गुरुवार, 25 मार्च 2010

सर्वाधिक मूर्खताएं - माइक्रोपोस्‍ट

इंसान तीन जगहों पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है

बच्‍चे के साथ

शीशे के सामने

और प्रेमिका के साथ उसके सामने...

रविवार, 14 मार्च 2010

नींद - एक और कविता पुरानी डायरी से

जैसा कि मैं स्‍वीकारोक्ति कर चुका हूं कि मुझे पद्य की समझ नहीं है इसके बावजूद मैंने कुछेक धृष्‍टताएं इस क्षेत्र में की हैं।
ऐसी ही एक कविता... पता नहीं कैसी है...

प्‍यारी नींद


आज फिर तैयार हो निकला मैं
इस संग्राम में
नई भोर में नया जीवन लिए
भिड़ने को तैयार मैं
दिनभर जूझा, दिनभर लड़ा
थक गया उस शाम मैं
फिर सुहानी रुपहली उस शाम को
मस्‍ती में डूबा रहा मैं
फिर अकेले बैठ बिताए
कुछ तन्‍हाई के पल मैंने
खो गया चैन,
ले ली बेचैनी मैंने
उड़ गई नींद
जागता रहा सारी रात मैं
समझ न पाया समझ में
क्‍या खो दिया कुछ पाने में
घावों को भरने वाली
नींद को छोड़ दिया मैंने
जो मीठी नींद दे सकती थी
फिर लड़ने की ताकत मुझे
तोड़ा उस नींद से नाता
जागता रहा सारी रात मैं...

सिद्धार्थ - 13-4-2002

एक अभिव्‍यक्ति

आज पुरानी डायरी में दो पंक्तियां दिख गई... 
सफाई का काम छोड़कर पहले उन्‍हें ही पोस्‍ट करने बैठा हूं... 
मेरी पद्य की दो-चार रचनाओं में से एक.... 



वक्‍त की मौज ने हमको देखा है एक बार 
अब तो हमीं याद करते हैं बिताए पलों को बार-बार









मंगलवार, 9 मार्च 2010

फिर जुड़ गया होम्‍योपैथी से

सालों पहले, यानि वर्ष 1997 और उससे पहले मेरे दिन के कुछ घंटे चाहे-अनचाहे होम्‍योपैथी के साथ गुजरते थे। रोग हो या न हो, सत्‍यव्रत सिद्धांतावलंकार, बोरिक और नैश पढ़ने को मिल जाते थे। कई बार क्‍लार्क की रैपरेटरी के पन्‍ने भी उलटने पड़ते। यह सब होता मेरे पड़नानाजी स्‍वर्गीय माधोदासजी व्‍यास के सानिध्‍य के कारण। मेरे नानीजी के पिताजी। कभी उन पर पूरी पोस्‍ट लिखूंगा। यहां बस यह उल्‍लेख कर देना चाहता हूं कि 78 साल की उम्र में उन्‍हें एक बार लगा कि होम्‍योपैथी दवाएं भी कारगर हो सकती हैं, और उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी और बाद में एक रोगी को तो मृत्‍युशैय्या से लौटा लाए थे। वर्ष 1999 में उनके निधन के साथ होम्‍योपैथी का सफर भी थम गया। उनके बारे में बाकी बातें बाद में,

हां, मैं फिर से लौट आया हूं होम्‍योपैथी के साथ।

कुछ दिन पहले पैट्रोल पम्‍प से महज बीस कदम की दूरी पर पैट्रोल खत्‍म हो गया। मैंने सोचा जय गणेश, और उत्‍साह में अपनी पल्‍सर से उतरा और उसे घसीटने लगा। अभी पांच सात कदम ही गया होउंगा कि ब्‍लैक आउट हो गया। आंखों के आगे अंधेरा। मैं जहां का तहां खड़ा रह गया। इसके कुछ दिन बाद शिक्षा निदेशालय की सीढि़या तेजी से चढ़ गया, ऊपर के माले पर पहुंचकर फिर वही स्थिति हुई। मैंने किसी को कहा तो नहीं लेकिन ऑफिस में कचौरी समोसे खाने बंद कर दिए, जो रोजाना शाम को किसी न किसी बहाने आ जाते हैं।

निदेशालय में ही मिले शिवकुमार आचार्यजी उर्फ भाईजी, एक दिन वहां की कैंटीन में ही कचौरी की शर्त लग गई। मैंने कहा खाउंगा तो नहीं लेकिन हार गया तो खिला दूंगा। इस पर भाईजी ने पूछा क्‍यों, पहले तो मैं टाल मटोल करता रहा लेकिन बाद में मैंने उन्‍हें बता दिया। उन्‍होंने मुझे कहा एक बार मेरे घर आना। तब तक मुझे पता नहीं था कि वे होम्‍योपैथी का अध्‍ययन करते हैं। उन्‍हें सेंट्रल नर्वस का कोई डिसऑर्डर हुआ था बीसेक साल पहले, तब ऐलोपैथी के सभी ईलाज आजमाने के बाद उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी थी। नर्वस डिसऑर्डर तो अभी भी वहीं है लेकिन दूसरे कई रोगों को ठीक करने में उन्‍होंने महारत हासिल कर ली है।

भाईजी के यहां गया तो वहां भाभीजी ने चाय के साथ भुजिया और खाखरे परोसे। मैंने चाय पी ली लेकिन दूसरी किसी चीज को हाथ नहीं लगाया। इस पर भाभीजी तो नाराज हो गए लेकिन भाईजी मुझे अपने कमरे में ले गए। वहां उनकी अलमारी में होम्‍योपैथी की दवाओं का भण्‍डार बना हुआ था। उन्‍होंने मुझे गैस मिक्‍सचर नाम की एक दवा की खुराक दी। गैस के कारण सिरदर्द हो रहा था। वह तुरंत ठीक हो गया। तुरंत से मतलब पांच-सात मिनट में। इसके बाद उन्‍होंने मुझे नक्‍स वोमिका 200 लाकर दी। कहा रात को सोते समय कुछ दिन ले ले। तनाव के कारण तेरा शरीर खराब हो रहा है। गैस मिक्‍सचर और नक्‍स ने तीन दिन में मुझे सिरे से बदल दिया। गर्दन और पेट के किनारे बढ़ रही चर्बी एक साथ खत्‍म हो गई और शरीर में पुरानी फुर्ती लौट आई।

अब फिर से सफेद हो रहे बालों के लिए एसबीएल का जोबरांडी का तेल और शैम्‍पू ले आया हूं। एक-दो दिन में फाइव फॉस भी फिर से ले आउंगा। पुरानी सब बातें वापस याद आने लगी हैं। हो सका तो अगले कुछ दिन में होम्‍योपैथी के कुछ और पक्षों के बारे में लिखने को मिल जाएगा।

मेरे पड़नानाजी माधोदासजी व्‍यास को नमन् और भाईजी को दिल से धन्‍यवाद...

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अच्‍छी रही इस बार की होली...

- साल दर साल होली बेहतर होती जा रही है। इस बार भी होली अच्‍छी रही।

- सौहार्द बना रहा: सुनारों, लोहारों, ब्राह्मणों, राजपूतों, नाइयों, नायकों सहित सबने अपनी-अपनी होली जलाई। किसी ने एक दूसरे की पंचायती नहीं की।

- दिल मिल गए- कॉलोनियों में जहां लोग एक-दूसरे को जानते नहीं वहां सभी ने होलिका दहन के लिए पांच से दस रुपए दिए और होलिका को देखने भी गए।

- साफ-सुथरी: अधिकांश लोग घरों में बंद रहे, जो निकले आस-पड़ोस के लोगों को थोड़ी सी गुलाल लगाकर फिर घरों में घुस गए।

- प्रदूषण भी नहीं- युवाओं ने घर-घर जाकर दो तीन हजार रुपए तो एकत्रित किए लेकिन इतनी संख्‍या में लकडि़यां लेकर नहीं आए। आस-पास का कचरा भी होलिका की भेंट चढ़ा दिया। वातावरण भी साफ हुआ और कुछ पेड़ भी कटने से बच गए।

- सितारों के साथ रहे: टीवी पर लगातार कार्यक्रम आते रहे, शोले से लेकर हाल ही में रिलीज अक्षय कुमार की फिल्‍मों के गानों में खेली गई होली को दर्शकों ने सितारों के साथ जीया। साफ सुथरी और संगीतमय होली ने फाग की रंगत को बढ़ा दिया।

- मुस्‍कुराहटों के दौर: होलिका दहन के बाद धुलण्‍डी से पहले ही कॉलोनी के लोग एक-दूसरे को रास्‍ते में देखकर होली की शुभकामनाएं देने लगे। मिलने पर एक दाढ़ से दूसरी दाढ़ तक दिखाकर विश किया। शाम ढलने तक मुस्‍कुराहटों के दौर दिखाई दिए।

- पीछे छूटा आतंक- गली मोहल्‍लों में पानी की बाल्टियों और पिचकारी लिए बच्‍चों के आतंक से भी इस बार रूबरू नहीं हुए। वह आतंक को कहीं पीछे छूट चुका है। बच्‍चों ने भी सलीके से होली खेलना सीख लिया है और बड़ों को पानी का महत्‍व समझ में आने लगा है।

- मजाक की सीमाएं तय- होली में किससे कितनी मजाक करनी है यह भी अब समझ में आने लगा है, किसी को भी ऐसे ही नहीं छेड़ सकते। सभी आपके दोस्‍त तो नहीं है, पता नहीं कौन चिढ़ जाए, बाद में लेने के देने पड़े। इसलिए सभी ने मजाक की सीमाएं तय कर ली है और छेड़ने के अंदाज भी बदल गए हैं।

गंदे शब्‍द भी नहीं- कई लोगों ने दुकानों पर डेक लगवा लिए हैं, जहां फिल्‍मी पैरोडी पर आधारित भजन बज रहे हैं, होली के नए पुराने गीत बज रहे हैं, लोग पान खाकर होली के गीत सुनकर रवाना हो रहे हैं। कहीं गंदे और भद्दे शब्‍द सुनने को नहीं मिल रहे।

मेरा दिल रोता है यह सब देखकर, क्‍यों न लौटा लाएं पुराने दिन
काश एक बार फिर पहले सी होली लौट आए, सप्‍ताहभर पहले ही उसकी रौनक शुरू हो जाए, गली मोहल्‍लों में चंग की थाप के बीच कहीं पानी की फुहार तो कहीं रंगों की मार एक बार फिर भिगो दे, कोई तो हो जो चुभती हुई निजी बातों को दीवार पर लिख दे, भले ही हर कोई मुझ पर हंसता हुआ गुजरे लेकिन मुझे मेरे होने का अहसास तो कराए, क्‍यों कान्‍हा गोपियों का मिजाज देखकर होली खेले...

काश एक बार फिर वही बिंदास अंदाज फिर दिखाई दे, किसी की परवाह नहीं, जो आएगा वहीं लपेट दिया जाएगा। मैं ना नुकर करता रहूं और सिर से पांव तक पानी में भीगा ठिठुराता रहूं और रंग फेंकने वाले एक बार फिर मुझे रिरियाने को मजबूर कर दे...
एक बार फिर वही होली लौट आए...

ऐसो बंशी बजाई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे
महलां माई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो...

सुंई हो जा रे सोनारण थारो कांई बिगड़े रे... सुंई हो जा रे...

तहजीब और तमीज के लिए तो बाकी पूरा साल पड़ा ही है। तो क्‍यों न तोड़ दे सभी बंधन और छोड़ दें सारी वर्जनाएं...