शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

आखिर मुझसे ही सवाल पूछ लिया :)

पीटर आंसर्स डॉट कॉम वेबसाइट सभी सवालों के जवाब दे रही है और इतने सटीक जवाब दे रही है कि हम सब लोग आश्‍चर्यचकित हैं।

मेरे भांजे ने कल रात फोन करके मुझे यह जानकारी दी। मैं बहुत साल पहले इस वेबसाइट के बारे में सुन चुका था, लेकिन तब मैंने सुनकर अनसुना कर दिया था। इस बार मैंने सोचा कि चलो वेबसाइट को आजमाकर आते हैं। सो पहुंच गए वेबसाइट पर। वहां सवालों का सिलसिला तो शुरू हुआ, लेकिन पीटर बाबा मौन हो गए। हर बार सवाल पूछने पर उन्‍होंने अलग अलग जवाब दिए। इनमें से कुछ जवाब इस तरह थे .

- आपके इस सवाल का जवाब मैं बाद में दूंगा।

- आपके सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है।

- निजी सवाल मत पूछिए।

- आपका सवाल सही फार्मेट में नहीं है।

 

और आखिर में वही हुआ जिसका मुझे डर था, पीटर बाबा ने जवाब देने के बजाय सवाल ही पूछना शुरू कर दिया Smile 

 

उन्‍होंने कुछ सवाल मुझसे पूछे उनमें से एक सवाल को मैंने कैप्‍चर किया है। मुलाहिजा गौर फरमाइए...

peter Q me

पीटर बाबा ने पूछा क्‍या तुम मुझ पर विश्‍वास करते हो?

जवाब का कोई बक्‍सा बना हुआ नहीं है वरना मैं कहता नहीं, कदापि नहीं...

रविवार, 3 जुलाई 2011

लोकतंत्र की लाश पर लोकतंत्र की रक्षा

कल अजीत फाउण्‍डेशन की लाइब्रेरी गया था। वहां जयप्रकाश नारायण की जेल डायरी मिली। किताबों को खांमखां उलटने पलटने की प्रवृत्ति ने यहां भी जोर मारा। डायरी का पहला ड्राफ्ट पढ़ा तो लगा कि जैसे आज की ही बात की जा रही है। आज से 36 साल पहले कमोबेश यही परिस्थितियां और इन्‍हीं मांगों के साथ बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन जेपी के नेतृत्‍व में इतना उग्र हो गया कि केन्‍द्र सरकार के गिरने की नौबत आ गई। आज फिर उन्‍हीं मुद्दों पर एक बार फिर केन्‍द्र सरकार घिरी हुई है। हालांकि इस बार कोई जननेता नहीं बन पा रहा है और न ही फिलहाल आपातकाल लागू करने की स्थिति बनी है, लेकिन आंदोलन के दमन का कांग्रेस का वही रवैया है। मैं यहां डायरी के कुछ अंश दे रहा हूं।

वर्ष 1975 में राजपाल एण्‍ड संस द्वारा प्रकाशित इस डायरी के अंश साभार...

जेल डायरी

21 जुलाई 1975

“लोकतंत्र की प्रक्रिया में मैं पूरी तरह जनता को निरन्‍तर साथ लेकर चलने का यत्‍न करता रहा हूं। इसके दो तरीके हैं। एक, हमें किसी ऐसे तंत्र की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए जिसके माध्‍यम से उम्‍मीदवारों को चुनते समय हम जनता से परामर्श प्राप्‍त कर सकें। दूसरे, पहले तरीकों की भांति तंत्र की व्‍यवस्‍था करके जिसके माध्‍यम से जनता अपने प्रतिनिधियों पर निगरानी रख सके और उनके ईमानदारी के साथ काम करने की मांग कर सके। यही वे दो मूल तत्‍व थे जो मैं बिहार के इस संघर्षपूर्ण आंदोलन से प्राप्‍त करना चाहता था और आज यहां (वे चण्‍डीगढ़ के एक अस्‍पताल में कैद थे) मैं लोकतंत्र के हनन के साथ अपनी कल्‍पना का हनन होते देख रहा हूं।”

“प्रधानमंत्री (पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) ने लोकतंत्र की हत्‍या करने और अपने तानाशाही शासन के शिकंजे में कसने के लिए क्‍या कदम उठाए हैं, उन्‍हें फिर से गिनाने की आवश्‍यकता नहीं है। यही वही प्रधानमंत्री है जो बार बार हम  पर लोकतंत्र को तबाह करने और फासिस्‍टवाद स्‍थापित करने का आरोप लगाती रही हैं और हम देखते हैं कि वही प्रधानमंत्री लोकतंत्र को तबाह कर रही है (देश में आपातकाल लागू हो चुका था) और उसी लोकतंत्र के नाम पर स्‍वयं फासिस्‍टवाद स्‍थापित कर रही हैं। अपने हाथों से लोकतंत्र का गला घोंटकर ओर लोकतंत्र की लाश को नीचे गहरी कब्र में दफनाकर वह लोकतंत्र की रक्षा कर रही है।”

6 अगस्‍त 1975

जिसकी संभावना (आशंका) थी वही हुआ। उच्‍च न्‍यायालय द्वारा संभवत: विपरीत निर्णय लिए जाने के विरुद्ध श्रीमती गांधी ने लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम में संशोधन कराकर अपने आपको सुरक्षित कर लिया है। भारी संवैधानिक संशोधन होने की संभावना है। यह सब-कुछ स्‍वयं नियुक्‍त देश उद्धारक के लिए तानाशाही पूरा करने के लिए है। और यह कहा जा सकता है कि यह सब कुछ संविधान के अनुरूप किया जा रहा है। हिटलर ने भी अपनी निर्णायक तानाशाही को कायम करने के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया था। क्‍या भारत को भी नरक में इसी तरह जाना है और फिर अंधकार से निकलना होगा? अब यह निश्चित दिखाई देता है किंतु भारत को इसके लिए जो मूल्‍य चुकाना होगा, वह बहुत महंगा होगा। ईश्‍वर इसकी सहायता करे।

7 अगस्‍त 1975

सम्‍पूर्ण क्रांति के बजाय हम विपरीत क्रांति के काले बादलों को देखते हैं। चारों ओर जिन उल्‍लू और गीदड़ों के चिल्‍लाने और गुर्राने की आवाजें हम सुनते हैं, उनके लिए यह दावत का दिन है। चाहे रात कितनी भी गहरी क्‍यों न हो, सुबह अवश्‍य होगी।

डायरी के बाकी हिस्‍से आगामी पोस्‍टों में देने की कोशिश करूंगा...

 

सर्च रिजल्‍ट

- भ्रष्‍टाचार पर गूगल बाबा ने About 3,860,000 results (0.17 seconds)  सर्च रिजल्‍ट बताए।

- "कांग्रेस भ्रष्‍टाचार" पर कुल 7,090 results (0.14 seconds)  सर्च रिजल्‍ट आए। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- "रामदेव भ्रष्‍टाचार" पर 17,900 results (0.26 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- “कालाधन” शब्‍द के लिए कुल 220,000 results (0.15 seconds)  सर्च रिजल्‍ट मिले।

- "कांग्रेस काला धन" पर 1,960 results (0.13 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

परिणाम - देश को इससे मतलब नहीं है कि विदेशी बैंकों में पड़ा काला धन किसका है, या कांग्रेस की इसमें क्‍या भूमिका है। इसके बजाय काले धन को देश में वापस लाने पर सभी एक राय है। दूसरी बात केवल काला धन वापस देश में लाना ही काफी नहीं होगा, भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने की मंशा आम भारतीय और मीडिया में अधिक बलवती है।

 

डिस्‍क्‍लेमर : मैंने अपने गूगल क्रोम एक्‍स्‍प्‍लोरर में से कुकीज और ब्राउजिंग डाटा साफ करने के बाद यह परिणाम हासिल किए हैं। इसके बावजूद अन्‍य ब्राउजर पर डाटा में कुछ बदलाव हो सकता है। सभी सर्च परिणाम हिन्‍दी के हैं अंग्रेजी के परिणाम अलग असर पैदा कर सकते हैं।

सोमवार, 20 जून 2011

नया रूप-रंग

मद्धम होते सितारों की  छांव में

ढलते चांद ने एक बार फिर

झूठा दिलासा दिया,

कल फिर मिलेंगे

तब मेरा यही रूप

और यही रंग होगा।

जेठ की गर्मी

नागौरण की तपिश

और लू से बेखबर

मैं सपने लेता रहा दिन में

रात को तारों की छांव में

चुपके से आए चांद ने फिर

दिखाया नया रूप, नया रंग

एक बार फिर मैं उसे

अपलक देखता रह गया...

रविवार, 12 जून 2011

क्‍या मैं ऐसा ही हूं... ?

आज रवि रतलामी जी ने चेताया कि आपको अपने ब्लॉगिंग व्यक्तित्व का अता-पता है भी? तो हम भी पहुंच गए यह जानने कि हमसे बेहतर हमें कौन जानता है। वहां पहुंचकर देखा कि महज लिंक पेश करना है और आपके व्‍यक्तित्‍व के बारे में विशद (?) जानकारी उपलब्ध है। पहले अपने एक ब्‍लॉग ज्‍योतिष दर्शन का पता किया तो शानदार परिणाम सामने आया। उत्‍साह के मारे अपने दूसरे ब्‍लॉग दिमाग की हलचल के जरिए भी खुद का परीक्षण कर लिया। वह तो और भी शानदार मिला। वाह... देखिए हमारे व्‍यक्तित्‍व के जो पहलु उभरकर सामने आए हैं। क्‍या वास्‍तव में मैं ऐसा ही हूं।

ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग के आधार पर मेरा विश्‍लेषण

The active and playful type. They are especially attuned to people and things around them and often full of energy, talking, joking and engaging in physical out-door activities. The Doers are happiest with action-filled work which craves their full attention and focus. They might be very impulsive and more keen on starting something new than following it through. They might have a problem with sitting still or remaining inactive for any period of time.

sidharth

 

दिमाग की हलचल ब्‍लॉग से मिले विश्‍लेषण का निष्‍कर्ष

The independent and problem-solving type. They are especially attuned to the demands of the moment and are highly skilled at seeing and fixing what needs to be fixed. They generally prefer to think things out for themselves and often avoid inter-personal conflicts. The Mechanics enjoy working together with other independent and highly skilled people and often like seek fun and action both in their work and personal life. They enjoy adventure and risk such as in driving race cars or working as policemen and firefighters.

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अपनी इतनी तारीफें पढ़ने के बाद एक वाकया याद आ गया....

एक बार राजस्‍थान के प्रार‍ंभिक शिक्षा निदेशक का सम्‍मान किया गया। उन्‍हें स्‍टेज पर बैठा दिया गया और पढे लिखे और वाकपटु शिक्षकों ने दो घंटे से अधिक समय तक उनकी तारीफों के ऐसे पुल बांधे कि सूरज देवता छिप गए। (मेरा ध्‍यान सूरज देवता पर ही था, क्‍यों‍कि भोज में विलम्‍ब हुआ जा रहा था)। आखिर तारों की रोशनी में निदेशक महोदय उठ खड़े हुए। उन्‍होंने डायस पर आते ही सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को तहेदिल से आभार व्‍यक्‍त किया, लेकिन इसके साथ ही अपनी पीड़ा भी व्‍यक्‍त कर दी। उन्‍होंने बताया कि प्राचीन काल में किसी राजा के दरबारियों में किसी व्‍यक्ति को लज्जित करना होता तो राजा उसे सभा में खड़ा कर देता और दूसरे सभासदों से कहता कि इनकी तारीफ में कसीदे गढ़े। जिस व्‍यक्ति की तारीफ राजा के सामने होती वह लज्जित होता रहता। निदेशक महोदय ने कहा कि ज्ञानी लोगों और ईश्‍वर से पहले पूछे जाने वाले गुरुजनों के समक्ष अपनी तारीफें सुनकर उन्‍हें भी लज्‍जा महसूस हो रही है। तबादलों और दूसरे कामों की उम्‍मीद लिए कर्मचारी सकते में आ गए। बाद में निदेशक महोदय ने खुद ही माहौल को हल्‍का कर दिया। ये निदेशक थे श्‍यामसुंदर बिस्‍सा। रिपोर्टर के तौर पर मेरे साथ इनके कई खट्टे मीठे अनुभव रहे, लेकिन इस घटना के बाद मैं निजी तौर पर उनका मुरीद हो गया।

आपने ऊपर मेरी तारीफ तो नहीं पढ़ी ना... मुस्‍कान 

शनिवार, 11 जून 2011

बीकानेर में छाते नहीं बिकते

आप भी कहेंगे कि ये क्‍या बात हुई, लेकिन मुझे अपना पक्ष तो स्‍पष्‍ट करने दीजिए। बीकानेर में छाते नहीं बिकते क्‍योंकि यहां बारिश नहीं होती। यह भी कोई खास बात नहीं है, लेकिन गौर करें तो पाएंगे कि बीकानेर में बेरहम गर्मी तो होती है, फिर छाते क्‍यों नहीं बिकते। पिछले साल पत्रिका के एक वरिष्‍ठ साथी राहुल शर्माजी ने मुझे यह जानकारी दी थी। वे मूलत राजस्‍थान के हिण्‍डौनसिटी के हैं। पिछले साल छुट्टियों पर वे अपने गांव गए तो उनके पिता ने कहा कि बीकानेर में इतनी गर्मी पड़ती है तो छाते भी खूब बनते होंगे। कोई अच्‍छा सा छाता मिले तो अगली बार लेकर आना। राहुलजी ने बीकानेर आकर पता किया तो पता चला कि बीकानेर में कोई भी दुकान खासतौर पर छाता बनाने वालों की नहीं है। (मैं खुद बीकानेर का हूं, लेकिन मैंने कभी यह गौर नहीं किया, यहां तक कि सोचा भी नहीं)। वरिष्‍ठ साथी ने कई जगह चक्‍कर निकाले और कुछ दुकानों में जहां मिले तो वे भी दूसरे शहरों या राज्‍यों के बने हुए छाते बिक रहे थे। दुकानदारों ने भी बताया कि बीकानेर में छातों की बिक्री नहीं होती। कुछ लोग शौक के लिए बस खरीदकर ले जाते हैं। लौटकर आने वाले ग्राहक तो हैं ही नहीं।

पिछले एक महीने से तापमापी का पारा 45 से 49 के बीच घूम रहा है। मौसम विज्ञानियों की मानें तो आदर्श परिस्थितियों में मापे गए पारे की तुलना में सड़क पर तापमान इससे तीन या चार डिग्री ऊपर होता है। यानि बीकानेर में इस साल पारा कई बार पचास डिग्री के पार पहुंच चुका है, लेकिन फिर भी सिर पर छाता ताने लोगों को मैंने इस बार भी नहीं देखा। हां दिखाई दिए तो ये तीन बच्‍चे एक ही छाते को लेकर जा रहे थे। मैंने अपने मोबाइल कैमरे से यह “दुर्लभ” फोटो खींचा है।

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पूर्वान्ह सवा ग्‍यारह बजे यह स्थिति हो चुकी थी कि जयनारायण व्‍यास कॉलोनी, जो पोश कॉलोनियों में से एक है, का बाजार सुनसान हो चुका था।

मुझे याद है बचपन में मेरे पड़नानाजी से उनकी उम्र के कुछ लोग मिलने आया करते थे तो वे छड़ी के बजाय छाता टेकते हुए आते थे। मैंने उन्‍हें कभी छाता सिर के ऊपर ताने हुए नहीं देखा। हमारे घर में भी बचपन से कभी छाता नहीं रहा। फैशन के तौर पर कभी आया भी तो बच्‍चों के खेल के भेंट ही चढ़ा। मैं समझ नहीं पाता कि बीकानेर की भीषण गर्मी से बचाव के लिए लोग छाते का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं करते। ठीक है यहां बारिश अधिक नहीं होती, लेकिन तपती धूप तो हमें परेशान करती ही है।

नए दौर के लोगों के लिए कहा जा सकता है कि तेज रफ्तार वाहनों ने छाते को बेकार कर दिया है, लेकिन आज से बीस साल पहले जब इतने वाहन नहीं थे, तब भी लोग छाते का इस्‍तेमाल इतना नहीं कर रहे थे, जितनी कि यहां गर्मी पड़ती है। इसके बजाय लोग सिर से पांव तक खुद को सूती कपड़ों से ढंककर बाहर निकलते हैं। महिलाएं तो अपना मुंह तक ओढ़ने से ढके रखती हैं।

इस बारे में एक जोरदार वाकया भी है। मेरे मामा उस जमाने में रिपोर्टर हुआ करते थे। दिल्‍ली के एक राष्‍ट्रीय अखबार की रिपोर्टर बीकानेर आई और उसने मई जून की भीषण गर्मी में ग्रामीण क्षेत्रों का दौर कर निष्‍कर्ष निकाला कि अभी राजस्‍थान और विशेषकर बीकानरे, जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्रों में महिलाओं की बड़ी दयनीय स्थिति है। यहां घूंघट प्रथा इतना विकराल रूप ले चुकी है कि महिलाओं को न सिर्फ सिर ढकने के लिए बाध्‍य किया जाता है, बल्कि पूरा मुंह गले तक ढककर महिलाएं बाहर निकलती हैं। मामाजी के सामने उस महिला पत्रकार ने अपनी बात रखी तो मामाजी ने माथा ठोंक लिया। उन्‍होंने पत्रकार से पूछा कि क्‍या आपने उन महिलाओं से बात की थी, या केवल देखकर ही अपना निष्‍कर्ष निकाल रही हैं। पत्रकार ने कहा कि वे स्‍थानीय भाषा जानती नहीं हैं सो देखकर ही निष्‍कर्ष निकाला है। अब मामाजी ने स्‍पष्‍ट किया कि बीकानेर में गर्मियों के दिनों में लगातार धूलभरी हवाएं चलती हैं। ऐसे में अगर महिला का मुंह खुला होगा तो चेहरे पर गर्म रेत के झोंके लगेंगे। इससे गर्मी भी अधिक लगेगी और चेहरे का भी नुकसान होगा। इससे बचने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपने ओढने से मुंह को भी पूरी तरह ढके रहती है। महिला पत्रकार के दिमाग की बत्‍ती जली तो उसने अपनी रिपोर्ट में आवश्‍यक सुधार किए।

और अब एक अनूठा प्रयोग

गर्मी है सो है, अब इससे बचने के लिए बीकानेर में कूलर का ही आसरा है। छठे वेतन आयोग का लाभ मिलने के बाद बीकानेर में एसी की ब्रिकी में भी जोरदार इजाफा हुआ है। तीन से पांच प्रतिशत आर्द्रता के बीच तेज गर्म हवाएं माहौल को बुरी तरह तपा देती हैं तो कूलर और एसी भी फेल साबित होते हैं। ऐेसे में प्रयोगधर्मी लोगों का दिमाग चालू रहता है। यही तो है थार की जीवटता। देखिए इसका एक नमूना। इसमें कूलर के आगे एक और पंखा लगा  दिया है। हवा दूनी रफ्तार से आती है। हालांकि इससे शोर तो बहुत हो रहा था, लेकिन हवा इतनी तेज और नम थी कि माहौल में गर्मी का असर कुछ कम हो गया।

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