बुधवार, 25 दिसंबर 2013

Social Network Vs Blogging


वर्ष 2006 में पहली बार ब्‍लॉग (Blog) को देखा और वर्ष 2007 में तो इसकी सवारी ही शुरू कर दी। उन दिनों ऑनलाइन लेखन (Online writing) और आज के ऑनलाइन लेखन में दिन रात का अंतर आ गया है। हालांकि पोस्‍ट करने और तुरंत टिप्‍पणियां (Comments) पाने की लालसा और बलवती ही हुई है, लेकिन पहले जितना सटीकता से लिखा जा रहा था, उतनी सटीकता अब नहीं आ पा रही है। कारण स्‍पष्‍ट है कि अब न तो वैसा आराम है न इंतजार। 

ब्‍लॉग की यह खूबसूरत कमी रही है कि हर बार लिखने से पहले सोचने और फिर उसे एडिट (Edit) करने के लिए हमेशा पर्याप्‍त समय रहा। लिखने की जल्‍दबाजी भी नहीं रही। जो लिख दिया, वह तुरंत लोगों की नजर में नहीं आया तो उसे सुधारने या डिलीट तक कर देने के विकल्‍प हमेशा हाथ में रहे। वहीं सोशल मीडिया (Social) में और खासतौर से कहूं तो फेसबुक (Facebook) पर एक बार विचार पोस्‍ट कर देने के बाद डिलीट करने की फुर्सत तक नहीं मिल पाती और लाइक (Like) व कमेंट का दौर शुरू हो जाता है। फिर सोचते हैं यार इतने लोगों ने तो देख लिया अब डिलीट करने से क्‍या फायदा। 

दूसरी तरफ फेसबुक लेखन ने लेखों की लंबाई को लील लिया है। एक विचार पकने से पहले परोसा जाने लगा है। इसका नतीजा कई बार तो यह भी हो रहा है कि मैं सोच कुछ रहा हूं, लिख कुछ रहा हूं और सर्किल में मौजूद लोग उसका अर्थ कुछ और ही लगा रहे हैं। परिणाम यह होता है कि विचार की भ्रूण हत्‍या (Abortion) ही हो जाती है। अब तेज माध्‍यम विचार करने की प्रवृत्ति को उकसाता है, लेकिन विचारों की इस प्रकार की अकाल मृत्‍यु कई बार क्षुब्‍ध कर देती है। 

ब्‍लॉगिंग के शुरूआती दिनों में एक माह में कुल मिलाकर ही तीन या चार पोस्‍ट से ऊपर मेरा आंकड़ा कभी नहीं गया, लेकिन फेसबुक पर तो रोजाना तीन से चार पोस्‍टें हो रही हैं। कई बार मैं खुद को रोकने का प्रयास करता हूं। सोचता हूं कुछ ठहरकर पहले विचार को पक लेने दिया जाए, लेकिन फिर केवल कौतुहल से ही विचार पोस्‍ट होता है कि देखें लोग इस मुद्दे पर क्‍या सोच रहे हैं। नतीजा यह होता है कि पोस्‍ट का ही कबाड़ा हो जाता है। 

सोशल नेटवर्क की एक खूबसूरती यह है कि यह आपको जनता से बीच अधिक से अधिक परोसे जाने का विकल्‍प पेश कर रहा है लेकिन कमी यह है कि चाहने पर भी आप न तो अपनी पूरी बात लिख सकते हैं न लोगों के पास लंबे ख्‍याल पढ़ने का वक्‍त है। 

ब्‍लॉग के जमाने में ब्‍लॉग अखबारों (Newspapers) के रूप में ब्‍लॉगवाणी (Blogvani) और चिठठाजगत (Chitthajagat) ने हम जैसे कई नौसिखियों को पनाह दे रखी थी। हम कुछ भी पोस्‍ट करते, दो या तीन हजार लोगों के समूह तक वह बात पहुंच जाती थी। इसके चलते दूसरे लेखकों और पाठकों के मिलने का सिलसिला बना रहा। इन दोनों ब्‍लॉग एग्रेगेटरों के बंद हो जाने के बाद तो लगा कि अब यहा समय किसके सहारे व्‍यतीत किया जा सकता है। सो आंशिक पलायन कर गए। 

यहां आंशिक इसलिए कहा क्‍योंकि पिछले तीन साल से फेसबुक पर अतिसक्रिय रहने के बावजूद अब तक न तो ब्‍लॉग का प्रेम कम हो पाया है न ही यहां लिखने की चाह खत्‍म हुई है। अब भी जब तक कुछ ऐसा लिखना होता है, जिसे मैं अर्से बाद फिर से देखना चाहूं, तो यहां लिखने चला आता हूं।

देखता हूं कि फेसबुक पर मेरे ही लिखे लेख कालपात्र में समाते जा रहे हैं। सक्रियता में कुछ कमी हुई नहीं कि लोग भूलने लगते हैं। पहले जहां एक पोस्‍ट को मुश्किल से 100 पाठक मिल पाते थे, वहीं अब हर फेसबुक स्‍टेटस (status) को दो से तीन सौ लोग पढ़ रहे हैं। 

फेसबुक प्रोफाइल (profile) पर इसका पता नहीं लगता, लेकिन फेसबुक पेज तो आपको बता देता है कि इतने लोगों की नजर से आपका लेख अब तक निकल चुका है। अब पाठक किसे नहीं चाहिए। समस्‍या तो तब है जब लिखने का अनुशासन आने से पहले पाठक आपसे रूबरू होना शुरू हो जाएं। 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

being human with Tablet #Better Way

With enlargement of mobiles and reducing size of laptops i already imagine a solution about 7 to 10 inch device. One fine day i search online and find tablet. Its a old story but not end here. As a group of advance computer application yser we discuss about a perfect tab. 

what should a perfect tab must have? It includ screen resolution, grip, style, storage space, ram, gpu, battery capacity and web connectivity. 

So, after a long discussion and time spent we find some special requirements. Here they are

It's a 7 to 9 inch tablet : What we want to purchase.
1. 3G network OR it may compromise with WiFi
2. Screen resolution must be higher than 768 * 976
3. screen density more than 160 dpi 
4. RAM not less than one GB if we find two GB, it will be better
5. internal storage at least 2 GB
6. Processor should be Quad core or Octa Core (as industry moving into it)
7. Battery capacity must be 6000 mAh, if tab size will enlarge to 9 inch than battery capacity must be 7600 mAh
8. clock speed must be higher than 1.5 GHz
9. All major sensors must be installed. ie axis, compass, light, proximity etc.
10. and last the system must have its Stand. 

Although we look for a complete solution for removing laptop completely from the scene and get a shorter device. but we fond several tabs with lot of accessories. Like tab case, keyboard, mouse, speaker and gadgets surrounds us again. 

Now its a better way if we can found a tablet with stand. so we do not have to carry another case for same work.

As an astrologer i want a handy device which have all qualities but less space. When we are at Jataka's home, I am not feel easy to ask them for a charger or a separate table or other supportive gadgets.  All i imagine that go to the spot analyze, use my tool and tell them what to do.  

Some solution i found in my tiny tablet called Vido mini one. it's a Chinese model. I arrange it through a Chinese connection. But it has its own problem like
No Guarantee
No back support
No software support
No additional gadget support
No battery replacement
No upgraded kernel versions etc. 

NOW i search for a human solution for this advance gadget. Hope i will find one. 

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

जन‍प्रतिनिधियों से गलत उम्‍मीदें

कई बार व्‍यवस्‍था को दोष देने का जी करता है, लेकिन जब समस्‍या की तह तक जाने का प्रयास करता हूं और एक पत्रकार के रूप में समाज को देखता हूं तो पाता हूं कि समस्‍याएं कहीं नहीं है, बस जो इच्‍छा का नहीं है वही हो रहा है। उसे समस्‍या का रूप दिया जा रहा है। हो तो वही रहा है जिसकी हम कोशिश कर रहे हैं।

इन दिनों लोकतंत्र का उत्‍सव अपने परवान पर है। भारत को आजाद हुए आधी सदी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन राजतंत्र की उस गुलामियों से हम अब तक आजाद नहीं हो पाए हैं। राजतंत्र में आम जनता पर शासन के लिए शासकों ने राजा में ईश्‍वरीय गुण और संप्रभुता होने का दावा किया और लोगों ने सहजता से उसे मान भी लिया। वहीं लोकतंत्र में एक सरकार बना दी गई, और शासन करने वालों ने मनमर्जी के कानून बनाकर फिर से जनता पर शासन करना शुरू कर दिया। 

दिखाई देने के लिए भले ही हमने ताकत के सूत्रों को बदल दिया है, लेकिन हकीकत देखी जाए तो हम आज भी वहीं हैं। बस शासन करने वाले लोगों के चेहरे बदल गए हैं। इसके लिए हम क्‍यों जिम्‍मेदार हैं, इसका कारण उन असक्षम लोगों में दिखाई देता है, जो काबिल न होते हुए भी काबिल लोगों का हक मारने का प्रयास कर रहे हैं। 

समाज के निर्माण भले ही सुरक्षा के लिए हुआ, लेकिन राज्‍य का विकास अतिरिक्‍त उत्‍पादन को हड़पने के‍ लिए ही हुआ। अब इस राज्‍य को जो भी चलाए, नतीजा वही होगा कि जो अतिरिक्‍त उत्‍पादन होगा, उसे हड़पने के लिए कुछ ताकतें लगातार काम करती रहेंगी। 

चुनावों के दौरान देखता हूं कि लोग अपने नेता का चुनाव कभी अपनी जाति के आधार पर कर रहे हैं तो कभी क्षेत्रीय प्रभुत्‍व के आधार पर। आज नेता बड़ी गाड़ी में बैठकर आता है और दुपहिया वाहन खरीदने तक की हैसियत नहीं रखने वाले लोगों को सपने दिखाकर उन्‍हें लूटने का षड़यंत्र शुरू करता है। हर बार इसका एक नया रूप होता है। पिछले सूत्र फेल होते हैं तो नए सूत्र गढ़ लिए जाते हैं। जनता लालच के भरोसे फिर नेता के पीछे पीछे हो लेती है। 

मैं सोचता हूं यह अनंत काल तक चलेगा, जब तक राज्‍य रहेगा, सत्‍ता रहेगी, संप्रभुता रहेगी, तब तक ऐसा ही चलेगा। सत्‍ता से ऐसी उम्‍मीद करना कि वह जनता के लिए काम करेगी एक मूर्खता है। जब हमने चुनाव ही ऐसे लोगों को किया है जो किसी समूह विशेष के स्‍वार्थ साधने का काम करेंगे तो ऐसे लोगों से सर्वजन हिताय की कैसे उम्‍मीद की जा सकती है।

शनिवार, 21 सितंबर 2013

एथिकल फिशिंग : ऑनलाइन कमाई का तरीका

मैं आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। 



एथिकल फिशिंग


यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं। 

इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया। 

अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें। 

अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। हर बार नया लेख कुछ नए लोगों को आप तक लेकर आता है। ऐसे में अगर आपके ब्‍लॉग पर ईमानदार कंटेंट पड़ा हो तो वह आपकी ओर सहजता से आकर्षित होता है। यह आकर्षण समय के साथ बढ़ा और लोगों के ज्‍योतिष संबंधी जिज्ञासाओं के सवाल सामने आने लगे। 


फांसना और कमाना... 


जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। पत्रकारिता की नौकरी के दौरान इतने पैसे मिलते रहे कि मैंने इस माध्‍यम से कमाने की नहीं सोची। हां, गूगल एडसेंस से कमाने का प्रयास किया, लेकिन यह पेसिव मोड था, सीधे लोगों से पैसे लेने का खयाल ही नहीं आया कभी। हालांकि कुछ लोग फीस ऑफर कर रहे थे, लेकिन मैं उदारतावश मना करता रहा। एक दिन पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है। लोग पहले भी ऐसे पांखडियों के पास जाते रहे हैं और आज भी इनका धंधा पूरी रवानी पर है। इस धंधे में कमाई का सबसे बड़ा जरिया डर है। आपको भविष्‍य के बारे में ऐसी सूचनाएं दी जाती हैं कि आपकी घिग्‍गी बंध जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि महंगे अस्‍पताल में ईलाज के लिए होने वाले खर्च से अधिक लोग ज्‍योतिषी द्वारा बताए गए उपचार में खर्च कर देते हैं। मैं इस चीज को समझता हूं। सो मैंने अपने लेखों के माध्‍यम से इस डर को खत्‍म करने का प्रयास किया। इसी प्रयास का परिणाम है कि आज कालसर्प जैसे योग को नकारना बहुत से ज्‍योतिषियों के लिए आसान हो गया है। 

जब एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है। 

यह बताते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं कि कई जातक ऐसे भी हैं जो वर्ष 2008 में मेरे नि:शुल्‍क विश्‍लेषण लेने वाले जातक थे, जो बाद में आग्रह करके फीस जमा कराने वाले जातक बने। अप्रेल 2011 में मैं इस क्षेत्र में जब प्रोफेशनली आया तो पहले ही खेप में 112 कुण्‍डलियां आई। मैं आल्‍हादित था। लोगों ने विश्‍वास दिला दिया था कि मैं सर्वाइव कर जाउंगा। आज तक उन लोगों से नियमित संपर्क में हूं। कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ अब भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया, विश्‍वास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली।


मैंने यह लेख वर्धा में हो रहे ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया और शायद हिंदी के आयाम को लेकर हो रही गोष्‍ठी के लिए लिखा था। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठीजी ने जिन लोगों को इसमें आमंत्रण के लिए याद किया, उनमें एक मेरा नाम भी था। भले ही मैं एकबारगी जाने के मूड में नहीं था, क्‍योंकि यह औचक था, सो मैंने एक वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर से इस बारे में बात की। उन्‍होंने कहा तुम्‍हें जरूर जाना चाहिए, ताकि तुम्‍हारा एक्‍सपोजर हो। ठीक है मैंने ऊपर दिया गया लेख लिखा और सिद्धार्थ शंकरजी को भेज दिया। उनका जवाब आया... 

मित्र,
आपने लिखा तो कमाल का है। बहुत उपयोगी बात है। लेकिन यह सेमिनार जिन मुद्दों को लेकर आयोजित है उनमें यह फिट नहीं बैठता। आप एक बार सेमिनार की रूपरेखा फिर से देख लीजिए। http://t.co/IEAqRZwZ6F निर्धारित विषयों में से एक चुनकर कुछ लिख डालिए। जल्दी करिए। समय बहुत कम बचा है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

मैंने लेख को सुधारा और कमोबेश उन्‍हीं बातों को रहने देकर ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया को जोड़ दिया... 

मैं  आप लोगों के समक्ष केवल वही बता सकता हूं जो मेरा ठोस अनुभव है। इतना जरूर है कि मैं जो बताने जा रहा हूं वह बहु प्रतीक्षित है, यानी ऑनलाइन माध्‍यम से कमाई का तरीका। इसमें एक छोर पर ब्‍लॉगिंग है तो दूसरे छोर पर फेसबुक। मेरी बात वजन इसलिए भी रखती है कि मैंने पत्रकारिता की जमी जमाई नौकरी छोड़ी और अब इस माध्‍यम से कमा रहा हूं। दो साल से सर्वाइव भी कर रहा हूं और मेरी कमाई में नियमित बढ़ोतरी भी हो रही है। हो सकता है आप भी मेरी बात से कुछ सीख पाएं और ऑनलाइन कमाई करना शुरू कर दें। यहां ब्‍लॉगिंग ने मेरे विचारों को मेरे जातकों तक मेरी बात पहुंचाने का काम किया तो फेसबुक ने मेरे अस्तित्‍व की पुष्टि की। हां ट्विटर मेरी अधिक मदद नहीं कर पाया है।
एथिकल फिशिंग
यह शब्‍द मैंने अपने स्‍तर पर गढ़ने का प्रयास किया है। इंटरनेट ऐसा स्‍थान है, जहां आपको पूरी दुनिया मिलती है, इसके बावजूद आप अपनी कल्‍पना और अपनी क्षमताओं के घेरे में ही रह पाते हैं। संभावनाओं के द्वार उतने ही खुल पाते हैं जितनी आपकी क्षमता है। यह जरूर है कि आप अपनी कल्‍पना शक्ति और क्षमता का इस्‍तेमाल कर मनचाहे तरीके से इस पर अपनी पकड़ और पहुंच बना सकते हैं। इंटरनेट पर शुरूआत भले ही जिज्ञासा से रही हो, लेकिन जल्‍द ही ब्‍लॉगिंग की पकड़ में आ गया था। अगर मेरी शुरूआती पोस्‍टों को देखा जाए तो मैं वहां आपको ज्ञान मुद्रा में दिखाई दूंगा, लेकिन जल्‍द ही यह बात समझ में आ गई कि अपने अपने क्षेत्रों के महाज्ञानी यहां बैठे हैं और सार्थक चिंतन पेश कर रहे हैं। सो एक बारगी कुछ समय के लिए खामोशी से देखता और समझता रहा। एक समय के बाद मुझे लगा कि इंटरनेट पर अगर मुझे कुछ परोसना है तो वही चीज हो सकती है‍, जिसे मैं भली भांति जानता हूं।
            इसके साथ ही शुरू हुआ ऑनलाइन ज्‍योतिष लेखों का सिलसिला। शुरूआती दौर में ही नास्तिक, यर्थाथवादी, लेखक, चिंतक, मार्क्‍सवादी, नारीवादी सहित कई वादियों से उलझ पड़ा। भले ही यह कठिन दौर था, लेकिन चूंकि ऑफलाइन मेरे पास अच्‍छा बैकअप था, सो डटा रहा। आखिर स्‍वीकार्यता बढ़ने लगी। हां, जैसा कि ब्‍लॉगिंग का दर्शन था कि जिसके पास अधिक कमेंट है, जिसे अधिक टैग किया जा रहा है, वह अधिक सफल लेखक है, लेकिन मेरी मदद गूगल का एनालिटिक टूल कर रहा था। उसने बताया कि रोजाना दो सौ से तीन सौ लोग मेरे ब्‍लॉग पर आ रहे हैं। यह उत्‍साह बढ़ाने वाला आंकड़ा था। किसी कवि या लेखक को भी रोजाना इतने पाठक-श्रोता नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में ब्‍लॉग पर लेख डालने का उत्‍साह बढ़ता गया।
            अन्‍य ज्‍योतिषियों की तुलना में मैं ऑनलाइन मामलों में खुद को अधिक सफल पा रहा हूं, इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍योतिषीय लेख लिखने के दौरान मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग पूरे शबाब पर थी। किस तरह लिखना है कि हर पाठक के दिमाग तक पहुंचा जा सके। संप्रेषणीय आग्रहता का कैसे सम्‍मान किया जाए, विषय की गंभीरता को बनाए रखते हुए लेखों को किस प्रकार हल्‍का फुल्‍का बनाया जाए और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी पहचान किस तरह पेश करें।
            अब इंटरनेट पर जो आ रहे हैं उन में से दस बीस या पचास लोग हो सकता है आपको जानते हों या किसी प्रकार परिचित हों। लगभग इतने ही लोग आपसे फोन या चैटिंग में बात कर करीब आ चुके हों, लेकिन तेजी से विस्‍तारित हो रहा हिंदी ब्‍लॉगजगत पूरा का पूरा आपको नहीं जान सकता। दूसरी तरफ ऑनलाइन माध्‍यम में जब कंसल्‍टेंसी देने वाला व्‍यक्ति आपके सामने नहीं है, तो ठगी की आशंकाएं भी जोर मारने लगती हैं। भले ही ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को पूरी दुनिया में फैला रही थी, लेकिन कहीं यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा था कि जो लेख जिस व्‍यक्ति के ब्‍लॉग पर पढ़ा जा रहा है, वह उसी का लेख है या कहीं से कॉपी पेस्‍ट किया गया मैटर है। ऐसे में ईमेल के जरिए संवाद हो सकता था। फोन की स्थिति पर पहुंचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। ऐसे में सोशल मीडिया और विशेषतौर पर कहें तो फेसबुक हमें जुड़ने के मौके दो प्रकार से देता है। पहला तो यह कि वह आपके, आपके परिवार के, आपके दोस्‍तों के बारे में जानकारी को साझा करता है। दूसरी ओर आपकी लोकेशन और अपेक्षाकृत अधिक तेजी से आ रहे विचार और टिप्‍पणियों को आपके नेटवर्क में जुड़े तकरीबन हर व्‍यक्ति के लिए सुलभ बना देता है। आप देखिए आपका न्‍यूजफीड लगातार आपके दोस्‍तों, जानकारों, रिश्‍तेदारों की हरकतों की जानकारी ही तो दे रहा है। ऐसे में एक ज्‍योतिषी क्‍या कर रहा है, इस बारे में भी इसी न्‍यूज फीड में जानकारी मिलती है। किसी भी घटना या विचार के प्रति उस ज्‍योतिषी का क्‍या नजरिया है, वह भी तुरंत ही पता चलता है। यहां फेक आईडी को बैठाकर काम कराना बहुत मुश्किल है।
भले ही आज कुछ सेलिब्रिटी अपने स्‍थान पर किसी दूसरे को बैठा दें, लेकिन इन घोस्‍ट आईडी के पास इतने अधिकार नहीं होते कि वे तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें। ऐसे में आपके जैनुइन होने पर ही यह संभावना बनती है कि आप तुरत फुरत प्रतिक्रियाएं दे सकें। एक तरफ ब्‍लॉगिंग आपके विचारों को तेजी से लोगों तक पहुंचा रही है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया आपकी उपस्थिति, आपके अस्तित्‍व, आपके विचारों की पुष्टि कर रही है। अब लोग अपेक्षाकृत अधिक सहजता से आपके करीब आने लगते हैं।
            मैं इसमें एक और तथ्‍य जोड़ना चाहूंगा कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसका बड़ा कारण है कि सही तरीके से प्रवाहमय हिंदी लिखने के लिए आपको खुद ही हर बार लिखना होगा। फिशिंग की पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता। वहीं अग्रेंजी में लिखे जाने पर यह आशंका रहती है कि कहीं पूर्व निर्धारित भाषा का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में आपकी स्‍वीकार्यता अपेक्षाकृत कम हो जाती है।
फांसना और कमाना...
जब आप इंटरनेट पर हैं, तो इतना तय है कि आपके पास इतना पैसा कि आप कम्‍प्‍यूटर खरीद लें, इंटरनेट का कनेक्‍शन ले लें और इतना समय निकाल लें कि रोजाना दो या तीन घंटे कम्‍प्‍यूटर के साथ बिताएं। यानी कम से कम मध्‍यमवर्गीय लोग तो होंगे ही। ऐसे लोगों की कॉमन समस्‍याएं होती हैं। मैंने पत्रकारिता छोड़ी और ज्‍योतिष को पेशे के रूप में अपना लिया। ऐसा नहीं है कि मैं पूरी तरह ऑनलाइन पर ही निर्भर रहा हूं, लेकिन ऑनलाइन मेरी कमाई का बड़ा स्रोत है। इसके लिए पहले आपको लोगों को फांसना पड़ता है। यह जरूरी नहीं है कि आप हमेशा लोगों को गलत काम के लिए ही फांसें। मैं अपने विषय की बात करूं तो वर्तमान में देश में ज्‍योतिष के नाम पर फर्जीवाड़ा कर कमा रहे लोग की संख्‍या बहुत अधिक हो चुकी है।
            मेरे ब्‍लॉग पर लेख पढ़ने के बाद जातक जब मुझे खोजता है तो मैं आसानी से फेसबुक पर मिल जाता हूं। एक बार जातक मेरे पास आता है तो उसे मैं भूतकाल और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देता हूं। आप देखिए कि जिस व्‍यक्ति को मैं निजी तौर पर बिल्‍कुल नहीं जानता, उसके भूतकाल और वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन जब उसके पास पहुंचता है तो वह जान जाता है कि ईमेल के दूसरी ओर बैठा इंसान इस विषय पर अपनी पकड़ रखता है। ऐसे में मेरी मेल रिप्‍लाई  के साथ पहुंची फीस तुरंत जमा होती है। ऐसा नहीं है कि सभी सवालों के जवाब देने पर फीस जमा होती है, लेकिन दस में से चार या पांच लोग फीस जमा कराने को राजी हो जाते हैं। इसके बाद ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण और उपचारों का दौर शुरू होता है।
            हालांकि ब्‍लॉगिंग के जमाने में भी लोगों ने मुझे टेस्‍ट किया और बाद में मेरे क्‍लाइंट बने लेकिन फेसबुक के बाद कुछ दोस्‍त बन गए तो कुछ आज भी गुरुजी या आचार्यजी का संबोधन देते हैं। कुछ लोगों को लगा कि आमने सामने की मुलाकात जरूरी है। कोई मुंबई से बीकानेर पहुंचा तो कोई हरियाणा से, कोई कोलकाता से कोई दिल्‍ली से। राजस्‍थान के जयपुर, जोधपुर, फलौदी और अन्‍य स्‍थानों से आने वालों की संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक रही, क्‍योंकि ये करीबी स्‍थान हैं।        

एक कोण से देखा जाए तो ऑनलाइन माध्‍यम से मैंने इन लोगों से संपर्क किया। पहले स्‍तर पर उनका नि:शुल्‍क विश्‍लेषण किया। अपनी फेसबुक आईडी के माध्‍यम से अपनी पहचान की पुष्टि की, विशवास जमाया और आखिर में उनसे फीस भी ली। 

इसके बाद मैं सम्‍मेलन स्‍थल तक पहुंचने के प्रयासों में लग गया। इससे पूर्व वे मुझे टिकट अपने स्‍तर पर ही बना लेने के लिए कह चुके थे। सो जाने से चार पांच दिन पूर्व जब मैं टिकट बनवा रहा था, तो उन्‍हें दोबारा फोन करके पूछा कि क्‍या वापसी के टिकट कन्‍फर्म कराने की जरूरत है। तो उन्‍होंने पूछा क्‍या आपके जाने का कार्यक्रम है क्‍या ? 

यह मेरे लिए नई जानकारी थी। उन्‍होंने बताया कि मेरा लेख रिजेक्‍ट कर दिया गया है। सो जिन लोगों को बुलाया जा रहा है, उन्‍हें यूनिवर्सिटी ने सीधे उनकी ईमेल आईडी पर पत्र भेज दिए हैं। मैंने पूछा क्‍या कारण रहा मेरे लेख को खारिज करने का, तो त्रिपाठीजी ने बताया कि विवि के कोई प्रोफेसर डांगी हैं, उनका यह मानना है कि 

जिस प्रकार का एक्‍सपोजर या कह दें उत्‍पाद प्रदर्शन मैं कर रहा हूं, हिंदी पट्टी अभी उसके लिए तैयार नहीं है... 
मैंने सोचा ओह। 
और कष्‍ट के लिए क्षमा मांगते हुए फोन काट दिया। 

...पता नहीं हिंदी पट्टी किसके लिए तैयार है?

जो भी हो रिजेक्‍शन बुरा लगता है, वह भी बिल्‍कुल गैरजिम्‍मेदाराना तरीके से। मुझे भी बुरा लग रहा है। मैंने सम्‍मेलन में जाने के लिए कोई प्राथमिक प्रयास नहीं किए। फिर नाम से मेल आने पर लेख लिखा, उस लेख को बिना किसी ठोस कारण के रिजेक्‍ट कर दिया गया,‍ जिसकी कोई पुख्‍ता सूचना भी नहीं दी गई। सम्‍मेलन ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया पर हो रहा है। मेरे ब्‍लॉग पर ढाई लाख पाठक आए हैं और सोशल मीडिया में भी दोस्‍तों की ठीक ठाक संख्‍या है। फिर क्‍या कारण है कि मैं त्‍यागने योग्‍य हो गया :( 

रविवार, 4 अगस्त 2013

इतना स्‍वार्थी बन जाएं कि परमार्थी हो जाएं

आपरो घी सौ कोस हालै


               यह मारवाड़ी की एक प्रसिद्ध कहावत है। यह कहावत घी बचाने या उसके इस्‍तेमाल के बारे में नहीं बल्कि सहायता देने और उसके वापस मिलने से संबंधित है। आध्‍यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सृष्टि का हर जीव और अजीव भी एक अदृश्‍य सूत्र से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। ऐसे में अगर आज मैं किसी को छटांक घी भी देता हूं तो वह आगे से आगे सूत्र में बढ़ता रहेगा और एक दिन वापस मुझे ही मिलेगा। यह सहायता का सुख है। 

               एक शोध के मुताबिक जब व्‍यक्ति तनाव में होता है तो दूसरों की सहायता करने में कम रुचि दिखाता है और स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न होने पर सहायता के लिए तत्‍पर नजर आता है। इसे बायस्‍टेंडर प्रभाव कहा जाता है। ऐसी अवस्‍था में इंसान दूसरों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को लेकर लापरवाह हो जाता है। अगर सजगता से सहायता करने की प्रवृत्ति को बचाए रखा जा सके, तो इससे तनाव से बचने में मदद भी मिलती है।

               जब हम किसी की सहायता करते हैं तो वास्‍तव में हम अपनी ही सहायता कर रहे होते हैं। चाहे वह भौतिक साधनों के रूप में हो या ज्ञान। जब भी कोई व्‍यक्ति आपसे कुछ मांगने आता है, तो सृष्टि के नैसर्गिक नियम के अनुसार प्रकृति ने मांगने वाले के रूप में उस व्‍यक्ति का और देने वाले के रूप में आपका चुनाव किया है। अब सहायता करनी है या नहीं करनी है, यह आपकी खुद की इच्‍छा पर निर्भर है। इच्‍छा की यही स्‍वतंत्रता हमें ईश्‍वर द्वारा स्‍थापित पूर्व नियतता से मुक्‍त करती है। एक कहावत के अनुसार आप दूसरों को जो कुछ देते हैं, वह वास्‍तव में आप बचा रहे हैं और जो कुछ आप अपने पास रखते हैं वह वास्‍तव में खो देते हैं। देने के साथ ही आपकी चेतना का विस्‍तार अपनी शरीर से बाहर निकलकर आपकी सहायता के विस्‍तार तक फैल जाता है। जब आप सहायता करने से इनकार कर देते हैं तो आपकी चेतना सिकुड़कर आप के भीतर ही कहीं कुंठित हो जाती है। ऐसे में सहायता करना आपको बढ़ाता है और इनकार करना आपको कुंठित करता है। प्रकृति ने आपकी मदद की है सहायता की इच्‍छा वाले व्‍यक्ति को आप तक पहुंचाने की। आखिर में सहायता करने के बाद यह अहंकार का भाव भी न रखिए कि सहायता आपने की है। बस आपका चुनाव किया गया कि आपके जरिए सहायता की जानी है और इसके बदले में भविष्‍य में आपको भी ऐसी या इससे बेहतर सहायता मिल सकेगी। 

               अगर तर्क की परिभाषा में देखें तो स्‍वार्थ की अति परमार्थ और परमार्थ की अति स्‍वार्थ है। इसे समझने के लिए हमें उदाहरण लेना होगा कि एक व्‍यक्ति चाहता है कि वह स्‍वर्गिक वातावरण में रहे। इसके लिए पहले वह अपने कमरे को दुरुस्‍त करेगा, यदि उसका स्‍वार्थ बढ़ता है तो अपने पूरे घर को संवारेगा, फिर अपनी गली में सुधार करेगा, फिर मोहल्‍ले, गांव, जिले और राज्‍य से होते हुए पूरे देश को सुधारने पर चिंतन करेगा। यदि यह स्‍वार्थ अपने चरम पर पहुंच जाएगा तो वह पूरी पृथ्‍वी पर ही स्‍वर्गिक वातावरण बनाने का प्रयास करेगा। ऐसे में आपका निजी स्‍वार्थ अति हो जाने पर परमार्थ में तब्‍दील हो जाएगा। इस कोण से देखें तो हम जब किसी दूसरे की सहायता कर उसे बेहतर स्थिति में ला रहे हैं तो वास्‍तव में अपने ही स्‍वार्थ के किसी कोण की पूर्ति कर रहे होते हैं। दूसरों की सहायता करने या सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले लोग आम लोगों की तुलना में अधिक स्‍वस्‍थ और सक्रिय रहते हैं। यहां दूसरों की चिंता की नहीं बल्कि दूसरों की सजग सहायता की बात हो रही है। 

               जरूरी नहीं कि सहायता हमेशा ऐसे रूप में हो कि आपको उसकी कीमत ही चुकानी पड़ रही हो। आपके घर में पड़ा कबाड़ हो सकता है आपके खुद के लिए किसी काम का न हो, लेकिन किसी दूसरे व्‍यक्ति के लिए यह उपयोगी सामान सिद्ध हो सकता है। अधिकांश लोग संग्रह की प्रवृत्ति के चलते न तो कबाड़ से छुटकारा पा पाते हैं और न ही उसका उपयोग कोई और कर पाता है। आध्‍यात्मिक स्‍तर पर आपके घर में या कह दें आपकी मिल्कियत के तहत आने वाला हर संसाधन आपकी चेतना के एक हिस्‍से पर काबिज होता है। एक ओर जहां आपके मन में अपने साधनों और वस्‍तुओं के प्रति अधिकार का भाव होता है, वहीं दायित्‍व का बोझ भी आपके उन्‍मुक्‍त मन को बोझिल बनाए रखता है। जब आप अपने पास पड़ी किसी ऐसी वस्‍तु को उस व्‍यक्ति के पास पहुंचाते हैं, जो वस्‍तु का बेहतर उपयोग कर सके, तो आप आपको मानसिक और शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाता है। आपकी चेतना का जो अंश वस्‍तु को लेकर बाधित हो चुका था, वह किसी और को देने के बाद मुक्‍त हो जाता है। आप इस बात से भी संतुष्‍ट रहते हैं कि अमुक व्‍यक्ति इसका सही इस्‍तेमाल करेगा। दूसरी ओर कबाड़ से पैदा हुई नकारात्‍मक ऊर्जा के दुष्‍प्रभाव से भी आप बच जाते हैं। 

               संसाधनों के साथ की जाने वाली सहायता के अलावा शारीरिक रूप से की गई सहायता के भी बहुत मायने हैं। जब आप देने के भाव में होते हैं तो स्‍वार्थ मुख्‍य धारा से हट जाता है। अब आप जो भी काम करते हैं, उसे पूरा मन लगाकर और बिना किसी प्रत्‍युत्‍तर की इच्‍छा के करते हैं। ऐसे में शारीरिक श्रम सामान्‍य श्रम न रहकर ईश्‍वर की आराधना में तब्‍दील हो जाता है। सिक्‍ख और सिंधी गुरुओं ने इंसान की इस नै‍सर्गिक प्रवृत्ति को समझा और गुरुद्वारों और झूलेलाल के मंदिरों में कारसेवकों की भूमिका को बढ़ावा दिया। आज हम ऐसे धार्मिक स्‍थल पर करोड़पति हो चुके व्‍यक्तियों को भी जूते पॉलिश करते और झूठे बर्तन धोते हुए देख सकते हैं। धार्मिक कार्य में उनकी यह शारीरिक सहायता श्रद्धालुओं को न केवल शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ बनाती है, बल्कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में भी सुधार लाती है।