हां मैंने देखा एक बच्चा वह किसी को खुश करने या किसी लालच में नहीं बल्कि अपनी धुन में गा रहा था। रेगिस्तान की मिट्टी न केवल जीवटता देती है बल्कि राग का भी वरदान बिना मांगे दे देती है। मैं इस बच्चे का नाम नहीं जानता, जाति नहीं जानता... हां यह गडरिया है जो बकरियां लिए घूम रहा था। एक जगह किसी बन्द घर के आगे बैठा कागजों के छोटे टुकड़ों से खेल रहा था और गाता जा रहा था। कॉलोनी के लोग मंत्रमुग्ध खड़े उसे सुन रहे थे। केवल मैंने धृष्टता की ईश्वर की उस आवाज को रिकॉर्ड करने की। मैंने सोचा आप भी आनन्द ले सकेंगे इस शुद्ध आवाज का। सुनिएगा... यह मेरा पहला वीडियो कास्ट है...
शनिवार, 20 नवंबर 2010
उसने ईश्वर के लिए गाया था
https://theastrologyonline.com/famous-astrologer-sidharth-joshi/
Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
एक महत्वपूर्ण वीडियो एड्स से सम्बन्धित...
साइंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन की वेबसाइट पर यह महत्वपूर्ण वीडियो दिखाई दिया। मुझे लगा कि लोगों को इस बारे में पता लगना चाहिए। सो मैंने इसे अपने ब्लॉग पर भी लगाने का विचार बनाया। आप देखिए कि क्या हकीकत है एड्स की... कुछ बातें सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हो सकता है एड्स से लोग मर रहे हों, लेकिन क्या यह वही एड्स है जिसे लेकर पूरी दुनिया में तहलका मचा हुआ है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
रविवार, 1 अगस्त 2010
सतत क्रांति के दौर में...
एक जगह ओशो ने लिखा कि भारत सतत क्रांति के दौर से गुजर रहा है। मैं भी क्रांति करने के मूड में आ गया। कई तरह की क्रांतियां की। जिस जमाने में बच्चों को साइकिल भी नहीं दी जाती थी, उन दिनों में एम-80 चलाई। यानि ग्यारह साल की उम्र में चार फीट की हाइट के साथ अपनी अस्सी किलोग्राम वजनी नानी को पीछे बैठाकर पांच किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में छोड़कर आता था। इसके बाद दूसरी क्रांति तब हुई जब दसवीं पास करने पर साइकिल खरीदने का फैशन आउट होने के बाद साइकिल खरीदकर लाया। घर वालों ने दिलाने से मना कर दिया तो, खुद अकेला जाकर खरीद लाया। भले ही बाद में अपने उस निर्णय पर पछतावा हुआ। ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में जितने ट्यूशन थे सब साइकिल पर आ गए। घर में मोटर वाले वाहन होने के बावजूद पैरों का पानी गन्ने की तरह निकल गया। टांगें भी कमोबेश गन्ने की तरह हो गई। लेकिन एक सच्चे क्रांतिकारी की तरह दूसरे सभी युवकों और युवतियों को वाहनों पर जाते देख न केवल व्यंग्य से मुस्कुराया करता बल्कि अपने साइकिल चलाने की सार्थकता पर भी लगातार सोचता रहता।
पुरातनपंथियों ने भी मुझे बरगलाने में कोई कसर नहीं रखी। मुझे बताया गया कि ज्यादा साइकिल चलाने से घुटने खराब हो जाते हैं, पाइल्स की समस्या हो जाती है। एक ने तो आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि इससे हृदय गति तक रुक जाती है।
खैर कुछ सालों बाद एक पुराने स्कूटर ने मुझे बदलाव का रास्ता दिखाया। नई नौकरी के साथ मिला पुराना स्कूटर मेरी बहुत कड़ी परीक्षा लेता और मैं फिर से साइकिल के बारे में सोचने लगता। शादी के साथ पल्सर मिली। तब से लेकर छह दिन पहले तक किक मारने के लिए भी टांग नहीं हिलाई। लम्बे समय तक आराम की अवस्था ने एक बार फिर क्रांति की स्थितियां पैदा कर दी।
कई दिन तक सोचने, कसमें खाने, वादे करने और मन को कड़ा करने की कार्रवाई के बाद एक ऐतिहासिक दिन (डेट तो रसीद में लिखी हुई होगी, उठकर देखूंगा तो फ्लो टूट जाएगा) मैं फिर से साइकिल खरीद लाया। इस बार थोड़ी स्टाइलिश है। थोड़ी इसलिए कि भाई साथ में था। वह पुरातनपंथियों की साजिश में हमेशा साथ रहता है। उसने गियर और शॉकर वाली साइकिल के विरोध में अपना वीटो पावर पेश कर दिया। सो दोनों तरह की खासियत इस साइकिल में शामिल नहीं कर पाया। जो भी हो इसके हैण्डल सीधे-सीधे नहीं है, यानि सीधे हैं पुरानी साइकिलों की तरह टेढ़े नहीं हैं।
पांच दिन से साइकिल चलाकर बीकानेर में सतत क्रांति के दौर को फिर से जगाने का प्रयास कर रहा हूं। अब तक कुल जमा 23 लोगों ने साइकिल का ट्रायल लिया है। दस मीटर से लेकर सत्तर मीटर तक के ट्रायल हुए हैं। मेरे कपड़ों, मोबाइल, घड़ी और दूसरे सहायक उपकरणों की तुलना में पांच ही दिनों में साइकिल ने दस गुना कमेंट बटोर लिए हैं।
इसी के साथ एक रहस्योद्घाटन भी हुआ है कि गरीब, दलित, पिछडि़त, दया का पात्र व्यक्ति साइकिल चलाए तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन एक मोटा, चमकते चेहरे वाला, जींस टीशर्ट पहना आदमी तबियत से धीरे-धीरे साइकिल चलाता जाए और उसके चेहरे पर खुशी के भाव हो तो पास से मोटर वाले दुपहिया या चार पहिया वाहन पर निकल रहा व्यक्ति भी पहले तो गौर से देखता है फिर ईर्ष्या से भर उठता है। ऐसे लोगों के भाव तो अधिक मुखरता से सामने आते हैं जिनके वाहन का पैट्रोल खत्म हो चुका होता है और वे सामने से अपनी गाड़ी घसीटते हुए आ रहे होते हैं।
जो भी हो एक और क्रांति का सूत्रपात हो चुका है, जल्द ही बीकानेर में साइकिल चलाने वालों की संख्या बढ़ी हुई दिखाई देने लगेगी। मैंने यह नहीं कहा कि संख्या बढ़ जाएगी...
यह सावन के अंधे वाली बात भी हो सकती है... :)
फोटो - साभार कान्हा जोशी
पुरातनपंथियों ने भी मुझे बरगलाने में कोई कसर नहीं रखी। मुझे बताया गया कि ज्यादा साइकिल चलाने से घुटने खराब हो जाते हैं, पाइल्स की समस्या हो जाती है। एक ने तो आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि इससे हृदय गति तक रुक जाती है।
खैर कुछ सालों बाद एक पुराने स्कूटर ने मुझे बदलाव का रास्ता दिखाया। नई नौकरी के साथ मिला पुराना स्कूटर मेरी बहुत कड़ी परीक्षा लेता और मैं फिर से साइकिल के बारे में सोचने लगता। शादी के साथ पल्सर मिली। तब से लेकर छह दिन पहले तक किक मारने के लिए भी टांग नहीं हिलाई। लम्बे समय तक आराम की अवस्था ने एक बार फिर क्रांति की स्थितियां पैदा कर दी।
कई दिन तक सोचने, कसमें खाने, वादे करने और मन को कड़ा करने की कार्रवाई के बाद एक ऐतिहासिक दिन (डेट तो रसीद में लिखी हुई होगी, उठकर देखूंगा तो फ्लो टूट जाएगा) मैं फिर से साइकिल खरीद लाया। इस बार थोड़ी स्टाइलिश है। थोड़ी इसलिए कि भाई साथ में था। वह पुरातनपंथियों की साजिश में हमेशा साथ रहता है। उसने गियर और शॉकर वाली साइकिल के विरोध में अपना वीटो पावर पेश कर दिया। सो दोनों तरह की खासियत इस साइकिल में शामिल नहीं कर पाया। जो भी हो इसके हैण्डल सीधे-सीधे नहीं है, यानि सीधे हैं पुरानी साइकिलों की तरह टेढ़े नहीं हैं।
पांच दिन से साइकिल चलाकर बीकानेर में सतत क्रांति के दौर को फिर से जगाने का प्रयास कर रहा हूं। अब तक कुल जमा 23 लोगों ने साइकिल का ट्रायल लिया है। दस मीटर से लेकर सत्तर मीटर तक के ट्रायल हुए हैं। मेरे कपड़ों, मोबाइल, घड़ी और दूसरे सहायक उपकरणों की तुलना में पांच ही दिनों में साइकिल ने दस गुना कमेंट बटोर लिए हैं।
इसी के साथ एक रहस्योद्घाटन भी हुआ है कि गरीब, दलित, पिछडि़त, दया का पात्र व्यक्ति साइकिल चलाए तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन एक मोटा, चमकते चेहरे वाला, जींस टीशर्ट पहना आदमी तबियत से धीरे-धीरे साइकिल चलाता जाए और उसके चेहरे पर खुशी के भाव हो तो पास से मोटर वाले दुपहिया या चार पहिया वाहन पर निकल रहा व्यक्ति भी पहले तो गौर से देखता है फिर ईर्ष्या से भर उठता है। ऐसे लोगों के भाव तो अधिक मुखरता से सामने आते हैं जिनके वाहन का पैट्रोल खत्म हो चुका होता है और वे सामने से अपनी गाड़ी घसीटते हुए आ रहे होते हैं।
जो भी हो एक और क्रांति का सूत्रपात हो चुका है, जल्द ही बीकानेर में साइकिल चलाने वालों की संख्या बढ़ी हुई दिखाई देने लगेगी। मैंने यह नहीं कहा कि संख्या बढ़ जाएगी...
यह सावन के अंधे वाली बात भी हो सकती है... :)
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
सुपरमैन का कंफ्यूजन और सुपर ब्लॉगर
मुझे लगता है सुपरमैन शुरू से ही कंफ्यूज है। पहले तो लगता था कि कंफ्यूज है लेकिन अब लगता है कि उस पर जानबूझकर इस प्रकार का द्वंद्व थोपा गया है। सुपरमैन खाली उड़ने वाला सुपरमैन नहीं है। मेरे सुपरमैनों में स्पाइडरमैन, बैटमैन, हीमैन, सुपर कमाण्डो ध्रुव, नागराज, फैण्टम, मैण्ड्रेक, लोथार, साबू और भी जो नाम आपको याद आते हों और जिनके पास अपनी खुद की शक्तियां हों, इसमें जोड़ सकते हैं।
अब आप कहेंगे ये लोग तो बिल्कुल स्पष्ट तरीके से अपना काम करते हैं। अच्छे लोगों की रक्षा करते हैं और बुरे लोगों को दण्डित करते हैं। लेकिन मुझे यह बात इतनी सीधी नहीं लगती है। इसमें कुछ लोचा है। ये सभी लोग पहले की बनाई गई व्यवस्था को ही फॉलो कर रहे हैं। न तो उसमें बदलाव ला रहे हैं न व्यवस्थापकों को बदलाव लाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। और तो और पिछले दिनों आए एक्समैन ने भी अच्छी ताकतों के साथ मिलकर अच्छे काम में सहयोग देना शुरू कर दिया।
ऐसा क्यों
उन्हें क्यों पहले से बनी व्यवस्था को ही फॉलो करना चाहिए जबकि
- उनके पास नैसर्गिक ताकत है
- पूर्व के किसी भी आम इंसान की तुलना में अधिक बुद्धि है
- पहले से अर्जित किसी भी ज्ञान से अधिक ज्ञान है
- किसी भी सत्ता के प्रति जवाबदेही नहीं है
- पृथ्वी के भीतर या ब्रह्माण्ड में कहीं उन्हें रुकना नहीं है
- ताकत और बुद्धि के अलावा कम जरूरतें उन्हें स्वतंत्र प्रभुसत्ता देती हैं
- वे खुद बेहतरीन न्याय कर सकते हैं
- उन्हें सलाखों में कैद नहीं किया जा सकता
- राजनीति से वे परे हैं
- सामाजिक बंधन उन्हें बांध नहीं सकते
- वे पलक झपकते ही कहीं भी पहुंच सकते हैं
और भी ऐसी हजारों विशेषताएं जो किसी आम मानव की तुलना में उन्हें श्रेष्ठ बनाती है। इसके बावजूद वे उसी व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं जो व्यवस्था पहले से बनी हुई है। वे उसमें बदलाव नहीं लाते, बल्कि व्यवस्था को तोड़ने वाले लोगों को दण्डित करते हैं। पिछले दिनों हैनकॉक आया और उसके बारे में पढ़ा तो लगा कि हां यह है असली सुपरमैन, लेकिन फिल्म के अंत तक वह भी आम सुपरमैन बन गया। अच्छे कपड़े पहन लिए और समाज की सेवा करने लगा। तो क्या सुपरमैन केवल समाज की सेवा के लिए अतिरिक्त शक्तियां लेकर आते हैं।
वास्तव में सुपरमैन कर क्या रहे हैं-
- कानून तोड़ने वालों को दण्ड देते हैं
- व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग देते हैं
- निर्बल लोगों को समस्याओं से बाहर निकालते हैं
- अंडर कवर बने रहकर सामान्य जिंदगी जीते हैं
- कानून का पालन करते हैं
- राजनीतिज्ञों, पुलिस, प्रशासन, समाज के ठेकेदारों, बॉस, परिवार जैसी इकाइयों का सम्मान करते हैं
- सुंदर बने रहते हैं और सुंदर और सभ्य लोगों का सम्मान करते हैं
- लोगों की केवल उतनी मदद करते हैं कि वे फिर से खड़े होकर पूर्व स्थापित व्यवस्था के लिए काम कर सकें
- बुरे लोगों को पकड़ते हैं और उन्हें पुलिस के हवाले कर देते हैं
- पुल को गिरने से बचाते हैं, रेल को ट्रेक पर बनाए रखते हैं, ट्रॉली को नदी में गिरने से रोकते हैं
ये सभी काम तो पहले से स्थापित व्यवस्था के लोग कर ही रहे हैं। सुपरमैनों के इन कामों को देखकर तो लगता है कि लोगों का व्यवस्था से जुड़े कार्मिकों पर से विश्वास उठ गया है। अब आम जनता को ऐसे लोग चाहिए तो तन-मन और धन से उनकी सेवा तो करें, लेकिन अंडर कवर रहकर कुछ भी बदले में नहीं मांगे। ऐसा क्यों, भगवान का अवतार अधर्म को खत्म कर धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए ही होता है। इंसान की बनाई व्यवस्था ढहने लगती है तो वह उसे सुधारने के बजाय भगवान को याद करता है। उन्हें कहता है आओ और मुझे फिर से अपने कंफर्ट जोन में लौटा दो। जब से भगवान ने आना बंद किया है इंसान ने सुपरमैन को बुलाना शुरू कर दिया है।
तो सुपरमैन ऐसा क्यों नहीं करते कि-
- वे अपनी शक्तियों के इस्तेमाल का राज्य और सरकार से कर वसूलना शुरू कर दें
- अंडर कवर रहने के बजाय एक नई व्यवस्था बनाएं जो राज्य के सामानान्तर चले
- वे खुद अपने स्तर पर न्याय करें। जो लोग सही है उन्हें प्रशय दें और जो गलत हैं उन्हें अपने स्तर पर ही दण्डित कर दें
- वे ऐसे विचार लेकर आएं जो हर जगह क्रांति कर दे
- वे ऐसे लोग तैयार करें जो उनकी तरह ही अपनी सामान्तर सत्ता चलाएं
- वे लोगों को सुपरमैन बनने के लिए प्रशिक्षित करें
वे खूब बच्चे पैदा करें और पूरी पृथ्वी को सुपरमैन की नई प्रजाति से भर दें, ताकि अक्षम और नाकारा हो चुके इंसान पूरी तरह खत्म हो जाएं जैसा कि होमो सैपियंस ने नियंडरथल मानव के साथ किया होगा। यह नई सुपरमैन प्रजाति ही पृथ्वी पर राज करे और किसी दूसरे को विकसित ही नहीं होने दे। बिल्कुल वैसे जैसे बरगद अपने नीचे किसी दूसरे पौधे को विकसित नहीं होने देता।
पर ऐसा नहीं होगा- क्योंकि आखिर सुपरमैन भी तो इंसान ने ही बनाए हैं। और जब इंसान ने अपने लिए सुपरमैन बनाए हैं तो वे इंसान की ही सेवा करेंगे, न कि उन्हें मारकर अपनी दुनिया बनाएंगे।
तो कैसा होगा सुपर ब्लॉगर
- पहले से स्थापित ब्लॉगरों को फॉलो करने वाला
- पहेलिया लिखने के दौर में पहेलिया लिखने वाला
- भड़ास निकालने वाला
- पुरानी डायरी से निकालकर कविता लिखने वाला
- दूसरे के ब्लॉग पर केवल अच्छे अच्छे कमेंट लिखकर उन्हें प्रोत्साहित करने वाला
- आस-पास के लोगों को प्रेरित कर उनके भी ब्लॉग शुरू कराने वाला
या मन की बातें बिंदास होकर लिखने वाला.....:)
अब आप कहेंगे ये लोग तो बिल्कुल स्पष्ट तरीके से अपना काम करते हैं। अच्छे लोगों की रक्षा करते हैं और बुरे लोगों को दण्डित करते हैं। लेकिन मुझे यह बात इतनी सीधी नहीं लगती है। इसमें कुछ लोचा है। ये सभी लोग पहले की बनाई गई व्यवस्था को ही फॉलो कर रहे हैं। न तो उसमें बदलाव ला रहे हैं न व्यवस्थापकों को बदलाव लाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। और तो और पिछले दिनों आए एक्समैन ने भी अच्छी ताकतों के साथ मिलकर अच्छे काम में सहयोग देना शुरू कर दिया।
ऐसा क्यों
उन्हें क्यों पहले से बनी व्यवस्था को ही फॉलो करना चाहिए जबकि
- उनके पास नैसर्गिक ताकत है
- पूर्व के किसी भी आम इंसान की तुलना में अधिक बुद्धि है
- पहले से अर्जित किसी भी ज्ञान से अधिक ज्ञान है
- किसी भी सत्ता के प्रति जवाबदेही नहीं है
- पृथ्वी के भीतर या ब्रह्माण्ड में कहीं उन्हें रुकना नहीं है
- ताकत और बुद्धि के अलावा कम जरूरतें उन्हें स्वतंत्र प्रभुसत्ता देती हैं
- वे खुद बेहतरीन न्याय कर सकते हैं
- उन्हें सलाखों में कैद नहीं किया जा सकता
- राजनीति से वे परे हैं
- सामाजिक बंधन उन्हें बांध नहीं सकते
- वे पलक झपकते ही कहीं भी पहुंच सकते हैं
और भी ऐसी हजारों विशेषताएं जो किसी आम मानव की तुलना में उन्हें श्रेष्ठ बनाती है। इसके बावजूद वे उसी व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं जो व्यवस्था पहले से बनी हुई है। वे उसमें बदलाव नहीं लाते, बल्कि व्यवस्था को तोड़ने वाले लोगों को दण्डित करते हैं। पिछले दिनों हैनकॉक आया और उसके बारे में पढ़ा तो लगा कि हां यह है असली सुपरमैन, लेकिन फिल्म के अंत तक वह भी आम सुपरमैन बन गया। अच्छे कपड़े पहन लिए और समाज की सेवा करने लगा। तो क्या सुपरमैन केवल समाज की सेवा के लिए अतिरिक्त शक्तियां लेकर आते हैं।
वास्तव में सुपरमैन कर क्या रहे हैं-
- कानून तोड़ने वालों को दण्ड देते हैं
- व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग देते हैं
- निर्बल लोगों को समस्याओं से बाहर निकालते हैं
- अंडर कवर बने रहकर सामान्य जिंदगी जीते हैं
- कानून का पालन करते हैं
- राजनीतिज्ञों, पुलिस, प्रशासन, समाज के ठेकेदारों, बॉस, परिवार जैसी इकाइयों का सम्मान करते हैं
- सुंदर बने रहते हैं और सुंदर और सभ्य लोगों का सम्मान करते हैं
- लोगों की केवल उतनी मदद करते हैं कि वे फिर से खड़े होकर पूर्व स्थापित व्यवस्था के लिए काम कर सकें
- बुरे लोगों को पकड़ते हैं और उन्हें पुलिस के हवाले कर देते हैं
- पुल को गिरने से बचाते हैं, रेल को ट्रेक पर बनाए रखते हैं, ट्रॉली को नदी में गिरने से रोकते हैं
ये सभी काम तो पहले से स्थापित व्यवस्था के लोग कर ही रहे हैं। सुपरमैनों के इन कामों को देखकर तो लगता है कि लोगों का व्यवस्था से जुड़े कार्मिकों पर से विश्वास उठ गया है। अब आम जनता को ऐसे लोग चाहिए तो तन-मन और धन से उनकी सेवा तो करें, लेकिन अंडर कवर रहकर कुछ भी बदले में नहीं मांगे। ऐसा क्यों, भगवान का अवतार अधर्म को खत्म कर धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए ही होता है। इंसान की बनाई व्यवस्था ढहने लगती है तो वह उसे सुधारने के बजाय भगवान को याद करता है। उन्हें कहता है आओ और मुझे फिर से अपने कंफर्ट जोन में लौटा दो। जब से भगवान ने आना बंद किया है इंसान ने सुपरमैन को बुलाना शुरू कर दिया है।
तो सुपरमैन ऐसा क्यों नहीं करते कि-
- वे अपनी शक्तियों के इस्तेमाल का राज्य और सरकार से कर वसूलना शुरू कर दें
- अंडर कवर रहने के बजाय एक नई व्यवस्था बनाएं जो राज्य के सामानान्तर चले
- वे खुद अपने स्तर पर न्याय करें। जो लोग सही है उन्हें प्रशय दें और जो गलत हैं उन्हें अपने स्तर पर ही दण्डित कर दें
- वे ऐसे विचार लेकर आएं जो हर जगह क्रांति कर दे
- वे ऐसे लोग तैयार करें जो उनकी तरह ही अपनी सामान्तर सत्ता चलाएं
- वे लोगों को सुपरमैन बनने के लिए प्रशिक्षित करें
वे खूब बच्चे पैदा करें और पूरी पृथ्वी को सुपरमैन की नई प्रजाति से भर दें, ताकि अक्षम और नाकारा हो चुके इंसान पूरी तरह खत्म हो जाएं जैसा कि होमो सैपियंस ने नियंडरथल मानव के साथ किया होगा। यह नई सुपरमैन प्रजाति ही पृथ्वी पर राज करे और किसी दूसरे को विकसित ही नहीं होने दे। बिल्कुल वैसे जैसे बरगद अपने नीचे किसी दूसरे पौधे को विकसित नहीं होने देता।
पर ऐसा नहीं होगा- क्योंकि आखिर सुपरमैन भी तो इंसान ने ही बनाए हैं। और जब इंसान ने अपने लिए सुपरमैन बनाए हैं तो वे इंसान की ही सेवा करेंगे, न कि उन्हें मारकर अपनी दुनिया बनाएंगे।
तो कैसा होगा सुपर ब्लॉगर
- पहले से स्थापित ब्लॉगरों को फॉलो करने वाला
- पहेलिया लिखने के दौर में पहेलिया लिखने वाला
- भड़ास निकालने वाला
- पुरानी डायरी से निकालकर कविता लिखने वाला
- दूसरे के ब्लॉग पर केवल अच्छे अच्छे कमेंट लिखकर उन्हें प्रोत्साहित करने वाला
- आस-पास के लोगों को प्रेरित कर उनके भी ब्लॉग शुरू कराने वाला
या मन की बातें बिंदास होकर लिखने वाला.....:)
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
रविवार, 13 जून 2010
प्रेम का शिकारा
मैंने शिकार नहीं शिकारा ही लिखा है। दरअसल पति और पत्नी शादी के तुरंत बाद गृहस्थी के शिकारे पर आ गिरते हैं। कश्मीर की वादियों जैसी खूबसूरत लगने वाली दुनिया में घर एक डल झील बन जाता है और पति और पत्नी शिकारे में...

अब शिकारे में तो एक ही व्यक्ति बैठ सकता है तो दूसरे का क्या होता है... यही तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदू है। वास्तव में शिकारे में एक ही आदमी होता है। दूसरा तो पानी में उतराता रहता है। कभी पति शिकारे में तो पत्नी पानी में और कभी पत्नी शिकारे में तो पति पानी में दिखाई देते हैं। कब, कौन, किसे और कैसे पानी में धकेलने में कामयाब होता है यह व्यक्तिगत स्किल पर निर्भर करता है। आमतौर पर पुरुषों को ही अधिकतर पानी में देखा गया है, लेकिन कई बार पत्नियां भी पानी में आ गिरती हैं। पर, मूढ़ पुरुषों की तुलना में वे पानी में कम वक्त बिताती हैं। यही नहीं जब पत्नी शिकारे में होती है तो झील में भ्रमण को दौरान शिकारे को धक्का भी पतिदेव से ही लगवाती हैं। आप अगर शादीशुदा हैं तो इस स्थिति से रोजाना ही रूबरू होते होंगे।
दरअसल शिकारे की सवारी के कई नियम हैं। पता नहीं ये शाश्वत हैं कि नहीं, लेकिन शादी के बाद से अब तक पिछले पांच सालों में मुझे इनकी इटरनिटी पर कोई संदेह नहीं रहा है। आप भी विश्वास कर सकते हैं।
पहला नियम: शिकारे में एक बार में केवल एक ही खिलाड़ी बैठ सकता है, इसमें बैठने का आपके पास ठोस कारण होना चाहिए, वरना आप खुद ब खुद पानी में आ गिरेंगे।
दूसरा नियम: पानी से निकलने के लिए सही समय का इंतजार करें, समय से पहले बाहर निकल आए तो शिकारा भरा हुआ मिलेगा और फिर से पानी में जा गिरेंगे।
तीसरा नियम: एक बार शिकारे पर जमने के बाद पानी में गिरे साथी को शिकारे में पहुंचने के लिए हाथ देने का उपक्रम करें, भले ही आपके हाथ में तेल ही क्यों न लगा हो।
चौथा नियम: जितनी बार आप फिसलकर पानी में गिरेंगे आपके शिकारे में लौटने का प्रयास करने की समयावधि भी बढ़ती जाएगी।
पांचवा नियम: एक बार पानी में गिर ही पड़ें तो कुछ देर वहीं बने रहें, बिना वजह खुद को शिकारे में होने का धोखा न दें... आखिर हार मानने का जज्बा भी तो होना चाहिए।
नोट: ध्यान रखें कि जब आप दोनों ये खेल खेल रहे हों तो किसी और को आपके शिकारे या पानी में होने की स्थिति का पता नहीं चले। इससे केवल जगहंसाई ही हो सकती है। सॉल्यूशन नहीं मिलेगा। सो निजी प्रयासों से खेल को चालू रखें और बाहर के लोगों को बाहर रखें। आखिर खेल आपका है और खेल का मजा भी आपका निजी है... :)
अब शिकारे में तो एक ही व्यक्ति बैठ सकता है तो दूसरे का क्या होता है... यही तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदू है। वास्तव में शिकारे में एक ही आदमी होता है। दूसरा तो पानी में उतराता रहता है। कभी पति शिकारे में तो पत्नी पानी में और कभी पत्नी शिकारे में तो पति पानी में दिखाई देते हैं। कब, कौन, किसे और कैसे पानी में धकेलने में कामयाब होता है यह व्यक्तिगत स्किल पर निर्भर करता है। आमतौर पर पुरुषों को ही अधिकतर पानी में देखा गया है, लेकिन कई बार पत्नियां भी पानी में आ गिरती हैं। पर, मूढ़ पुरुषों की तुलना में वे पानी में कम वक्त बिताती हैं। यही नहीं जब पत्नी शिकारे में होती है तो झील में भ्रमण को दौरान शिकारे को धक्का भी पतिदेव से ही लगवाती हैं। आप अगर शादीशुदा हैं तो इस स्थिति से रोजाना ही रूबरू होते होंगे।
दरअसल शिकारे की सवारी के कई नियम हैं। पता नहीं ये शाश्वत हैं कि नहीं, लेकिन शादी के बाद से अब तक पिछले पांच सालों में मुझे इनकी इटरनिटी पर कोई संदेह नहीं रहा है। आप भी विश्वास कर सकते हैं।
पहला नियम: शिकारे में एक बार में केवल एक ही खिलाड़ी बैठ सकता है, इसमें बैठने का आपके पास ठोस कारण होना चाहिए, वरना आप खुद ब खुद पानी में आ गिरेंगे।
दूसरा नियम: पानी से निकलने के लिए सही समय का इंतजार करें, समय से पहले बाहर निकल आए तो शिकारा भरा हुआ मिलेगा और फिर से पानी में जा गिरेंगे।
तीसरा नियम: एक बार शिकारे पर जमने के बाद पानी में गिरे साथी को शिकारे में पहुंचने के लिए हाथ देने का उपक्रम करें, भले ही आपके हाथ में तेल ही क्यों न लगा हो।
चौथा नियम: जितनी बार आप फिसलकर पानी में गिरेंगे आपके शिकारे में लौटने का प्रयास करने की समयावधि भी बढ़ती जाएगी।
पांचवा नियम: एक बार पानी में गिर ही पड़ें तो कुछ देर वहीं बने रहें, बिना वजह खुद को शिकारे में होने का धोखा न दें... आखिर हार मानने का जज्बा भी तो होना चाहिए।
नोट: ध्यान रखें कि जब आप दोनों ये खेल खेल रहे हों तो किसी और को आपके शिकारे या पानी में होने की स्थिति का पता नहीं चले। इससे केवल जगहंसाई ही हो सकती है। सॉल्यूशन नहीं मिलेगा। सो निजी प्रयासों से खेल को चालू रखें और बाहर के लोगों को बाहर रखें। आखिर खेल आपका है और खेल का मजा भी आपका निजी है... :)
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