रविवार, 30 सितंबर 2012

ग्रेट स्पिनर का बर्बाद होना...

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यह कहानी एक ऐसे स्पिनर की है जिसके टैलेण्‍ट की भ्रूण हत्‍या हो गई। वास्‍तव में यह एक बचाव प्रक्रिया थी या हत्‍या इस बारे में मैं आज तीन दशक बाद भी कंफ्यूज हूं।
***      इस घटना का सही सही दिन मुझे याद नहीं है, लेकिन महज सात या आठ साल की उम्र में एक दिन बीकानेरी भीषण दोपहरी में जब लू बज रही थी, मैं गली में क्रिकेट खेलने में मशगूल था। मुझे बैटिंग करने में अधिक रुचि नहीं थी। बॉलिंग में भी मेरी च्‍वाइस स्पिन की थी। मैंने अपना ओवर पूरा किया और फील्डिंग के लिए नाली के पास जाकर खड़ा हो ही रहा था कि मेरी ममेरी बहिन ने आकर कहा कि बाऊजी बुला रहे हैं। बाऊजी यानी मेरे पड़नाना डॉ. माधोदासजी व्‍यास। मैं उनके पास पहुंचा तो वे कुछ पढ़ रहे थे। चमकती चांद के पीछे सफेद बालों की लट और मोटा चश्‍मा। उन्‍होंने बिना सिर उठाए मुझे पूछा कहां थे। मैंने कहा खेल रहा था। उन्‍होंने दोबारा पूछा क्‍या खेल रहे थे, मैंने जवाब दिया क्रिकेट खेल रहा था।

***      बाऊजी ने सिर को एक तरफ इस तरह झटका जैसे मैं महामूर्खता का काम कर रहा होउं। मैंने पूछा क्‍यों क्रिकेट खेलने में क्‍या समस्‍या है। वे बोले यह कोई खेल नहीं है। यह तो गुलाम देशों को अंग्रेजों का दिया गुलामी का प्रतीक है। हालांकि मैं जाति से जोशी हूं, लेकिन ननिहाल में रहता था, सो आस पास के लोग “जोशी राजा” कहते थे (प्‍यार से कुछ लोग अब भी कहते हैं)। अब एक राजा गुलामी को कैसे सहन कर सकता है। वह भी सात आठ साल का राजा। बात दिल में चुभ गई। मैं अड़ गया, बोला सिद्ध करो। बस यहीं चूक हो गई। हिन्‍दी विभाग के प्रोफेसर रहे डॉ. व्‍यास (बाऊजी) को इसी काम में सबसे ज्‍यादा मजा आता था। उन्‍होंने पूछा बताओ कौन कौनसे देश की टीमें क्रिकेट खेलती हैं। मैंने नाम गिनाए, और बाऊजी ने बताया कि कौनसा देश कब अंग्रेजों का गुलाम बना।

***       मैं भ्रमित हो रहा था कि किसी देश को गुलाम बनाने के बाद क्रिकेट जैसे खेल की छाप छोड़ने की क्‍या जरूरत है। तो बाऊजी ने बताया कि अंग्रेज ग्रेट ब्रिटेन से आए थे, वहां का मौसम अपेक्षाकृत ठण्‍डा है। अंग्रेजों ने दूसरे मुल्‍कों पर कब्‍जे करने शुरू किए तो वहां अपने आदमी भी रखने पड़े। गर्म देशों में ऐसे अंग्रेजों का समय बहुत मुश्किल से निकल पा रहा था। पैसे वसूल करने के बाद उन्‍हें कुछ काम तो करना पड़ता नहीं था, ऐसे में दिन बिताने के लिए उन्‍होंने बेहद धीमे खेल को शुरू किया। क्रिकेट मूल रूप से कई दिन तक चलने वाला खेल था। बाद में इसका एक दिवसीय प्रारूप भी लाया गया।

***       इस तरह मुझे समझ में आया कि अंग्रेजों के समय बिताने (टाइम पास) का खेल हमारे देश का सबसे पॉपुलर खेल बन चुका था। उस समय तक कपिल देव ने वर्ड कप भी जीत लिया था, ऐसे में क्रिकेट का फीवर अपने चरम पर था। बाऊजी ने बताया कि इस खेल में न तो किसी प्रकार का मानसिक विकास होता और न शारीरिक। उनका इशारा पारंपरिक कुश्‍ती और शतरंज की ओर था। उन्‍होंने बताया कि चीन, जापान, अमरीका, फ्रांस जैसे देश या तो आजाद रहे या उन्‍होंने अंग्रेजों की गुलामी को अपने जेहन पर हावी नहीं होने दिया। इसी का परिणाम है कि उन देशों में क्रिकेट की टीमें नहीं हैं। इसके बाद मेरे छोटे से दिमाग में चार पांच सवाल और आए, उनके जवाब भी बाऊजी ने उसी अंदाज में दिए। उसी दिन क्रिकेट से मेरा मन फट गया। अगले दिन टीमें बंट रही थी, तो मैंने साफ मना कर दिया। मैं बोला यह गुलामों का खेल है मैं नहीं खेलूंगा। मैं पहले भी ऐसी सनकी घोषणाएं करता रहा था, सो बिना बहस या मान मुन्‍नौवल के प्रेम से किनारे बैठा दिया गया।

***       इसके बाद मैंने कभी क्रिकेट तो नहीं खेला। इस घटना के करीब बारह साल बाद मैंने दोबारा खेलना शुरू किया। इस बार मैंने आजाद ख्‍याल देश के खेल बॉस्‍केटबॉल का चुनाव किया। हालांकि फिरकी मेरी फितरत रही है सो बॉस्‍केटबॉल को बोर्ड पर फिरकी की तरह घुमाकर काउंट करता था। हालांकि मेरी इस हरकत से कोच बहुत नाराज होते। बोलते जहां खेलने जाओगे वहां ऐसा बोर्ड नहीं मिला तो तुम्‍हारी फिरकी ही हार का कारण बन जाएगी। पर...   

***       यूनिवर्सिटी खेलने के लिए कॉलेज की टीम के साथ रवाना होने से पहले बाऊजी से मिलने गया। उन्‍हें बताया कि मैं खेल में हिस्‍सा लेने हनुमानगढ़ जा रहा हूं। उन्‍होंने पूछा क्‍या खेलते हो, तो मैंने बताया कि बॉस्‍केटबॉल खेलता हूं। उन्‍होंने बारह साल पुराने उसी अंदाज में सिर को झटका और कहा “यह क्‍या खेलते हो? यह तो हब्शियों का खेल है!”

 

मैंने सिर पकड़ लिया। मैं बागी हो चुका था, कहा इस खेल में तो कोई गुलामी की बदबू नहीं है। तो उन्‍होंने कहा कि यह हमारा खेल भी नहीं है। इस बार सावधान रहा। बहस को बढ़ाए बिना बातचीत के रुख को इधर उधर घुमाया और वहां से निकल आया। बाद में चार साल तक इस खेल को जी भरकर खेला। लेकिन आज भी सोचता हूं कि अगर बाऊजी की बात नहीं सुनता को अच्‍छा स्पिनर बन सकता था, अगर सुन ली तो वास्‍तव में एक गुलामों के खेल को अलविदा कहकर अच्‍छा किया?

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

विकल्‍प और छद्म विकल्‍प!!

बहुत बार लोगों को यह कहते हुए सुनता हूं कि मैंने फलां निर्णय लिया तो आज इस स्थिति में हूं। या फलां निर्णय लेता तो आज उस स्थिति में होता। दूसरी ओर यह भी कि ईश्‍वर को यही मंजूर था। हकीकत क्‍या है, निर्णय मैं लेता हूं या ईश्‍वर लेता है। यह एक पुराना और गंभीर सवाल है।
mmm पहली स्थिति पर गौर करते हैं जब मैं यह कहता हूं कि मैंने निर्णय लिया। इस स्थिति में मेरे पास निर्णय लेने के लिए विकल्‍पों की जरूरत होगी। एक सामान्‍य मध्‍यमवर्गीय परिवार में जन्‍म लेने के बाद मेरे पास तय विकल्‍प चुनाव की एक पूर्व निर्धारित शृंखला होने की संभावना बहुत अधिक होती है। अगर परिवार किसी व्‍यवसाय में लगा है तो मैं भी उसी व्‍यवसाय या वैसे ही किसी व्‍यवसाय के बारे में सोचूंगा और यदि परिवार के अधिकांश सदस्‍य नौकरीपेशा है तो मुझे जीवनयापन का वही सबसे सुरक्षित तरीका नजर आएगा। ऐसे में विकल्‍पों का सामना करने से बहुत पहले ही मेरी कंडीशनिंग हो चुकी होती है। यानी सोचने का तरीका पूर्व निर्धारित हो चुका होता है। किसी व्‍यक्ति विशेष की मानसिक कंडीशनिंग का कोई भी आधार हो सकता है। कई बार एक तो कई बार एक से अधिक आधार भी हो सकते हैं।
पारिवारिक मूल्‍यों के तौर पर
सामाजिक सम्‍बन्‍धों के जरिए
राजनैतिक परिदृश्‍य से उपजी
किसी बदले की भावना
प्रेम की अवस्‍था से
धार्मिक विश्‍वास के कारण
आर्थिक स्थिति से प्रभावित
अथवा किसी भी प्रकार की तीव्र अथवा नाजुक भावनाएं
mmm हम मान सकते हैं कि किसी भी घटना या परिस्थिति के प्रति व्‍यक्ति के विचार करने अथवा निर्णय करने का कोण विशिष्‍ट ही रहेगा। बहुत कम संभावना है कि कोई व्‍यक्ति घटनाओं का निरपेक्ष अथवा साक्षी भाव से विश्‍लेषण कर पाए। कई बार तो तर्क भी इतना अधिक हावी होता है कि व्‍यक्ति निर्णय करने में अतितार्किक होकर सटीक निर्णय से भटक जाता है। ये कारण हमें बताते हैं कि कभी भी किसी भी स्थिति में लिए गए निर्णय को सौ प्रतिशत सही करार नहीं दिया जा सकता। हां, यह जरूर है कि निर्णयों की शृंखला हमें एक विशेष रास्‍ते की ओर लेकर जाती है। कई बार निर्णयों का परिणाम पूर्व में तय होता है तो कई बार बाद में इसके परिणाम सामने आते हैं। जो भी स्थिति हो, एक बार निर्णय लेने के बाद आगे की स्थिति के लिए हमें तैयार रहना होता है। उदाहरण के तौर पर पहला तो इस लेख को लिखने का निर्णय और बाद में इसे प्रकाशित करने का निर्णय। इसके आगे की स्थितियों के बारे में मैं खुद तय नहीं कर सकता कि पाठकों की इसके प्रति क्‍या प्रतिक्रिया होगी अथवा कोई इसे पढ़ेगा भी कि नहीं।
mmm हमारे निर्णयों के साथ साथ प्रकृति के खुद के निर्णय भी होते हैं। वे बिल्‍कुल प्राकृतिक होते हैं। हम कोई भी कार्य करते हैं तो वह कार्य संपन्‍न होने के साथ एक केओस (याद्रच्छिक अव्‍यवस्‍था) पैदा करता है। मानवीय या पशुवत व्‍यवहारों के इतर प्रकृति सृष्टि के कार्यों में न्‍यूनतम केओस पैदा करने की प्रवृत्ति होती है। यानी प्रकृति जो कार्य करेगी, उस कार्य का संतुलन इस प्रकार होगा कि अव्‍यवस्‍था कम से कम पैदा हो। जिन कारणों से हम अधिक केओस पैदा कर रहे हैं, उन कारणों को समेटते हुए प्रकृति स्‍वाभाविक रूप से संतुलन को बनाए रखती है। ऐसे में निर्णयों का टकराव एक नई व्‍यवस्‍था पैदा करता है।
mmm जो लोग ईश्‍वर को मानते हैं उनके अनुसार दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह सभी ईश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार हो रहा है। ईश्‍वर ने सारी व्‍यवस्‍था पहले से निर्धारित कर रखी है। हम जो कुछ करते हैं, जिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, जिन लोगों से मिलते हैं, जिन लोगों से स्‍नेह होता है, जिन लोगों से वैर होता है, सबकुछ पूर्व निर्धारित है। मेरा लेख लिखना और आपका मेरे ब्‍लॉग तक पहुंचकर पढ़ना महज संयोग नहीं बल्कि पूर्व निर्धारित है।
mmm जो लोग इच्‍छा स्‍वातंत्र्य (freedom of will) को मानते हैं उनके अनुसार या तो कुछ भी पूर्व निर्धारित नहीं है, अथवा पूर्व निर्धारित होने के बावजूद मनुष्‍य अपनी इच्‍छा के अनुसार परिस्थितियों को बदल सकता है। जो लोग ईश्‍वरवाद को मानते हैं और साथ ही इच्‍छा स्‍वतंत्रता के भी हामी हैं, उन्‍हें यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि इच्‍छा कि कितनी स्‍वतंत्रता मिली हुई है। क्‍योंकि ईश्‍वर की बनाई सृष्टि जिसमें सबकुछ अगर पूर्व निर्धारित है तो सुई की नोक के बराबर का परिवर्तन भी कई युगों या शताब्दियों में बड़ा परिवर्तन पैदा कर सकता है। मसलन इच्‍छा स्‍वातंत्र्य को मानने वाला व्‍यक्ति किसी एक चूहे को मरने से बचा लेता है। वह चूहा किसी चुहिया के साथ मिलकर बाकी बचे जीवन में कई दर्जन बच्‍चे पैदा करता है। कई सौ सालों में पैदा होने और मरने के क्रम पूरे होने के बावजूद “ईश्‍वर की इच्‍छा के विपरीत” कई हजार या लाख चूहे अधिक मात्रा में बच जाएंगे, जो हर साल लाखों टन अनाज का सत्‍यानाश कर सकते हैं। नष्‍ट हुए अनाज का प्रभाव किसान, ट्रेडर, उपभोक्‍ता पर पड़ेगा। इस तरह पूरी व्‍यवस्‍था में प्रभावी बदलाव सिद्ध होगा। क्‍या ईश्‍वर अपनी व्‍यवस्‍था में इतना बड़ा छेद रहने देंगे?
mmm अब वापस आते हैं विकल्‍प की ओर, क्‍या हम विकल्‍प का चुनाव करने के लिए इतने आजाद हैं कि पूर्व निर्धारित व्‍यवस्‍था को ध्‍वंस करने जितने बड़े निर्णय कर सकें। यदि हां, तो प्रकृति की नैसर्गिक व्‍यवस्‍था कैसे बनी रहेगी। अगर हम विकल्‍प चुनने के लिए आजाद नहीं है तो क्‍या हम छद्म विकल्‍पों का चुनाव कर रहे हैं। mmm

प्रिय गूगल, जन्‍मदिन की बधाई

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प्रिय गूगल, जन्‍मदिन की ढे़रों बधाइयां और उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए शुभकामनाएं। इस बार तुम चौदह साल के हो चुके हो। यकीन नहीं होता कि जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सबकुछ जानता है, वह महज चौदह साल का ही है। वास्‍तव में देखा जाए तो यह तुम्‍हारा कम और दुनिया में पिछली सदी में शुरू हुई सूचना क्रांति का चमत्‍कार अधिक नजर आता है। तुम्‍हारी ख़ासियत यही रही कि तुमने उस क्रांति के परों पर सवार होने में कतई देरी नहीं की। कम्‍प्‍यूटर युग का पहला चरण पूरा होने तक तुमने समझ लिया था कि ठीक है लोगों के हाथ में कम्‍प्‍यूटर तो आ गए, लेकिन इसका उपयोग किस तरह होगा। तुमने अपनी पूरी ताकत इस काम में लगा दी कि दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो रहा हो, उसे संबंधित यूजर तक किसी भी सूरत में पहुंचा दिया जाए। यह कहते हुए खुशी हो रही है कि तुम इसमें सफल भी रहे हो, हालांकि सुधार की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है, फिर भी श्रेष्‍ठ और सर्वश्रेष्‍ठ के अलंकरण उत्‍साह तो बढ़ाते ही हैं।
मेरा तुमसे परिचय 2002 में हुआ। यानी तब तक तुम भी चार साल के हो चुके थे। इसके बाद 2006 में पहली बार मैंने जीमेल खाता बनाया (देखा कितना पुराना साथी हूं तुम्‍हारा), इसके बाद तुमने एक के बाद एक कई एप्‍लीकेशन दी। मैंने तकरीबन हर एप्‍लीकेशन को इस्‍तेमाल करने का प्रयास करता रहा। एक दौर ऐसा भी था जब मैं तुम्‍हारी 31 एप्‍लीकेशंस का तेजी से उपयोग कर रहा था। इस बीच तुम्‍हारे कुछ प्रोजेक्‍ट फेल भी हुए। मसलन बज्‍ज और वेव। इन दोनों में मुझे संभावना दिखाई दे रही थी। भले ही बज्‍ज फेसबुक के बाद आया था, लेकिन तुमने तेजी से अपनी जगह बनाई। भले ही दुनियाभर में फेसबुक तेजी से फैल रहा था, लेकिन भारत में बज्‍ज के दीवाने भी थे। अधिकांश तो ब्‍लॉगर ही दिखाई देते थे।
और हां, ब्‍लॉग, इसने तो मुझे अपने अंदाज में लिखना तक सिखा दिया। पत्रकारिता की नौकरी मुझे बंधी बंधाई लीक पर लिखने के लिए बाध्‍य कर रही थी, तब तुमने मुझे अलग अंदाज से सोचने और लिखने के लिए उत्‍साहित किया। इसका नतीजा यह हुआ कि मेरे लिखने की खुद की शैली बनी। इसका मुझे अपने संस्‍थान में भी फायदा मिला। तुम्‍हारी सफलताओं के लिए तुम्‍हें ढेरों बधाइयां, लेकिन साथ ही कुछ नसीहत भी, ठीक वैसी ही जैसी स्‍पाइडरमैन के अंकल कहते थे “ताकत बढ़ने के साथ जिम्‍मेदारियां भी बढ़ती हैं”। तुम्‍हारे ऊपर भी समय के साथ जिम्‍मेदारियों का बोझ बढ़ रहा है। अब तक जिस बखूबी के साथ इसे निभा रहे हो, उम्‍मीद करता हूं कि भविष्‍य में भी ऐसे ही तटस्‍थ और सक्रिय रहोगे।
गूगल प्‍लस के संबंध में एक सलाह भी, अगर तुम्‍हारे शीर्ष अधिकारियों तक पहुंचे तो, गूगल प्‍लस सेवा फेसबुक से बेहतर साबित हो सकती है, अगर इसके पेज तनिक तेजी से लोड हो। पता नहीं क्‍यों गूगल प्‍लस पर अधिकांश लोग जीआईएफ इमेजेज लगातार लोड करते रहते हैं। एक से दो एमबी की चार या पांच इमेज भी स्‍ट्रीम में होने पर गूगल प्‍लस के खुलने की रफ्तार बैलगाड़ी से मुकाबला करने लगती है। ऐसे में मैं प्‍लस को छोड़कर फिर से फेसबुक पर जा बैठता हूं। उम्‍मीद है इस ओर ध्‍यान दोगे तो स्‍ट्रीम लोड होने की समस्‍या का समाधान होगा और खीज कम होने पर अधिक लोग इस ओर भी आ पाएंगे।
तुम्‍हारे बेहतर भविष्‍य की उम्‍मीद के साथ
पुराना यूजर
सिद्धार्थ जोशी
बीकानेर

रविवार, 23 सितंबर 2012

‘विश्‍वास का चमत्‍कार’

हवाई द्वीप के एक मनोचिकित्‍सक डॉ. ह्यू लिन ने अपने देश के सबसे कठिन मनोरोगियों को बिना उनसे मिले उन्‍हें ठीक कर दिया। आप और हम भले ही इसे चमत्‍कार मान लें, लेकिन इस चिकित्‍सक ने अपनी दिनचर्या में इस चमत्‍कार को शामिल कर रखा है। कुछ साल पहले इस चिकित्‍सक की पहली नियुक्ति देश के ऐसे मनोचिकित्‍सालय में हुई, जहां मनोरोग के सबसे विकट मामले भेजे जाते थे। डॉ. ह्यू लिन ने सोचा कि उन्‍हें यहां भेजा गया है तो इसमें जरूर ईश्‍वर का कोई न्‍याय रहा होगा। उन्‍होंने यह मानते हुए कि इन सभी मरीजों का चिकित्‍सक से कोई न कोई संबंध जरूर रहा है। इस जीवन में न सही पिछले किसी जन्‍म में हुए संबंध की वजह से आज वे साथ हैं। एक मरीज से रूप में तो दूसरा चिकित्‍सक के रूप में। यहीं से इलाज की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। 

जब चिकित्‍सक अस्‍पताल में आए तो वहां के मरीजों से न केवल अस्‍पताल का स्‍टाफ बल्कि चिकित्‍सक भी डरते थे। जंजीरों में जकड़े होने के बावजूद इन मरीजों के करीब जाना भी खतरनाक था। यहां ड्यूटी इतनी कठिन थी कि अस्‍पताल के स्‍टाफ को महीने दो महीने के बाद बदल दिया जाता था, ताकि ड्यूटी कर रहे कार्मिकों का मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य न बिगड़ जाए। इसी के साथ चिकित्‍सक की एक नई यात्रा शुरू हुई मानसिक संदेशों के आदान-प्रदान के रूप में। उन्‍होंने एक एक मरीज की फाइल को पढ़ना शुरू किया। हर केस को पढ़ने के दौरान उन्‍होंने दो मानसिक संदेश हर मरीज तक पहुंचाने का प्रयास किया। 

‘मुझे खेद है,’ ‘मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं’ डॉ. ह्यू लिन इसे ‘खुद की सफाई’ की पद्धति बताते हैं। वे इसे ‘हो’ओपोनोपोनो’’ कहते हैं। आश्‍चर्य की बात यह है कि मरीजों पर धीरे धीरे इसका असर दिखाई देने लगा। एक समय के बाद खतरनाक मरीज शांत होने लगे। अब स्‍टाफ भी नियमित काम करने लगा। जो मरीज हल्‍के मनोरोग से पीडि़त थे, वे ठीक होकर घर लौटने लगे, फिर अधिक गंभीर मरीजों में भी तेजी से सुधार शुरू हुआ। आखिर एक दिन खतरनाक स्‍तर के मनोरोगियों का वार्ड पूरी तरह खाली हो चुका था। आज डॉ. ह्यू लिन दुनियाभर में मरीजों को दुरुस्‍त करते हैं। उन्‍होंने अपने अनुभवों को अपनी पुस्‍तक ‘द जीरो लिमिट’ में सहेजा है। इसमें उन्‍होंने स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है कि दुनिया जैसी है वह हमारे भीतर का ही प्रतिबिंब है। भले ही आज हम उस प्रतिबिंब के कारणों को न जानतें हों, लेकिन इसी जन्‍म का भूतकाल अथवा पूर्वजन्‍म का बंधन इन बिंबों को पैदा करता है। भारतीय दर्शन भी सृष्टि में मौजूद हर जीव के आपसी संबंध को मानता है। हम जैसी दुनिया को देखते हैं, वह बाहरी दुनिया नहीं होती, बल्कि हमारे भीतर हमारे द्वारा बनाई गई दुनिया का प्रतिबिंब मात्र है। 

कुछ साल पहले ब्राजील के लेखक पॉल कोएलो ने इसी बात को अपने प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘द एल्‍केमिस्‍ट’ में इस तर्ज में कहा था कि ‘जिस चीज को तुम पूरी शिद्दत से चाहते हो, पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की साजिश करती है।’ इस कहानी में स्‍पेन का एक गडरिया अपने सपने पर विश्‍वास कर उसका पीछा करना शुरू करता है और आखिर में अपने भाग्‍य को पाता है। केवल एक विश्‍वास ही होता है जो सामान्‍य गडरिए को एल्‍केमिस्‍ट यानी अन्‍य धातुओं से सोना बनाने वाला कीमियागर बना देता है। 

इस कहानी से सालों पहले परमहंस योगानन्‍द ने अपनी जीवनी में मन के विश्‍वास और उससे उपजने वाले चमत्‍कारों के बारे में अपनी जीवनी ‘योगी कथामृत’ में जानकारी दी। खण्‍डों में विभक्‍त आत्‍मकथा में ऐसे कई उद्धरण हैं। मसलन एक बार योगानन्‍द अपनी बहिनों को छत पर देखते हैं जो कटी हुई पतंगों को हसरत भरी निगाहों से देख रही होती हैं। छत नीची होने के कारण योगानन्‍द के घर में एक भी पतंग नहीं आ रही होती है। योगानन्‍द विश्‍वास के आधार पर वातावरण में ऐसा परिवर्तन लाते हैं कि ऊंचाई पर उड़ रही पतंग अचानक हवा बंद होने के कारण गोता लगाती है और सीधे उनके घर में आ गिरती है। देखने में यह छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन किसी कटी पतंग की ओर इशारा कर उसे अपनी ओर बुला लेने का अर्थ पूरे माहौल पर कब्‍जा करना है। 

एक ओर हमारा हमारा अंतर्मन यह जानता है कि पूरी सृष्टि का संतुलन कैसे चल रहा है। किसी मामले में यह हमारी लय को सृष्टि की लय के साथ मिला देता है तो दूसरी ओर मन ही है जो प्रकृति के संतुलन को अपनी इच्‍छा के अनुसार मोड सकता है। हो सकता है कि इससे प्रकृति का संतुलन एक नई व्‍यवस्‍था की ओर मुड़ जाए, लेकिन अंतत: संतुलन बना रहता है। जो लोग इस संतुलन को जानते हैं और सृष्टि की परम लय के साथ खुद को जोड़कर चलते हैं, उन्‍हें भाग्‍यशाली कहा जाता है। दूसरी ओर इस संतुलन से परे रहने वाले लोग जीवन के उस रस से लगातार वंचित रहते हैं जिसके वे हकदार हो सकते हैं। हमारे दिमाग में हर तथ्‍य के सकारात्‍मक और नकारात्‍मक पहलू साथ साथ चलते हैं। जब सकारात्‍मक पक्ष हावी रहता है तो हमें तेजी से सफलताएं मिलती हैं और नकारात्‍मक पहलू के हावी रहने पर विफलता निश्चित हो जाती है। सफल होने वाले लोगों में इस सकारात्‍मक दृष्टिकोण को सहज रूप से देखा जा सकता है। वे कहते हैं मुझे नहीं पता कि इस काम में सफलता कैसे मिलेगी, लेकिन मेरा मन कह रहा है कि मैं सफल रहूंगा। कहा जा सकता है कि अगर किसी इंसान को भाग्‍यशाली बनना है तो उसे पहले खुद पर विश्‍वास करना होगा, इसके बाद अपने विश्‍वास पर अडिग रहना होगा। या तो वह सृष्टि की परम लय के साथ खुद को जोड़ पाने में सफल होगा, या लय को बदलने की क्षमता हासिल कर लेगा।

यह लेख राजस्‍थान पत्रिका में 23 सितम्‍बर को छपा है

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

समान्‍तर सत्ताएं...

मुझे लगता है कि देश और काल से परे तीन तरह की सत्ताएं समान्‍तर रूप से सक्रिय हैं। हो सकता है कि मैं समय के फलक पर उड़ती हुई चील नहीं हूं, लेकिन फिर भी निरपेक्ष रहने का प्रयत्‍न करते हुए मुझे लगता है कि धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं साथ साथ चलते हुए एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाए रखती हैं और एक दूसरे को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।

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धार्मिक - यहां धर्म गीता में वर्णित कर्म ही धर्म नहीं बल्कि वर्तमान दौर में अपनी पूर्व स्‍थापित मान्‍यताओं के साथ जड़ हुए संप्रदाय हैं। इसमें हिन्‍दू, मुस्लिम, इसाई सहित सभी संप्रदायों को शामिल किया जा सकता है। इस सत्‍ता से जुड़े लोग अपनी मान्‍यताओं के साथ इतनी शिद्दत से जुड़े हैं कि इन्‍हें हर समस्‍या का समाधान धर्म में ही नजर आता है। इस कोण में न तो अर्थ का कोई महत्‍व है और न ही राजनीति का। यहां आकर आर्थिक और राजनीतिक की रेखाएं धूमिल होने लगती है।

आर्थिक - इसमें पैसे को ही सबकुछ मानने वाले लोग हैं। वे लोग नहीं जो कहते हैं कि अर्थ का अपना महत्‍व है। इसमें वे लोग हैं जो कहते हैं कि पैसे से सबकुछ किया जा सकता है। उनके लिए धन ही धर्म  है और धन से जुड़ी ही की राजनीति करते हैं। धर्म अथवा राजनीति के समीकरण यहां आकर धुंधले हो जाते हैं। अलग अलग क्षेत्रों, समुदायों, धर्म और शक्तियों से आए लोग यहां केवल धन कमाने और उसे बढ़ाने के लिए एक हो जाते हैं, दूसरे कारण उन्‍हें किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं कर पाते।

राजनीति - यह जनता के समर्थन का दावा कर, संसाधनों पर काबिज होने, उनके व्‍यवस्थित करने और प्राप्‍त हुए पदों के जरिए राज्‍य को चलाने वाली सत्‍ता है। ये लोग अपनी सत्‍ता को बचाए रखने के लिए धन और धर्म का जमकर उपयोग या दुरुपयोग करते हैं।

(इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जो सुविधा को सिद्धांत बनाए हुए हैं। धन के लिए काम करते हैं, लेकिन मौका मिलने पर लाभ भी छोड़ देते हैं, या फिर धार्मिक काम करते हैं, लेकिन पैसे लिए कुछ समय के लिए धर्म (संप्रदाय) के नियम सिद्धांतों को ताक पर रख देते हैं।)

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जब मैं इनमें से किसी एक प्रकार की सत्ता के करीब रह रहे, या उसके बारे में सोच रहे लोगों से मिलता हूं तो उनके सभी तर्क, सभी संभावनाएं और आशंकाएं उसी सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। उन्‍हें दूसरा पक्ष बताने का प्रयास करता हूं तो वे उसे सिरे से खारिज कर देते हैं। उदाहरण के लिए धार्मिक सत्ता से प्रभावित लोगों को उनका धर्मगुरु आदेश देते हैं कि फलां जगह धर्मशाला और कुछ सुविधाएं बना दो। लोग धन अथवा राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना अपने गुरु की इच्‍छा को पूरा करते हैं। इसी तरह आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं अपना प्रभाव व्‍यक्‍त करती हैं। हर सत्‍ता के अपने नियम और पद्धतियां हैं। इनका अनुसरण किए बिना क्षेत्र में आपके आगे बढ़ने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। तीनों ही क्षेत्र अपने नियमों और सिद्धांतों को लेकर इतने कट्टर हैं कि “गलती की सजा मौत” के रूप में सामने आती है। राजनीति में इसे पॉलीटिकल एसेसिन कहते हैं तो धर्म में इसे धर्मच्‍युत कहा जा सकता है, धन के क्षेत्र में दीवालिया या बर्बाद जैसे शब्‍द आम हैं।

दूसरे संसाधन दूसरे दर्ज पर

धर्म, राजनीत और धन की सत्‍ताओं में से किसी एक सत्‍ता का चरम भले ही दूसरे संसाधनों को आसानी से उपलब्‍ध करा देता है, इसके बावजूद इन्‍हें साधने वाले साधक को दूसरे संसाधनों को हमेशा ही दूसरे दर्जे पर रखना पड़ता है। इसका परिणाम यह दिखाई देता है कि धर्म गुरु के पास अकूत संपदा होते हुए भी वह उसका वैसा उपयोग नहीं कर पाता, जैसा कि एक व्‍यवसायी कर सकता है, इसी तरह एक राजनीतिज्ञ को धर्म का ज्ञान और धंधे की समझ होने के बावजूद उसे कम ज्ञानी साधकों के सामने झुकना पड़ता है और लाभ के अवसर जानते हुए भी छोड़ने पड़ते हैं। कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि देश के शंकराचार्यों और अन्‍य धर्मगुरुओं के पास आज की तारीख में लाखों करोड़ रुपए की संपत्तियां और धन है, लेकिन वे इसका कोई उपयोग नहीं करते, इसी तरह कई राजनीतिज्ञों को धर्म के बारे में विशिष्‍ट जानकारियां हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में इनका कोई उपयोग नहीं है। किसी व्‍यवसायी या बाजार पर राज कर रहे धन के उपासक को ज्ञान और राजनीति की समझ होने के बावजूद वह अपने क्षेत्र तक सीमित रहता है, ताकि उसका बाजार प्रभावित न हो। इसके बावजूद एक सत्‍ता का दूसरी सत्‍ता का प्रभावित करने का खेल जारी रहता है। न तो राजनीति में ऐसे लोगों की कमी है जो धर्म का ध्‍वज उठाए रखते हैं और न धार्मिक सत्‍ता वोटों को प्रभावित करने से चूकती है। इसी तरह बाजार अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए राजनीतिक पार्टियों और धर्म के ठेकेदारों को अपने प्रभाव में रखने का प्रयास करता है।

सत्‍ताओं के बीच विचरण

एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता की ओर गमन के लिए हमेशा ही प्रयास जारी रहते हैं। कुछ लोग इनमें जबरदस्‍त सफलता अर्जित करते हैं तो कुछ औंधे मुंह गिरते हैं। किसी जमाने में इंग्‍लैण्‍ड के हाउस ऑफ कॉमंस में केवल धनिकों को ही जगह मिल पाती थी, वहीं चीन और रूस में धर्म के प्रभाव को खत्‍म करने के बाद एक नया धर्म पेश किया गया कार्ल मार्क्‍स का, उससे सत्‍ताएं केन्‍द्र में आई। कई देशों में आज भी धर्म की सत्‍ता का प्रभाव राजनीति और धन दोनों को बुरी तरह प्रभावित रखता है। भारत के इतिहास में भी ऐसे प्रकरण देखने को मिलते हैं। हालांकि तीनों को अलग अलग रखने के लिए स्‍पष्‍ट नीतियां और सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, लेकिन समय बदलने के साथ ही इन सिद्धांतों का अतिक्रमण होता है और सत्‍ताएं एक-दूसरे का अतिक्रमण कर जाती हैं। आजादी के बाद पहली पॉलीटिकल पार्टी कांग्रेस ने धर्म को राजनीति से दूर रखा और देश के विकास के लिए धन को शरण दी। लाइसेंस राज स्‍थापित किए गए और कुछ विशिष्‍ट लोगों को अधिकांश सुविधाएं मिली। बाद में जब भाजपा ने धर्म का ध्‍वज बुलंद किया तो देश की जनता ने उन्‍हें भी केन्‍द्र में ला बैठाया। फिर उदारणीकरण के बाद बाजार हावी हुआ तो धर्म की उपादेयता कम नजर आने लगी। ऐसे में भाजपा सत्‍ता से बाहर हो गई और पिछले नौ साल से कांग्रेस फिर केन्‍द्र में है। भले ही आम जनता कांग्रेस की नीतियों से सहमत न हो, लेकिन भाजपा भी विकल्‍प के रूप से अब तक खुद को स्‍थापित नहीं कर पा रही है। प्रचलित धर्मों और धन की सत्‍ता का नैसर्गिक विरोध करने वाले कॉमरेड भी लगभग हाशिए तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में धन के साथ चल रहे धर्म और राजनीति को आज हर कहीं प्रश्रय मिल रहा है।

विचरण का श्रेष्‍ठ उदाहरण

लेख के आखिर में बाबा रामदेव का नाम लेने से कहीं ऐसा न माना जाए कि यह पूरी पोस्‍ट बाबा रामदेव को केन्द्रित करके लिखी गई है। इसके बावजूद एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण का कोई श्रेष्‍ठ उदाहरण है तो आज के दौर में बाबा रामदेव है। बाबा रामदेव ने धर्म के जरिए धन के क्षेत्र में प्रवेश किया। आम जनता को धर्म की बातें बताई, योग कराया, स्‍वस्‍थ रहने की अपील की और भगवा धारण किए रखा। उनकी दवा कंपनियां और एफएमसीजी प्रॉडक्‍ट आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्‍ता उत्‍पाद बनाने वाली कंपनी हिंदुस्‍तान लीवर लिमिटेड तक को धक्‍का पहुंचा रहे हैं। हजारों करोड़ का साम्राज्‍य खड़ा करने के बाद अब रामदेव दूसरा अतिक्रमण राजनीति में करने का प्रयास कर रहे हैं। दीगर बात यह है कि धर्म और धन को साधने के बाद राजनीति को साधने के लिए उन्‍होंने लगभग सभी प्रचलित मान्‍यताओं को ताक पर रख दिया है। भले ही वे राजनीति में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं, लेकिन केवल धर्म का झंडा या धन की ताकत हाथ में रखकर दूर से प्रभावित करने के बजाय उन्‍होंने सीधे राजनीति क्षेत्र में उतरकर सिद्ध कर दिया है कि विचरण संभव है।

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ऐसे में दूसरे लोगों के लिए भी संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं कि किसी एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण किया जा सकता है। आज भले ही यह इतना आसान न लगे, लेकिन आने वाले दिनों में हमारे देश में इन सत्‍ताओं के बीच की रेखाएं और अधिक धूमिल होने की संभावनाएं बन रही हैं।