सोमवार, 11 जनवरी 2010

New ATM machine

MALE VS. FEMALE AT THE ATM MACHINE

A new sign in the Bank Lobby reads--- Please note that this Bank is installing new Drive-through ATM machines enabling customers to withdraw cash without leaving their vehicles. Customers using this new facility are requested to use the procedures outlined below when accessing their accounts.
After months of careful research, MALE &FEMALE Procedures have been developed. Please follow the Appropriate steps for your gender.'

MALE PROCEDURE:
1. Drive up to the cash machine.
2. Put down your car window.
3. Insert card into machine and enter PIN.
4. Enter amount of cash required and withdraw.
5. Retrieve card, cash and receipt.
6. Put window up.
7. Drive off.

FEMALE PROCEDURE:
1. Drive up to cash machine.
2. Reverse and back up the required amount to align car window with the machine.
3. Set parking brake, put the window down.
4. Find handbag, remove all contents on to passenger seat to locate card.
5. Tell person on cell phone you will call them back and hang up..
6. Attempt to insert card into machine...
7. Open car door to allow easier access to machine due to its excessive distance from the car.
8.. Insert card.
9. Re-insert card the right way.
10. Dig through handbag to find diary with your PIN written on the inside back page.
11. Enter PIN.
12. Press cancel and re-enter correct PIN.
13. Enter amount of cash required.
14. Check makeup in rear view mirror.
15. Retrieve cash and receipt..
16. Empty handbag again to locate wallet and place cash inside.
17. Write debit amount in check register and place receipt in back of checkbook.
18. Re-check makeup.
19. Drive forward 2 feet.
20. Reverse back to cash machine.
21. Retrieve card.
22. Re-empty hand bag, locate card holder, and place card into the slot provided!
23. Give dirty look to irate male driver waiting behind you.
24. Restart stalled engine and pull off.
25. Redial person on cell phone..
26. Drive for 2 to 3 miles.
27. Release Parking Brake


ENJOY :)...

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

बहुत सोचा अब लिख रहा हूं

थ्री इडियट्स देखी, फिर चकरी ले आया, फिर बार बार देखी, कई बार देखी, बीच- बीच में से देखी। कई सीन दोहराकर देखे, फिर सोचा कि अब लिखूं तो देखा कि लोगों ने जमकर पहले ही लिख दिया है। सुकून की बात यह है कि मैं जो सोचा वह यहां कहीं मिला नहीं और कहीं लिखा भी गया है तो मुझे दिखा नहीं। सो इस बार नए विचार के साथ विशेष तरह से सोचने वालों की बात की जा सकती है।

मेरा विचार यह है कि रैंचो हम में से हर एक में है, फिल्‍म को पहली बार देखते समय हम दो लोग साथ थे, मैं लो प्रोफाइल था और मेरा साथी मुझसे अधिक प्रोफाइल का था। मेरी खासियत यह है कि मैं आपे में बने रहने का भरसक प्रयास करता हूं और मेरा साथी अपनी प्रोफाइल से भी काफी नीचे बना रहकर छोटे से छोटा काम बड़ी तल्‍लीनता से करता है। हम दोनों ने फिल्‍म के दौरान ही यह बात शिद्दत से महसूस की कि हम अपनी-अपनी जिंदगी के एक खास समय में रैंचो थे। बाद में हमने खुद को ढाल लिया और राजू बन गए। ऐसा नहीं है कि हमारा राजूलाइजेशन हो गया बल्कि हमने उसे होना स्‍वीकार किया। फिल्‍म में सभी का ध्‍यान रैंचो की तरह है और सूत्रधार फरहान बना हुआ है इसके बावजूद सबसे तीखा परिवर्तन राजू में होता है।

हम भी राजू ही बनना चाहते हैं, क्‍योंकि रैंचो का तरीका कुछ दिन तो काम कर जाएगा लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में राजू वाली किल्‍लर इंस्टिंक्‍ट ही काम आएगी। ऐसा कब क्‍यों और कैसे होता है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन आप खुद सोचेंगे तो पाएंगे कि कभी न कभी आपकी जिंदगी में भी ऐसा काल आया होगा जब आपने स्‍थापित नियमों और सिद्धांतों को चुनौती दी और बाकी लोग एकटक पहले से खींची हुई लकीर को देखते हुए उसे ही पीटने की तैयारी कर रहे थे और आप आसानी से आगे निकल गए। वास्‍तव में थिंक आउट ऑफ द बॉक्‍स एक आदत होती है, यह हमें लुभाती है, लेकिन यह अनिश्चित भविष्‍य की ओर लेकर जाती है, इसी अनिश्चितता का डर हमें पूर्व में लिए गए फैसलों जैसे फैसले लेने को बाध्‍य करती है। मैं दोबारा बात करना चाहूंगा तीनों पात्रों की...

रैंचो की अलग सोच

रैंचो के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसने तो अपनी जिंदगी शुरू भी नहीं की है लेकिन वह ऐसा बैकअप रखता है जो ढाई करोड़ रुपए महीने के कमाता है और रैंचो की इंजीनियरिंग के लिए उन रुपयों को भी दांव पर लगा सकता है। रैंचो को डिग्री से भी कुछ हासिल नहीं करना है। अब सफल कैसे होगा, वह भविष्‍य के गर्भ में है। अगर रैंचो जीनियस न हो और उसमें वह जज्‍बा न हो तो वह कहां पहुंचेगा। पहले उसने अपने दिल की बात सुनी बाद में पॉल कोएलो आ गए और कहा जब आप किसी चीज को चाहते हैं तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने की साजिश करने लगती है (शाहरुख खान की फिल्‍म में यह डॉयलॉग बाद में आया था), और रैंचो को अपना भविष्‍य मिल जाता है, लेकिन कोई भी उम्रभर कंवारा रहकर अपने दोस्‍तों से अलग नहीं रहना चाहेगा। सो रैंचो का पात्र फिल्‍म बीतने तक कमजोर होने लगता है।

फरहान की दिल की बात

फरहान भी जीनियस है। वह वाइल्‍ड लाइफ फोटोग्राफी करता है। मजे की बात यह है कि उसके फोटोग्राफ हंगरी के आंद्रे इस्‍तवान को पसंद आ जाते हैं। अब मान लीजिए कि मैं एक ब्‍लॉगर हूं और किसी को भी मेरा लिखा पसंद नहीं आता। अब भले ही मैं कितनी भी दिल की क्‍यों न सुन लूं, आटा और दाल लाने के लिए तो रिपोर्टिंग ही करनी पड़ेगी। खबर लाउंगा तो हाजिरी गिनी जाएगी और उसी से तनख्‍वाह मिलेगी। एक सूत्रधार के दिल का सुकून है कि वह जो बनना चाहता था उसे वह बनने में रैंचों ने मदद की लेकिन मैं खुद को देखूं तो लगता है कि बचपन से किसी ऐसी चीज का सपना नहीं रहा। तो अब क्‍या बनूंगा। क्‍या करूंगा। न आंद्रे है न कैमरा न कमरे में एसी। यह कैरेक्‍टर बनाया ही कमजोर गया था। बस सूत्रधार जो रैंचो और राजू को देखता रहता है।

raju

राजू मेरा यार...

सिस्‍टम को दोष देना और जीभरकर गालियां निकाल लेना आसान है लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ उसी सिस्‍टम को रूल करना उससे अधिक कठिन काम है। जिन लोगों ने यह किया है वे इसे समझ सकते हैं। एक वाकया याद आता है। किसी चेले ने गुरू से पूछा कि विवेकानन्‍द और रामकृष्‍ण परमहंस में क्‍या अंतर है। तो गुरू ने कहा कि विवेकानन्‍द इतने बड़े हो गए कि माया का जाल उनके लिए छोटा पड़ गया लेकिन परमहंस इतने सूक्ष्‍म हो गए कि माया का जाल उन्‍हें पकड़ नहीं पाया। वास्‍तव में सांसारिक आदमी को... जो शादी करना चाहता है, अपने मां-बाप का ऋण चुकाना चाहता है, अपने लिए प्रॉपर्टी बनाना चाहता है, दुनिया में अपना नाम करना चाहता है, देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है, इज्‍जत और शोहरत के लिए कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार है वह विवेकानन्‍द नहीं बन सकता जो इज्‍जत को भारत में छोड़कर गए और सिर्फ राष्‍ट्र को ऊंचा उठाने के लिए खत्‍म हो गए। पीछे सिवाय विचारों के कुछ नहीं। वैसे परमहंस ने भी पीछे कुछ नहीं छोड़ा सिवाय विचारों के... लेकिन माया के जाल से बचने का रामकृष्‍ण का तरीका मुझे अधिक श्रेष्‍ठ लगता है। जहां रैंचो खुद को सिस्‍टम से बड़़ा बना लेता है वहीं राजू उसी सिस्‍टम में अपनी पैठ बनाता है। अंगूठियां पहनकर और भगवान से भीख मांगकर पास होने वाला राजू जब कांफिडेंस में आता है तो सलेक्‍टर्स को कहता है आप अपनी नौकरी रखिए मैं अपना एटीट्यूट रखता हूं।

क्‍या हम भी ऐसा ही नहीं चाहते...

फरहान बनकर सपनों के पीछे ब्राजील के रेन फोरेस्‍ट में जाने का ख्‍वाब मेरा तो नहीं है

रैंचो की तरह लद्दाख में गुमनामी की जिंदगी भी नहीं जी सकता

हां राजू की तरह सिस्‍टम को सिस्‍टम के भीतर रहकर चैलेंज कर सकता हूं और अपने लिए बेहतर जगह बना सकता हूं.... बिना डरे...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में लेखकों का उत्‍साह लगातार बढ़ता हुआ देख रहा हूं। एक तरफ पचासों लोग हैं जो आमतौर पर भी कुछ भी लिख दें तो पूरी शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी लेखकों की मिसालें भी हैं जो ऐसा लिखते हैं कि पाठक पढ़ना चाहते हुए भी पढ़ नहीं पाते। हालांकि पाठकों और टिप्‍पणीकारों का लगातार आग्रह रहता है कि ऐसी भाषा में लिखा जाए जिसे आम आदमी आसानी से पढ़ और समझ सके। इसके बावजूद लिखने में सिद्धहस्‍त लोग अपनी धुन में उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य नेट पर रच रहे हैं।

ठीक है, भले ही आज किसी को समझ में न आए लेकिन किसी न किसी दिन किसी न किसी पाठक को तो ये लेख समझ में आएंगे ही।

मैं सीधा-सीधा किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन विषय आधारित और कई जगह विषय से हटकर कुछ लोग ऐसी भाषा लिख रहे हैं जो कम से कम मुझे एक बार में समझ में ही नहीं आती। जरूरी नहीं है कि मैं सभी विषयों का अच्‍छा जानकार होउं और यह भी जरूरी नहीं है कि सबकुछ मेरे लिए ही लिखा जा रहा है। इसके बावजूद संप्रेषण को सुगम बनाने की आग्रहता बनी रहती है।

मैं सोचता हूं कि किसी हैडिंग को पढ़ने के बाद मेरी इच्‍छा होती है कि इस विषय पर जो लेख लिखा गया है उसे पढूं और समझूं कि इसमें नया क्‍या है। हो सकता है इस बारे में बाजार में कई किताबें उपलब्‍ध हों लेकिन जब एक ब्‍लॉगर लिख रहा है तो समझने के बाद नेट के पाठकों को समझाने के इरादे से लिख रहा होगा। मैं उस पोस्‍ट में पहुंचता हूं, तो पाता हूं कि अब तक जिस अंदाज में विषय को पढ़ा और समझा था उससे कहीं अधिक दुरुह अवस्‍‍था में यह नेट पर मिल रहा है। किसी लेख विशेष को एक दो या तीन बार पढ़ने के बाद भी मेरी उलझन खत्‍म नहीं होती, तो कुछ देर उलझा रहने के बाद अंतरजाल के किसी दूसरे कोने की ओर चल देता हूं।

आमतौपर नेट पर जमे हुए अधिकांश पाठकों की भी यही स्थिति होती होगी।

जो बातें किताबों में लिखी जा चुकी हैं उन्‍हें ज्‍यों का त्‍यों नेट पर हिन्‍दी में डाल देना न केवल हिन्‍दी की सेवा है बल्कि नेट पर हिन्‍दी के वर्चस्‍व की ओर एक और कदम है लेकिन यह कदम कितना प्रभावी है, यह सोचना भी महत्‍वपूर्ण लगता है। कई लोग अपनी बात लिख रहे हैं, सादे शब्‍दों में, कई बार कुछ कठिन शब्‍दों का भी इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन वे इतने कठिन नहीं होते कि पढ़ने पर सिर चकरा जाए, लेकिन सोचिए कि क्‍या बिना किसी विषय विशेष को केन्‍द्र में रखे ये लोग क्लिष्‍ट भाषा लिखते, तो क्‍या आज उन्‍हें इतनी लोकप्रियता मिल पाती।

मैं सोचता हूं,  नहीं।

... इससे हिन्‍दी और इसके क्लिष्‍ट शब्‍दों का महत्‍व भी कम नहीं होता।

जनकवि हरीश भादाणीजी की कविताओं की समीक्षा में एक बार जगदीश्‍वर चतुर्वेदीजी ने कहा था कि ये कविताएं केवल गाने के लिए हैं। आम आदमी सुनेगा और भुला देगा। जब तक खुद हरीशजी गाएंगे ये कविताएं जिंदा रहेगी लेकिन खुद हरीशजी के सीन से हटने के साथ ही कविता का भी लोप हो जाएगा। उनका संदर्भ हरीश भादाणीजी की कविताओं में आ रहे बिंब और बिंब के विचार में रिड्यूस होने के बारे में था। इस पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंदकिशोर आचार्यजी ने कहा था कि हरीशजी आम जनता से संप्रेषणीय आग्रहता के चलते बिंब के साथ कविता का सृजन करते हैं। और यह बिंब आम आदमी की समझ में आए इसलिए कविता के अंत तक बिंब यानि इमेज को विचार तक रिड्यूस कर देते हैं। यह कमी नहीं बल्कि हरीशजी की खासियत है।

आज उस घटना के करीब दो साल बाद मैं देख रहा हूं कि ब्‍लॉगिंग में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

एक ज्‍योतिष विद्यार्थी के रूप में जब लिखना शुरू किया तो लगा कि क्‍या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ में आए। विषय को लेकर सैकड़ों सवाल दिमाग में थे और अब भी हैं लेकिन उनमें से कुछ विषयों का जुड़ाव आम आदमी से सीधे होता है। अब नवमांश और सबलॉर्ड में से किसे अधिक सटीक माना जाए इस पर बहस की गुंजाइश अभी नेट पर नहीं है लेकिन ज्‍योतिष में अंधविश्‍वास या साढे़साती की समस्‍या पर हर पाठक पढ़ने को तैयार मिलेगा। ऐसे में मैं सरल शब्‍दों में अपनी बात रख पाता हूं तो पाठक भी उस विचार से खुद को जुड़ा हुआ पा सकेगा। जितने अधिक पाठक जुड़ेंगे विषय से नजदीकी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी।

शुरूआती दौर में एक रास्‍ते पर कुछ दूरी तक पाठक को खींच लेने के बाद विषय को क्लिष्‍ट बना लिया जाए तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन शुरूआत ही ऐसे शब्‍दों से हो जिन्‍हें समझने के लिए हर पंक्ति के बाद रुककर डिक्‍शनरी निकालनी पड़े तो क्‍या नेट पर ब्‍लॉग पढ़ना सजा की तरह नहीं हो जाएगा...

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

एक नया अध्‍याय शुरू हुआ बीकानेर में

मैं संयोगों पर यकीन करता हूं। ये बार बार होते हैं। हर बार होते हैं और मुझे पहले से अधिक आश्‍चर्यचकित छोड़ जाते हैं। इस बार फिर ऐसे ही संयोग हुए जिन्‍होंने ने न केवल मुझे सोचने पर मजबूर किया बल्कि कई दूसरे लोग भी इन संयोगों की चपेट में आए। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि मैं सक्रामक हो चुका हूं। इस बार तो मैंने संक्रमण के बीच ही बो दिए। या कहूं कि समय ने कुछ ऐसा चक्रव्‍यूह रचा कि संक्रमण के बीज खुद ब खुद आए और बीकानेर की मानस धरती पर समा गए। बीकानेर में ब्‍लॉग संगोष्‍ठी हुई। इसके लिए दो दिन से एक शब्‍द तलाश रहा हूं। पर घूमफिरकर एक ही सही शब्‍द दिमाग में आता है वह है...

ब्‍लॉग आमुखीकरण कार्यशाला

चलिए पहेलिया छोड़कर सीधे मुद्दे पर चलते हैं। अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर संजय बेगाणीजी सपरिवार बीकानेर आए। मैं बता दूं कि बीकानेर के पास के एक छोटे से गांव बीदासर से निकला बेगाणी परिवार करीब पैंतीस साल से सूरत और अहमदाबाद में स्‍थापित है। तो जड़ों की ओर लौटने के लिए संजय जी को बहाना मिला अपने साले साहब की शादी का। वे बीकानेर आ रहे थे उन्‍हीं दिनों उनसे मेरा संवाद स्‍थापित हुआ। इसी संवाद के दौरान उन्‍होंने मुझे बताया कि वे 27 नवम्‍बर को बीकानेर पधार रहे हैं। मैंने ब्‍लॉगर मीट के सपने देखने शुरू कर दिए। एक भरा हुआ हॉल और एक के बाद एक ब्‍लॉगर आए और अपने अनुभव दूसरों के साथ बांटता चला जाए। जो पहले से ब्‍लॉगर हैं वे तालियां बजाएं और जिन लोगों ने अब तक ब्‍लॉग शुरू नहीं किया है वे मुंह बाएं देखते रहें। खैर, दिन का सपना था सो जल्‍दी टूट गया। संयज जी के बीकानेर आने से ठीक एक दिन पहले तक बीकानेर में पहले महापैार फिर उपमहापौर के चुनाव सिर पर रहे। मैं शुरूआती एक दो दिन तैयारी के निकालने के बाद ऐसा व्‍यस्‍त हुआ कि बेगाणीजी की अगली मेल से तंद्रा टूटी और फिर से ब्‍लॉग मीट की तैयारी करने लगा। हकीकत तो यह है कि अपने दमघोंटू दिनचर्या में से मैंने कुछ ही घंटे निकाले।

डॉ. कटारिया की स्‍नेहपूर्ण कृपा

मैं खुद कभी किसी का अच्‍छा मित्र नहीं रहा हूं लेकिन मुझे हमेशा अच्‍छे मित्र मिले। इसी कड़ी में एक और नाम है डॉ. प्रताप कटारिया। वे बीकानेर संभाग के सबसे बड़े कॉलेज में प्राणीशास्‍त्र के व्‍याख्‍याता हैं और शौकिया पक्षीविज्ञानी। मैंने उन्‍हें बताया कि अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर आ रहे हैं उनके लिए एक संगोष्‍ठी का आयोजन कराने की कोशिश कर रहा हूं। उन्‍होंने कहा ठीक है मैं मदद कर दूंगा। बाद में तो यह स्थिति हुई कि शुरू से आखिर तक की सारी व्‍यवस्‍थाएं उन्‍होंने ही कराई। समय कम होने के कारण कॉलेज के तीन एलसीडी प्रोजेक्‍टर किसी न किसी कारण से हमारी पहुंच से दूर थे। माइक भी ईद की छुट्टी की वजह से अरेंज नहीं हो पाया। इन सबके बावजूद न तो किसी के उत्‍साह में कमी थी न उत्‍सुकता में।

मौजूद लोग

इनके बारे में मैं इसलिए जानकारी देना चाहता हूं कि संजयजी का भाषण और उपस्थिति श्रोताओं का तारतम्‍य समझा जा सके। डॉ. कटारिया के अलावा डॉ। नवदीप बैंस डूंगर कॉलेज के व्‍याख्‍याता हैं,

डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. हनुमानप्रसाद व्‍यास जो कि महात्‍मा गांधी और विवेकानन्‍द पर राष्‍ट्रीय स्‍तर की कई कांफ्रेंस में भाषण देते रहे हैं, और अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ समझे जाते हैं इन्‍होंने अपने जिंदगी के बीस साल अमरीका में गैलियम आर्सेनाइड पर रिसर्च में लगाए और भारत में आकर तकनीक विकसित करने पर पाथ ब्रेकिंग अवार्ड लिया,

शंकर लाल हर्ष भी मौजूद थे, हर्ष जी एशियन शतरंज संघ के उपाध्‍यक्ष रहे हैं और बीकानेर में शतरंज की अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिताएं करवा चुके हैं। अब भी हर साल दुनिया के कई देशों की यात्राएं करते हैं शतरंज टूर्नामेंटों को लेकर क्‍योंकि वे इंटरनेशनल ऑर्बिटर हैं,

विनय कौड़ा जो कि देश के प्रमुख आठ अखबारों के एडीटोरियल में नियमित रूप से छपते हैं, इनमें अमर उजाला, प्रभात खबर, राजस्‍थान पत्रिका जैसे नाम शामिल हैं, ये अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं,

पुखराज चोपड़ा जी अंतरराष्‍ट्रीय ट्रेड पर गहरी नजर रखते हैं और इनकी सलाह देश के सभी प्रमुख चैनल और अखबार सुनते हैं। इनके ब्‍लॉग की हर नई पोस्‍ट को ऑन लाइन ट्रेडिंग से जुड़े लोग तुरंत पढ़ते हैं।

इनके अलावा इन्‍हीं लोगों से संबंधित कुछ और लोग थे।

मेरी सीमाएं

कार्यक्रम के लिए मैंने भरसक प्रयत्‍न किया कि कम से कम पचास लोग तो आएं ही, लेकिन पूरी कोशिश करने के बावजूद भी शादियों का दिन, ईद की छुट्टी और अन्‍य कई कारणों से कई लोग चाहकर भी पहंच नहीं पाए। अगली कांफ्रेंस तक मैं कोशिश करूंगा कि कम से कम सौ लोग तो शामिल हों ही। वैसे मैं सोचता हूं कि खाने का प्रबंध किया जाएगा तो भोजनप्रिय बीकानेर के लोग अवश्‍य पहुंच जाएंगे। यह व्‍यवस्‍था कैसे होगी आगे बताउंगा।

तो शुरू हुआ कार्यक्रम

मेरी पंचायती में यह पहला कार्यक्रम था। सो ऑफीशियली कैसे शुरू करते हैं मुझे पता नहीं था। मैंने सबसे पहले कॉल किया संजय बेगाणीजी को, बेगाणी जी बस तैयार हो ही रहे थे कि डूंगर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पी.आर. ओझा ने घड़ी देखते हुए कहा कि पहले मैं बोलूंगा। अब डॉ. ओझा ब्‍लॉग तो लिखते नहीं हैं लेकिन हिन्‍दी पढ़े हुए हैं। उनके पिताजी भी हिन्‍दी के विद्वान थे। उन्‍होंने जो कुछ भी बोला उसका संबंध ब्‍लॉगिंग से कतई नहीं था। सो आपका समय भी मैं खराब नहीं करूंगा।

अब बारी थी संजय जी की...

उन्‍होंने जो कहा उसका मंतव्‍य था कि इंटरनेट पर भाषाओं की जंग छिड़ी हुई है। इसमें अंग्रेजी भाषा के बाद अब चीन अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करने में लगा हुआ है। सन 2020 तक इंटरनेट की प्रथम भाषा चीनी होगी और दूसरे स्‍थान पर हिंदी होगी। भले ही हम इससे खुश हो जाएं लेकिन ऐसा क्‍यों नहीं हो सकता कि हम पहले स्‍थान पर रहें। इसके लिए हर प्रबुद्ध व्‍यक्ति को ब्‍लॉग लिखना चाहिए। अब ब्‍लॉग पर क्‍या लिखा जा रहा है और क्‍या लिखा जा सकता है। इस बारे में उन्‍होंने कहा कि साहित्यिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ब्‍लॉग कचरे से अधिक कुछ नहीं हैं। क्‍योंकि यहां लिखने वाले लोग साहित्‍यकार नहीं हैं। अधिकांश लोगों को तो हिन्‍दी भी सही लिखनी नहीं आती। लेकिन इससे ब्‍लॉग का महत्‍व कम नहीं हो जाता। दुनिया में ऐसे कई प्रकरण हुए हैं जहां देशों की सरकारों के दमनचक्र को ब्‍लॉग के माध्‍यम से पूरी दुनिया ने जाना। यही कारण है कि तानाशाह देशों की सरकारें ब्‍लॉग से डरती हैं और इस पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही हैं। बेगाणीजी ने इसे आम आदमी की आवाज की ताकत बताते हुए कहा कि चाहे कुछ भी लिखिए लेकिन लिखिए जरूर। अन्‍य किसी माध्‍यम से लिखेंगे तो उस प्रकाशित रचना का जीवनकाल अधिक से अधिक एक दिन या एक महीना होगा लेकिन इंटरनेट पर आप जो कुछ लिखेंगे वह शाश्‍वत होगा। इससे आप अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ छोड़ जाएंगे। अब कौन क्‍या लिखे के बिंदू पर उन्‍होंने कहा कि जो अपने विषय के विशेषज्ञ हैं वे अपने विषय के बारे में लिखें वरना यह भी लिख सकते हैं कि आज दिन कैसा रहा। आज कैसे लोग मिले। उन्‍होंने एक चायवाले का उदाहरण देते हुए बताया कि एक चायवाला भी ब्‍लॉग लिख सकता है। उसमें वह लिखेगा कि आज तो ऐसे ऐसे अजीब लोग मिले।

कुछ सीखने की बातें

यहां तक पहुंचने के बाद लोगों में उत्‍सुकता थी कि ब्‍लॉग कैसे बनता है और हम कैसे इस जमात में शामिल हो सकते हैं। इस पर कुछ लोगों का मत था कि मैं खुद उन लोगों के पास जाउं और उनके ब्‍लॉग बनाकर लिखने की विधि समझा दूं लेकिन बाद में उपस्थित लोगों के आग्रह पर गोष्‍ठी को औपचारिक की बजाय अनौपचारिक बना दिया गया। तस्‍वीरों में जो सिटिंग दिखाई गई है उसे क्रम को तोड़कर सभी आगे आकर एकत्रित हो गए और बेगाणीजी भी मंच से नीचे उतर आए। यहां उन्‍होंने अपने लेपटॉप पर अपने मोबाइल से चल रहे इंटरनेट से लोगों को ब्‍लॉगर डॉट कॉम के दर्शन कराए और ब्‍लॉग बनाने के तीन आसान चरणों की जानकारी दी। इसके बाद उन्‍होंने ऑन लाइन हिन्‍दी टूल और वर्तनी शुद्धि वाले सॉफ्टवेयर्स की जानकारी भी दी।

एक बार भी ताली नहीं बजी

संजय जी के भाषण के दौरान एक बार भी ताली नहीं बजी। पूरे सदन में केवल मैं ही था जो उपस्थित श्रोताओं को बेगाणीजी को पर्सनली जानता था। इसलिए मैं देख सकता था कि हिन्‍दी और हिन्‍दुस्‍तान के वर्चस्‍व के संबंध, अंतरराष्‍ट्रीय मामलों पर बेगाणीजी के बोलने के साथ ही प्रमुख श्रोता अपनी तलवारें निकाल चुके थे। वे यह सुनने को तैयार ही नहीं थे कि चीन हमसे आगे है। डॉ. व्‍यास ने अपने शोध से चीन को धूल चटाई थी, कौड़ाजी जानते थे कि चीन हमसे किन मामलों में पिछड़ रहा है, पुखराज जी भारत की मजबूत अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सोच रहे थे और हर्षजी विश्‍वनाथन आनन्‍द और अन्‍य भारतीय शतरंज मास्‍टरों के बारे में सोचने लगे थे। यानि भाषण की शुरूआत ही कुछ ऐसी थी कि बेगाणीजी ने श्रोताओं को एक्टिवेट कर दिया था। इसलिए बाकी के भाषण के दौरान श्रोता उनके शुरूआती कथन के विश्‍लेषण में ही उलझे रहे। इसलिए एक बार भी तालियां नहीं बजी।

चाय और कचौरियां

कार्यक्रम करीब आधे घण्‍टे देरी से शुरू हुआ। भाषण के पहले भाग के अंत तक डॉ. कटारिया के आज्ञाकारी शिष्‍य चाय और गर्मागरम कचौरिया लेकर पहुंच चुके थे। हॉल के पीछे से खुशबू आनी शुरू हो गई। मैं सुबह से बिना नाश्‍ता किए निकला हुआ था। दोपहर एक बजे तक तो पेट जवाब दे गया। मैंने गुजारिश की कि चलिए चाय पी लेते हैं। बाकी लोगों के पीछे पहुंचने से पहले मैं दो कचौरिया निगल चुका था। चाय के ब्रेक के दौरान ब्‍लॉग, इसकी ताकत, बनाने के तरीके और चीन के वर्चस्‍व को लेकर लगातार होती रहीं। मेरा ध्‍यान पूरी तरह से कचौरियों की तरफ था।

श्रोताओं के विचार

जैसा कि मैंने पहले से सोच रखा था, मैंने कुछ श्रोताओं को बोलने के लिए आमं‍त्रित किया। सबसे पहले आए डॉ. व्‍यास उन्‍होंने अपने डीआरडीओ के अनुभव के आधार पर बताया कि केवल हिंदी की बात करने से अन्‍य भाषाओं वाले लोग चिढ़ सकते हैं। उत्‍तर भारत में तो ठीक है लेकिन दक्षिण भारतियों के समक्ष तो हिन्‍दी तो प्रमुखता की बजाय कनेक्टिंग लैंग्‍वेज के रूप में परोसना ही उचित रहेगा। इससे हिन्‍दी का भी विकास होगा और दूसरी भाषाओं को भी उचित सम्‍मान मिलेगा। शंकरलाल हर्ष ब्‍लॉग में लिखे गए किसी भी अंट शंट के लिटिगेशन के बारे में पूछना चाह रहे थे। उनका सवाल था कि इसके लिए जुरिस्डिक्‍शन जोन कौनसा होगा। मैं बीकानेर से कुछ लिखता हूं और एक आदमी आपत्ति करके मुझे बैंगलोर की अदालत में हाजिर करवा लेगा तो ब्‍लॉगिंग तो पीछे रह जाएगी, नौकरी धंधे का भी संकट हो जाएगा। हालांकि उनका सवाल अनुत्‍तरित रहा लेकिन संगोष्‍ठी जारी रही। चाय के दौरान डॉ. व्‍यास ने रजनीश परिहार जी से पूछा था कि आप क्‍या लिखते हैं ब्‍लॉग में... मैंने दोबारा यही सवाल उठाते हुए उन्‍हें बोलने के लिए आमंत्रित किया। परिहारजी ने बताया कि वे जो कुछ रोजाना की जिंदगी में देखते हैं। उसे ही लिखते हैं। पिछले दिनों उन्‍होंने अंधी मां के दो बच्‍चों की कहानी लिखी थी, जिस पर देशभर में पढ़ा गया और कई लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। इस पर तालियां बजी

अगली संगोष्‍ठी का प्रपोजल

बीकानेर में अगली संगोष्‍ठी के लिए मुझे दो प्रपोजल मिले हैं। एक तो यहां के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सेमिनार हॉल का और दूसरा बीकानेर के उपनगर गंगाशहर स्थित तेरापंथ भवन का। पुखराज जी ने तो दो लाख रुपए तक के खर्च की सीमा भी पेश की है। अगर सबकुछ सही रहा तो छह महीने बाद ही अलगी संगोष्‍ठी आयोजित करने का प्रयास करूंगा। जिसमें देश के अन्‍य क्षेत्रों से प्रमुख ब्‍लॉगरों को बुलाने की कोशिश रहेगी। और प्रमुख वक्‍ताओं में संजय बेगाणीजी तो होंगे ही...

संगोष्‍ठी के दौरान मैं अपना कैमरा लेकर पहुंचा नहीं, सो मीडिया द्वारा लिए गए फोटो से ही काम चलाना होगा। ये वही फोटो हैं जो संयजजी ने अपने ब्‍लॉग जोगलिखी पर लगाए हैं...

sanjay begani1

dungar college auditorium1 

dungar college auditorium2

शनिवार, 28 नवंबर 2009

बीकानेर में हुई ब्‍लॉग कार्यशाला वक्‍ता संजय बेगाणी

अहमदाबाद से बीकानेर आए संजय बेगाणी को मुख्‍य वक्‍ता के रूप में रखकर एक ब्‍लॉग गोष्‍ठी का आयोजन शनिवार को किया गया। इसमें डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. एच.पी. व्‍यास, एशियन चैस एसोसिएशन के पूर्व उपाध्‍यक्ष एस.एल. हर्ष और एनसीडीईएक्‍स और एमसीएक्‍स की एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य पुखराज चोपड़ा सहित कई गणमान्‍य लोग मौजूद थे। इस गोष्‍ठी की झलकियां और फोटो के साथ कल सुबह एक पोस्‍ट चस्‍पा करूंगा। क्‍योंकि संजयजी के साथ संवाद के उत्‍साह में फोटो खुद ने लिए नहीं और मीडिया में गए फोटो आज मिले नहीं। सो कल मिलेंगे फोटो और कल ही पेश करूंगा
इस गोष्‍ठी में ब्‍लॉगिंग का इतिहास, वर्तमान और भविष्‍य के बारे में तो चर्चा की ही गई, साथ ही स्‍थानीय ब्‍लॉगरों जैसे रजनीश पडि़हार, पुखराज चोपड़ा और डॉ. प्रताप कटारिया के विचारों से भी अवगत हुए।

फोटो मिल जाएंगे तो रविवार को पोस्‍ट पूरी बनाकर पेश करूंगा। तब तक तो इंतजार करना ही पड़ेगा। संगोष्‍ठी शुरू हुई तो मुझे लानतें मिल रही थी और खत्‍म होने तक शाबाशियां। साथ ही अगली गोष्‍ठी के लिए प्रपोजल भी...

क्‍या कैसे कब और क्‍यों हुआ जानिए अगले अंक में...