बुधवार, 26 अगस्त 2009
बाबे के पीरत्व में कमी
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, 25 अगस्त 2009
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बैठकर...
यहां बीकानेर में पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बैठकर एक भारतीय दिल्ली और शिमला में हो रही उठापटक के क्या मायने देख सकता है। मुझे सोचता हूं कि सिंधु नदी के इस पास सुदूर दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और उत्तर में हिमालय के बीच गोथळी की तरह तीन दिशाओं से सुरक्षित है। इस भूभाग को हमेशा पश्चिमी कोने से आए विदेशियों का इंतजार रहा है। भले ही वे हमें अच्छे लगें हों या नहीं लेकिन उनका आना और हमें प्रभावित करने का सिलसिला अब भी जारी है और आगे भी जारी रहना चाहिए। वरना हम नए विचारों के अभाव में सड़ने लगेंगे।
पश्चिम और पश्चिमी लोगों के प्रति भारतीयों का रैवेया हमेशा स्वागत वाला रहा है। इतिहास बताता है कि कई बार पश्चिमी आक्रांताओं ने भारत को लूटा लेकिन भारत ने कभी इस राह में चीन जैसी दीवार बनाने की नहीं सोची। क्योंकि नए विचार और क्रांतियां भी इधर से ही आ रही थी। सतत क्रांति के दौर से गुजर रहे भारत को लगातार ताजी बयार की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि जड़ मानसिकता वाले लोग इस बयार और ताजे विचारों का विरोध करने लगते हैं। मुझे लगता है यही द्वंद्व है।
जिन्ना को लेकर हिन्दू उग्रवादी संगठन का अपने ही नेता के प्रति रेवैया यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या वास्तव में सीमा हमें इस कदर काटकर रख देती है कि हम उस पार की अच्छाई या बुराई या तटस्थ विचार भी बयान नहीं कर सकते। वह भी ऐसे संगठन में जो राष्ट्रीय होने का दंभ भरता है। शायद सीमा पर रहने वाले बहुत से लोग जमीन और इंसानों से घृणा नहीं भी करते हैं। घृणा के लायक बस गंदी राजनीति ही हो सकती है जो सीमाओं को बांधे रखती है। वरना तो मीलों तक पसरे रेगिस्तान में कभी भी जामों की अदला-बदली भी हो सकती है। भले ही जमीन पर बाड़ खींच दी गई हो, लेकिन आंखें देखती हैं कि हम भी नहाते-धोते हैं, हंसी मजाक करते हैं और वे भी। हमारे पास भी पशु और धान हैं और उनके पास भी। वे भी उतने ही जिंदा और ईश्वर के करीब हैं जितने हम। विदेश मंत्री रहने के दौरान और विदेशी जमीन पर स्थापित कंपनियों में भारतीयों और पाकिस्तानी नागरिकों को एक थाली में खाते देख जसवंत सिंह ने भी पार्टी और संघ की लघु सोच पर विचार किया होगा। यह इसलिए हुआ होगा क्योंकि नागपुर में उनका ब्रेनवाश नहीं किया जा सका था। अपनी अधिकांश उम्र छद्म राष्ट्रवाद और हिन्दुवाद में झोंक देने के बाद जब इस व्यक्ति ने अपने विचार व्यक्त किए तो मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए इक्का-दुक्का मुस्लिम लीडर शामिल कर चुकी भाजपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
विभाजन से पहले और बाद में बहुत सा हिन्दुतान बचा रह जाता है। हालांकि अब उसका कुछ भाग पाकिस्तान के पास है लेकिन यादों का क्या करें?
विभाजन की त्रासदी को जिन लोगों ने झेला हैं उनमें से कुछ को मैं भी जानता हूं। सीमा से बिल्कुल सटे बीकानेर में ऐसे बहुत से परिवार हैं जो सिंध में अपना चलता कारोबार छोड़कर यहां आ बसे। जो कुछ साथ लाए थे वह भी जल्द ही खत्म हो गया। उन लोगों ने शून्य से शुरूआत की और अब तक अच्छी स्थिति में आ चुके हैं। विभाजन का दर्द कम भले ही न हुआ हो लेकिन कुछ धुंधला पड़ने लगा है। वह अब रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित नहीं करता। वे लोग सिंध से आए तो सिंधी भाषा और संस्कृति भी अपने साथ लेते आए। कुछ झूलेलाल को मानने वाले हैं तो कुछ वल्लभाचार्य के वैष्णव हैं। पिछले दिनों सिंधी समाज के बिल्कुल करीब जाने का अवसर मिला। तो पता चला कि पुष्करणा भी सिंधी ही हैं। यानि मैं भी सिंध से ही आया हुआ हूं। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। लेकिन सिंधी समाज के लोग जिनसे मैं बात कर रहा था, यह बात इतनी सहज होकर कह रहे थे कि बात मेरी समझ में नहीं आई। तो एक पढ़े लिखे सज्जन ने बताया कि अरे सांई, हम तो पचास-साठ साल पहले ही आए हैं, तुम तीन-चार सौ साल पहले आ गए थे। मैं इंटरव्यू कर रहा था और कई लोग बैठे थे सो सोचने का समय नहीं था। मैंने बात वहीं खत्म कर दी। घर आया तो यही बात दिमाग में घूम रही थी। पुष्करणा ब्राह्मणों में भी लालवाणी, सत्याणी और देवाणी की तरह कीकाणी, लालाणी और केशवाणी जैसी जातियां होती हैं। तो मेरे लिए यह स्वीकार करना अधिक आसान हो गया कि मैं भी इन सिंधियों की तरह इस भारत भूमि पर सिंध प्रांत से आया बंदा हूं। बस अंतर इतना है कि मैं तीन-चार सौ साल पहले आ गया था। यानि भारत ने इतने वर्ष पहले ही मुझे स्वीकार कर लिया था। विभाजन तो बहुत बाद की घटना है। विभाजन के बाद पाकिस्तान बना और अब तो सिंध प्रांत से आने वाली हवा को भी घृणित समझा जाने लगा है। अगर वह हमारा, कम से कम पुष्करणा समाज का उद्गम स्थल है तो मैं तो उस स्थान से घृणा नहीं कर सकता। दूसरे लोगों के लिए भी केवल यही कारण नहीं हो सकता घृणा करने का, कि वह उनका उद्गम स्थल नहीं है। इसी आधार पर मैं भी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश से घृणा नहीं कर सकता। एक हिन्दु ब्राह्मण होने के बावजूद सिंध से अपना कुछ जुड़ाव महसूस करता हूं और सोचता हूं, क्या उधर भी कुछ सोचने विचारने और देश व संप्रदाय की सीमाओं को ताक पर रखने वाले लोग होंगे।
इसका जवाब मिला अपने मामा से। वे एक दशक से अधिक लम्बे समय तक डिफेंस रिसर्च एण्ड डवलपमेंटल ऑर्गनाइजेशन की दिल्ली लैब में रहे। पिछले दिनों निदेशक के पद से सेवानिवृत्त होकर बीकानेर लौट आए हैं। डीआरडीओ में काम करने से पहले वे बीस साल तक अमरीका में थे। बाद में कलाम के बुलावे पर भारत लौटे। बातचीत में एक बार उन्होंने बताया कि उनके दो दोस्त थे और एक प्रतिद्वंदी। दोस्तों में एक अमरीकी था और एक पाकिस्तानी। प्रतिद्वंदी कश्मीरी था। वह अपने काम में इतना अधिक दक्ष था कि हमेशा कड़ी चुनौती दिए रखता था। काम को पूरा करने में अमरीकी और पाकिस्तानी दोस्त हमेशा उनकी मदद करते थे। मेरे लिए उन दिनों यह सोचना भी टेढ़ा काम था कि एक पाकिस्तानी उनका खास दोस्त है। मैं कौतुहल से पूछता तो वे हंसते। कहते वहां सब एक हो जाते हैं। देशों की सीमाएं संस्थानों में लुप्त हो जाती हैं। तभी अमरीका इतनी तरक्की कर पा रहा है। क्या भारत भी ऐसा कर सकता है। या ऐसा ही चलता रहेगा कि उन्मुक्त विचारों का गला घोंटने के लिए कुछ संगठन प्रतिगामी क्रियाओं में ही व्यस्त रहेंगे।
कभी सोचता हूं भारतीय मतदाता भी इसमें बराबर के दोषी हैं...
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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बुधवार, 19 अगस्त 2009
दो मामा की भूखी भानजी
अनाथ चंपूबाई के दो मामा हैं। छोटे हैं जो हल्दी की गांठ लेकर पंसारी की दुकान चलाते हैं और बड़े ट्रेडिंग से जुड़े हैं। वे पुराने सामान से लेकर घर के बर्तनों तक की ट्रेडिंग करते हैं। जब चंपूबार्इ के बड़े मामा की शादी पक्की हुई तो ससुराल वालों ने पूछा था कि मामा क्या करते हैं। तो नानी ने अश्वत्थामा हतोहत: की तर्ज पर झूठ बोल दिया कि बड़ा बर्तन बेचता है। उनके ससुराल वालों को बाद में बहुत गुस्सा आया जब पता चला कि बड़ा तो घर के ही बर्तन बेचता है और पैसा बैंक में जमा कर देता है। शादी में मिले बर्तन भी बड़े ने बेच दिए और पैसा बैंक में जमा करा दिया। नाना ने पूछा कि क्या करोगे बेटा पैसा जमा करके। तो बेटा बोला किसी दिन लौटा लाएंगे बड़ी योजनाओं के लिए। तो नाना ने समझाया बड़ी योजनाएं तो मेरा खून चूसने के लिए ही बनाई जाती है फिर तेरा पैसा कहां काम आएगा। लेकिन बड़ा अड़ा रहा। बर्तन बिक गए। घर में खाना पकना बंद हुआ तो घर के बच्चों ने सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिल रहे मिड-डे मील को खाना शुरू कर दिया। बड़ा मामा खुश था। क्योंकि नाना के ही पैसों से अभियान चल रहा था। बड़ी योजना थी।
अब हाल छोटे का। नाना ने सोचा कि छोटे की भी शादी कर देते हैं। बहु कान खींचेगी तो बड़े से धन निकलवा लेगा। शादी हो गई। शादी होते ही छोटा प्रसन्नचित्त रहने लगा। न दिन का ख्याल न रात का जीभरकर मजे लूट रहा था। नाना को गुस्सा आ गया। एक दिन बिस्तर से बाहर खींचा और फेंक दिया बड़े के कमरे के आगे। और कोई चारा न देखकर छोटा बड़े के कमरे में डरते-डरते दाखिल हुआ और पता नहीं क्या सांठ-गांठ हुई कि बड़े ने कई बड़ी योजनाएं छोटे को पकड़ा दी। छोटा खुशी-खुशी योजनाएं लेकर अपने कमरे में दाखिल हो गया। नाना देखते रह गए। अब दोनों मामाओं की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढाही में। बाकी बच गए तीन जन। नाना, नानी और अनाथ चंपूबाई। न बड़े ने खाने का पूछा न छोटे ने। दोनों अपनी-अपनी बीवीयों और बच्चों के साथ होटल गए और खाना खा आए। चंपूबाई अब भी देख रही थी। धान की गैळ में दोनों मामाओं को घर में बैठी चंपूबाई दिखी ही नहीं। दोनों अपने-अपने कमरों में जाकर सो गए। रात को बड़ी मामी ने मामा से पूछा चंपू ने क्या खाया तो बड़े ने कहा छोटा लाया होगा चंपू के लिए। उधर छोटी मामी ने मामा से पूछा तो छोटे मामा ने कहा बड़ा कुछ लाया होगा चंपू के लिए। दो मामाओं की भानजी चंपू को कुछ नहीं मिला।
भूखी चंपूबाई रातभर भूख से तड़पती रही। कुछ दिन यही क्रम चलता रहा। चंपूबाई की भूख बढ़ी तो बाहर निकली और गंगू के घर पहुंच गई। वहां जमकर खाया और घर के राज बताए। गंगू को यही तो चाहिए था। वह घर में घुसा और तोड़-फोड़ मचाकर निकल गया। मामा सोते रह गए। सुबह मामाओं की आंख खुली तो पता चला कि घर में तोड़ फोड़ हुई है। अब दोनों एक दूसरे पर दोष मंढने लगे। चंपूबाई रातभर की जागी हुई थी और भोर में खाना मिला था सो लम्बी तान के सो गई। नाना भूखे बैठे किनारे की ओर बैठे देख रहे थे और हंस रहे थे। शाम ढलने तक मामा लड़ते रहे, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।
जब तक राज्य और केन्द्र के मामाओं के बीच हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा यो ही भूखों मरेगी तब तक घर में आतंकी हमले होते रहेंगे। घर को योजनाओं के नाम पर मामा खा रहे हैं और चंपूबाई भूख से बेहाल होकर गंगू के हाथों दो रोटी की एवज में बिक रही है। अब तक मेरी समझ में यह स्पष्ट नहीं है कि करप्शन ऊपर से नीचे आता है या नीचे से ऊपर जाता है।
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सोमवार, 3 अगस्त 2009
ओपन सोर्स ब्लॉगिंग का वक्त आ गया है
पिछले दिनों चिठ्ठा चर्चा में चोरी पर पूरी एक पोस्ट बन गई थी। तब उसमें हो सकता है बहुत से लोगों का ध्यान गया हो लेकिन मुझे इस कमेंट ने बहुत प्रभावित किया। यह था कि आप खुद को स्वतंत्र महसूस करें मेरे लेखों को चोरी करने के लिए। निशांत मिश्राजी ने इसके प्रति ध्यान आकृष्ट किया था। मैं पहुंच गया वहां मिले जैन हैबिट्स के Leo Babauta। टाइटल था Open Source Blogging: Feel Free to Steal My Content.
मुझे बात जम गई। पहले भी ब्लॉगिंग की रीति नीति और हां साहित्य को लेकर काफी चर्चा हो चुकी है। इन सबको देखते हुए मैं ओपन सोर्स ब्लॉगिंग को करारा जवाब मान सकता हूं। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि वास्तव में कॉपीराइट एक्ट और कुछ नहीं बस आपके विचारों को रोकने का एक साधन है। क्या हुआ अगर किसी व्यक्ति ने मेरा कोई लेख उठा लिया। अगर वह इस लेख को आगे प्रचारित करता है तो खुश होने की बात है कि मेरी क्रिएटिविटी (जितनी भी है) का आगे प्रसार हो रहा है। विचार लगातार आगे बढ़ रहा है। विचार तो ऐसी ही चीज है जितना आगे बढ़ेगा उतना ही प्रबल होगा।
प्रिंट या अन्य प्रकाशन माध्यमों में कॉपीराइट लगाने की कोशिश अकसर प्रकाशक ही करता है न कि लेखक। लेखक को तो खुशी ही होती होगी जब कोई उसके ही विचारों को अधिक समृद्ध रूप में वापस उसके सामने लेकर आए। लेकिन प्रकाशकों को इससे नुकसान होता है। कुछ समय पहले पॉल कोएलो ने भी कुछ इसी तरह से अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उनकी पुस्तक द एल्केमिस्ट की करोड़ो प्रतियां बिक जाने के बाद पॉल ने अपने प्रकाशकों को कहा कि अब इस किताब को मुफ्त जितना सस्ता या मुफ्त कर देना चाहिए। लेकिन प्रकाशकों ने उनकी सुनी नहीं। और किताब अब भी बिक रही है। पॉल ने प्रकाशकों से बदला लेने के लिए चार पुस्तकें और लिखी और उन्हें ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध करा दिया है। जब मैं बबूता को पढ़ रहा था तो मेरे दिमाग में लगातार पॉल ही घूम रहे थे। एल्केमिस्ट के बाद मुझे इलेवन मिनट्स हाथ लगी तो मैंने सोचा कि पॉल ऐसे अंधे हैं जिनके हाथ एल्केमिस्ट का बटेर लग गया होगा। छोटे शहर में रहने का यही नुकसान है कि बाहर क्या चल रहा है पता ही नहीं चलता। चर्चा करने वाले दोस्त भी सब बाहर जा चुके हैं। ठीक है इसके बाद वैल्केरीज हाथ आई। इस पुस्तक ने फिर से पॉल के प्रति रुचि जगा दी। यहां के एक पुस्तक विक्रेता पर दबाव डालकर जहीर मंगवाई और पढ़ी, लेकिन मैं एक प्रतिशत भी विश्वास नहीं कर रहा था कि पॉल मुफ्त किताबें भी देंगे।
इन पुस्तकों को आप भी यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। ये बिल्कुल मुफ्त हैं और पीडीएफ फार्मेट में उपलब्ध हैं। पॉल के इस कदम ने मुझे प्रकाशकों की सोच पर एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। बहुत से लोग बहुत क्रिएटिव होते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक विचार मिलने पर उसकी इतनी शानदार पॉलिश करते हैं कि विचार पैदा करने वाला भी अचंभित रह जाता है। मैं ऐसे लोगों का उतना ही सम्मान करता हूं जितना कि विचार पैदा करने वाले का।
बबूता की सलाह और पॉल के कदम से प्रेरित होकर मैंने भी अपने ज्योतिष दर्शन ब्लॉग पर लगाए गए डिस्क्लेमर को बदल दिया है। अब मेरे लेखों को आप कभी भी कहीं भी इस्तेमाल कर सकते हैं। जैसा कि निशांत जी कहते हैं अगर आप अपने ब्लॉग से दो पैसे भी नहीं कमा रहे हैं तो अपने लेखों को मुक्त कर दीजिए। ठीक है मैं पैसे नहीं कमा रहा लेकिन अपने सृजन को तो कीमती मानता ही हूं। इसके बावजूद अपने विचार को आगे बढ़ाने के लिए मैं चाहूंगा कि सौ से अधिक रीडर रोजाना वाले मेरे ब्लॉग से कोई पोस्ट कॉपी की जाए और उसे दो सौ रीडर रोज पढ़ें।
शायद गणेश जी ने कहा तथास्तु...
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गुरुवार, 16 जुलाई 2009
अकेला केला ही कर दिखाएगा
अभी मेल से मुझे केले के बारे में विशद जानकारियां हासिल हुई हैं। मैंने कॉपी पेस्ट कर इसे यहां पोस्ट में ठेला है। आप भी देखिए क्या फायदे हैं अकेले केले के ही।
Two Bananas a Day Keep all Doctors Away
Never put banana in the refrigerator! !!
Bananas contain three natural sugars - sucrose, fructose and glucose combined with fiber. A banana gives an instant, sustained and substantial boost of energy.
Research has proven that just two bananas provide enough energy for a strenuous 90-minute workout. No wonder the banana is the number one fruit with the world's leading athletes.
But energy isn't the only way a banana can help us keep fit.
It can also help overcome or prevent a substantial number of illnesses and conditions, making it a must to add to our daily diet.
Depression: According to a recent survey undertaken by MIND amongst people suffering from depression , many felt much better after eating a banana. This is because bananas contain tryptophan, a type of protein that the body converts into serotonin, known to make you relax, improve your mood and generally make you feel happier.
PMS: Forget the pills - eat a banana. The vitamin B6 it contains regulates blood glucose levels , which can affect your mood.
Anemia: High in iron, bananas can stimulate the production of hemoglobin in the blood and so helps in cases of anemia.
Blood Pressure: This unique tropical fruit is extremely high in potassium yet low in salt, making it perfect to beat blood pressure. So much so, the US Food and Drug Administration has just allowed the banana industry to make official claims for the fruit's ability to reduce the risk of blood pressure and stroke.
Brain Power: 200 students at a Twickenham (Middlesex) school were helped through their exams this year by eating bananas at breakfast, break, and lunch in a bid to boost their brain power. Research has shown that the potassium-packed fruit can assist learning by making pupils more alert.
Constipation : High in fiber, including bananas in the diet can help restore normal bowel action, helping to overcome the problem without resorting to laxatives.
Hangovers : One of the quickest ways of curing a hangover is to make a banana milkshake, sweetened with honey. The banana calms the stomach and, with the help of the honey, builds up depleted blood sugar levels , while the milk soothes and re-hydrates your system.
Heartburn: Bananas have a natural antacid effect in the body, so if you suffer from heartburn, try eating a banana for soothing relief.
Morning Sickness : Snacking on bananas between meals helps to keep blood sugar levels up and avoid morning sickness .
Mosquito bites: Before reaching for the insect bite cream, try rubbing the affected area with the inside of a banana skin. Many people find it amazingly successful at reducing swelling and irritation.
Nerves: Bananas are high in B vitamins that help calm the nervous system.
Overweight and at work? Studies at the Institute of Psychology in Austria found pressure at work leads to gorging on comfort food like chocolate and crisps. Looking at 5,000 hospital patients, researchers found the most obese were more likely to be in high-pressure jobs. The report concluded that, to avoid panic-induced food cravings, we need to control our blood sugar levels by snacking on high carbohydrate foods every two hours to keep levels steady.
Ulcers: The banana is used as the dietary food against intestinal disorders because of its soft texture and smoothness. It is the only raw fruit that can be eaten without distress in over-chronicler cases. It also neutralizes over-acidity and reduces irritation by coating the lining of the stomach.
Temperature control : Many other cultures see bananas as a "cooling" fruit that can lower both the physical and emotional temperature of expectant mothers. In Thailand, for example, pregnant women eat bananas to ensure their baby is born with a cool temperature.
Seasonal Affective Disorder (SAD):Bananas can help SAD sufferers because they contain the natural mood enhancer tryptophan.
Smoking & Tobacco Use: Bananas can also help people trying to give up smoking. The B6, B12 they contain, as well as the potassium (K) and magnesium (Ma) found in them, help the body recover from the effects of nicotine withdrawal .
Stress: Potassium is a vital mineral, which helps normalize the heartbeat, sends oxygen to the brain and regulates your body's water balance. When we are stressed, our metabolic rate rises, thereby reducing our potassium levels. These can be rebalanced with the help of a high-potassium banana snack.
Strokes: According to research in "The New England Journal of Medicine, 'eating bananas as part of a regular diet can cut the risk of death by strokes by as much as 40%!
Warts: Those keen on natural alternatives swear that if you want to kill off a wart, take a piece of banana skin and place it on the wart, with the yellow side out. Carefully hold the skin in place with a plaster or surgical tape !
So, a banana really is a natural remedy for many ills. When you compare it to an apple, it has four times the protein, twice the carbohydrate, three times the phosphorus, five times the vitamin A and iron, and twice the other vitamins and minerals . It is also rich in potassium and is one of the best value foods around So maybe its time to change that well-known phrase so that we say, "A banana a day keeps the doctor away!"
PS: Bananas must be the reason monkeys are so happy all the time!
Shine your shoesJ Take the INSIDE of the banana skin, and rub directly on the shoe...polish with dry cloth.......
Shine your face J Mix banana with honey and a bit of lemon juice, make paste, apply on your face (beware of skin allergy- so make a test doze first), keep for half an hour every day before sun-rise and wash out... and Your face will shine like fresh banana....
Amazing fruit, really the banana, bringing consolation to the whole humanity.... .....and rather cheap.....So get going...
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सोमवार, 13 जुलाई 2009
उड़न तश्तरी की सबसे लम्बी टिप्पणी :)
आज कुछ ऐसा हाथ लगा कि सोचा सबको बताया जाए। यह है एक टिप्पणी। हमारे समीर भाई की टिप्पणी। जिनके बारे में ब्लॉगजगत में मशहूर है कि वे उम्दा, बढि़या, रोचक, लगे रहिए, आभार से अधिक कम ही लिखते हैं। प्रतिदिन सैकड़ों पोस्ट जो पढ़ने होते हैं। लेकिन इस बार समीरजी को एक इश्यू ने ऐसा झकझोरा कि उन्होंने पोस्ट के साइज की टिप्पणी दे मारी। वहां की टिप्पणी को में यहां उठा लाया। ताकि सभी लोग उसे देख परख सकें। कहीं टिप्पणी बक्से में गुम न हो जाए।
तो पहले मैं किस्सा बताने की कोशिश करता हूं। रवि रतलामीजी ने राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग? में ब्लॉग और साहित्य के बारे में गुड़ी मुड़ी चर्चा की। हमारे इस जगत के तूफानी लेखकों में से एक बालसुब्रमण्यमजी ने सवाल दागा कि क्या ब्लोग साहित्य है? इस पर शिव कुमार मिश्र जी ने कहा कि वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं? पर बहस अब पुरानी हो चुकी है। इसी पोस्ट तक आते आते समीरजी ब्लॉग और साहित्य के बीच गुल्ली डंडा करते हुए उकता गए और दे मारी मैराथन टिप्पणी। आप ऊपर दिए तीनों लिंक पर जाकर किस्सा समझें और बाद में समीरजी की टिप्पणी पढ़ें। पहले यह किस्सा मुझे मालूम नहीं था। कुछ पता था। इसी दौरान एक पोस्ट मैंने भी लिख मारी कि ब्लॉग साहित्य नहीं है। कन्फर्म। यहां तक आते आते तो समीरजी हाथ पर हाथ रखकर बैठने को तैयार हो गए थे। लेकिन उससे पहले की पोस्ट और उस पर कमेंट का अवलोकन करने के लिए प्रस्तुत है।
समीर भाई शिव कुमार मिश्रजी की पोस्ट में कहते हैं
कोई मुझे साहित्य की स्पष्ट परिभाषा बतलाने का कष्ट करे तो आजीवन आभारी रहूँगा और आगे से लेखन को उस परिभाषा की कसौटी में कस कस कर निचोड़ कर ब्लॉग को अरगनी मान सूखने फैला दिया करुँगा. जब हिट्स की चटक धूप में सूख जायेगा तो प्रतिक्रियाओं में मिले अंगारों को इस्तेमाल कर इस्त्री करके किताब की शक्ल में लाऊँगा..सब करुँगा..बस कोई मुझे साहित्य की स्पष्ट परिभाषा बतलाने का कष्ट करे.
साहित्य न हुआ, बीरबल की खिचड़ी हो गई-किसी को पता ही नहीं कितना पकाना है. कभी जैसे राहुल साकृत्यायन और किपलिंग को कह दिया कि पक गई पक गई..अभी खाये भी ठीक से नहीं कि कहने लगे नहीं पकी, नहीं पकी. मजाक बना कर रख दिया है. क्यूँ?
हे प्रभु, क्या जमाना आया है कि अब चार लोग चश्मा लगा कर बतायेंगे कि क्या साहित्य है और क्या नहीं..पाठक क्या घास छिलने को बनें हैं.
मानो आप हमें चपत लगा लगा कर साहित्य रचवा भी लो सिखा पढ़ा कर-फिर पाठक, उनको भी चपत लगाओगे क्या कि चल अब पढ़ इन्हें, ये साहित्यकार हैं. जी लेने दो, महाराज और आप भी जिओ. समय सबके पास लिमिटेड है, लेखक के पास भी और पाठक के पास भी, उस पर से बीच में बैठे आप छाना बीनी में लगे हैं, जबकि सबसे कम समय आप ही के पास है (औसत के हिसाब से):). ये सब छोड़ कर, माना आप ही कागज लुग्दी में साहित्य रच रहे हो, तो रचते काहे नहीं भई. यहाँ क्या करने तराजू लिये चले आ रहे हो? यहाँ तो इलेक्ट्राँनिक तराजू है. बटन दबाओ, झट छपो और पाठक बोले. कागज लुग्दी वाला बट्टा बाट और काँटा मारी की कम ही गुंजाईश है, इससे तो परेशान नहीं हो गये कहीं.
खैर जो मन आये सो करो. हमारे शिव बाबू हम सब की बात कह दिये हैं. वे सो गये हैं और अब हम भी चले सोने!! राम राम जी की!!
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शनिवार, 11 जुलाई 2009
ब्लॉग साहित्य नहीं है। कन्फर्म.
मैंने दो प्रवृत्तियां स्पष्ट तौर पर देखी हैं। पहली जो परिवर्तन हो रहा है उसे स्वीकार नहीं करना और दूसरी कि जो नया है उसे पुराने के भीतर फिट करने का प्रयास करना।
अपनी बात कहने से पहले एक किस्सा सुनाना चाहता हूं। कुछ दिन पहले हमारे ग्रुप में बात हो रही थी। कुछ महीने पहले कह सकते हैं। ग्रुप के सभी लोगों के पास ऑरिजिनल विंडो एक्स पी सर्विस पैक थ्री था। सभी खुश थे और उसी की बातें कर रहे थे। मैंने बीच में तीर चलाया कि रवि रतलामी ने अपने ब्लॉग में बताया है कि माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज सेवन जारी किया है। ग्रुप में सभी लोगों ने ऐसे मुंह बिचकाया जैसे मैंने कोई बचकानी बात कह दी हो। मैंने दोबारा स्ट्रेस किया। तो कुछ साथी भड़क गए। बोले अब तक जितना कस्टमाइजेशन किया है उसका क्या होगा। नई विंडो आएगी तो सबकुछ दोबारा करना पड़ेगा। मोझिला जैसे ब्राउजर को दोबारा टूल करना भी टेढा काम है। बाकी छोटे मोटे सब मिलाकर कम से कम पचास सॉफ्टवेयर दोबारा डालने पड़ेंगे और अपडेट भी लेने पड़ेंगे।
मैं यह बात समझता था लेकिन उम्र के जिस दौर से गुजर रहा हूं हर नई चीज पर जल्दी पहुंचने की कोशिश में लगा हूं। सो मैं विंडो सेवन ट्राइ करने के लिए तैयार था। लेकिन अगर ग्रुप में एक भी बंदा मेरे साथ न हुआ तो फंसने पर सहायता मिलने की बजाय लानतें ही मिलती। अब मैंने पैंतरा फेंका। मैंने कहा कि वे लोग कितने बेवकूफ हैं जो अब तक विंडो 98 से चिपके हुए हैं। उन्हें न तो ग्राफिक्स का आनन्द आता है न यूनिकोड के जरिए हिन्दी लिखने का कुछ अनुभव है। मेरी इस बात पर सभी लोग प्रसन्न हो गए। हम लोग सचमुच आनन्द ले रहे थे। माहौल रिलेक्स हुआ तो मैंने कहा यदि हमने विंडो सेवन के प्रति रिजिडिटी दिखाई तो थोड़े दिन बाद हमारी हालत भी 98 वालों की तरह हो जाएगी। अब हर किसी का माथा ठनक गया। आधे घण्टे तक कैंटीन के बाहर धूप में चाय और सिगरेट चल रही थी। वातावरण नि:शब्द हो चुका था। वहां से उठे तो दो साथी सेवन डाउनलोड करने के लिए तैयार हो गए। रात को अनलिमिटेड मिलता है सो अगले दिन सुबह ही कॉल आ गई कि डाउनलोड कर लिया है ले जाना। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। अब इसे इस्तेमाल कर रहा हूं तो अपने निर्णय पर गर्व होता है।
अब आता हूं मुद्दे पर ब्लॉग को साहित्य कहने वाले लोगों की भी कमोबेश यही स्थिति है। दरअसल किसी ने घर में एसी लगाया है तो वह साहित्य का हिस्सा कैसे हुआ। कोई पुराने ग्रंथ की बातों का अनुवाद पेश कर रहा है तो वह साहित्य कैसे हुआ। कोई किसी मुद्दे को लेकर चिंतन कर रहा है, कोई खबर की जुगाली कर रहा है, कोई भाषा को दुरुस्त करने की बात कर रहा है, कोई घर परिवार के सदस्यों की बात कर रहा है, कोई सुंदर तस्वीरें पेश कर रहा है, किसी को देश की चिंता है, किसी को गलत भाषा के उपयोग की, कोई अपने पुराने साथियों को याद कर रहा है तो कोई तकनीक के बारे में जानकारी दे रहा है। इन सबमें साहित्य का भी एक भाग शामिल है लेकिन सबकुछ साहित्य नहीं है। और न ही इसे होना चाहिए। हम लोगों को प्रकाशन का एक नया माध्यम मिला है। अपनी बात, अपनी भावनाएं और अपनी समझ दूसरे लोगों तक पहंचाने का जरिया मिला है। इसे किसी एक शब्द या विधा से जोड़ देना वैसा ही है जैसे किसी नए ईजाद किए गए उपकरण पर बल्ब या बाइसाइकिल जैसा टैग लगा देना।
एक पत्रकार होने के नाते मैं कह सकता हूं कि ब्लॉग का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि आपके विचारों और प्रकाशन के बीच कोई माध्यम नहीं है। यह बहुत बड़ी बात होती है। जिन लोगों ने पहले अपनी रचनाएं प्रकाशित कराई है उनसे पूछिए कि एक रचना को प्रकाशन के प्रोसेस में कितना इंतजार और मॉडरेशन झेलना पड़ता था। जो लोग आकाशवाणी में बोले हैं वे जानते हैं कि शब्द और समय की सीमाएं कई बार विषय का ही गला घोंट देती हैं। टीवी से जुड़े लोगों को पता है कि विचार और उसके संप्रेषण के बीच हमेशा बाजार खड़ा मिलता है। ऐसे में हर दृष्टि से सृजकों को स्वतंत्र कर देने वाले माध्यम को मैं साहित्य नहीं मान सकता। साहित्य तो इसका एक बहुत छोटा अंश है।
मेरा निजी अनुभव बताता है कि इंटरनेट पर जहां सैक्स सबसे ज्यादा बिक रहा है वहां मनोरंजन पाठक, दर्शक या श्रोता की पहली शर्त है। उसे आनन्द आएगा तो वह रुकेगा। वरना आगे बढ़ चलेगा। यह टीवी तो नहीं है जो आधे घण्टे के सीरियल में बीस मिनट तक कमर्शियल झेलना ही पड़ेगा। इस माध्यम ने जिनता सर्जकों को आजाद किया है उतना ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को भी।
आगे समय है इस आजाद वैश्विक गांव में अपनी पहचान बनाने का। अधिक से अधिक लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हमें इतनी सशक्त और प्रभावी बात करनी होगी कि पढ़ने वाला रुक जाए, सुनने वाला थम जाए और देखने वाला ठगा सा रह जाए। खुद के खर्च पर रचनाएं छापने वाले लोगों से यह माध्यम बहुत आगे निकल चुका है।
बाकी देखते हैं दुनिया इसे किस नजर से देखती है...
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
रविवार, 5 जुलाई 2009
मैं संक्रामक हो गया हूं !!
अब मैं कह सकता हूं कि मैं संक्रामक ब्लॉगर हो गया हूं। पिछले चार-पांच महीने में कई लोगों को ब्लॉग शुरू करवा दिए हैं। इनमें से कुछ ब्लॉग तो अच्छे खासे चल भी रहे हैं। मुझसे बातचीत करने वाले लोग कहते हैं कि थोड़ी देर की बात के बाद ही मैं ब्लॉग-ब्लॉग बोलने लगता हूं। पहले पोस्ट लिखकर पब्लिश करता और लोगों को घर लाकर वह पोस्ट पढ़ाता था। अब जहां भी जाता हूं वहां जीमेल अकाउंट बनवाता हूं और ब्लॉग शुरू करा देता हूं। मेरे कई दोस्त तो मेरी इस संक्रामक बीमारी के कारण मुझसे कटे-कटे भी रहने लगे हैं। :)
इस संक्रमण का सबसे पहला शिकार थे मेरे सीनियर अनुराग हर्ष जी। उन्होंने अपने नाम से ही अपना ब्लॉग शुरू किया। अब एक पोस्ट लिखते है। मुझे दिखाते हैं और ब्लॉगवाणी पर अपने पाठकों के आंकड़े देखते हैं। दूसरा नम्बर रहा पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्ता का। उन्होंने अपना फोटो ब्लॉग WORLD WITH MY EYES बनाया। पहले ही महीने में 55 पोस्ट ठेल दी। मैंने कहा बंधुवर कभी कभार हैडिंग भी लिख दिया करो। अब वे हैडिंग लिखकर पोस्ट में फोटो ठेलते हैं। इससे आगे अभी मैंने बताया नहीं है सो आगे कुछ करते भी नहीं हैं। तीसरा नम्बर कह सकते हैं जूलॉजी के लेक्चरर डॉ. प्रताप कटारिया का। उन्होंने अपने ब्लॉग desert wildlifer में लिखना तो शुरू कर दिया लेकिन पहली पोस्ट मेरे सामने लिखने के बाद आज तक वापस और कुछ लिखा नहीं है। इसके बाद मैंने ट्राइ किया स्तंभकार विनय कौड़ा पर। वे कहते तो हैं ब्लॉग शुरू करने के लिए लेकिन करते नहीं हैं। अगली मुलाकात में उन्हें ब्लॉगर बना ही दूंगा। इसके अलावा फूटी आंख नाम से भी एक ब्लॉग शुरू करवा चुका हूं। लेखक ज्ञान संतोषजी अपना नाम नहीं बताना चाहते सो उनका नाम नहीं दे रहा। हां अभी तक उन्होंने कोई पोस्ट नहीं लिखी है लेकिन शीघ्र ही वे एक कुत््ते का इंटरव्यू छापेंगे।
पिछले दिनों जयपुर गया था। वहां मेरे एक दूर के मामाजी हैं डॉ शिव हर्ष। उन्होंने बीसेक सालों तक अमरीका में हार्ट सर्जन के तौर प्रेक्टिस की और अब वापस जयपुर आकर रहने लगे हैं। उनके कम्प्यूटर में कुछ खराबी आई थी। उसे दुरुस्त कराने के लिए मुझे बुलाया। कम्प्यूटर तो हाथों-हाथ ठीक नहीं हुआ लेकिन उनका ब्लॉग पहले ही बन गया। आप भी देखिएगा भारत में ह्रदय रोग के कारणों और निवारणों पर उनका ब्लॉग हार्ट सिम्पलीफाइड। यह ब्लॉग अंग्रेजी में ही सही लेकिन है केवल भारतीयों के लिए। डॉ शिव पांच दिन में दो पोस्ट ठेल चुके हैं और इसी रफ्तार से आगे बढ़ने वाले हैं। आप वहां पहुंचकर उनकी हौंसला आफजाई कर सकते हैं।
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शनिवार, 4 जुलाई 2009
चल मालिश करा के आते हैं!!?
छोटी काशी बीकानेर में हमेशा ही कुछ न कुछ धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। कुछ बड़े तो कुछ छोटे। एक बार एक महाराज आए। प्रखर जी महाराज। उन्होंने बीकानेर के धरणीधर महादेव मंदिर में 1008 कुण्डीय महायज्ञ शुरू किया था। एक महीने तक मंदिर के पास की सूखी हुई तलाई में होने वाले कार्यक्रम के लिए तलाई को पूरी तरह बालू मिट्टी से ढंक दिया गया। एक बड़ा सभागार बनाया गया। अस्थाई सभागार बड़ा मनोरम था। पास ही प्रखरजी महाराज की कुटिया भी बनाई गई। हजारों लोग तलाई का बदला हुआ रूप देखने पहुंचने लगे। बीकानेर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के 1008 जोड़ों ने इस महायज्ञ के लिए पंजीकरण करा लिया था। आयोजन शुरू होने से पहले उसका जबरदस्त प्रचार किया गया कि यज्ञ में धन की आहूति देने वाले लोगों को गजब का पुण्य मिलेगा। लोगों ने दान देने में कोई कसर नहीं रखी और प्रखर जी महाराज और उनके चेलों ने बटोरने में।
आयोजन शुरू हो गया। हम चूंकि पढ़े लिखे प्रबुद्ध लोगों के परिवार से थे। इसलिए आयोजन से पर्याप्त दूरी बनाए हुए थे। फिर भी कौतुहलवश एक बार जाकर देख आए थे कि कैसा दिख रहा आयोजन स्थल। अभी आयोजन को शुरू हुए पांच-सात दिन ही हुए थे कि मेरा दोस्त प्रभु आया बोला प्रखर जी महाराज के यहां मालिश कराई क्या? वह हमेशा ही मुझे हैरान करता रहा है। इस बार तो अति हो गई। मैंने पूछा प्रखरजी महाराज ने यज्ञ के साथ मसाज पार्लर भी खोला है। वो बोला नहीं प्रखर जी महाराज के साथ एक विदेशी शिष्य है। उसने शक्तिपात की कला सीखी है। उससे शक्तिपात के बारे में बात करना। तो वह मालिश कर देगा। मेरे लिए यह नई जानकारी थी। मुझे असमंजस में देखकर प्रभु बोला चल मेरे साथ मालिश करा के आते हैं। मैं यंत्रवत् उसके साथ निकल पड़ा। शाम का समय था। यज्ञ की आहूतियां अपने अंतिम चरण में थी। पूरा वातावरण संहिता के श्लोकों से गुंजायमान हो रहा था। प्रखरजी महाराज स्थानीय जनप्रतिनिधियों को समझा रहे थे कि वे लोग दस करोड़ रुपए एकत्रित करके उन्हें दें तो वे बीकानेर में एक वैदिक स्कूल स्थापित कर सकते हैं। जिसमें सुरम्य वातावरण में पढ़ाई संभव हो सकेगी। बड़े-बड़े लोग बैठे थे इसलिए बीच में बोलना उचित नहीं लगा लेकिन मन में आया कि सुरम्य वातावरण की इतनी बड़ी कीमत की क्या जरूरत है। हम आगे बढ़ गए। कुटिया के पास ही विदेशी शिष्य कुछ लोगों को शक्तिपात की जानकारी दे रहे थे लेकिन बीकानेर के मारवाड़ी लोगों को बात पल्ले नहीं पड़ रही थी। प्रभु और मैं भी झुण्ड में जाकर बैठ गए। कुछ देर में भीड़ कम हुई तो प्रभु ने भगवाधारी विदेशी शिष्य को अंग्रेजी में बताया कि मैं दर्शन का विद्यार्थी हूं और शक्तिपात के बारे में जानना चाहता हूं। कुछ देर तक बोझिल ज्ञान से सराबोर करने के बाद जब मैं झपकी लेने की स्टेज में आ चुका था तो अचानक उन विदेशी भगवाधारी साधू महाराज ने मेरा सिर सामने से पकड़ा और अपने घुटनों की ओर झुका दिया। वे व्रजासन में बैठे थे। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उन्होंने सिर से लेकर मेरी पीठ के आखिरी हिस्से तक तेजी से अपने हाथ चलाए(पीटा नहीं :))। इससे मेरी आंखें लाल हो गई। आस-पास बैठे लोगों को लगा कि मुझमें शक्तिपात हो गया है। सच कहूं तो मुझे भी एक बार लगा कि शक्ति बढ़ गई है। मेरा बॉस्केटबॉल में स्ट्रेचिंग का अनुभव बताता है कि अच्छी तरह से स्ट्रेच और मसाज हो तो पूरा शरीर हल्का हो जाता है। बस वही फीलिंग उस समय हुई। सिर ऊंचा उठाया तो महाराज ने पूछा क्यों कुछ महसूस हुआ। मैंने नहीं में सिर हिला दिया। महाराज नाराज हो गए और उठकर चले गए।
बाद में मैं काफी देर तक मेले में घूमता रहा। प्रभु ने महाराज के यहां से छूटते ही पूछा कैसी लगी मालिश। मैंने कहा कि मैं सोच रहा हूं कि दोबारा कैसे कराई जाए। :)
साक्षात प्रखरजी महाराज से एनकाउंटर अगली पोस्ट में।
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गुरुवार, 25 जून 2009
सब कुछ है गांधीमय (रिंग, रिंग रिंगा भाग तीन)
मैं आजादी के बाद की बात कर रहा हूं। उससे पहले भले ही गांधीजी का जीवंत करिश्मा रहा होगा लेकिन इसके बाद कैश कराने की प्रवृत्ति के चलते सबकुछ गांधीमय हो चुका है। गांधी टोपी पहनी तो इसलिए कि गांधीजी ने कहा है और उतारकर रख दी तो इसलिए कि गांधीजी खुद नंगे सिर रहते थे। एक तरफ दलितों के उत्थान का विचार है तो दूसरी तरफ दलितों से बराबरी की शुद्ध भावना।
देश में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बन चुकी है। इस कारण नहीं कि मनमोहन सिंह की सरकार ने नरेगा में रोजगार दिया और किसानों के कर्जे माफ किए। या अमरीका से संधि की। बल्कि युवा गांधी के अथक प्रयासों से बुढ़ाती कांग्रेस में नई जान आ गर्इ। युवा नेता ने मंत्री बनने के बजाय संगठन में काम करने की सोची है। अब युवाओं के सामने एक ही लक्ष्य है, संगठन को मजबूत करना। परीक्षा दो और सफल हो जाओ। इससे कतार में आखिरी खड़े आदमी को भी लाभ होगा। यही तो गांधीजी चाहते थे।
ठीक है देश का नेतृत्व जवान लोग करेंगे। स्थानीय प्रतिनिधि से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर युवा ही देश की बागडोर को थामे रहेंगे। तो बूढ़े क्या करेंगे?
बूढे चिंतन करेंगे। आज की समस्याएं और गांधी। आज की समस्याओं पर चिंतन उन्हें मुख्यधारा का अहसास कराएगा और गांधी युवाओं की समुद्री आंधी से बचाए रखेगा। तो आइए चिंतन करते हैं आज की कुछ समस्याओं पर।
आतंकवाद- आप कहेंगे वाह क्या विषय चुना है। आतंकवाद की जड़ असंतोष में है। गांधीजी ने संतोषी प्रवृत्ति का पाठ पढ़ाया था। आतंकवादियों को संतोषी होना चाहिए और सुरक्षा बलों को अहिंसक। बाकी रघुपति राघव राजा राम तो हैं ही। कहीं गए थोड़े ना ही हैं। गांधी हमारे दिल में है और राम सर्वव्यापी हैं।
दूसरा मुद्दा बेरोजगारी- (कृपया आरक्षण शब्द का इस्तेमाल कर इसे राजनीतिक रूप देने की कोशिश न करें।) गांधी ने ग्राम स्वराज्य का मॉडल दिया था। हर गांव आत्मनिर्भर हो तो बेरोजगारी की समस्या स्वत: ही दूर हो जाएगी। इसके लिए केन्द्र की ओर मुंह ताकने की जरूरत नहीं है। संयम और ईमानदारी से ग्राम स्वराज्य भी बन जाएगा और रामराज्य भी आ जाएगा।
सांप्रदायिकता: गांधीजी ने कहा था कि सब मनुष्य समान हैं। बस अंग्रेजों को भगा दो। बाकी लोग अपने ही हैं। उनके लिए तो पाकिस्तान बनना भी एक सदमा था। गांधीजी ने सर्वजन हिताय की बात की थी। इसमें क्या हिन्दु, क्या मुसलमान, क्या सिक्ख और क्या इसाई। उनकी नजर में तो सब बराबर थे। हमें उनसे सीख लेनी चाहिए।
ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर वरिष्ठ नेता पद और लाभ का मोह छोड़कर चिंतन कर सकते हैं। अब देश की बागडोर युवा कंधों पर है तो उन्हें देखें और सराहें। जब सलाह की जरूरत होगी तो मांग ली जाएगी। तब तक वे चिंतन करें।
वास्तव में गांधी ऐसी चीज है जो हर जगह फिट होती है। किसी भी बिंदु पर चिंतन करो। घुमा फिराकर घुसा दो गांधी में। दलित उद्धारक की छवि से लेकर हजार रुपए के नोट तक गांधी एक जैसे हैं। समस्याओं के पैदा होने से लेकर उनके समाधान तक गांधी वैसे ही मुस्कुराते हुए मिलते हैं। चलिए अगले करिश्मे तक यही सही...
रिंग रिंग रिंगा है आभासी आशावाद। फिल्म ने पैदा किया। गरीबी दिखाई। घनघोर दिखाई, विद्रुपताओं की पराकाष्ठा दिखाई और अंत में भाग्य की जीत दिखाई। भारत भाग्य विधाता है और गांधी राष्ट्रपिता। स्वागत कीजिए पांचवी पीढ़ी के युवा नेता का।
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शनिवार, 20 जून 2009
राहत की बात - मैं अकेला नहीं हूं :)
अभी सुरेश चिपलूनकर जी टिप्पणी सम्बन्धी खुराफ़ात के बारे में बता रहे थे तब पहली बार लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। इस कारण नहीं कि वे ज्योतिष और वास्तु जैसी विधाओं को कोसते रहे हैं। इस विषय पर तो मैंने उनका विरोध किया है। लेकिन उनकी कविता नहीं समझ पाने की स्थिति ने मुझे काफी राहत दी है। अब तक ऐसा लगता था कि दुनिया के अधिकांश पढ़ने लिखने वाले लोग गद्य के अलावा पद्य को आसानी से समझ लेते हैं और सृजन भी कर लेते हैं। इस पोस्ट में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उन्हें कविता समझ में नहीं आती। दरअसल मुझे भी नहीं आती। :)
इसके बावजूद नेट पर रोजाना पचासों कविताएं नई आती हैं। मौलिक और गहरी। कईयों के तो शब्द और वाक्य संरचना तक दिमाग के एंटीना को भी छू नहीं पाते। खैर मुझे लगता है मेरे और सुरेश जी के अलावा जहां में और भी होंगे जो सुखनवर न बन पाए हों। वैसे गद्य लिखकर भी मैं भारतेंदु हरिश्चंद्र की परम्परा को ही आगे बढ़ा रहा हूं। उन्होंने पद्य में अतुकांत का समावेश किया और फिर अभिव्यक्ति के क्षेत्र में गद्य को प्रभावी तरीके से शामिल कर दिया। मैं अपने मन की बात सहज होकर कह पा रहा हूं। तब शायद पद्य की इतनी आवश्यकता भी नहीं है।
फिर भी उड़न तश्तरी .... को देखता हूं तो कर्मकाण्ड की एक बात याद आ जाती है जिसमें बताया गया है कि सरस्वती की बीजमंत्र के साथ आराधना करने पर कवित्व शक्ति अर्जित की जा सकती है। समीरजी न केवल गद्य में अपनी बात रोचक और गहराई के साथ व्यक्त करते है और पद्य भी सहज रच लेते हैं। यह मुझमे ईर्ष्या भाव जगा देता है।
(मैं यहां द्वेष नहीं कह रहा :))
इसी तरह अनुराग आर्य जी के दिल की बात ही ले लीजिए। वे अपनी बात गद्य के छोटे बड़े टुकड़ों में करते हैं और आखिर में पद्य की तीन या चार लाइने इतनी प्रभावी होती हैं कि पोस्ट के नीचे के कमेंट्स में गद्य से अधिक पद्य तालियां बटोरता नजर आता है। यही स्थिति चिट्ठा चर्चा की भी है। अनूपजी पूरी पोस्ट लिखने के बाद आखिर में एक लाइना लिखते हैं। यह एक ओर गद्य होता है तो दूसरी ओर लाइन को पूरा करने के चक्कर में पद्य जैसा बन जाता है। यह इतनी रोचक होती है कि मैं पूरी पोस्ट छोड़कर पहले एक लाइना पर जाता हूं। वहां कुछ दम दिखाई देता है तो बाकी की पोस्ट भी पढ़ लेता हूं वरना आगे रवाना। अनूपजी ने कुछ पोस्टें तो पूरी ही एक लाइना लिखी हैं। गद्य और पद्य का यह मिलन किसी चिठ्ठा चर्चा में ही हो सकता है। जहां बात समझ नहीं आने पर लिंक पर चटका लगाओ और पहुंच जाओ माजरा समझने के लिए :)
अब सोच रहा हूं कि ऐं, वद् वद् वाग्वादिनी के सवा लाख जप करके कवित्व शक्ति प्राप्त कर ही लेनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां कहा जाता है धिके जित्ते धिकन्दे यानि जब तक चलता रह सकता है चलने दो। ठीक है गद्य ही सही... :)
आखिर में बात लिंक रोड की। जयपुर के राजीव जैन जी ने एक नया ब्लॉग शुरू किया है। यहां वे क्लासिफिकेशन के आधार पर ब्लॉग्स जमा रहे हैं। इसमें बीकानेर के ब्लॉग में मेरे ब्लॉग का पता भी है। इसके अलावा कार्टूनिस्टों के ब्लॉग, हास्य व्यंग, लेखकों, तकनीकी आदि ब्लॉगों के बारे जानकारी दे रहे हैं। फिलहाल बहुत कम ब्लॉग इनकी लिस्ट में है लेकिन यह लगातार बढ़ता रहा तो एक दिन रेफरल चिठ्ठा बन जाएगा। राजीव जी को शुभकामनाएं।
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गुरुवार, 18 जून 2009
चिडि़या पानी तो पी ले, लेकिन दूब न खाए
अब रजनीगंधा और अनोखी मकड़ी
रजनीगंधा में खिला फूल और उस पर सफेद जीव छोटा सा
पूरी खूबसूरती के साथ
वह जीव मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता
मोगरा। इसे हाथी मोगरा भी कहते हैं।
जीव के बारे में किसी को पता हो तो बताइएगा। मैंने तो इसे पहली बार देखा है। यह मकड़ी की तरह दिखाई देता है। सभी फोटो इनलार्ज हो सकते हैं।
one more clear photo
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शनिवार, 6 जून 2009
आज ही सांस ली है
पिछले कई दिन से जैसे मशीन ही बन गया था। सुबह आठ बजे दिन शुरू होता और रात को तीन बजे खत्म होता। अगले दिन सुबह आठ बजे फिर दिन शुरू हो जाता। पर मजा आ गया।
अतिव्यस्तता के कारणों में से एक प्रमुख कारण था वास्तु की कक्षाएं। समर स्कूल में मुझे छह दिन तक वास्तु संबंधी कक्षाएं लेने का मौका मिला। अभी से पहले कभी पढ़ाया नहीं और पढ़ा भी ढंग से नहीं। कक्षाएं शुरू होने से पहले ही मुझे बता दिया गया कि मेरी अनौपचारिक कक्षा में एक ऐसे सज्जन ने भी पंजीकरण कराया है जो एक स्थानीय अखबार में वास्तु पर नियमित कॉलम लिखते हैं। सच पूछिए तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। बाकी प्रतिभागी भी धुरंधर थे। कक्षा शुरू होने से पहले अठारह दिन तक लगातार पढ़ता रहा। साथ ही मनन भी करता रहा कि कहां से शुरू किया जाए और कहां तक ले जाया जाए। लेकिन अब तक पढ़ा सबकुछ रिकॉल किया। सारे नोट्स दोबारा संभाले। आखिर वह दिन आ गया।
मैं समय से पहले कक्षा में पहुंचा। लेकिन कक्षा खाली मिली तो इधर-उधर घूमने लगा। थोड़ी देर बार कॉर्डिनेटर को जाकर कहा तो उसने बताया कि सभी प्रतिभागी आ चुके हैं। कक्षा के बाहर ही खड़े होंगे। मैं वापस कक्षा की तरफ दौड़ा तो वहां कुछ वरिष्ठ पुरुष और महिलाएं खड़े थे। मैं उन्हें नजरअंदाज कर कक्षा में घुस गया और बोर्ड साफ करने लगा। मैं जिस बात को अवोईड करना चाह रहा था वही हुई। सबसे पहले स्तंभकार कक्षा में आए। और आते ही मेरा इंटरव्यू लेने लगे। पूछा क्या आता है आपको वास्तु के बारे में। आमतौर पर मैं जवाब देता हूं कि कुछ खास नहीं बस सीख रहा हूं। लेकिन अपनी कक्षा में यह बात कहना और वह भी पहले प्रतिभागी को नुकसानप्रद हो सकता था। सो उनकी बात मैं हंसकर टाल गया और समर स्कूल और दूसरे विषयों पर बात करने लगा। थोड़ी देर में उन्होंने पूछा कि आपको कितने साल हुए हैं अध्ययन करते हुए। मैंने गर्व से बताया कि ग्यारह साल हुए हैं। तो वे बोले 'बेटा' मैं 1990 से इस व्यवसाय में हूं। मेरी पीठ पर पसीना आ गया। वैसे उस दिन गर्मी भी अधिक थी। :)
खैर एक एक कर सभी प्रतिभागी अंदर आते गए और मैं किसी तरह अपना कांफिडेंस संभाले बैठा रहा। सबसे अच्छी बात यह रही कि एक हंसमुख बच्ची भी वास्तु की कक्षा में थी। मैंने उसी से शुरूआत की। मैंने उससे पूछा क्या होता है वास्तु। वह मुस्कुराई और जो भी उसके मन में आया बोलती गई। मेरा काम आसान हो गया। उसकी गलतियों को सुधारते हुए मेरी गाड़ी चलने लगी। पहले दिन आसानी से डेढ़ घण्टे तक मैं वास्तु के मूल सिद्धांतों के बारे में बताता रहा और उसी दिन मैंने सभी प्रतिभागियों को वास्तु की एक पुस्तक भवन भास्कर जो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है लाने के लिए कह दिया। यह मेरी पसंदीदा किताब है। फेंग शुई से अछूती और प्राचीन सिद्धांतों से परिपूर्ण। कहीं कोई शंका की गुंजाइश नहीं।
कक्षा खत्म होते ही घर आया और किताब को एक बार फिर पूरी पढ़ गया। अब मैं फुल चार्ज था। अगले दिन उन्हीं स्तंभकार ने दो-तीन बार मुझे टोका लेकिन मैं अपनी रौ में फ्रायड, डेल कारनेगी, स्टीफन आर कोवे, एलन पीज और विवेकानन्द तक के उद्धरण देते हुए अपनी बात पूरी करता गया और प्रतिभागियों के समक्ष तस्वीर स्पष्ट होती गई। हर किसी के दिमाग में कहीं न कहीं कोई न कोई भ्रांति पहले से थी। अधिकांश ने पहले से वास्तु का कुछ न कुछ अध्ययन किया हुआ था। अच्छी बात यह थी कि किसी ने भवन भास्कर नहीं पढ़ी थी। हर रोज एक विषय लेकर उसे पूरा करता और कक्षा के अंत तक किसी ने किसी मॉडल का विश्लेषण करता। पांचवे दिन प्रतिभागी परफेक्ट मॉडल बनाकर लाए। उन मॉडल्स में गलतियां बताई और आखिरी दिन तो दो मॉडल बिल्कुल परफेक्ट बन गए। हर दिन मेरे और मेरे प्रतिभागियों के चेहरे पर चमक बढ़ती गई। बस एक गड़बड़ हुई कि आखिरी दिन स्तंभकार महोदय नहीं आए। कक्षा खत्म होने के बाद उनका फोन आया। बोले मैं किसी कारणवश आ नहीं पाया इसलिए माफी चाहता हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं। उस समय मैं कॉर्डिनेटर के पास बैठा था। उन्होंने कहा परीक्षा से डर से नहीं आए होंगे। मैंने कहा परीक्षा की तो कुछ बात ही नहीं थी। तो उन्होंने बताया कि हर कोर्स में आखिरी दिन परीक्षा का प्रावधान है। उसमें टॉप रहने वाले विद्यार्थी को पुरस्कृत किया जाएगा।
अब बात मेरी समझ में आई कि स्तंभकार महोदय को लगा कि मैं परीक्षा लूंगा और फेल कर दूंगा तो उनकी फजीहत होगी लेकिन हकीकत में मुझे परीक्षा के बारे में जानकारी ही नहीं थी। खैर मैंने एक टॉप विद्यार्थी का नाम बता दिया जिसे पुरस्कृत किया जाएगा।
इस तरह छह दिन का समय इतना अधिक व्यस्तता वाला रहा कि न तो ब्लॉग पढ़ पाया न लिख पाया। रात को दो बजे के बाद भी बैठता तो केवल केरल पुराण की कोई नई कथा पढ़ने या इक्का दुक्का दूसरे ब्लॉग देखने। इसी दौरान कुर्सी पर ही नींद आ जाती।
खैर आज पुरानी सारी मेल देखी। ज्योतिष दर्शन पर लेख डाला और यहां आपबीती सुनाने आ गया। अच्छा रहा ये सप्ताह...
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