बुधवार, 9 सितंबर 2009

अभिभूत हूं

सात सितम्‍बर को मेरा जन्‍मदिन था। जब पच्‍चीस साल का हुआ था तो लगा था कि बहुत बड़ा हो गया। तब से हर बार वर्षगांठ आने पर लगता कि अरे अभी तक कुछ किया भी नहीं और चौथाई जिंदगी निकल गई। आस-पास का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। सो लगता कि जन्‍मदिन आने का मतलब है बहुत खराब बात। एक और साल हाथ से निकल गया। इस भावना ने दिन में काम के घण्‍टों को बढ़ा दिया था। पहले पढ़ाई के साथ-साथ कम्‍प्‍यूटर कोर्स और खेल-कूद जारी रखे तो नौकरी लगने के बाद भी दूसरे आयाम खोजता रहा।

2008 में सक्रिय रूप से ब्‍लॉगिंग में जुड़ा और इसके बाद तो जैसे पंख लग गए। रोज नए लोगों से जानकारी और रोज नए विचार। कभी-कभार इतनी खुश करने वाली घटनाएं भी नहीं होती लेकिन ओवर ऑल बहुत अच्‍छा समय रहा। अभी सात सितम्‍बर को 32 साल का हो रहा था, तब अचानक इस बार दो-तीन दिन पहले घर में जन्‍मदिन की तैयारी शुरू हो गई और बाहर भी लोग पूछने लगे। ऑफिस में जहां आमतौर पर मैकेनिकल माहौल रहता है, वहां भी सरसता घुल गई। स्‍टॉफ के कई लोगों को पता था कि सात सितम्‍बर को मेरा हैप्‍पी बर्थ डे है :)

उत्‍साह बढ़ता गया, मैंने पाबलाजी को मेल करके आग्रह किया कि ब्‍लॉगर्स के जन्‍मदिन में मेरा नाम भी शामिल किया जाए। पांच सितम्‍बर को सुबह मेल की और दोपहर तक तो उनकी मेल वापस भी आ गई। शाम तक तो नाम भी जुड़ चुका था और सात सितम्‍बर को बड़े फोंट में उस ब्‍लॉग पर प्रकाशित हुआ कि आज सिद्धार्थ जोशी का जन्‍मदिन है। ऐसा लगा किसी और के बारे में पढ़ रहा हूं। नीचे बधाइयों के संदेश जुड़ते गए।

ब्‍लॉग, ईमेल, एसएमएस, ऑरकुट और फोन कॉल के दौर सुबह-सुबह शुरू हो गए जो देर रात तक चलते रहे। सालों बाद ऐसा लगा कि वाह... ऑफिस में तो छोटी सी पार्टी भी हो गई।

घर में भी पार्टी भी हुई। परिवार के लोग एकत्रित हुए। हमारे यहां काठे दाल-भात और लापसी बनते हैं। यह टिपिकल राजस्‍थानी या कहूं बीकानेरी खाना है। कुल जमा पंद्रह लोग शामिल हुए लेकिन गिफ्ट खूब आए। सबने दिए। कैश भी। मजा आ गया।

साल में कम से कम एक बार तो ऐसा होना ही चाहिए कि बर्थ डे ब्‍वॉय बना जाए। दिन में जमकर खुशियां मनाने के बाद रात को उत्‍साह के मारे नींद भी नहीं आई। (वैसे भी रोज दो बजे से पहले सोता नहीं हूं)। बैठकर बीते सालों के बारे में सोचता रहा। फर्क बस इतना था कि अच्‍छी बातें ही ध्‍यान आई।

पता नहीं साल कैसा बीतेगा लेकिन पहला दिन इतना मस्‍त था कि लगा पूरा साल बढि़या जाएगा। एक बार फिर सभी लोगों को दिल से धन्‍यवाद। मेरे खास दिन को खासमखास बनाने के लिए।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

क्‍या हम अपनी ही ताकत से डरते हैं ?

मुझे लगता है हां, कई बार यह इतनी अधिक हो जाती है कि समझ में नहीं आता कि इसका क्‍या किया जाए। तब या तो इसे नष्‍ट करने के तरीके ढूंढने लगते हैं या फिर उसे डायवर्ट कर देते हैं। वास्‍तव में पूरी ताकत का क्‍या किया जाए इसका जवाब काफी टेढ़ा है। गांधी, नेहरू, सरदार वल्‍लभ भाई पटेल, कृष्‍ण मेनन, चेतन भगत, नेपोलियन, हिटलर, डेंजिल वाशिंगटन, इंदिरा नुई, इंदिरा गांधी, सचिन तेंदुलकर सहित हजारों नाम गिनाए जा सकते हैं। वही बहत्‍तर हजार आठ सौ चौसठ नाडि़यां और वही फेफडे़ होने के बावजूद प्रयासों में जमीन आसमान का अन्‍तर है। तो क्‍या शरीर से इतर दिमाग की कोई नस ऐसी भी है जो बाकी के हिस्‍से को खोलने से रोकती है।

कुछ भी हो ताकत तो वही है, फिर कौनसी चीज है जो हमें रोकती है...

क्‍या है जो उन्‍हें लगातार आगे बढ़ने और अनजान की ओर जाने का साहस देता है...

कौनसी शक्ति इसके पीछे काम करती है्...

कैसे वे अपनी शक्ति को नियंत्रित कर पाते हैं...

यह भाग्‍य तो नहीं हो सकता क्‍योंकि भाग्‍य की बात की जाए तो इनमें से अधिकांश लोगों ने आम लोगों से अधिक दुर्भाग्‍य झेला होगा...

क्‍या वास्‍तव में हम अपनी ताकत से डरते हैं... ?

शनिवार, 29 अगस्त 2009

दार्शनिकता कब शुरू होती है

Adi    SwamiMain      ka     11024X768

दो साल तक ऑ‍फीशियली दर्शन का विद्यार्थी रहा। ऑफीशियली का मतलब पोस्‍ट ग्रेजुएट का विद्यार्थी रहा। उन दो सालों में ओशो, कृष्‍णामूर्ति, अरविन्‍द और विवेकानन्‍द के जीवन दर्शन से इतर शुद्ध लॉजिकल दर्शन से रूबरू हुआ। मेरे लिए जुदा अनुभव था। 'मैं हूं इसलिए ईश्‍वर है' और 'घोस्‍ट इन द मशीन' के पश्चिमी विचारों से लेकर 'एको ब्रह्म जगत मिथ्‍या' तक के विचारों को पढ़ गया था। हालांकि शंकराचार्य उत्‍तरार्द्ध में आते थे लेकिन मैं उन्‍हें भी पूर्वाद्ध में पढ़ गया। कोई काम तो था नहीं, नया नया शौक था सो पढ़ता गया। दिसम्‍बर की सर्दियों में जोधपुर विश्‍वविद्यालय से एक प्रोफेसर आए जोशी जी (अभी उनका पूरा नाम याद नहीं आ रहा, वे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर भी हैं।) का अतिथि व्‍याख्‍यान हुआ। पहले दिन उन्‍होंने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में 'दर्शन क्‍या है' पर भाषण दिया। न तो भाषण समझ में आया न उसका औचित्य। एक सवाल उन्‍होंने शुरू से आखिर तक खड़ा किया था कि दर्शन कब शुरू होता है। और मेरे दिमाग में एक ही बात आई कि जब आदमी खा पीकर लेटी हुई मुद्रा में होता है तब यह दर्शन शुरू होता है।

भाषण के आखिर में उन्‍होंने पूछ ही लिया कि बताइए दर्शन कब शुरू होता है। उनका मतलब सत्‍य की खोज लॉजिकल तरीके से पराकाष्‍ठा तक पहुंचने के संदर्भ था। उन्‍होंने डेढ़ घण्‍टे के अपने भाषण में यही स्‍थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन मैं अड़ गया। मेरे पास अपने ठोस कारण थे। हमारी बीकानेर की डूंगर कॉलेज में पूर्वाद्ध और उत्‍तरार्द्ध के अस्‍सी छात्रों में एक भी ऐसा बंदा नहीं था जो स्‍थापित परिवार से न हो। यानि सब खाते-पीते घरों के। पोस्‍ट ग्रेजुएट करके भी वे अपने परिवारों पर अहसान कर रहे थे, कि बेरोजगार नहीं है पढ़ रहे हैं। मेरे खा-पीने के बाद लेटने वाले लॉजिक में दम था। हमारी कॉलेज के संस्‍कृत के एक विद्वान अध्‍यापक को मेरी बात जंची नहीं। वे सोच रहे थे कि मैं दर्शन की मजाक बना रहा हूं लेकिन जोशी सर समझ गए। उन्‍होंने कहा आज के संदर्भ में तुम्‍हारी बात ठीक है लेकिन पश्चिम में अरस्‍तू और भारत में शंकराचार्य ने भूखे रहकर दर्शन को स्‍थापित किया। इस पर मेरा कहना था कि वे शुद्ध विचार थे जिन्‍हें अब दर्शन में शामिल किया गया है। जोशी सर का पक्ष भी उतना ही दमदार था, लेकिन मेरा लॉजिक भी कॉलेज में दर्शन को चुनौती दे रहा था। इस बीच संस्‍कृत वाले सर बौखला गए। वे वार्ता को सिरे पर पहुंचाने के बजाय मुझे ही डांटने लगे। उनके कारण बात सिरे पर नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में भाषण और संवाद खत्‍म होने के बाद बाहर बरामदे में मैंने कोशिश की कि जोशी सर से एक बार फिर बात की जाए लेकिन दूसरे अध्‍यापकों ने मुझे मौका नहीं दिया। अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त लैक्‍चरर से हर कोई मिलने को उत्‍सुक था। मेरी बात वहीं  रह गई।

अंत में मैंने अपने स्‍तर पर ही निष्‍कर्ष निकाला कि अब जो दर्शन है वे इलाईट क्‍लास के हाथ में है ओर कुछ नया विचार आने के बजाय बस पुराने विचारों की जुगाली हो रही है। बाद में और भी पढ़ा पर कहीं भी शुद्ध दार्शनिकता नहीं मिली। उन दो सालों के बाद जब भी ओशो को पढ़ा तो लगा कि वे लॉजिक से स्‍थापित पुरानी बातों को चुनौती दे रहें, उसमें नया कुछ नहीं बस विरोध है। हर स्‍तर पर विरोध, चार्वाक को खराब बताया गया है तो चार्वाक का समर्थन कर देते हैं और नीति को सही बताया गया है तो उसके औचित्‍य पर सवाल खड़ा कर देते हैं। विवेकानन्‍द और अरविन्‍द पुरानी बातों को नए अंदाज में दोहरा रहे हैं। बस कृष्‍णामूर्ति का संवाद नया है लेकिन सिरे चढ़ता नहीं लगता। खुले सूत्र इतने अधिक हैं कि वह स्‍थाई नहीं दिखाई देता।

उत्‍तरार्द्ध में जब डेजरर्टेशन देने का मौका आया तब भी मैंने पुराने विचारों को ही लिया। बस अंतर इतना था कि दो दर्शनों को जोड़ दिया था। वास्‍तव में यह कहना भी गलत होगा कि जोड़ दिया। वे खुद जुड़े हुए हैं। राबिया,  अमीर खुसरो, खय्याम, इकबाल जैसे विचारक वास्‍तव में शंकराचार्य के दर्शन की ही पैरोकारी करते हैं। अपने अंदाज में। सो मैंने विषय रखा 'इस्‍लाम में धर्म की दार्शनिक पृष्‍ठभूमि।' इसमें मैंने इस्‍लाम को कुरान से इतर सूफी रहस्‍यवाद से जोड़कर पेश किया था। जब मैंने इसे सभा में पढ़ा तो विद्यार्थियों के अलावा हमारी एचओडी का चेहरा भी ब्‍लैंक था। डेजरर्टेशन खत्‍म होने के बाद तो उन्‍होंने ईमानदारी से कह दिया कि सिद्धार्थ ये कहां से उठा लाए हो। खैर मुझे तो समझ नहीं आया, जो भी है इसे सबमिट कर दो। :)

चाइनीज कॉल सेंटर में

1 

Caller: Hello, can I speak to Annie Wan?

Operator: Yes, you can speak to me..

Caller: No, I want to speak to Annie Wan!

Operator: Yes I understand you want to speak to anyone. You can speak to
me.. Who is this?

Caller: I'm Sam Wan .. And I need to talk to Annie Wan! It's urgent.

Operator: I know you are someone and you want to talk to anyone ! But
what's this urgent matter
about?

Caller: Well... just tell my sister Annie Wan that our brother Noe Wan
was involved in an accident.
Noe Wan got injured and now Noe Wan is being sent to the hospital.
Right now, Avery Wan is on his way to the hospital.

Operator: Look, if no one was injured and no one was sent to the
hospital, then the accident isn't an urgent matter! You may find this hilarious but I don't have time for
this!

Caller: You are so rude! Who are you?

Operator: I'm Saw Ree ..

Caller: Yes! You should be sorry . Now give me your name!!

Operator: That's what I said. I'm Saw Ree ..

Caller: Oh .....God.... .

From
Good Wan!

यह चुटकुला आज मेल से प्राप्‍त हुआ।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

बाबे के पीरत्‍व में कमी

Baba Ramdev2
भादवे ही दशमी को बाबा रामदेव का मेला भरेगा। एकम् को बीकानेर से हजारों पैदल यात्रियों ने 200 किलोमीटर से अधिक लम्‍बी यात्रा शुरू की। कई लोग तो बीकानेर से भी दूर से आए थे, जैसे हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर से। यानि यात्रा में कुछ सौ किलोमीटर और जुड़ गए। जैसलमेर के रूणीचा स्थित धाम जाने वालों में कुछ साल पहले तक हिन्‍दुओं को मुसलमानों की संख्‍या बराबर थी। यह ऐसा मेला है जहां जांत-पांत ऊंच-नीच खत्‍म हो जाते हैं। पूरा रास्‍ता श्रद्धालुओं से अटा होता है और मार्ग पर एक ही घोष होता है, जय बाबे री। यही पदयात्रियों को इतनी लम्‍बी यात्रा करने का जोश दिलाता है। इस बार हिन्‍दुओं की तुलना में मुसलमान बहुत कम दिखाई दिए। सही कहूं तो दिखाई ही नहीं दिए। मुझे पता नहीं क्‍या कारण रहा होगा, लेकिन दिखाई नहीं दिए सो बता रहा हूं। सालों से सुनता आ रहा हूं कि बाबा रामदेव जहां हिन्‍दुओं के लिए देवता है  वहीं मुसलमानों के लिए पीर है। 
क्‍या बाबा रामदेव के पीरत्‍व में कमी हो गई है।
क्‍या बाबा कि केवल हिन्‍दुओं की मन्‍नत पूरी कर रहे हैं।
क्‍या मुसलमानों को इन सालों में उन्‍होंने कोई पर्चा नहीं दिया।
क्‍या लोकदेवता के आगे भी नेताओं की बनाई छद्म दीवार आड़े आ रही है।
क्‍या मुस्लिमों की सभी मन्‍नतें पूरी हो चुकी हैं।
अभी रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। मुसलमान रोजा रखकर अपने तन और मन की शुद्धि में लगे हैं। दिनभर हर तरह की बुराई से दूर रहकर कठोर व्रत करते हैं और दिन ढलने पर रोजा खोलते हैं। इन सालों में रोजा रखने वाले बच्‍चों की संख्‍या में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे मैं कह सकता हूं कि धार्मिक आस्‍थाएं कम तो नहीं हुई। अल्‍लाह पर मुसलमानों को अब भी गहरा भरोसा है। पर दोनों समुदायों को एक जैसा मानने वाले और हर आने वाले श्रद्धालु को श्रद्धा के अनुरूप पर्चा देने वाले बाबा रामदेव के प्रति रुचि कम होने का कारण सोचने के लिए मजबूर कर देता है।
वैसे मेरा यह ऑब्‍जर्वेशन बीकानेर तक ही सीमित है। हो सकता है दूसरे शहरों, दिशाओं, रास्‍तों और माध्‍यमों से मुस्लिम समुदाय के लोग रूणीचा पहुंचे होंगे। बीकानेर के मार्ग से जा रहे पैदल यात्रियों में इनकी संख्‍या कम देखकर कुछ उथल-पुथल हुई सो व्‍यक्‍त कर दी।