बुधवार, 13 अगस्त 2008

छोटे निवेश में अधिक लाभ

बिजनेस में हम इसे स्मार्ट निवेश कह सकत हैं लेकिन यहां मैं पैसों के निवेश के बजाय आध्यात्मिक निवेश की बात करना चाहूंगा। व्यापार से जुड़े सैकड़ों लोगों को मैंने करीब से देखा और समझने की कोशिश की। आध्यात्मिक स्तर पर बणिए (यहां बणिए से तात्पर्य उद्यमी से है) दो प्रकार के होते हैं। एक तो अपने प्रतिष्ठान में देवी-देवता की तस्वीर लगाते हैं और पूजा पाठ का जिम्मा किसी पण्डित को सौंप देते हैं। पण्डित रोजाना सुबह आता है देवताओं की सुध लेता है और चला जाता है। देवता किनारे बैठे रहते हैं। दूसरे वे जो अपना सारा काम भगवान के निमित् होकर करते हैं। पहली प्रकार के बणियों को मैंने पैंतीस से चालीस साल तक की छोटी उम्र में साइटिका, स्पांडलाइटिस और नर्वस सिस्टम की अन् बीमारियों से जूझते हुए देखा है। चिकित्सक के पास जाने पर इनका पुख्ता र्इलाज भी नहीं होता। क्योंकि चिकित्सकों को कहना है कि ये बीमारियां शारीरिक होने के बजाय तनाव से अधिक प्रभावित होती हैं।

उद्यमियों को क्‍या करना चाहिए?

समस्या को इस दृष्टिकोण से देखने के बाद मैंने अपने जानकार उद्यमियों को आध्यात्मिक होने की सलाह दी तो उन्होंने मुझी से पूछा,

क्यों पंडित जी अब धंधा छोड़कर पूजा-पाठ में लगना पड़ेगा।

मैंने जबाव दिया, नहीं।

आध्यात्मिक होने का अर्थ पूजा-पाठ कतई नहीं है। शेयर बाजार में जहां यह कहा जाता है कि ईमानदार दोस् खोजने की बजाय कुत्ता पाल लेना बेहतर है ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो कि आपकी बात को सुनकर समाधान सुझाए। यहां एक बार फिर में वैज्ञानिकों की खोज का हवाला देते हुए बताना चाहूंगा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि हम अपनी दिनचर्या में अपने दिमाग का महज एक प्रतिशत हिस्सा ही काम में लेते हैं। शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन मस्तिष् के पास होता है। हमारा आध्यात्मिक रुझान इसी 99 प्रतिशत हिस्से से हमारे लिए अतिरिक् ऊर्जा और समाधान चुराता है। यानि आध्यात्मिक होकर अपनी सहायता खुद ही कर रहे होते हैं। रहा सवाल पूजा पाठ का यह तो मात्र बाहरी उपांग हैं। वास्तविक रुप से तो हमें उस ईश्वर का ध्यान करना है जो हमें सही रास्ता दिखा सके। आप भी गौर करेंगे तो पाएंगे कि जो लोग ईश्वर की शरण में रहते हैं वे अपनी सामान् जिन्दगी में तनावों को खुद से दूर रखने में सफल होते हैं। तो सुबह या शाम के समय खुद और ईश्वर में किया गया समय का जरा सा निवेश हमें अच्छा फायदा दिला सकता है।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना- भाग पांच

मानसिक गुलामी...
ईश्वर ने हमें पैदा किया तो साथ ही हमारे खाने की भी व्यवस्था की। इस धारणा के साथ हरी घास के मैदान में चरती भेड का चित्रण किया गया। फिर इस भेड को एक रस्सी से बंधा देखा गया और निष्कर्ष निकाला गया कि खूंटे से बंधी रस्सी से बंधी भेड उतनी दूर तक ही चर सकती है जितनी दूर तक रस्सी जाती है। यानि कल्पना करें कि अधिक से अधिक कितनी घास खाई जा सकती है तो लगता कि एक गोल घेरे जितनी घास जिसका व्यास रस्सी के बराबर हो। यहां फिर से पूर्वनियतता धमकती है। यानि खूंटा ईश्वर ने लगाया, रस्सी उसने दी और कितना खा सकते हो इसकी आजादी भी। यहां आजादी है लेकिन रस्सी से बंधी आजादी। यह कल्पना भारतीय प्राचीन दर्शन से मेल नहीं खाती जो खुद को ईश्वर का ही अंश बताती है और एक दिन ईश्वर हो जाने का विश्वास भी दिलाती है।
पश्चिमी दार्शनिकों ने हालांकि स् और ईश्वर दोनों की ही विशद व्याख्या की है लेकिन भारतीय दर्शन ने तो मुक्ति के नाम पर चमत्कार ही कर दिया। हर बंधन का जवाब है। अद्वैतवाद में देखा जाए तो सबकुछ मिथ्या है और इससे परे निकला जा सकता है। द्वैतवाद को देखें तो लगता है कि भले ही सबकुछ मिथ्या हो लेकिन इससे बाहर निकला जा सकता है। चार्वाक की सुनें तो ऋण लेकर भी जिंदगी को और विशाल बनाया जा सकता है। सांख् की सुनें तो सृष्टि के साथ ही बंधन दिखाई देता है। इसके परे निकलने पर निर्गुण तक पहुंचा जा सकता है। यानि बच निकलने की संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन मानसिक गुलामी का क्या जो भेड के साथ बंधी रस्सी की शक् में लगातार हमारे साथ रहती है।

शनिवार, 29 मार्च 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना... भाग चार

आत्मा की स्वतंत्रता की बात से पहले बात आती है मानसिक स्वतंत्रता की। जब तक मनुष् इस दृष्टिकोण से सोचना शुरू नहीं करता कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता भी है तब तक स्वतंत्रता की अन् संभावनाओं पर विचार करना व्यर्थ प्रतीत होता है। मोटीवेशनल मेनेजमेंट गुरुओं की सुनें तो लगता है जैसे कि आम आदमी के लिए बनाए गए अधिकांश निय व्यक्ति को सीमाओं में बांध देते हैं और इसी से स्वतंत्र होने की संभावनाएं खत् होने लगती है। इसकी परिणिती यह होती है कि व्यक्ति खुद को बंधनों में जकडा हुआ पाता है और कभी स्वतंत्र नहीं होता है। लेकिन विवेकानन् और रामकृष् परमहंस को देखा जाए तो मानसिक बंधनों की क्षुद्रता समझ आने लगती है। एक ओर परमहंस हैं जो कि कीचड के बीच भी श्वेत धवल नजर आते हैं। सांसारिकता में इतने सूक्ष् की मूर्ति से इतना प्यार कर बैठे कि उसे जीवंत कर दिया। माया के जाल में इतने सूक्ष् हो गए कि जाल का ताना-बाना उन्हें जकड नहीं पाया। अपनी पत्नी को ही मां का दर्जा दे दिया। दूसरी ओर हैं विवेकानन्, उन्हीं परमहंस के शिष्य। माया के जाल के हर टुकडे से दूर। सांसारिकता त्यागने के बाद भी उन्हें चैन नहीं आया तो अपनी मातृभूमि त्याग दी और हर संबंध को खुद से दूर रखा। यानि अपना कद इतना विशाल कर लिया कि माया का जाल छोटा पड गया। केवल भारतीय और अमरीकी ही नहीं दुनिया का हर मनुष् उनके लिए भाई या बहन बन गए। तो जीवन बंधनों से बंधा हुआ होकर भी इतना सूक्ष् हो सकता है कि माया का आवरण बांध सके और इतना विशाल भी कि आवरण ही छोटा पड जाए। यानि स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकला जाए। यहां दूसरी खोज शुरू होती है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

गुरुवार, 6 मार्च 2008

दूसरे दिमाग की आहट

(Listening The Second Mind)
हमने चेतन और अवचेतन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। योग में राजयोग ऐसा सैगमेंट है जो हमें सैकण् माइंड तक पहुंचने के लिए सहायता करता है। इसके अलावा तंत्र में भी कई ऐसी तकनीकें हैं जो हमें सैकण् माइंड तक लेकर जाती हैं। फिलहाल मैं बात करूंगा साइकोलॉजिकल पद्धति की। साइकोलॉजिस् बताते हैं कि हमारे दिमाग की चार अवस्थाएं होती है। उन्हें एल्फा, बीथा, थीटा आदि में बांटा गया है।
एल्फा लेवल तकनीक: सेकण् माइंड में उतरने की यह मुझे सबसे सुलभ पद्धति लगती है। इसमें शांत होकर एक बंद कमरे में बैठना होता है। कमर सीधी और आंखें ठीक पैंतालीस डिग्री पर छत की ओर। अब सौ से एक तक उलटी गिनती करनी होती है। धीरे-धीरे। एक तक पहुंचने तक हमारा दिमाग एल्फा लेवल में पहुंच जाता है। तब हमारी श्वास स्थिर और स्वाभाविक हो जाती है। दिमाग की इस अवस्था में पहुंच हुए व्यक्ति को समस्याओं के समाधान भी नजर आते हैं और डिप्रेशन के पेशेंट को अधिक लॉजिकल सोचने का अवसर मिलता है। योग एवं तंत्र संबंधी चर्चा बाद में कभी...

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग तीन

ईश्‍वरवादी धर्मों में स्‍वतंत्रता की संभावना
ईश्वरवादी धर्म वे हैं जो वेदों को मानते हैं। यह दर्शन विषय की भाषा है। ईश्वर की व्युत्पत्ति कुछ इस तरह होती है कि वह सबकुछ जानने वाला है और सभी कुछ नियंत्रित रखता है। यानि सृष्टि में जो कुछ हो रहा है वह पूर्व नियत है। इंसान केवल खिलौना मात्र है। जो इस सृष्टि में परम पित परमात्मा के इशारे पर सुख दुख का खेल खेलते रहते हैं।
आप गहराई में सोचेंगे तो लगेगा कि सारे प्रयास फिजूल है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे किया जा सके क्योंकि सबकुछ तो ईश्वर ही कर रहा है। अमिताभ बच्चन की फिल् अक् में भी खलनायक भी यही कहता है मैं कुछ नहीं करता जो करता है वह करता है मैं नहीं कहता गीता में लिखा है। यानि कत् भी किया तो ईश्वर की मर्जी से और सजा भुगती तो वह भी ईश्वर की मर्जी से। ज्योतिष भी कुछ ऐसा ही कहती है। इंसान के पैदा होने के साथ ही उसके आगामी जीवन का खाका बनकर तैयार हो जाता है। यानि वह कितना पढेगा, कब शादी होगी, पत्नी कैसी होगी, बच्चे कितने और क्या होंगे, व्यवसाय करेगा या नौकरी, जिंदगी में कितना सफल होगा। सबकुछ।
दोनों बातें मिलकर परेशान कर देती है कि जब सबकुछ पूर्वनियत है तो मनुष् के स्वतंत्र होने की क्या संभावना है। क्या ऐसे ही एक के बाद दूसरी योनि में प्रवेश करता रहेगा और जीवन भोगता रहेगा। कभी मनुष् तो कभी चींटी, कभी हाथी तो कभी चिडिया।
मनुष् में स्वतंत्र होने की संभावना विद्यमान है। कैसे मैं नहीं जानता लेकिन विवेकानन् ने कहा कि स्वतंत्र हुआ जा सकता है, ओशो भी कहते हैं पुरातन भारतीय मनीषीयों ने भी कहा है। ईश्वरवादी धर्म के इस बंधन को त्यागने के लिए धर्म को त्याग भी दूं तो मैं नहीं जानता कि मुक्ति का रास्ता क्या है
शायद बुद्ध जानते थे, शंकराचार्य ने पहचाना था, शायद कृष् कुछ इशारा कर रहे थे। किसकी सुनूं और किधर जाउं यह यक्षप्रश् सदा दिमाग में घूमता रहता है। आपके भी घूमता होगा कि इन बंधनों से कैसे निकला जाए...