मंगलवार, 9 मार्च 2010

फिर जुड़ गया होम्‍योपैथी से

सालों पहले, यानि वर्ष 1997 और उससे पहले मेरे दिन के कुछ घंटे चाहे-अनचाहे होम्‍योपैथी के साथ गुजरते थे। रोग हो या न हो, सत्‍यव्रत सिद्धांतावलंकार, बोरिक और नैश पढ़ने को मिल जाते थे। कई बार क्‍लार्क की रैपरेटरी के पन्‍ने भी उलटने पड़ते। यह सब होता मेरे पड़नानाजी स्‍वर्गीय माधोदासजी व्‍यास के सानिध्‍य के कारण। मेरे नानीजी के पिताजी। कभी उन पर पूरी पोस्‍ट लिखूंगा। यहां बस यह उल्‍लेख कर देना चाहता हूं कि 78 साल की उम्र में उन्‍हें एक बार लगा कि होम्‍योपैथी दवाएं भी कारगर हो सकती हैं, और उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी और बाद में एक रोगी को तो मृत्‍युशैय्या से लौटा लाए थे। वर्ष 1999 में उनके निधन के साथ होम्‍योपैथी का सफर भी थम गया। उनके बारे में बाकी बातें बाद में,

हां, मैं फिर से लौट आया हूं होम्‍योपैथी के साथ।

कुछ दिन पहले पैट्रोल पम्‍प से महज बीस कदम की दूरी पर पैट्रोल खत्‍म हो गया। मैंने सोचा जय गणेश, और उत्‍साह में अपनी पल्‍सर से उतरा और उसे घसीटने लगा। अभी पांच सात कदम ही गया होउंगा कि ब्‍लैक आउट हो गया। आंखों के आगे अंधेरा। मैं जहां का तहां खड़ा रह गया। इसके कुछ दिन बाद शिक्षा निदेशालय की सीढि़या तेजी से चढ़ गया, ऊपर के माले पर पहुंचकर फिर वही स्थिति हुई। मैंने किसी को कहा तो नहीं लेकिन ऑफिस में कचौरी समोसे खाने बंद कर दिए, जो रोजाना शाम को किसी न किसी बहाने आ जाते हैं।

निदेशालय में ही मिले शिवकुमार आचार्यजी उर्फ भाईजी, एक दिन वहां की कैंटीन में ही कचौरी की शर्त लग गई। मैंने कहा खाउंगा तो नहीं लेकिन हार गया तो खिला दूंगा। इस पर भाईजी ने पूछा क्‍यों, पहले तो मैं टाल मटोल करता रहा लेकिन बाद में मैंने उन्‍हें बता दिया। उन्‍होंने मुझे कहा एक बार मेरे घर आना। तब तक मुझे पता नहीं था कि वे होम्‍योपैथी का अध्‍ययन करते हैं। उन्‍हें सेंट्रल नर्वस का कोई डिसऑर्डर हुआ था बीसेक साल पहले, तब ऐलोपैथी के सभी ईलाज आजमाने के बाद उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी थी। नर्वस डिसऑर्डर तो अभी भी वहीं है लेकिन दूसरे कई रोगों को ठीक करने में उन्‍होंने महारत हासिल कर ली है।

भाईजी के यहां गया तो वहां भाभीजी ने चाय के साथ भुजिया और खाखरे परोसे। मैंने चाय पी ली लेकिन दूसरी किसी चीज को हाथ नहीं लगाया। इस पर भाभीजी तो नाराज हो गए लेकिन भाईजी मुझे अपने कमरे में ले गए। वहां उनकी अलमारी में होम्‍योपैथी की दवाओं का भण्‍डार बना हुआ था। उन्‍होंने मुझे गैस मिक्‍सचर नाम की एक दवा की खुराक दी। गैस के कारण सिरदर्द हो रहा था। वह तुरंत ठीक हो गया। तुरंत से मतलब पांच-सात मिनट में। इसके बाद उन्‍होंने मुझे नक्‍स वोमिका 200 लाकर दी। कहा रात को सोते समय कुछ दिन ले ले। तनाव के कारण तेरा शरीर खराब हो रहा है। गैस मिक्‍सचर और नक्‍स ने तीन दिन में मुझे सिरे से बदल दिया। गर्दन और पेट के किनारे बढ़ रही चर्बी एक साथ खत्‍म हो गई और शरीर में पुरानी फुर्ती लौट आई।

अब फिर से सफेद हो रहे बालों के लिए एसबीएल का जोबरांडी का तेल और शैम्‍पू ले आया हूं। एक-दो दिन में फाइव फॉस भी फिर से ले आउंगा। पुरानी सब बातें वापस याद आने लगी हैं। हो सका तो अगले कुछ दिन में होम्‍योपैथी के कुछ और पक्षों के बारे में लिखने को मिल जाएगा।

मेरे पड़नानाजी माधोदासजी व्‍यास को नमन् और भाईजी को दिल से धन्‍यवाद...

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अच्‍छी रही इस बार की होली...

- साल दर साल होली बेहतर होती जा रही है। इस बार भी होली अच्‍छी रही।

- सौहार्द बना रहा: सुनारों, लोहारों, ब्राह्मणों, राजपूतों, नाइयों, नायकों सहित सबने अपनी-अपनी होली जलाई। किसी ने एक दूसरे की पंचायती नहीं की।

- दिल मिल गए- कॉलोनियों में जहां लोग एक-दूसरे को जानते नहीं वहां सभी ने होलिका दहन के लिए पांच से दस रुपए दिए और होलिका को देखने भी गए।

- साफ-सुथरी: अधिकांश लोग घरों में बंद रहे, जो निकले आस-पड़ोस के लोगों को थोड़ी सी गुलाल लगाकर फिर घरों में घुस गए।

- प्रदूषण भी नहीं- युवाओं ने घर-घर जाकर दो तीन हजार रुपए तो एकत्रित किए लेकिन इतनी संख्‍या में लकडि़यां लेकर नहीं आए। आस-पास का कचरा भी होलिका की भेंट चढ़ा दिया। वातावरण भी साफ हुआ और कुछ पेड़ भी कटने से बच गए।

- सितारों के साथ रहे: टीवी पर लगातार कार्यक्रम आते रहे, शोले से लेकर हाल ही में रिलीज अक्षय कुमार की फिल्‍मों के गानों में खेली गई होली को दर्शकों ने सितारों के साथ जीया। साफ सुथरी और संगीतमय होली ने फाग की रंगत को बढ़ा दिया।

- मुस्‍कुराहटों के दौर: होलिका दहन के बाद धुलण्‍डी से पहले ही कॉलोनी के लोग एक-दूसरे को रास्‍ते में देखकर होली की शुभकामनाएं देने लगे। मिलने पर एक दाढ़ से दूसरी दाढ़ तक दिखाकर विश किया। शाम ढलने तक मुस्‍कुराहटों के दौर दिखाई दिए।

- पीछे छूटा आतंक- गली मोहल्‍लों में पानी की बाल्टियों और पिचकारी लिए बच्‍चों के आतंक से भी इस बार रूबरू नहीं हुए। वह आतंक को कहीं पीछे छूट चुका है। बच्‍चों ने भी सलीके से होली खेलना सीख लिया है और बड़ों को पानी का महत्‍व समझ में आने लगा है।

- मजाक की सीमाएं तय- होली में किससे कितनी मजाक करनी है यह भी अब समझ में आने लगा है, किसी को भी ऐसे ही नहीं छेड़ सकते। सभी आपके दोस्‍त तो नहीं है, पता नहीं कौन चिढ़ जाए, बाद में लेने के देने पड़े। इसलिए सभी ने मजाक की सीमाएं तय कर ली है और छेड़ने के अंदाज भी बदल गए हैं।

गंदे शब्‍द भी नहीं- कई लोगों ने दुकानों पर डेक लगवा लिए हैं, जहां फिल्‍मी पैरोडी पर आधारित भजन बज रहे हैं, होली के नए पुराने गीत बज रहे हैं, लोग पान खाकर होली के गीत सुनकर रवाना हो रहे हैं। कहीं गंदे और भद्दे शब्‍द सुनने को नहीं मिल रहे।

मेरा दिल रोता है यह सब देखकर, क्‍यों न लौटा लाएं पुराने दिन
काश एक बार फिर पहले सी होली लौट आए, सप्‍ताहभर पहले ही उसकी रौनक शुरू हो जाए, गली मोहल्‍लों में चंग की थाप के बीच कहीं पानी की फुहार तो कहीं रंगों की मार एक बार फिर भिगो दे, कोई तो हो जो चुभती हुई निजी बातों को दीवार पर लिख दे, भले ही हर कोई मुझ पर हंसता हुआ गुजरे लेकिन मुझे मेरे होने का अहसास तो कराए, क्‍यों कान्‍हा गोपियों का मिजाज देखकर होली खेले...

काश एक बार फिर वही बिंदास अंदाज फिर दिखाई दे, किसी की परवाह नहीं, जो आएगा वहीं लपेट दिया जाएगा। मैं ना नुकर करता रहूं और सिर से पांव तक पानी में भीगा ठिठुराता रहूं और रंग फेंकने वाले एक बार फिर मुझे रिरियाने को मजबूर कर दे...
एक बार फिर वही होली लौट आए...

ऐसो बंशी बजाई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे
महलां माई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो...

सुंई हो जा रे सोनारण थारो कांई बिगड़े रे... सुंई हो जा रे...

तहजीब और तमीज के लिए तो बाकी पूरा साल पड़ा ही है। तो क्‍यों न तोड़ दे सभी बंधन और छोड़ दें सारी वर्जनाएं...

सोमवार, 11 जनवरी 2010

New ATM machine

MALE VS. FEMALE AT THE ATM MACHINE

A new sign in the Bank Lobby reads--- Please note that this Bank is installing new Drive-through ATM machines enabling customers to withdraw cash without leaving their vehicles. Customers using this new facility are requested to use the procedures outlined below when accessing their accounts.
After months of careful research, MALE &FEMALE Procedures have been developed. Please follow the Appropriate steps for your gender.'

MALE PROCEDURE:
1. Drive up to the cash machine.
2. Put down your car window.
3. Insert card into machine and enter PIN.
4. Enter amount of cash required and withdraw.
5. Retrieve card, cash and receipt.
6. Put window up.
7. Drive off.

FEMALE PROCEDURE:
1. Drive up to cash machine.
2. Reverse and back up the required amount to align car window with the machine.
3. Set parking brake, put the window down.
4. Find handbag, remove all contents on to passenger seat to locate card.
5. Tell person on cell phone you will call them back and hang up..
6. Attempt to insert card into machine...
7. Open car door to allow easier access to machine due to its excessive distance from the car.
8.. Insert card.
9. Re-insert card the right way.
10. Dig through handbag to find diary with your PIN written on the inside back page.
11. Enter PIN.
12. Press cancel and re-enter correct PIN.
13. Enter amount of cash required.
14. Check makeup in rear view mirror.
15. Retrieve cash and receipt..
16. Empty handbag again to locate wallet and place cash inside.
17. Write debit amount in check register and place receipt in back of checkbook.
18. Re-check makeup.
19. Drive forward 2 feet.
20. Reverse back to cash machine.
21. Retrieve card.
22. Re-empty hand bag, locate card holder, and place card into the slot provided!
23. Give dirty look to irate male driver waiting behind you.
24. Restart stalled engine and pull off.
25. Redial person on cell phone..
26. Drive for 2 to 3 miles.
27. Release Parking Brake


ENJOY :)...

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

बहुत सोचा अब लिख रहा हूं

थ्री इडियट्स देखी, फिर चकरी ले आया, फिर बार बार देखी, कई बार देखी, बीच- बीच में से देखी। कई सीन दोहराकर देखे, फिर सोचा कि अब लिखूं तो देखा कि लोगों ने जमकर पहले ही लिख दिया है। सुकून की बात यह है कि मैं जो सोचा वह यहां कहीं मिला नहीं और कहीं लिखा भी गया है तो मुझे दिखा नहीं। सो इस बार नए विचार के साथ विशेष तरह से सोचने वालों की बात की जा सकती है।

मेरा विचार यह है कि रैंचो हम में से हर एक में है, फिल्‍म को पहली बार देखते समय हम दो लोग साथ थे, मैं लो प्रोफाइल था और मेरा साथी मुझसे अधिक प्रोफाइल का था। मेरी खासियत यह है कि मैं आपे में बने रहने का भरसक प्रयास करता हूं और मेरा साथी अपनी प्रोफाइल से भी काफी नीचे बना रहकर छोटे से छोटा काम बड़ी तल्‍लीनता से करता है। हम दोनों ने फिल्‍म के दौरान ही यह बात शिद्दत से महसूस की कि हम अपनी-अपनी जिंदगी के एक खास समय में रैंचो थे। बाद में हमने खुद को ढाल लिया और राजू बन गए। ऐसा नहीं है कि हमारा राजूलाइजेशन हो गया बल्कि हमने उसे होना स्‍वीकार किया। फिल्‍म में सभी का ध्‍यान रैंचो की तरह है और सूत्रधार फरहान बना हुआ है इसके बावजूद सबसे तीखा परिवर्तन राजू में होता है।

हम भी राजू ही बनना चाहते हैं, क्‍योंकि रैंचो का तरीका कुछ दिन तो काम कर जाएगा लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में राजू वाली किल्‍लर इंस्टिंक्‍ट ही काम आएगी। ऐसा कब क्‍यों और कैसे होता है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन आप खुद सोचेंगे तो पाएंगे कि कभी न कभी आपकी जिंदगी में भी ऐसा काल आया होगा जब आपने स्‍थापित नियमों और सिद्धांतों को चुनौती दी और बाकी लोग एकटक पहले से खींची हुई लकीर को देखते हुए उसे ही पीटने की तैयारी कर रहे थे और आप आसानी से आगे निकल गए। वास्‍तव में थिंक आउट ऑफ द बॉक्‍स एक आदत होती है, यह हमें लुभाती है, लेकिन यह अनिश्चित भविष्‍य की ओर लेकर जाती है, इसी अनिश्चितता का डर हमें पूर्व में लिए गए फैसलों जैसे फैसले लेने को बाध्‍य करती है। मैं दोबारा बात करना चाहूंगा तीनों पात्रों की...

रैंचो की अलग सोच

रैंचो के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसने तो अपनी जिंदगी शुरू भी नहीं की है लेकिन वह ऐसा बैकअप रखता है जो ढाई करोड़ रुपए महीने के कमाता है और रैंचो की इंजीनियरिंग के लिए उन रुपयों को भी दांव पर लगा सकता है। रैंचो को डिग्री से भी कुछ हासिल नहीं करना है। अब सफल कैसे होगा, वह भविष्‍य के गर्भ में है। अगर रैंचो जीनियस न हो और उसमें वह जज्‍बा न हो तो वह कहां पहुंचेगा। पहले उसने अपने दिल की बात सुनी बाद में पॉल कोएलो आ गए और कहा जब आप किसी चीज को चाहते हैं तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने की साजिश करने लगती है (शाहरुख खान की फिल्‍म में यह डॉयलॉग बाद में आया था), और रैंचो को अपना भविष्‍य मिल जाता है, लेकिन कोई भी उम्रभर कंवारा रहकर अपने दोस्‍तों से अलग नहीं रहना चाहेगा। सो रैंचो का पात्र फिल्‍म बीतने तक कमजोर होने लगता है।

फरहान की दिल की बात

फरहान भी जीनियस है। वह वाइल्‍ड लाइफ फोटोग्राफी करता है। मजे की बात यह है कि उसके फोटोग्राफ हंगरी के आंद्रे इस्‍तवान को पसंद आ जाते हैं। अब मान लीजिए कि मैं एक ब्‍लॉगर हूं और किसी को भी मेरा लिखा पसंद नहीं आता। अब भले ही मैं कितनी भी दिल की क्‍यों न सुन लूं, आटा और दाल लाने के लिए तो रिपोर्टिंग ही करनी पड़ेगी। खबर लाउंगा तो हाजिरी गिनी जाएगी और उसी से तनख्‍वाह मिलेगी। एक सूत्रधार के दिल का सुकून है कि वह जो बनना चाहता था उसे वह बनने में रैंचों ने मदद की लेकिन मैं खुद को देखूं तो लगता है कि बचपन से किसी ऐसी चीज का सपना नहीं रहा। तो अब क्‍या बनूंगा। क्‍या करूंगा। न आंद्रे है न कैमरा न कमरे में एसी। यह कैरेक्‍टर बनाया ही कमजोर गया था। बस सूत्रधार जो रैंचो और राजू को देखता रहता है।

raju

राजू मेरा यार...

सिस्‍टम को दोष देना और जीभरकर गालियां निकाल लेना आसान है लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ उसी सिस्‍टम को रूल करना उससे अधिक कठिन काम है। जिन लोगों ने यह किया है वे इसे समझ सकते हैं। एक वाकया याद आता है। किसी चेले ने गुरू से पूछा कि विवेकानन्‍द और रामकृष्‍ण परमहंस में क्‍या अंतर है। तो गुरू ने कहा कि विवेकानन्‍द इतने बड़े हो गए कि माया का जाल उनके लिए छोटा पड़ गया लेकिन परमहंस इतने सूक्ष्‍म हो गए कि माया का जाल उन्‍हें पकड़ नहीं पाया। वास्‍तव में सांसारिक आदमी को... जो शादी करना चाहता है, अपने मां-बाप का ऋण चुकाना चाहता है, अपने लिए प्रॉपर्टी बनाना चाहता है, दुनिया में अपना नाम करना चाहता है, देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है, इज्‍जत और शोहरत के लिए कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार है वह विवेकानन्‍द नहीं बन सकता जो इज्‍जत को भारत में छोड़कर गए और सिर्फ राष्‍ट्र को ऊंचा उठाने के लिए खत्‍म हो गए। पीछे सिवाय विचारों के कुछ नहीं। वैसे परमहंस ने भी पीछे कुछ नहीं छोड़ा सिवाय विचारों के... लेकिन माया के जाल से बचने का रामकृष्‍ण का तरीका मुझे अधिक श्रेष्‍ठ लगता है। जहां रैंचो खुद को सिस्‍टम से बड़़ा बना लेता है वहीं राजू उसी सिस्‍टम में अपनी पैठ बनाता है। अंगूठियां पहनकर और भगवान से भीख मांगकर पास होने वाला राजू जब कांफिडेंस में आता है तो सलेक्‍टर्स को कहता है आप अपनी नौकरी रखिए मैं अपना एटीट्यूट रखता हूं।

क्‍या हम भी ऐसा ही नहीं चाहते...

फरहान बनकर सपनों के पीछे ब्राजील के रेन फोरेस्‍ट में जाने का ख्‍वाब मेरा तो नहीं है

रैंचो की तरह लद्दाख में गुमनामी की जिंदगी भी नहीं जी सकता

हां राजू की तरह सिस्‍टम को सिस्‍टम के भीतर रहकर चैलेंज कर सकता हूं और अपने लिए बेहतर जगह बना सकता हूं.... बिना डरे...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में लेखकों का उत्‍साह लगातार बढ़ता हुआ देख रहा हूं। एक तरफ पचासों लोग हैं जो आमतौर पर भी कुछ भी लिख दें तो पूरी शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी लेखकों की मिसालें भी हैं जो ऐसा लिखते हैं कि पाठक पढ़ना चाहते हुए भी पढ़ नहीं पाते। हालांकि पाठकों और टिप्‍पणीकारों का लगातार आग्रह रहता है कि ऐसी भाषा में लिखा जाए जिसे आम आदमी आसानी से पढ़ और समझ सके। इसके बावजूद लिखने में सिद्धहस्‍त लोग अपनी धुन में उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य नेट पर रच रहे हैं।

ठीक है, भले ही आज किसी को समझ में न आए लेकिन किसी न किसी दिन किसी न किसी पाठक को तो ये लेख समझ में आएंगे ही।

मैं सीधा-सीधा किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन विषय आधारित और कई जगह विषय से हटकर कुछ लोग ऐसी भाषा लिख रहे हैं जो कम से कम मुझे एक बार में समझ में ही नहीं आती। जरूरी नहीं है कि मैं सभी विषयों का अच्‍छा जानकार होउं और यह भी जरूरी नहीं है कि सबकुछ मेरे लिए ही लिखा जा रहा है। इसके बावजूद संप्रेषण को सुगम बनाने की आग्रहता बनी रहती है।

मैं सोचता हूं कि किसी हैडिंग को पढ़ने के बाद मेरी इच्‍छा होती है कि इस विषय पर जो लेख लिखा गया है उसे पढूं और समझूं कि इसमें नया क्‍या है। हो सकता है इस बारे में बाजार में कई किताबें उपलब्‍ध हों लेकिन जब एक ब्‍लॉगर लिख रहा है तो समझने के बाद नेट के पाठकों को समझाने के इरादे से लिख रहा होगा। मैं उस पोस्‍ट में पहुंचता हूं, तो पाता हूं कि अब तक जिस अंदाज में विषय को पढ़ा और समझा था उससे कहीं अधिक दुरुह अवस्‍‍था में यह नेट पर मिल रहा है। किसी लेख विशेष को एक दो या तीन बार पढ़ने के बाद भी मेरी उलझन खत्‍म नहीं होती, तो कुछ देर उलझा रहने के बाद अंतरजाल के किसी दूसरे कोने की ओर चल देता हूं।

आमतौपर नेट पर जमे हुए अधिकांश पाठकों की भी यही स्थिति होती होगी।

जो बातें किताबों में लिखी जा चुकी हैं उन्‍हें ज्‍यों का त्‍यों नेट पर हिन्‍दी में डाल देना न केवल हिन्‍दी की सेवा है बल्कि नेट पर हिन्‍दी के वर्चस्‍व की ओर एक और कदम है लेकिन यह कदम कितना प्रभावी है, यह सोचना भी महत्‍वपूर्ण लगता है। कई लोग अपनी बात लिख रहे हैं, सादे शब्‍दों में, कई बार कुछ कठिन शब्‍दों का भी इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन वे इतने कठिन नहीं होते कि पढ़ने पर सिर चकरा जाए, लेकिन सोचिए कि क्‍या बिना किसी विषय विशेष को केन्‍द्र में रखे ये लोग क्लिष्‍ट भाषा लिखते, तो क्‍या आज उन्‍हें इतनी लोकप्रियता मिल पाती।

मैं सोचता हूं,  नहीं।

... इससे हिन्‍दी और इसके क्लिष्‍ट शब्‍दों का महत्‍व भी कम नहीं होता।

जनकवि हरीश भादाणीजी की कविताओं की समीक्षा में एक बार जगदीश्‍वर चतुर्वेदीजी ने कहा था कि ये कविताएं केवल गाने के लिए हैं। आम आदमी सुनेगा और भुला देगा। जब तक खुद हरीशजी गाएंगे ये कविताएं जिंदा रहेगी लेकिन खुद हरीशजी के सीन से हटने के साथ ही कविता का भी लोप हो जाएगा। उनका संदर्भ हरीश भादाणीजी की कविताओं में आ रहे बिंब और बिंब के विचार में रिड्यूस होने के बारे में था। इस पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंदकिशोर आचार्यजी ने कहा था कि हरीशजी आम जनता से संप्रेषणीय आग्रहता के चलते बिंब के साथ कविता का सृजन करते हैं। और यह बिंब आम आदमी की समझ में आए इसलिए कविता के अंत तक बिंब यानि इमेज को विचार तक रिड्यूस कर देते हैं। यह कमी नहीं बल्कि हरीशजी की खासियत है।

आज उस घटना के करीब दो साल बाद मैं देख रहा हूं कि ब्‍लॉगिंग में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

एक ज्‍योतिष विद्यार्थी के रूप में जब लिखना शुरू किया तो लगा कि क्‍या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ में आए। विषय को लेकर सैकड़ों सवाल दिमाग में थे और अब भी हैं लेकिन उनमें से कुछ विषयों का जुड़ाव आम आदमी से सीधे होता है। अब नवमांश और सबलॉर्ड में से किसे अधिक सटीक माना जाए इस पर बहस की गुंजाइश अभी नेट पर नहीं है लेकिन ज्‍योतिष में अंधविश्‍वास या साढे़साती की समस्‍या पर हर पाठक पढ़ने को तैयार मिलेगा। ऐसे में मैं सरल शब्‍दों में अपनी बात रख पाता हूं तो पाठक भी उस विचार से खुद को जुड़ा हुआ पा सकेगा। जितने अधिक पाठक जुड़ेंगे विषय से नजदीकी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी।

शुरूआती दौर में एक रास्‍ते पर कुछ दूरी तक पाठक को खींच लेने के बाद विषय को क्लिष्‍ट बना लिया जाए तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन शुरूआत ही ऐसे शब्‍दों से हो जिन्‍हें समझने के लिए हर पंक्ति के बाद रुककर डिक्‍शनरी निकालनी पड़े तो क्‍या नेट पर ब्‍लॉग पढ़ना सजा की तरह नहीं हो जाएगा...