हवाई द्वीप के एक मनोचिकित्सक डॉ. ह्यू लिन ने अपने देश के सबसे कठिन मनोरोगियों को बिना उनसे मिले उन्हें ठीक कर दिया। आप और हम भले ही इसे चमत्कार मान लें, लेकिन इस चिकित्सक ने अपनी दिनचर्या में इस चमत्कार को शामिल कर रखा है। कुछ साल पहले इस चिकित्सक की पहली नियुक्ति देश के ऐसे मनोचिकित्सालय में हुई, जहां मनोरोग के सबसे विकट मामले भेजे जाते थे। डॉ. ह्यू लिन ने सोचा कि उन्हें यहां भेजा गया है तो इसमें जरूर ईश्वर का कोई न्याय रहा होगा। उन्होंने यह मानते हुए कि इन सभी मरीजों का चिकित्सक से कोई न कोई संबंध जरूर रहा है। इस जीवन में न सही पिछले किसी जन्म में हुए संबंध की वजह से आज वे साथ हैं। एक मरीज से रूप में तो दूसरा चिकित्सक के रूप में। यहीं से इलाज की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। रविवार, 23 सितंबर 2012
‘विश्वास का चमत्कार’
हवाई द्वीप के एक मनोचिकित्सक डॉ. ह्यू लिन ने अपने देश के सबसे कठिन मनोरोगियों को बिना उनसे मिले उन्हें ठीक कर दिया। आप और हम भले ही इसे चमत्कार मान लें, लेकिन इस चिकित्सक ने अपनी दिनचर्या में इस चमत्कार को शामिल कर रखा है। कुछ साल पहले इस चिकित्सक की पहली नियुक्ति देश के ऐसे मनोचिकित्सालय में हुई, जहां मनोरोग के सबसे विकट मामले भेजे जाते थे। डॉ. ह्यू लिन ने सोचा कि उन्हें यहां भेजा गया है तो इसमें जरूर ईश्वर का कोई न्याय रहा होगा। उन्होंने यह मानते हुए कि इन सभी मरीजों का चिकित्सक से कोई न कोई संबंध जरूर रहा है। इस जीवन में न सही पिछले किसी जन्म में हुए संबंध की वजह से आज वे साथ हैं। एक मरीज से रूप में तो दूसरा चिकित्सक के रूप में। यहीं से इलाज की प्रक्रिया भी शुरू हो गई।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, 21 अगस्त 2012
समान्तर सत्ताएं...
मुझे लगता है कि देश और काल से परे तीन तरह की सत्ताएं समान्तर रूप से सक्रिय हैं। हो सकता है कि मैं समय के फलक पर उड़ती हुई चील नहीं हूं, लेकिन फिर भी निरपेक्ष रहने का प्रयत्न करते हुए मुझे लगता है कि धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं साथ साथ चलते हुए एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाए रखती हैं और एक दूसरे को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।
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धार्मिक - यहां धर्म गीता में वर्णित कर्म ही धर्म नहीं बल्कि वर्तमान दौर में अपनी पूर्व स्थापित मान्यताओं के साथ जड़ हुए संप्रदाय हैं। इसमें हिन्दू, मुस्लिम, इसाई सहित सभी संप्रदायों को शामिल किया जा सकता है। इस सत्ता से जुड़े लोग अपनी मान्यताओं के साथ इतनी शिद्दत से जुड़े हैं कि इन्हें हर समस्या का समाधान धर्म में ही नजर आता है। इस कोण में न तो अर्थ का कोई महत्व है और न ही राजनीति का। यहां आकर आर्थिक और राजनीतिक की रेखाएं धूमिल होने लगती है।
आर्थिक - इसमें पैसे को ही सबकुछ मानने वाले लोग हैं। वे लोग नहीं जो कहते हैं कि अर्थ का अपना महत्व है। इसमें वे लोग हैं जो कहते हैं कि पैसे से सबकुछ किया जा सकता है। उनके लिए धन ही धर्म है और धन से जुड़ी ही की राजनीति करते हैं। धर्म अथवा राजनीति के समीकरण यहां आकर धुंधले हो जाते हैं। अलग अलग क्षेत्रों, समुदायों, धर्म और शक्तियों से आए लोग यहां केवल धन कमाने और उसे बढ़ाने के लिए एक हो जाते हैं, दूसरे कारण उन्हें किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं कर पाते।
राजनीति - यह जनता के समर्थन का दावा कर, संसाधनों पर काबिज होने, उनके व्यवस्थित करने और प्राप्त हुए पदों के जरिए राज्य को चलाने वाली सत्ता है। ये लोग अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए धन और धर्म का जमकर उपयोग या दुरुपयोग करते हैं।
(इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जो सुविधा को सिद्धांत बनाए हुए हैं। धन के लिए काम करते हैं, लेकिन मौका मिलने पर लाभ भी छोड़ देते हैं, या फिर धार्मिक काम करते हैं, लेकिन पैसे लिए कुछ समय के लिए धर्म (संप्रदाय) के नियम सिद्धांतों को ताक पर रख देते हैं।)
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जब मैं इनमें से किसी एक प्रकार की सत्ता के करीब रह रहे, या उसके बारे में सोच रहे लोगों से मिलता हूं तो उनके सभी तर्क, सभी संभावनाएं और आशंकाएं उसी सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। उन्हें दूसरा पक्ष बताने का प्रयास करता हूं तो वे उसे सिरे से खारिज कर देते हैं। उदाहरण के लिए धार्मिक सत्ता से प्रभावित लोगों को उनका धर्मगुरु आदेश देते हैं कि फलां जगह धर्मशाला और कुछ सुविधाएं बना दो। लोग धन अथवा राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना अपने गुरु की इच्छा को पूरा करते हैं। इसी तरह आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं अपना प्रभाव व्यक्त करती हैं। हर सत्ता के अपने नियम और पद्धतियां हैं। इनका अनुसरण किए बिना क्षेत्र में आपके आगे बढ़ने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। तीनों ही क्षेत्र अपने नियमों और सिद्धांतों को लेकर इतने कट्टर हैं कि “गलती की सजा मौत” के रूप में सामने आती है। राजनीति में इसे पॉलीटिकल एसेसिन कहते हैं तो धर्म में इसे धर्मच्युत कहा जा सकता है, धन के क्षेत्र में दीवालिया या बर्बाद जैसे शब्द आम हैं।
दूसरे संसाधन दूसरे दर्ज पर
धर्म, राजनीत और धन की सत्ताओं में से किसी एक सत्ता का चरम भले ही दूसरे संसाधनों को आसानी से उपलब्ध करा देता है, इसके बावजूद इन्हें साधने वाले साधक को दूसरे संसाधनों को हमेशा ही दूसरे दर्जे पर रखना पड़ता है। इसका परिणाम यह दिखाई देता है कि धर्म गुरु के पास अकूत संपदा होते हुए भी वह उसका वैसा उपयोग नहीं कर पाता, जैसा कि एक व्यवसायी कर सकता है, इसी तरह एक राजनीतिज्ञ को धर्म का ज्ञान और धंधे की समझ होने के बावजूद उसे कम ज्ञानी साधकों के सामने झुकना पड़ता है और लाभ के अवसर जानते हुए भी छोड़ने पड़ते हैं। कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि देश के शंकराचार्यों और अन्य धर्मगुरुओं के पास आज की तारीख में लाखों करोड़ रुपए की संपत्तियां और धन है, लेकिन वे इसका कोई उपयोग नहीं करते, इसी तरह कई राजनीतिज्ञों को धर्म के बारे में विशिष्ट जानकारियां हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में इनका कोई उपयोग नहीं है। किसी व्यवसायी या बाजार पर राज कर रहे धन के उपासक को ज्ञान और राजनीति की समझ होने के बावजूद वह अपने क्षेत्र तक सीमित रहता है, ताकि उसका बाजार प्रभावित न हो। इसके बावजूद एक सत्ता का दूसरी सत्ता का प्रभावित करने का खेल जारी रहता है। न तो राजनीति में ऐसे लोगों की कमी है जो धर्म का ध्वज उठाए रखते हैं और न धार्मिक सत्ता वोटों को प्रभावित करने से चूकती है। इसी तरह बाजार अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए राजनीतिक पार्टियों और धर्म के ठेकेदारों को अपने प्रभाव में रखने का प्रयास करता है।
सत्ताओं के बीच विचरण
एक सत्ता से दूसरी सत्ता की ओर गमन के लिए हमेशा ही प्रयास जारी रहते हैं। कुछ लोग इनमें जबरदस्त सफलता अर्जित करते हैं तो कुछ औंधे मुंह गिरते हैं। किसी जमाने में इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमंस में केवल धनिकों को ही जगह मिल पाती थी, वहीं चीन और रूस में धर्म के प्रभाव को खत्म करने के बाद एक नया धर्म पेश किया गया कार्ल मार्क्स का, उससे सत्ताएं केन्द्र में आई। कई देशों में आज भी धर्म की सत्ता का प्रभाव राजनीति और धन दोनों को बुरी तरह प्रभावित रखता है। भारत के इतिहास में भी ऐसे प्रकरण देखने को मिलते हैं। हालांकि तीनों को अलग अलग रखने के लिए स्पष्ट नीतियां और सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, लेकिन समय बदलने के साथ ही इन सिद्धांतों का अतिक्रमण होता है और सत्ताएं एक-दूसरे का अतिक्रमण कर जाती हैं। आजादी के बाद पहली पॉलीटिकल पार्टी कांग्रेस ने धर्म को राजनीति से दूर रखा और देश के विकास के लिए धन को शरण दी। लाइसेंस राज स्थापित किए गए और कुछ विशिष्ट लोगों को अधिकांश सुविधाएं मिली। बाद में जब भाजपा ने धर्म का ध्वज बुलंद किया तो देश की जनता ने उन्हें भी केन्द्र में ला बैठाया। फिर उदारणीकरण के बाद बाजार हावी हुआ तो धर्म की उपादेयता कम नजर आने लगी। ऐसे में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई और पिछले नौ साल से कांग्रेस फिर केन्द्र में है। भले ही आम जनता कांग्रेस की नीतियों से सहमत न हो, लेकिन भाजपा भी विकल्प के रूप से अब तक खुद को स्थापित नहीं कर पा रही है। प्रचलित धर्मों और धन की सत्ता का नैसर्गिक विरोध करने वाले कॉमरेड भी लगभग हाशिए तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में धन के साथ चल रहे धर्म और राजनीति को आज हर कहीं प्रश्रय मिल रहा है।
विचरण का श्रेष्ठ उदाहरण
लेख के आखिर में बाबा रामदेव का नाम लेने से कहीं ऐसा न माना जाए कि यह पूरी पोस्ट बाबा रामदेव को केन्द्रित करके लिखी गई है। इसके बावजूद एक सत्ता से दूसरी सत्ता में संचरण का कोई श्रेष्ठ उदाहरण है तो आज के दौर में बाबा रामदेव है। बाबा रामदेव ने धर्म के जरिए धन के क्षेत्र में प्रवेश किया। आम जनता को धर्म की बातें बताई, योग कराया, स्वस्थ रहने की अपील की और भगवा धारण किए रखा। उनकी दवा कंपनियां और एफएमसीजी प्रॉडक्ट आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड तक को धक्का पहुंचा रहे हैं। हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने के बाद अब रामदेव दूसरा अतिक्रमण राजनीति में करने का प्रयास कर रहे हैं। दीगर बात यह है कि धर्म और धन को साधने के बाद राजनीति को साधने के लिए उन्होंने लगभग सभी प्रचलित मान्यताओं को ताक पर रख दिया है। भले ही वे राजनीति में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं, लेकिन केवल धर्म का झंडा या धन की ताकत हाथ में रखकर दूर से प्रभावित करने के बजाय उन्होंने सीधे राजनीति क्षेत्र में उतरकर सिद्ध कर दिया है कि विचरण संभव है।
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ऐसे में दूसरे लोगों के लिए भी संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं कि किसी एक सत्ता से दूसरी सत्ता में संचरण किया जा सकता है। आज भले ही यह इतना आसान न लगे, लेकिन आने वाले दिनों में हमारे देश में इन सत्ताओं के बीच की रेखाएं और अधिक धूमिल होने की संभावनाएं बन रही हैं।
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बुधवार, 25 जुलाई 2012
गुटखा : एक स्वीकारोक्ति, एक गुजारिश
अपनी हर एक समस्या के लिए समाज और व्यवस्था को दोष देने की परम्परा का निर्वहन करते हुए मैं एक बार फिर राज्य सरकार को गुटखे पर पाबंदी लगाने के लिए बधाई देने के साथ ही गुजारिश करूंगा कि गुटखे पर पूरी तरह प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए। इससे घटिया कैमिकल, सुपारी और नष्ट कर दिए जाने योग्य जर्दे का इस्तेमाल कर बनाए गए कैंसर के टूल को समाप्त करने में मदद मिलेगी।
राज्य सरकार ने राजस्थान में गुटखे पर प्रतिबंध कर दिया है, लेकिन एक सुराख (बहुत बड़ा सुराख) खुला छोड़ दिया है। इसके अनुसार राजस्थान में केवल उस गुटखे को प्रतिबंधित किया गया है जिसमें पान मसाला और तम्बाकू पहले से मिला हुआ हो। दुकानदार पान मसाला और तम्बाकू अलग अलग बेच सकते हैं। ऐसे में गुटखे पर प्रतिबंध केवल सांकेतिक बनकर रह जाएगा। राज्य सरकार को लगा कि गुटखा खाने वाले लोगों में कैंसर की समस्या अधिक है। हो सकता है इसके लिए राज्य सरकार ने किसी मेडिकल रिपोर्ट का सहारा लिया हो। तो क्या यह मेडिकल रिपोर्ट यह कह सकती है कि
पान मसाला और गुटखा अलग अलग खरीदने और बाद में उन्हें मिलाकर खाने से कैंसर नहीं होगा?
गुटखे पर प्रतिबंध से पहले भी मैं रजनीगंधा पान मसाला और तुलसी 00 मिलाकर खाता था। आज भी खा रहा हूं। उसकी सप्लाई पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगी है। हां, जिन गुटखों की सप्लाई पर रोक लगी है, वे इतने महंगे हो गए हैं कि गुटखा प्रेमी आज की तारीख में रोटी से अधिक गुटखे पर खर्च कर रहे हैं। भले ही रजनीगंधा तुलसी पर रोक नहीं लगी है, लेकिन दूसरे गुटखों पर रोक का असर रजनीगंधा पर हुआ है और दस रुपए एमआरपी का यह सैट (सात रुपए का पान मसाला और तीन रुपए का जर्दा) आज पंद्रह से बीस रुपए में मिल रहा है। मुझे पैसा अधिक देने में कोई दिक्कत नहीं है, मजे की बात तो यह है कि पंडितजी को खिलाने वाले भी एक ढूंढो दस मिलते हैं, लेकिन मुझे पीड़ा है, कालाबाजारी से।
गुटखे की कीमतें बढ़ने का यह दूसरा प्रकरण है। इससे पहले राज्य में पॉलीथिन पर रोक लगाने के साथ ही गुटखे के पाउच पर भी रोक लगा दी गई थी। इसके चलते बाजार में पड़ा गुटखा महंगा बिकने लगा था। दस रुपए का रजनीगंधा उन दिनों बीस रुपए के भाव देख आया था, फिर बारह या तेरह रुपए से नीचा को कभी बिका भी नहीं। मैंने अपने समाचार पत्र के जरिए स्थानीय डीलर और कंपनी के प्रतिनिधि को लाइन में लिया था। कंपनी प्रतिनिधि ने तो दीपावली के बाद कह दिया कि होली से पहले इसके भाव कम करवा देंगे (आप देखिए पान मसाला बनाने वाली कंपनी का प्रतिनिधि यह बात कह रहा है) और स्थानीय वितरक ने कहा कि मांग अधिक है और उसके पास सामान देने के लिए पर्याप्त आदमी नहीं है। आपको यह लॉजिक समझ में नहीं आया होगा। मामला यह है कि रजनीगंधा का स्थानीय वितरक बहुत अधिक “ईमानदार” आदमी है। इसलिए वह अधिक कीमत पर माल नहीं बेचता। बस उसके पास माल होता ही नहीं है। इसका तो अब क्या ईलाज है। ऐसे में रिटेल दुकानदारों को एमआरपी से भी ऊंची कीमत देकर अंडरकटिंग कर रहे लोगों से माल खरीदना पड़ता है।
सरकार और गुटखे के खिलाडि़यों की मिलिभगत से आम जनता का साथ दिखाई दे रहा है। सरकार ने बैन लगा दिया और कंपनियों ने गुटखा बेचना बंद कर दिया। बस अलग अलग ही तो बेचते हैं...
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
हमें मंच पर नाचते बाबा ही पसंद हैं...
आज जैसे ही कोई योग, आसन या प्राणायाम की बात करता है तो तुरंत दिमाग में मंच पर नौली क्रिया करते अथवा नाचते रामदेव बाबा दिखाई देते हैं। यह एक ओर बाबा की सफलता है तो दूसरी ओर हमारी गलती। हमने हमारे योग को सही तरीके से समझा नहीं और लगे कसरत करने। आज की तारीख में योग कर रहे सौ लोगों को पूछा जाए कि आप योग क्यों करते हैं तो पचानवे प्रतिशत लोगों के संभावित जवाबों में फिट रहना, बीमारी से लड़ना या तनाव को दूर करने का प्रयास करना जैसे जवाब शामिल होंगे। क्या योग फिजिकल फिटनेस का काम करता है। क्या यह कसरत का एक रूप है।
कम से कम मुझे तो नहीं लगता। ऋषि पातंजलि ने अपने पहले श्लोक में स्पष्ट किया है कि योग चित्त की वृत्तियों का निरोध करता है। कुछ लोगों ने योग को जोड़ से भी जोड़ा है। इसमें अच्छी और खराब एनर्जी के मिलन से लेकर शरीर और आत्मा तक के मिलन को जोड़ दिया है। पर चित्त की वृत्तियों के निरोध के लिए किया जा रहा योग, शरीर को वहां कैसे लेकर जा रहा है। यह समझ में नहीं आता।
योग पर कुछ बात करने से पहले क्यों न बाबा की कुछ तारीफ कर ली जाए। बाबा रामदेव ने “आधुनिकता” की रौ में बह रहे भारतीय समाज को बेहतर तरीके से पकड़ा और प्रचार के जोर को भी समझा। स्टेज पर मुंहफट अंदाज में बोलना और रिसर्च पेपर लेकर अपनी बात सिद्ध करने के लिए चिकित्सकों तक की मदद लेने के अंदाज ने भारतीय जनमानस को जोरदार तरीके से प्रभावित किया। उन्होंने योग को आध्यात्मिक उत्थान के बजाय शारीरिक सौष्ठव और सुंदरता से जोड़ दिया। हालांकि इसे भी प्राथमिकता पर नहीं रखा और इससे एक कदम आगे जाकर उन्होंने कहा कि इससे भीषण होती जा रही बीमारियों और बुढ़ाते शरीर को भी दुरुस्त किया जा सकता है। बीकानेर के छोटा शहर है। इसके बावजूद मैंने साठ पार के पचासों लोगों को सार्वजनिक पार्कों में सुबह सुबह बैठकर योग और प्राणायाम करते हुए देखा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाबा रामदेव ने लोगों में एक नई जान फूंक दी। पश्चिम के मार्केटिंग हथियारों से ही पश्चिम की कंपनियों को चित्त करते हुए उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाया कि प्राचीन भारतीय पद्धतियां ही तुम्हारी रक्षा कर सकती है। लोग भी उतर गए मैदान में। बस, यही बाबा की कमाई का आधार है, एक तरफ योग (आसन और प्राणायाम) सिखाते हैं और दूसरी तरफ स्वस्थ्य बने रहने के लिए दवाएं बेचते हैं। मेरे निजी सूत्रों के अनुसार बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी सहित तीन दवा कंपनियां 2400 करोड़ से अधिक कीमत की हैं। बाबा ने उपेक्षित ग्वारपाठे और लौकी को प्रचलन में ला दिया है। भारतीय योग शिक्षा के लिए मैं बाबा रामेदव के प्रयास की जितनी सराहना करूं, उतनी कम है।
अब इसके दूसरे पक्ष को देखने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि बाबा ने कितना बड़ा नुकसान किया है। पश्चिम के लोगों ने योग को जिस तरीके से समझा, वह उनकी भौतिक सोच का नतीजा था, लेकिन भारत में योग की एक सतत धारा बह रही थी, उसे बाबा रामदेव ने बुरी तरह झकझोर दिया है।
योग जीवन के हर हिस्से में है। कहीं यह प्रेमयोग है तो कहीं कर्मयोग, भक्तियोग, क्रियायोग, ज्ञानयोग या हठ योग। योग के शारीरिक कसरत के रूप में पेश कर बाबा रामदेव ने हठ योग को ही योग का पर्याय बना दिया। चित्त की वृत्तियों के निरोध का दर्शन कहीं पीछे दबकर रह गया है। योग के नाम पर अब कसरत बाकी रही है...
सिर्फ हठ योग के रूप में योग को पेश करने का एक दुष्परिणाम यह भी हुआ कि केन्द्र सरकार ने योग और हैल्थ क्लब को एक ही श्रेणी में डाल दिया।
...और तो और इस पर दस प्रतिशत कर भी लगा दिया है।
हो सकता है बाबा रामदेव खुशी से यह टैक्स चुका रहे हों, क्योंकि किसी भी मंच पर आजतक उन्होंने इस कर का विरोध नहीं किया है, लेकिन श्रीश्री रविशंकर का आर्ट ऑफ लिविंग भी इसकी जद में आ गया है। वे अपने तीन से सात दिनों के शिविरों में क्रियायोग का अभ्यास कराते हैं। केन्द्र सरकार के अनुसार यह क्रिया योग भी हैल्थ क्लब एक्टिविटी है और इस कारण शिविर में ली जाने वाली फीस पर दस प्रतिशत कर लगने लगा है। करीब सालभर पहले बीकानेर में श्री श्री रविशंकर का कार्यक्रम हुआ था। इससे पहले आर्ट ऑफ लिविंग की एज्युकेशन विंग के निदेशक मुरलीधर कोटेश्वर बीकानेर आए थे। सामान्य इंटरव्यू के बाद सामान्य बातचीत में उन्होंने इस कर के बारे में जानकारी दी। आप भी इस कर के बारे में देख सकते हैं।
(ऊपर दिए गए चित्र पर क्लिक करें। केन्द्र सरकार की वेबसाइट पर पूरी जानकारी मिल जाएगी)
सरकार आमतौर पर ऐसे साधनों पर कर की प्रताड़ना जारी करती है, जिन कामों को वह रोकना चाहती है। जैसे शराब, सिगरेट या विदेशों से लाई जाने वाले उत्पाद। ऐसे मेंयोग पर टैक्स किस कोण से लगाया गया है, यह समझना अभी बाकी है। दुनिया के अधिकांश देशों में जहां योग को प्रमुख रूप से अपनाया जा रहा है, वहां की सरकारों ने न केवल योग को करमुक्त रखा है, बल्कि इसके विकास और शोध के लिए अच्छा खासा धन भी व्यय कर रही है। विदेशों में चल रहे प्रयासों की एक बानगी यहां, यहां और यहां सहित इंटरनेट के कई ठिकानों पर देख सकते हैं। केवल सरकार के ही प्रयास नहीं, कई बड़े संस्थान भी अपने स्तर पर जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार टैक्स लगाकर योग को दबाने की जुगत लगा रही है। है ना मूर्खतापूर्ण, लोकसभा में एक विशेष कक्षा सभी सांसदों के लिए लगनी चाहिए - योग की...
... योग के पातंजलि पक्ष और अनुलोम विलोम पर अगली किसी पोस्ट में चर्चा करेंगे।
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मंगलवार, 17 जुलाई 2012
आश्रम का साधू : फेसबुक और ब्लॉगिंग
बहुत साल पहले जब खेलने के लिए पहली बार स्टेडियम गया तो एक ऐसा अनुभव हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। अनफेयर सलेक्शन का। बाद में मैं खुद इसी जमात में शामिल हो गया...
छुट्टियों के दिनों में कई नौसिखिए खिलाड़ी स्टेडियम पहुंचते थे। यह स्टेडियम एक छोटा-मोटा स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स की तरह था। मैंने एक साथ चार खेलों का चुनाव किया। पहले टीटी और बैडमिंटन खेलेंगे, इसके बाद फुटबॉल और आखिर में बास्केटबॉल। बैडमिंटन और फुटबॉल में मैं प्रियता के अनुसार पात्रता बांटे जाने का “शिकार” हुआ। टीटी और बास्केटबॉल खेलने वाले खिलाड़ी कम थे। दोनों ही खेलों में अपेक्षाकृत अधिक स्किल की जरूरत थी। छूटी हुई दोनों चीजें मुझे आसानी से मिल गई। मैं हमेशा चिढ़ता रहता था कि फुटबॉल और बैडमिंटन में जमे हुए भोमिए किसी को आसानी से अंदर नहीं आने देते। अपने चेहतों को आसान प्रवेश, बाकी लोगों के लिए कठिन परीक्षाएं। धीरे धीरे टीटी भी छूट गया, केवल बास्केटबॉल रहा।
यहां अधिक अच्छे खिलाड़ी नहीं थे। सभी शौकिया और आस-पास रहने वाले लोग थे। मैं ही सबसे अधिक दूरी से आता था। बास्केटबॉल में पुष्करणा स्टेडियम में खेलने के कुछ ही महीनों बाद मैंने डूंगर कॉलेज और रेलवे स्टेडियम में भी खेलना शुरू कर दिया था। इससे मेरा खेल तेजी से सुधरा और मेरे साथ पुष्करणा स्टेडियम में खेल रहे शौकिया खिलाडि़यों का स्तर भी तेजी से ऊपर आया। खेलते हुए करीब एक साल हो गया तब तक करीब पंद्रह खिलाड़ी हो गए थे। यह तीन टीमें बनाने के लिए पर्याप्त था। दो टीमें खेलती जो हारती वह हटती थी। मैं श्रेष्ठ खिलाडि़यों में से एक था। बाद में डूंगर कॉलेज और रेलवे स्टेडियम भी छूटते गए और मैं सुबह शाम दोनों समय करीब छह सात घंटे रोजाना प्रेक्टिस कर रहा था। इन्हीं दिनों में कई नए खिलाड़ी भी मैदान में आए। इनमें नौसिखिए भी थे और अच्छे खिलाड़ी थी। चूंकि मैं श्रेष्ठ खिलाड़ी था और उस समय तक यह कुंठा मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी। श्रेष्ठ खिलाड़ी होने के कई फायदे होते हैं, आपको भागकर बॉल नहीं लानी होती है, जब आप प्रेक्टिस कर रहे होते हैं तो जूनियर दौड़कर आपको बॉल पकड़ाते हैं आदि आदि। नए खिलाड़ी मुझे गांठते नहीं थे। सालभर से अधिक समय तक मेहनत करने के बाद मुझे लगने लगा कि इन खिलाडि़यों द्वारा मेरी इज्जत की जानी चाहिए। इसी कुंठा में मैंने खिलाडि़यों के गुट बना दिए। पुराने खिलाड़ी शायद यही चाहते थे (मेरी तरह), सो गुट आसानी से बन गए। इसी बीच मुझे टाइफाइड हुआ।
कई दिन के अवकाश के बाद फिर से ग्राउंड पहुंचा तो पुरानी ताजगी लौट आई थी। वहां हो चुकी गुटबाजी और उससे बिगड़ते खेल और उससे भंग होते आनन्द को मैं निरपेक्ष भाव से देख पा रहा था। मन में बड़ी ग्लानि हुई। अब अगले पंद्रह दिन तक मैंने जैसे कैम्प चालू कर दिया। नए और पुराने खिलाडि़यों को एक ही छड़ी से ताड़ना शुरू किया। सभी कतार में आ गए। खेल का आनन्द फिर से शुरू हो गया, लेकिन मैं अधिक खराब हो गया। क्योंकि मेरी भूमिका खिलाड़ी से बदलकर कोच की हो गई। अब अहं पहले से भी अधिक हो गया। इसके चलते उदंड खिलाडि़यों से मेरी नियमित नोंक झोंक होने लगी। अधिकतर उदंड खिलाड़ी ऐसे थे जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि खिलाडि़यों की ही थी। ऐसे में वे भी “बाहर के” कोच को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। धीरे धीरे बास्केटबॉल के मैदान से नाता टूटता गया। एक दिन पूरी तरह जाना बंद कर दिया।
इस प्रकरण के कई साल बाद स्वामीनारायणन् जी से मुलाकात हुई। एक बार की बातचीत में मुझसे कहीं ऐसी बात निकली होगी तो उन्होंने एक रोचक कथा सुनाई कि
“रामराज्य के दिन थे, राजा राम का दरबार लगा हुआ था कि एक कुत्ता वहां आया। उसका सिर फटा हुआ था और उससे खून निकल रहा था। उन दिनों जानवर भी बोला करते थे। कुत्ते ने कहा कि एक ब्राह्मण ने अकारण ही उसका यह हाल किया है। भगवान राम ने तुरंत ब्राह्मण को दरबार में बुलाया। ब्राह्मण ने आते ही बताया कि वह गंगाजी में नहाकर बाहर निकला ही था कि इस कुत्ते ने खुद को झड़काने के उद्देश्य से कुछ छींटे उछाले। इससे मैं अपवित्र हो गया। मुझे गुस्सा आया तो मैंने ईंट से मारकर इस कुत्ते का सिर फोड़ दिया। भगवान को कथा समझ में आ गई। उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि तुम्हें इसकी सजा मिलेगी। फिर कुत्ते से पूछा कि तुम ही बताओ कि इस ब्राह्मण को क्या सजा दी जाए। इस पर कुत्ते ने कहा कि मैं तो धोबी का कुत्ता हूं। इस कारण मुझे कभी घाट तो कभी धोबी के घर चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन मैं दोनों ही जगह का नहीं रहा। इस ब्राह्मण को कुछ ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिससे इसे मेरी वास्तविक स्थिति का पता चले। राम मुस्कुराए, उन्होंने ब्राह्मण को आश्रम का साधू बना दिया।”
मैंने स्वामीनारायणजी से पूछा कि ब्राह्मण को यह सजा कैसे मिली। अब वे हंसने लगे। बोले आश्रम का साधू कहीं का नहीं होता। घर-बार इसलिए छोड़ता है ताकि दुनियादारी से दूर रहे, लेकिन आश्रम की व्यवस्थाएं एक कुशल गृहिणी की तरह उसे देखनी पड़ती है। आया-गया साधू आश्रम की व्यवस्थाओं के लिए उसे कोसता है, आश्रम के अधिष्ठाताओं के सामने उसे हाजिरी लगानी पड़ती है। व्यवस्थाएं देखते देखते साधू खुद को आश्रम से पूरी तरह जोड़ लेता है और तो और उसे खुद के आध्यात्मिक उत्थान के लिए उसे समय नहीं मिल पाता है। ऐसे में वह न घर-परिवार वाला रहता है न पूरी तरह साधू बन पाता है। यह कमोबेश धोबी के कुत्ते वाली ही स्थिति है।
उन्होंने कुछ इस अंदाज में बात कही कि मुझे अपने बॉस्केटबॉल कोर्ट वाले दिन याद हो आए। मैं समझ गया कि एक बास्केटबॉल कोर्ट पर नियमित रूप से आते-जाते कैसे मैं उसे अपना समझने लगा था। वहां की अधिकार भावना भी ऐसी ही थी। वहां मेरा कुछ नहीं था, जब गया था तब कोर्ट था और जब छोड़कर आया तब भी कोर्ट ही था। आनन्द लेने के बजाय मैंने खुद को व्यवस्थाओं के हवाले कर दिया था। यही स्थिति अन्य खेलों (बैडमिंटन, फुटबॉल और टीटी) के मठाधीशों की रही होगी।
अब ऑनलाइन चल रहे खेल को देखता हूं तो दिखाई दे रहा है कि जहां सब कुछ स्वतंत्र है और सभी आनन्द लेने वाले लोग हैं (इसमें टूल्स के फ्री होने का बड़ा योगदान है), वहां धीरे धीरे लोग अपने निकाय बनाते जा रहे हैं। फेसबुक समूह और पेज तो ऐसी जगहें बन रही हैं, जहां इस भावना का जमकर दोहन किया जा रहा है। कमोबेश यही स्थिति ब्लॉगिंग की भी है। बीच के दो साल ब्लॉगिंग से दूर रहा और अब लौटकर आया हूं तो देखता हूं कि शुरूआती दिनों में मुक्तता के साथ सृजन का जो आनन्द था, उसके रस को काल ने पी लिया है। अब अधिकांश ब्लॉगर और फेसबुकिए अपने अहं का विस्तार कर रहे हैं। ब्लॉगिंग में भी ऐसे निकाय देख रहा हूं। कई ब्लॉगर तो एक-दूसरे के ब्लॉग पर जाना तक छोड़ चुके हैं।
इस वर्चुअल दुनिया में, जहां न आश्रम अपना है, न घर अपना है। फिर क्यों आश्रम के साधू बनें !!!!!
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
