपने हाथ चलाए(पीटा नहीं :))। इससे मेरी आंखें लाल हो गई। आस-पास बैठे लोगों को लगा कि मुझमें शक्तिपात हो गया है। सच कहूं तो मुझे भी एक बार लगा कि शक्ति बढ़ गई है। मेरा बॉस्‍केटबॉल में स्‍ट्रेचिंग का अनुभव बताता है कि अच्‍छी तरह से स्‍ट्रेच और मसाज हो तो पूरा शरीर हल्‍का हो जाता है। बस वही फीलिंग उस समय हुई। सिर ऊंचा उठाया तो महाराज ने पूछा क्‍यों कुछ महसूस हुआ। मैंने नहीं में सिर हिला दिया। महाराज नाराज हो गए और उठकर चले गए।

बाद में मैं काफी देर तक मेले में घूमता रहा। प्रभु ने महाराज के यहां से छूटते ही पूछा कैसी लगी मालिश। मैंने कहा कि मैं सोच रहा हूं कि दोबारा कैसे कराई जाए। :)

साक्षात प्रखरजी महाराज से एनकाउंटर अगली पोस्‍ट में।

गुरुवार, 25 जून 2009

सब कुछ है गांधीमय (रिंग, रिंग रिंगा भाग तीन)

mahatma-gandhi-indian-hero मैं आजादी के बाद की बात कर रहा हूं। उससे पहले भले ही गांधीजी का जीवंत करिश्‍मा रहा होगा लेकिन इसके बाद कैश कराने की प्रवृत्ति के चलते सबकुछ गांधीमय हो चुका है। गांधी टोपी पहनी तो इसलिए कि गांधीजी ने कहा है और उतारकर रख दी तो इसलिए कि गांधीजी खुद नंगे सिर रहते थे। एक तरफ दलितों के उत्‍थान का विचार है तो दूसरी तरफ दलितों से बराबरी की शुद्ध भावना।

देश में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बन चुकी है। इस कारण नहीं कि मनमोहन सिंह की सरकार ने नरेगा में रोजगार दिया और किसानों के कर्जे माफ किए। या अमरीका से संधि की। बल्कि युवा गांधी के अथक प्रयासों से बुढ़ाती कांग्रेस में नई जान आ गर्इ। युवा नेता ने मंत्री बनने के बजाय संगठन में काम करने की सोची है। अब युवाओं के सामने एक ही लक्ष्‍य है, संगठन को मजबूत करना। परीक्षा दो और सफल हो जाओ। इससे कतार में आखिरी खड़े आदमी को भी लाभ होगा। यही तो गांधीजी चाहते थे।

ठीक है देश का नेतृत्‍व जवान लोग करेंगे। स्‍थानीय प्रतिनिधि से लेकर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर युवा ही देश की बागडोर को थामे रहेंगे। तो बूढ़े क्‍या करेंगे?

बूढे चिंतन करेंगे। आज की समस्‍याएं और गांधी। आज की समस्‍याओं पर चिंतन उन्‍हें मुख्‍यधारा का अहसास कराएगा और गांधी युवाओं की समुद्री आंधी से बचाए रखेगा। तो आइए चिंतन करते हैं आज की कुछ समस्‍याओं पर।

आतंकवाद- आप कहेंगे वाह क्‍या विषय चुना है। आतंकवाद की जड़ असंतोष में है। गांधीजी ने संतोषी प्रवृत्ति का पाठ पढ़ाया था। आतंकवादियों को संतोषी होना चाहिए और सुरक्षा बलों को अहिंसक। बाकी रघुपति राघव राजा राम तो हैं ही। कहीं गए थोड़े ना ही हैं। गांधी हमारे दिल में है और राम सर्वव्‍यापी हैं।

दूसरा मुद्दा बेरोजगारी- (कृपया आरक्षण शब्‍द का इस्‍तेमाल कर इसे राजनीतिक रूप देने की कोशिश न करें।) गांधी ने ग्राम स्‍वराज्‍य का मॉडल दिया था। हर गांव आत्‍मनिर्भर हो तो बेरोजगारी की समस्‍या स्‍वत: ही दूर हो जाएगी। इसके लिए केन्‍द्र की ओर मुंह ताकने की जरूरत नहीं है। संयम और ईमानदारी से ग्राम स्‍वराज्‍य भी बन जाएगा और रामराज्‍य भी आ जाएगा।

सांप्रदायिकता: गांधीजी ने कहा था कि सब मनुष्‍य समान हैं। बस अंग्रेजों को भगा दो। बाकी लोग अपने ही हैं। उनके लिए तो पाकिस्‍तान बनना भी एक सदमा था। गांधीजी ने सर्वजन हिताय की बात की थी। इसमें क्‍या हिन्‍दु, क्‍या मुसलमान, क्‍या सिक्‍ख और क्‍या इसाई। उनकी नजर में तो सब बराबर थे। हमें उनसे सीख लेनी चाहिए।

ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर वरिष्‍ठ नेता पद और लाभ का मोह छोड़कर चिंतन कर सकते हैं। अब देश की बागडोर युवा कंधों पर है तो उन्‍हें देखें और सराहें। जब सलाह की जरूरत होगी तो मांग ली जाएगी। तब तक वे चिंतन करें।

वास्‍तव में गांधी ऐसी चीज है जो हर जगह फिट होती है। किसी भी बिंदु पर चिंतन करो। घुमा फिराकर घुसा दो गांधी में। दलित उद्धारक की छवि से लेकर हजार रुपए के नोट तक गांधी एक जैसे हैं। समस्‍याओं के पैदा होने से लेकर उनके समाधान तक गांधी वैसे ही मुस्‍कुराते हुए मिलते हैं। चलिए अगले करिश्‍मे तक यही सही...

रिंग रिंग रिंगा है आभासी आशावाद। फिल्‍म ने पैदा किया। गरीबी दिखाई। घनघोर दिखाई, विद्रुपताओं की पराकाष्‍ठा दिखाई और अंत में भाग्‍य की जीत दिखाई। भारत भाग्‍य विधाता है और गांधी राष्‍ट्रपिता। स्‍वागत कीजिए पांचवी पीढ़ी के युवा नेता का।

शनिवार, 20 जून 2009

राहत की बात - मैं अकेला नहीं हूं :)

अभी सुरेश चिपलूनकर जी  टिप्पणी सम्बन्धी खुराफ़ात के बारे में बता रहे थे तब पहली बार लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। इस कारण नहीं कि वे ज्‍योतिष और वास्‍तु जैसी विधाओं को कोसते रहे हैं। इस विषय पर तो मैंने उनका विरोध किया है। लेकिन उनकी कविता नहीं समझ पाने की स्थिति ने मुझे काफी राहत दी है। अब तक ऐसा लगता था कि दुनिया के अधिकांश पढ़ने लिखने वाले लोग गद्य के अलावा पद्य को आसानी से समझ लेते हैं और सृजन भी कर लेते हैं। इस पोस्‍ट में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें कविता समझ में नहीं आती। दरअसल मुझे भी नहीं आती। :)

इसके बावजूद नेट पर रोजाना पचासों कविताएं नई आती हैं। मौलिक और गहरी। कईयों के तो शब्‍द और वाक्‍य संरचना तक दिमाग के एंटीना को भी छू नहीं पाते। खैर मुझे लगता है मेरे और सुरेश जी के अलावा जहां में और भी होंगे जो सुखनवर न बन पाए हों। वैसे गद्य लिखकर भी मैं भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की परम्‍परा को ही आगे बढ़ा रहा हूं। उन्‍होंने पद्य में अतुकांत का समावेश किया और फिर अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में गद्य को प्रभावी तरीके से शामिल कर दिया। मैं अपने मन की बात सहज होकर कह पा रहा हूं। तब शायद पद्य की इतनी आवश्‍यकता भी नहीं है।

फिर भी उड़न तश्तरी .... को देखता हूं तो कर्मकाण्‍ड की एक बात याद आ जाती है जिसमें बताया गया है कि सरस्‍वती की बीजमंत्र के साथ आराधना करने पर कवित्‍व शक्ति अर्जित की जा सकती है। समीरजी न केवल गद्य में अपनी बात रोचक और गहराई के साथ व्‍यक्‍त करते है और पद्य भी सहज रच लेते हैं। यह मुझमे ईर्ष्‍या भाव जगा देता है।

(मैं यहां द्वेष नहीं कह रहा :))

इसी तरह अनुराग आर्य जी के दिल की बात ही ले लीजिए। वे अपनी बात गद्य के छोटे बड़े टुकड़ों में करते हैं और आखिर में पद्य की तीन या चार लाइने इतनी प्रभावी होती हैं कि पोस्‍ट के नीचे के कमेंट्स में गद्य से अधिक पद्य तालियां बटोरता नजर आता है। यही स्थिति चिट्ठा चर्चा की भी है। अनूपजी पूरी पोस्‍ट लिखने के बाद आखिर में एक लाइना लिखते हैं। यह एक ओर गद्य होता है तो दूसरी ओर लाइन को पूरा करने के चक्‍कर में पद्य जैसा बन जाता है। यह इतनी रोचक होती है कि मैं पूरी पोस्‍ट छोड़कर पहले एक लाइना पर जाता हूं। वहां कुछ दम दिखाई देता है तो बाकी की पोस्‍ट भी पढ़ लेता हूं वरना आगे रवाना। अनूपजी ने कुछ पोस्‍टें तो पूरी ही एक लाइना लिखी हैं। गद्य और पद्य का यह मिलन किसी चिठ्ठा चर्चा में ही हो सकता है। जहां बात समझ नहीं आने पर लिंक पर चटका लगाओ और पहुंच जाओ माजरा समझने के लिए :)

अब सोच रहा हूं कि ऐं, वद् वद् वाग्‍वादिनी के सवा लाख जप करके कवित्‍व शक्ति प्राप्‍त कर ही लेनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां कहा जाता है धिके जित्‍ते धिकन्‍दे यानि जब तक चलता रह सकता है चलने दो। ठीक है गद्य ही सही... :)

 

आखिर में बात लिंक रोड की। जयपुर के राजीव जैन जी ने एक नया ब्‍लॉग शुरू किया है। यहां वे क्‍लासिफिकेशन के आधार पर ब्‍लॉग्‍स जमा रहे हैं। इसमें बीकानेर के ब्‍लॉग में मेरे ब्‍लॉग का पता भी है। इसके अलावा कार्टूनिस्‍टों के ब्‍लॉग, हास्‍य व्‍यंग, लेखकों, तकनीकी आदि ब्‍लॉगों के बारे जानकारी दे रहे हैं। फिलहाल बहुत कम ब्‍लॉग इनकी लिस्‍ट में है लेकिन यह लगातार बढ़ता रहा तो एक दिन रेफरल चिठ्ठा बन जाएगा। राजीव जी को शुभकामनाएं।