रविवार, 21 दिसंबर 2008

मेरा वाला नीला


मेरे घर के बागीचे में यह फूल खिला है। कोयलस के पौधे में इन दिनों ऐसे खूब सारे फूल लगे हैं।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

ये विजय दिवस क्‍या ?

आज विजय दिवस है। ये क्‍या है... आओ मंथन करें 

आजकल हर दिन का दिवस बना दिया है मीडिया वालों ने। कभी जच्‍चा दिवस, कभी बच्‍चा दिवस, कभी पुराने मित्र दिवस  तो कभी नए मित्र दिवस, कभी पिता दिवस तो कभी माता दिवस। कुल मिलाकर साल के 365 दिन अपने आप में विशिष्‍ट हैं। फिर ये विजय दिवस क्‍या है। 

ये दशहरे के आस-पास नहीं आता क्‍या, या उसी दिन आता है। अभी सर्दियों में इसकी बात क्‍यों हो रही है। इसमें तो शस्‍त्र पूजा होती होगी। या फिर करगिल युद्ध जीता उसकी याद में मनाया जाता है। 


16 दिसम्‍बर 1971 की याद में सेना द्वारा जाने वाले विजय दिवस के संदर्भ में एक परिचर्चा करने का काम मुझे सौंपा गया। बीस से अधिक बुद्धिजीवियों (बुद्धि बेचकर खाने वालों, श्रमजीवी की तर्ज पर) से बात की। अधिकांश लोग अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे। उनके जवाब कुछ ऐसे ही थे। एक ने तो यहां तक कहा कि जब तक इस सवाल को कंपीटीशन परीक्षाओं में शामिल नहीं किया जाएगा तब तक लोगों को ध्‍यान नहीं आएगा। 

करीब तीन घण्‍टे की मशक्‍कत के बाद मैं झल्‍ला गया और अपनी तरफ से कुछ लोगों को विजय दिवस के बारे में जानकारी देकर उनके 'विचार' जाने। संदर्भ पता चलने के बाद कुछ ने नेताओं की भाषा में इतना गोलमोल बोला कि फोन रखने के बाद कई देर तक मुझे सोचना पड़ा कि बंदे ने वास्‍तव में जवाब दिया क्‍या है। कुछ ने कहा यार कुछ भी लिख देना। तूं लिखेगा तो गलत थोड़े ही लिखेगा। 

मैंने सोचा कि किसी पुराने सैनिक को ये बातें बता देता हूं वो पहले वाले बीस और बाद वाले चार लोगों को अपनी थ्री नॉट थ्री से गोली मार आएगा। दुख से अधिक क्षोभ हुआ कि जिस जीत को मैं आल्‍हादकारी मान रहा था उसकी याद भी लोगों की जेहन से धुमिल होती जा रही है। 


खैर कुछ जानकारी जो मुझे है इस बारे में बता देना चाहूंगा। 

16 दिसम्‍बर 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्‍तानी को ढाका में उसकी 93000 सैनिकों के साथ झुकने पर मजबूर कर दिया और संधि पर हस्‍ताक्षर कराए। एक अलग देश बना बांग्‍लादेश। यह ऐतिहासिक जीत थी। इसी की याद में सेना द्वारा विजय दिवस मनाया जाता है। आज इस जीत की महज 37वीं वर्षगांठ है और बहुत से युवा इस जीत को भुला चुके हैं। जिन वीरों मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर किया उन्‍हें भूलना खुद की जड़ें भुला देने जैसा है। 

मेरी ओर से देश के वीर शहीदों और आज देश की रक्षा कर रहे जवानों को गर्वीला सलाम। 

इन दिनों बीकानेर में छाए बादल


इन दिनों बीकानेर में बादलों का जमावड़ा है। यहां बादल होना ही अपने आप में घटना है। बादलों का एक सुंदर चित्र 

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

यही है वो मंदिर

राजस्‍थान के अधिकांश लोगों के लिए इस मंदिर की चर्चा करना घावों को कुरेद देने जैसा काम है। अभी कुछ दिन पहले जोधपुर गया। सालों बाद और शादी के बाद तो पहली बार जोधपुर जाना हुआ। वहां पत्‍नीजी साथ थीं। पहुंचने के कुछ ही मिनटों के भीतर वे पता कर आईं कि यहां कोई ऐसा मंदिर है जहां कुछ भी मांगों मिल जाता है। वैसे वे मांग-तांग में विश्‍वास नहीं करती लेकिन बहुत ज्‍यादा मांगना हो तो वे किसी स्‍थापित भगवान का गला पकड़ती हैं और मांग लेती है। कभी मिल जाता है तो ठीक वरना इन रोड साइड भगवानों की नि:स्‍सारता का तो उन्‍हें भान है ही। खैर मेरे दिमाग में घूमने का प्‍लान था और पत्‍नीजी के दिमाग में उस मंदिर जाने का। एक ऑटो वाले को पकड़ा और घूमने की जगह पूछी। वह बिना प्‍लान सीधे मेहरानगढ़ ले गया। गढ़ में प्रवेश से पहले ही वहां गढ़ की प्राचीरों के ऊपर मं‍डराती चीलें दिखाई दी। मैंने सोचा राजशाही का कत्‍ल हुए साठ साल से ज्‍यादा समय हो गया अब ये चीलें किसका मांस ढूंढ रही हैं। हम ऊपर चढ़ते गए। गढ़ के अन्‍दर की कुछ महिलाएं कठपुतलियां बेच रही थीं। कान्‍हा (मेरा बेटा) उत्‍सुकता से उनके पास चला गया। उनमें से एक से मैंने पूछा गढ़ में आगे क्‍या है। तो उसने बताया आगे चामूण्‍डा माता का मंदिर है। मेरे दिमाग में एक मिनट के लिए भी ख्‍याल नहीं आया था कि हम उसी देवी के पास जा रहे हैं जिसने कुछ ही दिन पहले सैकड़ों जवान लड़कों की बलि ली है। पीठ में सिरहन दौड़ गई। एक उत्‍सुकता थी देखने की सो कुछ तेजी से आगे बढ़ा। साथिन ने पूछा क्‍यों जी ये वही मंदिर है जहां मनौतियां सौ प्रतिशत पूरी होती है। मैं एक बारगी कुछ बोल नहीं पाया। एक ओर पत्‍नी का उत्‍साह तो दूसरी ओर दिमाग में चल रहा तूफान। मैंने धीरे-धीरे बोलते हुए बताया ये वही मंदिर है जहां सैकड़ो युवा कुचलकर मर गए थे। अब श्रीमतीजी के पांव भी ठिठक गए। माहौल बिल्‍कुल काला-काला सा नजर आने लगा। एक-दूसरे को हिम्‍मत देते हुए आगे बढ़े और निज मंदिर तक आए। हम दोनों ही कुछ नहीं बोल रहे थे। मंदिर से लौटते वक्‍त उन्‍होंने कहा मुझे तो केवल चीत्‍कार का ही अनुभव हुआ। वापस लौटते समय दोनों शांत थे। कान्‍हा समझ नहीं रहा था कि जब घूमने आए हैं तो खुश क्‍यों नहीं है।


किले के ऊपर का नजारा

सोमवार, 17 नवंबर 2008

बीकानेर की पाटा संस्‍कृति


भारत के बीकानेर शहर और इटली के उदीने शहर में एक समानता है और एक चीज दोनों शहर आपस में बांटते हैं।

जो चीज समान है वह है पाटा... इसके बारे में अभी  बताता हूं और क्‍या बांटते हैं वह लेख के आखिर में बताउंगा।

जो लोग बीकानेर के हैं या कुछ समय बीकानेर में  रह चुके हैं उन्‍हें अजीब लगेगा कि इस विषय पर मैं कैसे लिख रहा हूं लेकिन मुझे  पाटे पर लिखने का ख्‍याल कल रात को ही आया। हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स के स्‍पेशल कोरस्‍पोंडेंट  श्रीनंद झा, जो किसी पॉलिटिकल कवरेज के लिए बीकानेर आए थे, मुझसे फोन पर पूछा कि ये पाटा क्‍या  होता है। मैंने जवाब में सवाल ही पूछा कि आपको इस बारे में किसने बता दिया?

उन्‍होंने  कहा बता दिया किसी ने। क्‍या आप मुझे दिखाकर लाएंगे। मैंने कहा काम से फारिग होते  ही आपको ले चलूंगा। उन्‍होंने समय पूछा तो मैंने बताया रात दस बजे ठीक रहेगा। वे  अगले दिन की उम्‍मीद कर रहे थे और मेरे रात के दस बजे के प्रपोजल को सुनकर पशोपेश  में पड़ गए। फोन की दूसरी ओर तक कुछ देर की शांति के बाद उन्‍होंने कहा ठीक है, चलते हैं। मुझे काम निपटाने में कुछ अधिक समय लग गया। रात साढे़ दस के बाद ही मैं  उनकी आरटीडीसी की होटल तक पहुंच पाया। वे इंतजार कर रहे थे। उनका विचार था कि  फोटोग्राफर को भी साथ ले लेंगे तो काम हाथों-हाथ निपट जाएगा। मैंने कहा तीन लोग  चलेंगे तो कार लेनी पड़ेगी। पुराने शहर की तंग गलियों में कार मुश्किल से चल पाएगी, तो बाइक पर चलना ठीक रहेगा। फोटोग्राफर अगले दिन सुबह भी फोटो ले सकता है।

कुछ देर के डिस्‍कशन के बाद मेरी बात मान ली गई।  झा को लेकर मैं शहर के मुख्‍य मार्गों से होता हुआ पुराने शहर की ओर बढ़ रहा था तो  पहली बार मुझे शहर के बाहरी इलाके और तंग गलियों वाले पुराने शहर में अन्‍तर शिद्दत से महसूस हुआ।

अब पाटों की बात-

निकलने से पहले श्रीनन्‍दजी ने मुझसे थोड़ा ब्रीफ करने के लिए कहा। शुरुआती तौर पर मैंने जो बताया उसे झा ने कुछ इस तरह से समझा कि पाटा एक तरह का बड़ा दीवान होता है जो मोहल्‍ले के बीचों-बीच लगा होता है। इस पर कई लोग बैठते हैं। उनका सवाल था कि लोग करते क्‍या हैं पाटे पर? उनके लिए विषय नया था और मेरे लिए यह सवाल नया था। मैंने कहा सबकुछ। यानि हर तरह की गतिविधि पाटे से जुड़ी होती है। उन्‍होंने पूछा पाटे पर बैठते कौन लोग हैं। मैंने बताया हर तरह के पाटे पर अलग तरह के लोग नजर आएंगे। गुत्‍थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही थी। झा को लगा चलकर देख लेना ठीक रहेगा वरना ये युवा पत्रकार उन्‍हें और उलझा देगा।

ऐसा दिखता है पाटा-


यह है आचार्यों के चौक का पाटा-

बीकानेर के तकरीबन हर मोहल्‍ले में पाटा है या कहूं कि पाटे हैं। पाटे पाटा का बहुवचन है। हर पाटे का अपना इतिहास है। मोहल्‍ले के बीचों-बीच शीशम की टनों लकड़ी से बना यह ऊँचा ‘दीवान’ सामाजिक कार्यों की धुरी बनता है।

खैर हम लोगों ने आचार्यों के चौक पहुंचकर पाटे पर बैठे लोगों से सीधे बातचीत शुरू कर दी। पहले मैंने मारवाड़ी में बोलते हुए बैठे लोगों को बताया कि ये झा सा’ब हैं और दिल्‍ली से हिस्‍दुस्‍तान टाइम्‍स अख़बार से आए हैं। अपने पाटे के बारे में जानना चाहते हैं। इसके बाद आधे घण्‍टे से अधिक लम्‍बे समय तक लोग बोल रहे थे। इसमें वर्ड बैंक के पूर्व निदेशक और वर्तमान राजस्‍थान सरकार के वित्‍तीय सलाकार विजय शंकर व्‍यास, विभिन्‍न शोधों के तेरह पेटेंट हासिल कर चुके हर नारायण आचार्य और उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों को अपने तख्‍त पर बैठा चुका पाटा मानो खुद बोल रहा था। कैसे हर सामाजिक कार्यों में पाटा लोगों को एक स्‍थान पर एकत्रित करता है, बुजुर्गों की शामें और रातें तक इस पर गुजरती हैं, युवाओं की बीवीओं को सौत लगने वाला पाटा कई सौ सालों की स्‍मृति संजोए आने वाली पीढ़ी को, बीती हुई पीढ़ी के साथ मौहल्‍ले के बीचों-बीच बैठकर देखता है। झा केवल हां-हां में सिर हिला रहे थे और उत्‍साहित बड़े-बूढ़े, अधेड़ और जवान लोग लगातार बोल रहे थे। कोई आधे घण्‍टे बाद मैंने यह कहकर झा को मुक्ति दिलाई कि इन्‍हें भट्टड़ों के चौक का पाटा भी देखना है। लोगों ने निकलते हुए कहा वहां तो आपको ज्‍योतिषियों की पूरी जमात मिल जाएगी। झा एक बारगी अचकचा गए। मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि खुद ही देख लीजिए पूरी रात जगने वाले पाटे को।  

भट्टड़ों के चौक का पाटा

यह पाटा पूरी रात जगता है। दिन में बड़े-बूढ़े इस पर बैठते हैं और जैसे-जैसे रात ढ़लती है यहां ज्‍योतिषियों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। रात नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक एक ज्‍योतिषी जाता है तो दूसरा आता है। धुरी में रहते हैं प‍ंडित राजेन्‍द्र व्‍यास उर्फ ममू भईजी। कई बार वे आस-पास या कलकत्‍ता गए हुए होते हैं तो यह गहमा-गहमी कम होती है। लेकिन हमारा भाग्‍य प्रबल था। ममू वहीं मिल गए पाटे पर। अपने शिष्‍यों के साथ लैपटॉप पर किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण कर रहे थे। मैंने झा साहब का परिचय दिया तो उन्‍होंने गोत्र तक पूछ डाले। किसी समय मैं भी ममू के दरबार का हिस्‍सा रहा हूं। सो उनका स्‍वभाव जानता हूं। मैंने झा को ममू के हवाले कर किनारे हो गया। पाटा संस्‍कृति का दूसरा आयाम देखने के बाद झा बस नोट करते जा रहे थे। दो दिन पूर्व दिवंगत हुए आचार्यराज के बारे में पूरी जानकारी ली।

इसके बाद शुरू हुआ ज्‍योतिष का काम। बिना झा की कुण्‍डली देखे ममू ने प्रश्‍न कुण्‍डली बनाकर झा को उनके जीवन और परिवार के बारे में कई बातें बताई। जब झा को विश्‍वास हो गया तो उनसे जन्‍म समय और तारीख लेकर कुण्‍डली बनाई। इसके बाद तो ममू ने कई पन्‍ने खोलकर रख दिए। करीब डेढ़ घण्‍टे इसी पाटे पर व्‍यतीत हुए। यहां से देर रात रवाना होने के बाद मैंने झा से कहा कि बाकी पाटे मैं केवल आपको दिखा देता हूं। स्‍टोरी इन दो जगहों के आधार पर ही बन जानी चाहिए। झा सहमत थे। मैंने उन्‍हें मोहता चौक, कीकाणी व्‍यासों का चौक, हर्षों का चौक आदि स्‍थानों पर पाटे दिखाए और अंत में ले गया दम्‍माणी चौक के छतरी वाले पाटे पर। पूरे समय झा चुपचाप बस देखते रहे। बाद में देर रात जब मैं उनको वापस होटल छोड़ने गया तो उन्‍होंने धन्‍यवाद जैसी कुछ औपचारिकताओं के अलावा पाटे के बारे में कहा...

अद्भुद् 


अब दूसरी बात बीकानेर और उदीने शहर टैस्‍सीटोरी के रूप में एक हस्‍ती को बांटते हैं। कुछ उनकी क्‍योंकि यह हस्‍ती वहां पैदा हुई और कुछ हमारी क्‍योंकि जिन्‍दगी का अधिकांश हिस्‍सा उन्‍होंने बीकानेर में रहकर काम किया और यहीं दिवंगत हुए। उनके बारे में विशद चर्चा फिर कभी..