मंगलवार, 17 जुलाई 2012

आश्रम का साधू : फेसबुक और ब्‍लॉगिंग

बहुत साल पहले जब खेलने के लिए पहली बार स्‍टेडियम गया तो एक ऐसा अनुभव हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। अनफेयर सलेक्‍शन का। बाद में मैं खुद इसी जमात में शामिल हो गया...

Basketball Dunkछुट्टियों के दिनों में कई नौसिखिए खिलाड़ी स्‍टेडियम पहुंचते थे। यह स्‍टेडियम एक छोटा-मोटा स्‍पोर्ट्स काम्‍प्‍लेक्‍स की तरह था। मैंने एक साथ चार खेलों का चुनाव किया। पहले टीटी और बैडमिंटन खेलेंगे, इसके बाद फुटबॉल और आखिर में बास्‍केटबॉल। बैडमिंटन और फुटबॉल में मैं प्रियता के अनुसार पात्रता बांटे जाने का “शिकार” हुआ। टीटी और बास्‍केटबॉल खेलने वाले खिलाड़ी कम थे। दोनों ही खेलों में अपेक्षाकृत अधिक स्किल की जरूरत थी। छूटी हुई दोनों चीजें मुझे आसानी से मिल गई। मैं हमेशा चिढ़ता रहता था कि फुटबॉल और बैडमिंटन में जमे हुए भोमिए किसी को आसानी से अंदर नहीं आने देते। अपने चेहतों को आसान प्रवेश, बाकी लोगों के लिए कठिन परीक्षाएं। धीरे धीरे टीटी भी छूट गया, केवल बास्‍केटबॉल रहा।

यहां अधिक अच्‍छे खिलाड़ी नहीं थे। सभी शौकिया और आस-पास रहने वाले लोग थे। मैं ही सबसे अधिक दूरी से आता था। बास्‍केटबॉल में पुष्‍करणा स्‍टेडियम में खेलने के कुछ ही महीनों बाद मैंने डूंगर कॉलेज और रेलवे स्‍टेडियम में भी खेलना शुरू कर दिया था। इससे मेरा खेल तेजी से सुधरा और मेरे साथ पुष्‍करणा स्‍टेडियम में खेल रहे शौकिया खिलाडि़यों का स्‍तर भी तेजी से ऊपर आया। खेलते हुए करीब एक साल हो गया तब तक करीब पंद्रह खिलाड़ी हो गए थे। यह तीन टीमें बनाने के लिए पर्याप्‍त था। दो टीमें खेलती जो हारती वह हटती थी। मैं श्रेष्‍ठ खिलाडि़यों में से एक था। बाद में डूंगर कॉलेज और रेलवे स्‍टेडियम भी छूटते गए और मैं सुबह शाम दोनों समय करीब छह सात घंटे रोजाना प्रेक्टिस कर रहा था। इन्‍हीं दिनों में कई नए खिलाड़ी भी मैदान में आए। इनमें नौसिखिए भी थे और अच्‍छे खिलाड़ी थी। चूंकि मैं श्रेष्‍ठ खिलाड़ी था और उस समय तक यह कुंठा मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी। श्रेष्‍ठ खिलाड़ी होने के कई फायदे होते हैं, आपको भागकर बॉल नहीं लानी होती है, जब आप प्रेक्टिस कर रहे होते हैं तो जूनियर दौड़कर आपको बॉल पकड़ाते हैं आदि आदि। नए खिलाड़ी मुझे गांठते नहीं थे। सालभर से अधिक समय तक मेहनत करने के बाद मुझे लगने लगा कि इन खिलाडि़यों द्वारा मेरी इज्‍जत की जानी चाहिए। इसी कुंठा में मैंने खिलाडि़यों के गुट बना दिए। पुराने खिलाड़ी शायद यही चाहते थे (मेरी तरह), सो गुट आसानी से बन गए। इसी बीच मुझे टाइफाइड हुआ।

कई दिन के अवकाश के बाद फिर से ग्राउंड पहुंचा तो पुरानी ताजगी लौट आई थी। वहां हो चुकी गुटबाजी और उससे बिगड़ते खेल और उससे भंग होते आनन्‍द को मैं निरपेक्ष भाव से देख पा रहा था। मन में बड़ी ग्‍लानि हुई। अब अगले पंद्रह दिन तक मैंने जैसे कैम्‍प चालू कर दिया। नए और पुराने खिलाडि़यों को एक ही छड़ी से ताड़ना शुरू किया। सभी कतार में आ गए। खेल का आनन्‍द फिर से शुरू हो गया, लेकिन मैं अधिक खराब हो गया। क्‍योंकि मेरी भूमिका खिलाड़ी से बदलकर कोच की हो गई। अब अहं पहले से भी अधिक हो गया। इसके चलते उदंड खिलाडि़यों से मेरी नियमित नोंक झोंक होने लगी। अधिकतर उदंड खिलाड़ी ऐसे थे जिनकी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि खिलाडि़यों की ही थी। ऐसे में वे भी “बाहर के” कोच को स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे। धीरे धीरे बास्‍केटबॉल के मैदान से नाता टूटता गया। एक दिन पूरी तरह जाना बंद कर दिया।

इस प्रकरण के कई साल बाद स्‍वामीनारायणन् जी से मुलाकात हुई। एक बार की बातचीत में मुझसे कहीं ऐसी बात निकली होगी तो उन्‍होंने एक रोचक कथा सुनाई कि

“रामराज्‍य के दिन थे, राजा राम का दरबार लगा हुआ था कि एक कुत्‍ता वहां आया। उसका सिर फटा हुआ था और उससे खून निकल रहा था। उन दिनों जानवर भी बोला करते थे। कुत्‍ते ने कहा कि एक ब्राह्मण ने अकारण ही उसका यह हाल किया है। भगवान राम ने तुरंत ब्राह्मण को दरबार में बुलाया। ब्राह्मण ने आते ही बताया कि वह गंगाजी में नहाकर बाहर निकला ही था कि इस कुत्‍ते ने खुद को झड़काने के उद्देश्‍य से कुछ छींटे उछाले। इससे मैं अपवित्र हो गया। मुझे गुस्‍सा आया तो मैंने ईंट से मारकर इस कुत्‍ते का सिर फोड़ दिया। भगवान को कथा समझ में आ गई। उन्‍होंने ब्राह्मण से कहा कि तुम्‍हें इसकी सजा मिलेगी। फिर कुत्‍ते से पूछा कि तुम ही बताओ कि इस ब्राह्मण को क्‍या सजा दी जाए। इस पर कुत्‍ते ने कहा कि मैं तो धोबी का कुत्‍ता हूं। इस कारण मुझे कभी घाट तो कभी धोबी के घर चक्‍कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन मैं दोनों ही जगह का नहीं रहा। इस ब्राह्मण को कुछ ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिससे इसे मेरी वास्‍तविक स्थिति का पता चले। राम मुस्‍कुराए, उन्‍होंने ब्राह्मण को आश्रम का साधू बना दिया।”

मैंने स्‍वामीनारायणजी से पूछा कि ब्राह्मण को यह सजा कैसे मिली। अब वे हंसने लगे। बोले आश्रम का साधू कहीं का नहीं होता। घर-बार इसलिए छोड़ता है ताकि दुनियादारी से दूर रहे, लेकिन आश्रम की व्‍यवस्‍थाएं एक कुशल गृहिणी की तरह उसे देखनी पड़ती है। आया-गया साधू आश्रम की व्‍यवस्‍थाओं के लिए उसे कोसता है, आश्रम के अधिष्‍ठाताओं के सामने उसे हाजिरी लगानी पड़ती है। व्‍यवस्‍थाएं देखते देखते साधू खुद को आश्रम से पूरी तरह जोड़ लेता है और तो और उसे खुद के आध्‍यात्मिक उत्‍थान के लिए उसे समय नहीं मिल पाता है। ऐसे में वह न घर-परिवार वाला रहता है न पूरी तरह साधू बन पाता है। यह कमोबेश धोबी के कुत्‍ते वाली ही स्थिति है।

उन्‍होंने कुछ इस अंदाज में बात कही कि मुझे अपने बॉस्‍केटबॉल कोर्ट वाले दिन याद हो आए। मैं समझ गया कि एक बास्‍केटबॉल कोर्ट पर नियमित रूप से आते-जाते कैसे मैं उसे अपना समझने लगा था। वहां की अधिकार भावना भी ऐसी ही थी। वहां मेरा कुछ नहीं था, जब गया था तब कोर्ट था और जब छोड़कर आया तब भी कोर्ट ही था। आनन्‍द लेने के बजाय मैंने खुद को व्‍यवस्‍थाओं के हवाले कर दिया था। यही स्थिति अन्‍य खेलों (बैडमिंटन, फुटबॉल और टीटी) के मठाधीशों की रही होगी।

अब ऑनलाइन चल रहे खेल को देखता हूं तो दिखाई दे रहा है कि जहां सब कुछ स्‍वतंत्र है और सभी आनन्‍द लेने वाले लोग हैं (इसमें टूल्‍स के फ्री होने का बड़ा योगदान है), वहां धीरे धीरे लोग अपने निकाय बनाते जा रहे हैं। फेसबुक समूह और पेज तो ऐसी जगहें बन रही हैं, जहां इस भावना का जमकर दोहन किया जा रहा है। कमोबेश यही स्थिति ब्‍लॉगिंग की भी है। बीच के दो साल ब्‍लॉगिंग से दूर रहा और अब लौटकर आया हूं तो देखता हूं कि शुरूआती दिनों में मुक्‍तता के साथ सृजन का जो आनन्‍द था, उसके रस को काल ने पी लिया है। अब अधिकांश ब्‍लॉगर और फेसबुकिए अपने अहं का विस्‍तार कर रहे हैं। ब्‍लॉगिंग में भी ऐसे निकाय देख रहा हूं। कई ब्‍लॉगर तो एक-दूसरे के ब्‍लॉग पर जाना तक छोड़ चुके हैं।

इस वर्चुअल दुनिया में, जहां न आश्रम अपना है, न घर अपना है। फिर क्‍यों आश्रम के साधू बनें !!!!!

सोमवार, 9 जुलाई 2012

प्रिय शिव, भोले हो पर गजब के हो...

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श्रावण मास में शिव खुद ब खुद याद आने लगते हैं। स्‍वभाव से भोले, गायों (संपदा) की रक्षा करने वाले और शीघ्र प्रसन्‍न होने वाले प्रिय शिव भक्‍तों की पुकार पर दौड़कर आते हैं। मैंने-आपने उन्‍हें देखा नहीं है, महसूस तो किया ही होगा। मैंने महसूस किया है, इतना करीब कि बता सकता हूं।
करीब पंद्रह साल पहले हमें योगीराज (उनका मूल नाम सुनील शर्मा था, जो मुझे बाद में पता चला) के पास भेजा गया। वे हमें हठ योग सिखाते थे। 5 फीट 9 इंच ऊंचाई के साथ मेरा वजन बिना वर्जिश किए 84 किलोग्राम तक पहुंच गया था। पेट पर हाथ मारते तो कई देर तक हिलता रहता था। मैंने योगीराज से कहा कि मुझे वजन कम करना है। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए पूछा वजन कम करना है या पतला होना है। मैंने कहा 84 किलोग्राम वजन है। उन्‍होंने कहा अभी एक किलोग्राम और बढ़ाना पड़ेगा। मेरी आंखे दीवार की दरार की तरह थीं। हंसने पर तो दिखाई देना भी बंद जाता था। मुझे दिखाई नहीं दिया कि योगीराज भी हंस रहे हैं या नहीं...
उन दिनों बाबा रामदेव का कहीं नामो निशान भी नहीं था। ऐसे में केवल एक ही प्राणायाम था जिसे विवेकानन्‍द ने अपने राजयोग में बताया था। वह था अनुलोम विलोम। सुबह पहले सूक्ष्‍म व्‍यायाम होते थे। इसमें शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में हिलाया जाता। सूक्ष्‍म व्‍यायाम के बाद सूर्य नमस्‍कार। शरीर की इन मामूली हरकतों से भी सर्दियों की सुबह सवा पांच बजे पसीना निकल आता था। इसके बाद आसन और आखिर में प्राणायाम।
सूक्ष्‍म व्‍यायाम और प्रणायाम कोई भी कर सकता है, लेकिन आसन, वे तो तोड़कर रख देते हैं। हर आसन मेरे लिए नई चुनौती लेकर आता। कुछ दिन में जब आसन लगने लगता तो योगीराज अगला आसन बता देते। पद्मासन, मत्‍स्‍यासन, अर्द्धमत्‍यासन, भुजंगासन, पर्वतासन तो मैंने किसी तरह आगे पीछे करके कर लिए। इसके बाद आया एक बहुत ही आसान आसन। वह था वज्रासन। मैंने समझा यह आसन कराना तो फिजूल है। सभी आराम से बैठ गए हैं। इसी आसन की अगली कड़ी था सुप्‍त वज्रासन।
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(इस चित्र में वज्रासन की एक्‍सट्रीम स्थिति दिखाई गई है। इससे पूर्व कुछ आसान प्रकार भी होते हैं। जैसे ये नीचे वाला)
Supta-Vajrasana
देखने में यह ऊपर वाली स्थिति से आसान दिखाई दे रहा होगा, लेकिन कल्‍पना कीजिए एक मोटे व्‍यक्ति की, जिसकी जांघे उसके शरीर के कुल भार के बराबर हों। ऐसी स्थिति में वज्रासन में सीधा बैठना आसान है। पीछे तरफ झुकने की भी कल्‍पना नहीं की जा सकती। योगीराज पास में आए। उन्‍होंने एक-दो बार पीठ के पीछे हाथ रखकर मुझे सहारे से लिटाने का प्रयास किया, फिर छोड़ दिया। कहा क्‍लास के बाद मुझसे मिलकर जाना। उन्‍होंने मुझे एक कागज पेन दिया और कहा कि लिखो। उन्‍होंने शंख प्रक्षालन की विधि बताई। कहा दो दिन यहां आना मत। शंख प्रक्षालन करो और एक दिन का आराम करो, फिर लौटकर आना। घर आया और शंख प्रक्षालन में जुट गया। इसमें नमक मिला पानी पीना होता है और भुजंग आसन सहित चार आसान आसन बार बार करने होते हैं। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद चारों आसन। छह गिलास पीने तक तो कुछ महसूस नहीं हुआ, लेकिन जब सातवीं गिलास पानी पी रहा था, तो अचानक तेज प्रेशर महसूस हुआ। लैट्रीन की ओर भागा। मुझे बीस गिलास तक यह क्रिया दोहरानी थी। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद दौड़ना पड़ रहा था। बस राहत की बात इतनी ही थी कि घर में इटैलियन कमोड था। अगर नीचे बैठने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ती तो शंख प्रक्षालन से पहले उठक बैठक से ढेर हो चुका होता। आखिर बीसवें गिलास तक यह स्थिति हो गई कि जैसा पानी पी रहा था, साफ सुथरा, वैसा ही निकाल रहा था। (इसे कहते हैं शंख प्रक्षालन, मेरी आंतों को नमक मिले पानी ने धो दिया था) अब मैं काफी हल्‍का और थका हुआ महसूस कर रहा था। अगले दिन आराम किया और तीसरे दिन पहुंचा तो फिर वही सुप्‍त वज्रासन। दूसरे पुराने विद्यार्थी आसानी से आसन कर रहे थे और मैं उन्‍हें देख भर रहा था। आंतें साफ हो चुकने के बाद पीछे की ओर झुकने की स्थिति नहीं बन पा रही थी। 19 साल तक जिस कमर को ठोस बनाया था, वह मुड़ने को तैयार नहीं हो रही थी। सभी को आसन की मुद्रा से हटने को कहा गया और योगीराज ने सभी को एक बात बताई कि :-
“शिव का योगीराज कहा जाता है। जानते हो इसका कारण क्‍या है। किसी को नहीं पता था। योग गुरु ने बताया कि
शिव ने विश्‍व में पाई जाने वाली कुल जमा 84 लाख योनियों के अनुरूप 84 लाख आसनों को सिद्ध किया है। इसलिए वे योगीराज हैं।”
(किसी भी हठ योगी को एक आसन सिद्ध करने में कई बार सालों लग जाते हैं। आसन सिद्ध होने का अर्थ होता है करीब साढ़े तीन घंटे उसी एक आसन में बैठे रहना। आसन सिद्ध तभी समझा जाता है जबकि योगी को उस आसन में बैठने में किसी प्रकार की कठिनाई महसूस न हो)
मैं रोमांचित था इस बात को सुनकर। सभी विद्यार्थी फिर सुप्‍त वज्रासन में जुट गए। मैं अब भी सुप्‍त वज्रासन नहीं कर पा रहा था। इस बार योगीराज ने मेरी सहायता नहीं की। बस इतना भर कहा कि शिव का ध्‍यान करो। मैंने आंखें बंद की और खिलंदड़ शिव दिखाई दिए। सुप्‍त वज्रासन करते हुए। मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट आई और मैं पीछे की ओर लेट गया। लेटे लेटे मैंने आंखे खोली तो देखा कि सिर की ओर योगीराज (योग गुरु) खड़े हैं और मुस्‍कुरा रहे हैं। धीरे से बोले, जितना असर तुममें दिखाई दिया है किसी और में नहीं दिखा।
उस दिन से आज भी मेरे दिमाग में शिव की वही छवि है। कोई दूसरी छवि बैठ भी नहीं पाई। अब भी ध्‍यान करने बैठता हूं तो अनुलोम विलोम के पूरक, कुंभक और रेचन में एक, चार और दो के अनुपात को बनाए रखने के लिए ऊं नम: शिवाय का मंत्र बोलता हूं। एक बार के लिए एक, चार बार के लिए चार बार और दो बार के लिए दो बार मंत्र का जाप। इससे ध्‍यान भी जल्‍दी लगता है।
आष्‍टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि ये आठ भाग हैं। ये मन को स्थिर करते हैं। चूंकि शिव इन सभी के लिए कृपा करते हैं, इसलिए कहते हैं शिव की उपासना करने से मन को मजबूती मिलती है...

रविवार, 24 जून 2012

क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो...

जोशीजी, ध्‍यान रखना
क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो, उसका क्‍या, जो दंतहीन, विषहीन विनीत सरल हो...
एक साथी स्‍वतंत्र पत्रकार ने मुझे उस समय यह बात कही जब मुझे अपने संस्‍थान में डेस्‍क से उठाकर पूरी तरह रिपोर्टर बना दिया गया था और कुछ बड़े विभाग मुझे रिपोर्टिंग के लिए सौंपे गए थे। इनमें राजस्‍थान का शिक्षा मुख्‍यालय यानी शिक्षा निदेशालय भी शामिल था। मुझे इस तथ्‍य को समझने में अधिक वक्‍त भी नहीं लगा। मेरे जिस साथी का बाहर तबादला हुआ था, वे शिक्षा विभाग की सालों तक रिपोर्टिंग करते रहे थे, शायद दस साल से वे इस विभाग से जुड़े थे। ऐसे में निदेशालय ने नए रिपोर्टर को एक जल्‍दी से स्‍वीकार नहीं किया। मेरा संस्‍थान बड़ा था और रसूखदार भी, लेकिन न मैं उस समय इतना प्रभाव रखता था, न मेरा भय। कई दिन तक निदेशालय में एक अनुभाग से दूसरे अनुभाग तक चक्‍कर लगाता रहा। मंत्रालयिक कर्मचारियों के नेता हो या शिक्षक नेता, मुझसे मीठी मीठी बातें तो करते, लेकिन खबर नहीं देते। मैं परेशान, पूरा दिन निदेशालय के चक्‍कर काटकर शाम को प्रेस लौटता को संपादक की झिड़कियां सुनने को और मिलती। फिर मुझे मिले एक प्रशासनिक अधिकारी, मुझे परेशान देखकर ही उन्‍होंने माजरा समझ लिया। पूछा कितनी खबरें निकाली है अब तक, मैं खिसियाया, बोला अब तक तो प्रतिस्‍पर्द्धी से पिट ही रहा हूं। उन्‍होंने कुछ ऐसी ही बात दोहराई कि पीटोगे नहीं तो पिटोगे। मैंने कहा अपने ही लोग हैं, अच्‍छे लोग हैं पीटने से क्‍या होगा, खबर है ही नहीं उनके पास। तो अधिकारी महोदय ने कहा कि दूसरा अखबार यहां आकर खबर पैदा थोड़े ही करता है।
यह बात मुझे भी जंच गई। मैंने अधिकारी महोदय से ही पूछा कि कैसे पीटें। तो एक अभिभावक की तरह उन्‍होंने समझाया। जो बात बताई वह समझ में भी आ गई। दो दिन बाद मैंने एक खबर लगाई।
“यही लगे यहीं से रिटायर होंगे”
शिक्षा निदेशालय की स्थिति के बारे में यहीं के एक कर्मचारी ने कभी कहा कि ये तो करणी माता के काबा हैं। देशनोक की करणी माता के बारे में प्रसिद्ध है कि चारण जाति के लोग मानव देह त्‍यागकर करणी माता के काबे (चूहे) बन जाते हैं और काबा शरीर छोड़ने के बाद चारण बनते हैं। कमोबेश यही स्थिति निदेशालय में भी है। सचिवालय की तरह यहां क्‍लोज कैडर नहीं होने के बावजूद यहां एक बार लगा कर्मचारी कभी फील्‍ड में नहीं जाता। अस्‍सी प्रतिशत मामलों में ऐसा ही होता है। मेरी खबर में यही दिया गया था कि क्‍लोज कैडर नहीं होने के बावजूद कई कर्मचारी ऐसे हैं जो तीस तीस साल से यही बैठे हैं। अधिक से अधिक उनका अनुभाग ही बदल रहा है।
खबर ने जिस तेजी से असर दिखाया, वह मुझे हैरान करने वाला था। अगले दिन निदेशालय में पहुंचने के साथ ही कर्मचारी और शिक्षक नेता मुझे बुला बुलाकर बात करने लगे। उनके तयशुदा ठिकानों का एक ही दिन में दर्शन कर लिया। पहले तो मुझे झिड़का कि ऐसी क्‍या खबरें लगाते हो। फिर प्‍यार से पूछा कि यह खबर किसने बताई। मैं टाल गया तो समझ गए कि मसाला दिए बिना यह छोरा हमारे ऊपर ही हमला कर देगा। फिर इधर-उधर की खबरें निकलने लगी। किसी एक समूह ने दूसरे की तो तीसरे ने चौथे की खबरें बताई। पहले से चल  रही धड़ेबंदी भी एक ही दिन में टूट गई। दोनों प्रमुख अखबारों के खबरी मुझे खबरें दे रहे थे। शाम साढ़े चार बजे तक तो मैं प्रेस पहुंच गया और तीन खबरें ठोंक दी। रात तक फोन आते रहे। आखिर रात दस बजे तक मैंने कुल जमा सात खबरें दी और तीन प्रेस नोट सबमिट किए।
उस एक दिन के उदाहरण से मैं समझ गया कि प्रेम से बात करना बेकार है। अब तो हाथ में जैसे छड़ी ही उठा ली। किसी एक की खबर का कोई सूत्र भी हाथ में होता तो दस लोगों के बीच में उसकी बात करना शुरू करता। संबंधित अधिकारी या कर्मचारी मुझे रोकता और बाद में कोने में ले जाकर पूरी बात समझाता। इसी दौरान मेरे सोर्सेज भी तेजी से बने। कुछ दिन में तो मैं खबरों को क्रॉस चैक तक करने लगा। पुराने लोगों को बनाया तिलस्‍म टूट चुका था और नए लोग पूरी तरह मेरे लोग थे। चूंकि मैंने खबर लेने के लिए किसी प्रकार का वादा किसी से नहीं किया था, इसलिए कहीं स्‍पैल बाउंड भी नहीं हुआ। कर्मचारी और शिक्षक नेताओं के लिए यह सबसे कठिन बात थी। अपनी मर्जी की खबरें छपवाने के आदी नेताओं को सबसे अधिक पीड़ा हुई। उन्‍होंने कई तरह से मुझे घेरने की कोशिश की, लेकिन मेरे हाथ तब तक बहुत मजबूत छड़ी आ चुकी थी। या तो खबर बताओ, वरना तुम्‍हारी फंसी हुई खबर छाप देते हैं। डेढ़ साल के दौरान मैंने जो चाहा वो छापा। जो नहीं जंचा उसे छापने से साफ इनकार कर दिया। इसका सबसे ज्‍वलंत उदाहरण रहा स्‍कूलों के एकीकरण का। राजस्‍थान सरकार ने निर्णय किया कि जिन स्‍कूलों में अधिक शिक्षक और कम छात्र हैं उन्‍हें करीबी स्‍कूलों में मर्ज कर दिया जाए। शहर में कई स्‍कूल ऐसे थे, जिनमें शिक्षक तो चौदह से बीस तक थे, लेकिन छात्रों की संख्‍या दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंची थी। इस निर्णय से शहरी क्षेत्र में सालों से जमे शिक्षकों पर तगड़ी ग़ाज गिरनी तय थी। सो उन्‍होंने आंदोलन शुरू कर दिया। शिक्षक नेताओं ने मुझसे संपर्क किया और आंदोलन के पक्ष में सॉलिड खबरें डालने के लिए कहा। मैंने साफ इनकार कर दिया। संसाधनों के समुचित उपयोग की एकमात्र सरकारी योजना को मैं धक्‍का कैसे पहुंचा सकता था। एक शिक्षक नेता ने अधिक जोर दिया तो मैंने कहा कि आप चौदह शिक्षक और छह छात्रों वाले स्‍कूल का औचित्‍य सही सिद्ध करके बात दो, मैं खबरें छाप दूंगा। खबरें नहीं आई तो आंदोलन ने भी एक सप्‍ताह के भीतर दम तोड़ दिया।
इन दिनों देख रहा हूं कि सरकारी आदेशों और सरकारी प्रेसनोट का पत्रकारों को बेसब्री से इंतजार रहता है। ऐसे में किस आधार पर पत्रकार डंडा उठाएंगे और किसे मारेंगे। यह स्थिति अखबारों को इस स्‍तर तक भी उतार सकती है कि वे क्षमा करने लायक भी न बचें...

शुक्रवार, 11 मई 2012

पिछले दिनों लेखन में...

पिछले लंबे अर्से से ब्‍लॉग से गायब हूं, लेकिन राहत की बात यह है कि लेखन से नदारद नहीं हूं। पिछले एक साल में ऑफलाइन लिखने का भी खूब मौका मिला और उसे मैंने भुनाने में कसर भी नहीं रखी। यहां कुछ लिंक छोड़ रहा हूं। इन पर मेरे कुछ लेख हैं। समय मिले तो आप भी पढि़एगा।

साहस के साथ कुछ युवा अपने देश के लिए ऐसे काम कर रहे हैं जो आमतौर पर हमें देखने को नहीं मिलते। अपनी जान पर खेलकर नाम कमा चुके कुछ लोगों के नाम गिनाए हैं मैने इस आलेख में...
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=30990

नवसंवत्‍सर शुरू हुआ तो इसके स्‍वागत में भी कलम चलाई थी...
http://www.patrika.com/article.aspx?id=32735

फलादेश और कारक ज्ञान - कुंडली में स्थित कारकों के बारे में यदि स्पष्ट जानकारी हो तो कोई भी शख्स खुद से जुड़ी जिज्ञासा का समाधान कर सकता है। हर सवाल का जवाब प्राप्त कर सकता है। आइए देखें भावों के अनुसार कारक कौन से होते हैं।
इस विषय पर पूरा लेख मिलेगा आपको राजस्‍थान पत्रिका की वेबसाइट पर...
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=28580

शिवोपासना से चंद्र मजबूत - मन की गति को कोई नहीं पकड़ सकता। यह मन ही है जो हमें सपने दिखाता है और उन्हें पूरे करने की ताकत भी देता है। मन में पैदा हो रहे विचार की शक्ति ही हमें पशुओं से अलग करती है। ये विचार ही हैं जो हमें सपनों के रूप में मिलते हैं और विचार ही हमें सपने पूरे करने की ताकत देते हैं। मन की इसी ताकत के कारण हम दूसरों से कुछ अलग होते हैं।
शिव की उपासना के संबंध में इस लेख के बाद मेरे पास कई फोन आए... कुछ खास तो नहीं है लेकिन पत्रिका वालों ने कहा कि आम आदमी के काम का है, इसलिए अच्‍छा रेस्‍पांस मिला...
लिंक - http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=27829

पेड़-पौधे दिलाएं ग्रहों से शांति - पेड़-पौधे न केवल हमें जीवन देते हैं, बल्कि बुरे ग्रहों के प्रभाव से भी हमें बचाते हैं। सामान्य उपचारों में देखें तो यदि शनि मारकेश है तो राजपथ पर वट वृक्ष लगाने से आयु बढ़ती है। गुरू निर्बल है या किसी अन्य ग्रह के कारण अल्पायु योग बनाता है तो गुरूवार के दिन पीपल का वृक्ष लगाना ठीक रहता है।
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=33987 इस लिंक पर पूरा लेख मिलेगा...

चेहरा बताता है ग्रहों का प्रभाव  - किसी व्यक्ति की सूरत देखने पर उसके सीरत का अहसास तो हो ही जाता है लेकिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखें तो पता चलता है कि दिखने वाले चेहरे के इतर भी बहुत सी बातें होती हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर जाते हैं। इस आलेख को पढ़ने बाद आप हो सकता है आप जिक्र करने लगें कि उस आदमी की शक्ल तो राहू से मिलती है या बुध से। देखतें हैं कि क्या विशेषताएं होती किसी व्यक्ति के चेहरे की ग्रह विशेष के प्रभाव में- हालांकि इस लेख का बड़ा हिस्‍सा मैं अपने ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग में पहले से लिख चुका हूं, लेकिन संपादन के बाद इसमें नई रंगत आई है लिंक है ... http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=31200

इसके अलावा वास्‍तु संदेश और ज्‍योतिष मंथन मैग्‍जीन में कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं। जैसा कि इस ब्‍लॉग में मैंने कहा कि ज्‍योतिष और पत्रकारिता के इतर सबकुछ लिखूंगा, सो एक बार फिर हाजिर हूं अपने उसी वादे के साथ। जल्‍द ही बीकानेर की राजनीतिक स्थिति पर एक नया आलेख लाने की सोच रहा हूं। पता नहीं कितने दिन में होगा, लेकिन अब नई ऊर्जा महसूस कर रहा हूं सो, हो सकता है जल्‍द ही आपको नया लेख मिले।

सादर

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

पगड़ी का रिश्ता


यह अतिथि पोस्ट है. पेशे से न्यूरोलोजिस्ट और मेरे मामा डॉ. अरविन्द व्यास ने मुझे ये किस्सा बताया. मैंने उनके शब्दों को हूबहू यहाँ उतारा है. बताइयेगा कैसे लगी ये अतिथि पोस्ट. 

यहाँ बात पिछली गर्मियों की है. मैं हॉस्पिटल से घर आया ही था कि एक ग्रामीण अपनी भतीजी को दिखाने ले आया. अस्पताल कि भागदौड़ से परेशान था और भूख भी लग रही थी तो मैंने उस ग्रामीण को घर के सामने वाले पेड़ के नीचे बैठने के लिए कह दिया. वह सामने जाकर बैठ तो गया लेकिन 5 मिनट मैं ही लौट आया. मैं अंदर था और पापा ने गेट खोला. उसने पापा से पूछा कि डॉक्टर साब को दिखाना है ? पापा ने उसे कह कि थोड़ी देर में आयेंगे. वह चला गया पर थोड़ी ही देर में फिर लौट आया. इस बार मैं नाराज हो गए. उसे जोरदार लताड़ पिलाई . वह चुपचाप चला गया. 
बाद में खाना खाकर चेम्बर में मैंने ग्रामीण और उसकी भतीजी को बुलाया. बातचीत में पता चला की भतीजी पंजाबी में बोल रही थी और ग्रामीण शुद्ध मारवाड़ी था. दोनों के कपड़ों से भी लग रहा था की दोनों अलग-अलग देश, भाषा और संस्कृति के लोग है. मुझे पंजाबी आती नहीं और मरीज को हिंदी बोलनी नहीं आ रही थी. मैंने ग्रामीण से कह की यह क्या बोल रही है तूं बता, पर ग्रामीण की भी वही स्तिथि थी जो मेरी थी, उसे भी पंजाबी समाज में नहीं आ रही थी. अब मुझे माजरा समाज में नहीं आया. में पूछा कि ये तेरी भतीजी कैसे हुई ? तब ग्रामीण ने बताया कि करीब 30 साल पहले उस युवती के दादा बीमार होकर इलाज के लिए बीकानेर के पीबीएम अस्पताल आये थे. अस्पताल में किसी ने सरदारजी की जेब काट ली. opretion के लिए तुरंत 20 हज़ार रुपयों की जरुरत थी. मेरे पिता और इसके दादा का इलाज एक ही वार्ड में चल रहा था. मेरे पिता ने मौके कि नजाकत को देखते हुए अपने मित्रों की मदद से कहीं से २० हज़ार रुपये दिलाये. इलाज सफल रहा. इसके दादा अनजान शहर में ऐसे आत्मीयता के भाव देख  अपनी पगड़ी मेरे पिता के सर पर रख दी. मेरे पिता ने भी अपनी पगड़ी इसके दादा के सर पर रखकर एक नए रिश्ते की नीव रख दी. आज मेरे पिता और इसके दादा गुजर चुके है, लेकिन पगड़ी का रिश्ता आज भी वैसा ही है. इन लोगों को मारवाड़ी नहीं आती और हमें पंजाबी. उसी पगड़ी के रिश्ते की डोर ने हमें तीसरी पीढ़ी तक बाँध रखा है. 
ग्रामीण की बात सुनकर पहले तो  मैं स्तब्ध रह गया. फिर उससे किये अपने व्यवहार पर पश्चाताप होने लगा. जिस व्यक्ति को मैं शिष्टाचार का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा था, उसने मुझे संबंधों को निभाने का पाठ पढ़ा दिया...