गुरुवार, 21 मई 2009

जो ब्‍लॉगर मुझे प्रभावित करते हैं - चिठ्ठा चर्चा

पिछले कई दिन से लिखने के बजाय पढ़ने का क्रम बना हुआ है। नेट पर बैठता हूं। पहले अपने पसंदीदा ब्‍लॉग्‍स को खोलकर पढ़ता हूं। फिर वहां मिली कडि़यों से आगे बढ़ता जाता हूं। दो चार या छह घण्‍टे तक यही क्रम चलता है। इस दौरान लगा कि कई चिठ्ठे बहुत अच्‍छे हैं। मुख्‍यतया कंटेट के मामले में। सोचा अन्‍य पाठकों को भी बताया जाए। अब इसका लहजा स्‍वत: ही चिठ्ठा चर्चा जैसा बन रहा है। देखिएगा।

केरल पुराण   बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायणजी एक के बाद दूसरी केरल की शानदार कहानियां सुना रहे हैं। बीच-बीच में एक दो दिन का गैप आता है तो लगता है अंतराल में सदियां बीत गई। हर कहानी बहुत शानदार। और अनुवाद लगातार निखरता जा रहा है। कई कथाएं तो छह या सात खण्‍डों में भी हैं। रसास्‍वादन कीजिएगा।

लिख डाला में शाहिद मिर्जाजी  यह बिल्‍कुल लॉटरी लगने जैसा अनुभव है। शाहिद मिर्जा जी को जो लोग जानते हैं। यानि लाखों लोगों को पता है कि उनका लेखन कैसा रहा है। उनकी पत्‍नी वर्षा भम्‍भाणी मिर्जा जी ने अपने ब्‍लॉग लिख डाला में उनका एक लेख पिछले दिनों प्रकाशित किया। सालों पहले लिखा गया लेख आज भी उतना ही सटीक है। इसे कालजयी कृति कह सकते हैं। देखिएगा...

Life is beautiful  इस ब्‍लॉग के बारे में शायद रविरतलामीजी ने बताया था। रंगीन चित्रों में कला से अधिक जीवन ढूंढने की कोशिश करता यह ब्‍लॉग वाकई शानदार है। हर पोस्‍ट में पिछली पोस्‍ट से अधिक सशक्‍त अभिव्‍यक्ति दिखाई देती है। हैं बस चित्र ही...

ज्‍योतिष की सार्थकता पंडित डीके शर्माजी अब तक सॉफ्ट अंदाज में अपनी बातें कहते रहे हैं। उनके ताजे लेख में तो उन्‍होंने विज्ञान की सबसे एडवांस शाखा अंतरिक्ष विज्ञान के समक्ष ही चुनौती पेश कर दी है। मेरा मतान्‍तर यह है कि ज्‍योतिष को ज्‍योतिष ही रहने दिया जाए उसे विज्ञान सिद्ध करने के चक्‍कर में अधिक कचरा होता है। क्‍यों न अब विज्ञान को ही ज्‍येातिष के पैमाने पर परखने का प्रयास किया जाए।

निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग  निशांत मिश्राजी ने जेन कथाओं के साथ इस ब्‍लॉग की शुरुआत की। शुरू में छोटी छोटी कहानियां आ रही थी। बाद में कुछ बड़ी और बहुत बड़ी पोस्‍टें भी आई। लेकिन अब भी छोटी प्रेरक कथाओं का क्रम चालू है। हर रोज इस ब्‍लॉग पर एक तो ऐसी कथा होती ही है। कभी सुनी हुई तो कभी बिल्‍कुल नई। पिकासो और आइंस्‍टाइन के वृत्‍तांत को कमाल के हैं। इसे फीड रीडर से नियमित पढ़ा जा सकता है। मैं इस ब्‍लॉग का फैन हूं।

संजय व्यासजी ये जोधपुर के हैं। पिछले दिनों पहली बार इनके ब्‍लॉग पर गया और एक अभिशप्‍त कस्‍बे की कहानी पढ़कर इनका मुरीद हो गया। अब गूगल फ्रेंड कनेक्‍ट के माध्‍यम से इनसे जुड़ गया हूं और आगे नियमित पढ़ने की कोशिश करूंगा। आप भी इन्‍हें पढ़ सकते हैं। इनके लेखन में ताजे पानी का अहसास होता है।

डॉ अनुराग आर्य इनके ब्‍लॉग पर पहले भी जाता रहा हूं लेकिन पिछली पोस्‍ट में अनुराग जी ने क्‍लीन बोल्‍ड कर दिया। तर्जुमा था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव' और इसका सुधार था 'जीनियस डोंट फॉल इन लव- इट हैपंस' आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं। आप जब भी वहां पहुंचेंगे तो अपने छात्र जीवन और उन दोस्‍तों को जरूर याद करेंगे जो बेगरज आपके यार रहे हैं।

बस इतना ही... बाकी के बारे में फिर कभी बताउंगा। ब्‍लॉग के लिंक उठाना और उन्‍हें एक एक कर जमाना वाकई कठिन काम है। चिठ्ठा चर्चा नियमित रूप से करने वालों को साधुवाद। :)

बुधवार, 20 मई 2009

याद आई फैशन परेड

पिछले दिनों मेरे नानीजी श्रीमती राधादेवी हर्ष जयपुर से बीकानेर आई। अपने आवश्‍यक काम निपटाने के दौरान एक दिन मुझे पुराने घर बुलाया और मुझे एक शर्ट दिया। लाल चौकड़ी वाला। यह शर्ट मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में  पहनता था। मैंने मुस्‍कुराते हुए पूछा ये फैशन परेड के लिए है क्‍या ?

तो नानीजी भी हंस पड़ी बोली तुम्‍हें नहीं दे रही, कान्‍हे की मां को दे देना। यह सामान्‍य काम था। मोटरसाइकिल में शर्ट की थैली को अटका लिया। घर आया तो याद आया कि शर्ट पड़ा है। मैंने बताया कि कान्‍हे के लिए नानीजी ने कोई शर्ट भेजा है वह मेरा पुराना शर्ट है। कान्‍हे की मां दौड़ी- दौड़ी बाहर गई और शर्ट ले आई। हाथों-हाथ कान्‍हे को पहनाकर दिखाया। उस समय कान्‍हे और उसकी मां की आंखों की चमक देखने लायक थी। पता नहीं पुरुष हूं इसलिए या मूढ हूं इसलिए, मुझे कभी समझ नहीं आया कि पुराना शर्ट कुतूहल कैसे पैदा कर सकता है। जो भी हो मुझे अपनी फैशन परेड याद आ गई।

फैशन टीवी के जमाने से बहुत साल पहले मेरे घर में फैशन परेड का जमाना आ गया था। साल में दो बार यह परेड होती। रंगबिरंगे कपड़े, जमा जमाया रैम्‍प और केवल जज। हां जी जितने दर्शक होते उतने ही जज होते। एकाध आया-गया भी अपनी राय जरूर भेंट चढ़ा जाता। बस तकलीफ तब होती जब अनफिट कपड़ों में हमें फिट करने का प्रयास किया जाता। सर्दियां खत्‍म होकर गर्मियां शुरु हो या गर्मियां खत्‍म होकर सर्दियां शुरू हो। नानीजी पुराने कपड़े निकालकर बैठ जाती और मुझे और भाई आनन्‍द को एक एक कर आवाज देती। बीते मौसम में कम बार पहने हुए कपड़े, मामा के कपड़े और मामा के मामा के कपड़े और कई साल पहले सिलाई हुए कपड़े। सब एक जगह पड़े होते। पैंट की हाफपेंट बनती और शर्ट की बंडी। कुल मिलाकर कपड़ों में हमें फिट किया जाता। अब ये कपड़े दुरुस्‍त भी लग रहे हैं या नहीं इसे देखने के लिए अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक चलना होता और वहां से लौटना होता। ड्रेस डिजाइन, कांबिनेशन, लैंथ, चालू फैशन को किसी तरह मैच करने का प्रयास किया जाता। गर्मी की छुट्टियों में नानीजी (जो खुद अध्‍यापिका थी) हमारी तरह पूरी तरह फ्री होती। तो, किसी भी सुबह यह क्रम शुरू हो जाता और अगले कई दिन तक जारी रहता। इस दौरान जा पहचान के लोग, रिश्‍तेदार और मामाओं के दोस्‍त तक मिलने के लिए आते। हर किसी की अपनी राय होती। किसी को रंग की फिक्र होती तो किसी को डिजाइन की, कोई कांबिनेशन पर ध्‍यान देता तो कोई बचत के प्रति जागरुक दिखाई देता। पचासों ड्रेस ट्राई करने के बाद पांच-सात ड्रेस ऐसी होती जिनको कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के लिए रख लिया जाता और अधिकतम राय जुटाने के प्रयास किए जाते। इसी क्रम में सात ड्रेस को उनचास बार पहनकर दिखाना पड़ता और रैम्‍प वही रहता। अन्‍दर वाले कमरे से आंगन पार करते हुए गैलेरी तक। कई दिनों तक चलने वाले इस क्रम में अगर हम दोनों में से कोई 'बागी' हो जाता तो उसकी खैर नहीं। नानीजी झल्‍ला जाते। कहते मैं इतनी मेहनत से इन बच्‍चों के लिए यह काम कर रही हूं और इन्‍हें कदर ही नहीं है। हम हारकर फिर से परेड में जुट जाते।

 

हमारी बगिया में खिला एक और सुंदर फूल

<KENOX S760  / Samsung S760>

मुझे इसका नाम पता नहीं है। यह आकार में काफी छोटा है और हमारा माली इसे फुलवारी कहता है। किसी को पता हो तो बताने की कृपा करें।

मंगलवार, 12 मई 2009

जब अवार्ड लेकर आया था।


जनवरी में राजस्‍थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्‍कारों में बीकानेर की जस्‍ट टीम को मिला बैस्‍ट स्‍पेशल कवरेज कैटेगरी में अवार्ड। लेने मुझे भेजा गया था। चित्र में दाएं से दूसरे आगे बैठे हुए पत्रकारों में से एक। 

सोमवार, 11 मई 2009

छोटे शहर के वाशिंदे और रंगीन पल

यह बीकानेर का सार्दुल सिंह सर्किल है। बीकानेर रियासत के कुछ विश्‍वप्रसिद्ध राजा हुए हैं। उनमें से एक थे सार्दुल सिंह। यह फोटो संभवतया अजीज भाई का खींचा हुआ है। बीकानेर स्‍थापना दिवस, छब्‍बीस जनवरी और पंद्रह अगस्‍त को यह इसी तरह रौशन होता है।

 
मुशायरा 
मेरा एक ही दोस्‍त ऐसा है जो शेरो शायरी करता है। वली मोहम्‍मद गौरी। फ्रेंड्स एकता कमेटी बना रखी है। इसी नाम से फ्रेंड्स एकता पार्क भी है। इसी पार्क में वली भाई मुशायरा करते हैं। हिन्‍दी, अंग्रेजी और राजस्‍थानी के कवियों को भी बुला लेते हैं। फिर इसे नाम दिया जाता है विविध भाषा या बहुभाषा कविता संगोष्‍ठी। मैंने एक बार शिरकत की थी। यह शिरकत शब्‍द भी वहीं से सीखकर आया हूं। नीचे दिया गया फोटो हमारे फोटो अजीज भुट्टा जी का खींचा हुआ है। मेरे दोस्‍त का है सो मैंने लगा लिया है। माइक पर मुंह लगाए बैठे हैं वली मोहम्‍मद गौरी। साथ में अन्‍य विधाओं के कवि और गणमान्‍य लोग भी बैठे हैं। (अब वली भाई गा रहे हैं तो कोई तो झेलेगा ही। :) )



सेलिब्रिटी मेरे साथ ... 
और यह है राजा हसन। इसने बहुत जिद की तो मैंने इसके साथ फोटो खिंचवा लिया। वैसे ऑफिस में सब कह रहे थे कि मैं जिद कर रहा था। पता नहीं मुझे स्‍पष्‍ट याद नहीं है। लेकिन आप लोगों को राजा हसन याद होगा। सारेगामापा में राजा ने जो वंदे मातरम गाया था। उस परफार्मेंस में तो राजा ने रहमान को भी पीछे छोड़ दिया था। यह वही राजा हसन है। 


अगली बार फिर कुछ दृश्‍य एकत्र करने की कोशिश करूंगा। जैसा कि ज्ञानदत्त पाण्‍डेजी कहते हैं कैमरा तो पोस्‍ट एम्‍बेडेड गैजेट है। 

गुरुवार, 7 मई 2009

कुछ ऐसा है मेरा बीकाणा

चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान कैमरा भी हाथ में था सो कुछ तस्‍वीरें ऐसी भी ली जो भले ही चुनाव के काम की न हो लेकिन बीकानेर को प्रदर्शित करने वाली हो सकती हैं। 

मैंने अपनी नजर से बीकानेर को पेश करने का प्रयास किया है। गौर फरमाइए। 

  
छोटा फॉर्म हाउस। वैसे रेगिस्‍तान में अरंडी का पेड़ भी वृक्ष की शोभा पाता है। यहां तो सचमुच का पेड़ है। हां भरा नहीं है लेकिन पूरा है। पुराने तरीके की झोंपड़ी। आजकल तो बीकानेर में टूरिज्‍म के लिहाज से भी झोंपडि़यां बनने लगी हैं। उनमें एसी और कूलर भी लगे होते हैं।

धोरों पर बनने वाली ये लकीरें आम दिनों में अधिक स्‍पष्‍ट होती है। मैं जिस क्षेत्र में था वहां वनस्‍पति बढ़ने लगी है सो धोरे कम हो रहे हैं और धूल की लकीरें भी। 

भीषण गर्मी में कीकर की छांव में भेड़ें आराम फरमा रही हैं। 
आ लेके चलूं तुझे ऐसे गगन के तले, जहां गम भी न हो आसूं भी न हो
 
रेगिस्‍तान के जहाज के लिए चालीस डिग्री तापमान कुछ भी नहीं है। वह आराम से बैठा है। :)