शनिवार, 28 नवंबर 2009
बीकानेर में हुई ब्लॉग कार्यशाला वक्ता संजय बेगाणी
https://theastrologyonline.com/famous-astrologer-sidharth-joshi/
Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
सोमवार, 23 नवंबर 2009
मानसिक स्तरों में विचरण
शुरू से मैं यह जानता नहीं था या कह दूं कि मानता नहीं था कि मानसिक स्तरों में उतार चढ़ाव होता है और कई बार यह खतरनाक भी हो सकता है। बहुत छोटा था तब मुझे कॉमिक्स पढ़ते देख मेरे पड़नानाजी स्वर्गीय डॉ. माधोदासजी व्यास मुझे टोका करते थे। वे कहते कि एक बार हल्के साहित्य में उतर गए तो कभी गंभीर साहित्य पढ़ नहीं पाओगे। मुझे कॉमिक्स अच्छी लगती थी। सो उनकी बात थोड़ी कम पचती थी। यह स्वाभाविक भी था। पर इसे मैंने एक चैलेंज की तरह लिया और उन्हीं दिनों नागराज और सुपर कमाण्डो ध्रुव के साथ प्रेमचंद को भी पढ़ा। सच कहूं रोलर कोस्टर राइड थी। एक तरफ आभासी दुनिया थी और दूसरी तरफ जमीनी सच्चाई। नागराज अपने हाथों से निकले सापों से परदे खड़े कर रहा था और प्रेमचंद का परदा बिल्कुल गल गया था, जिसके पीछे अधनंगी सच्चाई खड़ी थी। शायद इन्हीं दिनों में मेरा एक ही समय में अलग अलग मानसिक स्तरों में विचरण का क्रम शुरू हो गया था।
लाइक डिजाल्व लाइक की तर्ज पर मुझे मिला आशीष। वह जीनियस होने का भ्रम पाले जबरदस्ती मानसिक स्तरों का विचरण कर रहा था। भले ही मेरी स्थिति भी जबरदस्ती वाली ही थी लेकिन मेरे पास इसके लिए सुविधाएं और साधन मुहैया थे। सबकुछ घर पर ही और आशीष इनके लिए भटक रहा था। हम दोस्त थे, बाद में इस विचरण के साथी भी बन गए। हमारे कई तरह के प्रयासों के बावजूद निजता बरकरार रही। बाद में एक दिन आशीष ने इक्कीसिया गणेश मंदिर के पास बने खेल मैदान की हमारी बैठक में कहा कि ये मानसिक स्तरों का विचरण खतरनाक हो सकता है। मैं बेफिक्र था। मैंने ध्यान ही नहीं दिया।
इसी दौर में मैं मानसिक रोगों के बारे में पढ़ना शुरू कर चुका था। मेडिकल स्टूडेंट समझ सकते हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूं, कि रोगों को पढ़ने के साथ मैंने उनमें से कई रोगों को महसूस करने की कोशिश शुरू कर दी। या कहें वे खुद को महसूस कराने लगे। वास्तव में यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है। मेरा सबसे पसंदीदा विषय स्कीजोफ्रीनिया है। जब मैंने उसे पढ़ना शुरू किया तो रोग को समझना ही टेढ़ी खीर लगा। जैकाल हाइड वाली कहानी से मिलता जुलता यह रोग है। यानि भेड़ की खाल में छिपा भेडि़या। ये रोगी वैसे नहीं होते कि अच्छी सामाजिक छवि हो और नौकरानी का बलात्कार करे। बल्कि ये रोगी सामान्य दिखने वाले ऐसे लोग होते हैं जो लगातार मर रहे होते हैं। अब मरना क्या है इसे समझना भी बहुत मुश्किल है। सही कहूं तो असंभव है। लेकिन मरने के करीब होने की कल्पना करना उससे कुछ आसान है। यहां मैं कह रहा हूं कि कुछ आसान है यानि असंभव से कुछ आसान। ठीक है उस स्थिति को महसूस करने के बाद अगली स्टेज नहीं आ सकती क्योंकि वह लगातार चलने वाला प्रोसेस है। ऐसे में आप नीयर डेढ एक्पीरियंस की कल्पना तो कर सकते हैं लेकिन उसके प्रभावों की नहीं। उसके प्रभाव तक एक बार पहुंच भी गए तो उससे अगली स्टेज मिलना तो असंभव है, बिना रोग हुए। फिर भी मैंने लम्बे काल के लिए उस स्थिति को बनाए रखने की कोशिश की तो कुछ ऐसे अनुभव होने शुरू हुए जिसमें शक होने लगता है। यहां मैं एक बार सावधान हुआ और खुद को दूसरे कामों में मोड़कर बाहर आ गया। लेकिन इस प्रयास ने मुझे समझने का सूत्र थमा दिया। अब मैं इस रोगी को समझ सकता था। इस दौर के बाद मुझे दो बार शक हुआ कि कहीं मैं भी इसका रोगी तो नहीं हूं। सो यहां थोड़े अंतराल में दो अलग अलग मानसिक रोग विशेषज्ञों को दिखाकर आया। दोनों में मुझे क्लीन चिट दी। बाद वाले ने मुझे पंद्रह दिन की एंटी डिप्रेसेंट लिख दी। वो मैंने नहीं ली और घर आकर प्राणायाम में जुट गया। कुछ दिन में वह अवस्था खत्म हो गई तो मैंने दोबार मुड़कर देखा। अब मैं मुस्कुरा सकता था।
यह सब मुझे याद आया समय की टिप्पणी से। वे छद्म और अंध विश्वास में अंतर नहीं कर पाए। यह एक प्रकार के माइंड सेटअप की समस्या है। वे खुद को क्लिष्ट शब्दों और तार्किक ज्ञानयोग में झोंक रहे हैं। ऐसे में जब अंधविश्वास की बात आती है तो वे उसे आमतौर पर बताया जाने वाला ईश्वरीय विश्वास मान रहे हैं। यही छद्म विश्वास भी है। उनकी उलझाहट में मानसिक स्तर में विचरण नहीं कर पाने की विवशता दिखाई देती है। उनके ब्लॉग पर जाकर मैंने दो बार आगाह भी किया लेकिन वे अपने इस विश्वास के साथ बने हुए हैं कि दर्शन ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मैं अब भी उन्हें यही सलाह देना चाहता हूं कि वे शब्दों की क्लिष्टता और ज्ञान की तार्किकता के परे आकर आम बोलचाल की भाषा में दर्शन की बात करें। यह लोगों की समझ में भी जल्दी आएगा और वे खुद भी स्वाभाविक मानसिक अवस्था में रह पाएंगे। वैसे उनका ब्लॉग है और उनका दिमाग... वे जैसा उचित समझे करें।
उनके लिए स्पष्ट कर रहा हूं कि एक सामान्य अंधविश्वासी बिना जाने यकीन करता है कि ईश्वर है और बताए गए रूप में है। जबकि एक छद्म विश्वासी उस ईश्वर को अपने अंदाज में देखता है भोगता है और उसका दिमाग उसे जस्टिफाई भी करता है। यानि अंध से अधिक पक्का छद्म विश्वास होता है। यही बात मैं स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा था।
अगली पोस्ट ब्लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता पर होगी... यह एक रोचक बहस का हिस्सा थी और अब इसे रोजाना देख रहा हूं....
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
छद्म और अंध विश्वास में अंतर है
लवली कुमारी जी के ब्लॉग संचिका पर मैं अंधविश्वास के बारे में हैडिंग देखकर पढ़ने चला गया। विज्ञान की छात्रा लवली कुमारीजी की मेधा पर बहुत कम लोगों को शक होगा लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा टॉपिक छेड़ा कि मैं न चाहते हुए भी उसमें कूद पड़ा। वहां चर्चा का सिलसिला अप्रिय तरीके से मैंने ही शुरू किया और अब उसे और बढ़ाना नहीं चाहता। लेकिन एक बात मन में है कि स्किजोफ्रीनिया के बारे में आम लोगों को आम भाषा में जानकारी क्यों न दी जाए। बस यह पोस्ट लिखने बैठ गया हूं। बात शुरू हुई अंधविश्वासियों से...
स्किजोफ्रीनिया के रोगी अंधविश्वासी होते हैं वे न केवल ईश्वर को देखते हैं बल्कि उनसे वार्तालाप भी करते हैं और कई बार उनके आदेशों को मानकर बलि देने जैसे कामों को भी अंजाम दे देते हैं। भारत में एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी ने एक रात में लोहे की रॉड से सड़क के किनारे सो रहे इकतालीस लोगों की हत्या की और शांति से अपने घर में जाकर बैठ गया। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय में उस रोगी के चेहरे पर असीम शांति थी। क्योंकि यह सब उसने सूर्य भगवान के निर्देश पर किया था। सूर्य भगवान रोज उससे बातें किया करते थे। यह रोगी दिल्ली की तिहाड़ जेल में है। पिछली जानकारी तक तो.. आज का पता नहीं।
खैर यहां डराने की नहीं बल्कि हकीकत तक पहुंचने की बात है। करीब दस साल पहले मैंने एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साइकोलॉजिस्ट (अब उनका निधन हो चुका है) से इस बारे में पूछा था। तब उन्होंने जो समझाया आज तक समझने के स्तर पर उससे बेहतर और कोई जवाब मिला नहीं है। इस बारे में मैंने न्यूरोलॉजिस्ट से लेकर साइक्रेटिस्ट और अन्य साइकोलॉजिस्ट से भी बातें की लेकिन किसी के दिमाग में इसकी स्पष्ट तस्वीर नहीं है।
लक्षण: स्पष्ट तौर पर सिर्फ एक संदेह। हर किसी पर, हर परिस्थिति पर और हर कोण से। बाकी बातें बाद में आती हैं।
कैसे होता है: इसे साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कह सकते हैं। यानि शारीरिक क्षति का भुगतान मानसिक अवस्था करती है।
आम बोलचाल में: इसे समझिए कि दिमाग के दो हिस्से हैं। दांया और बायां। इन दोनों हिस्सों में या कह दें कि दिमाग में ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए लाल रक्त कणिकाओं का इस्तेमाल नहीं होता। इसके लिए अलग से ऑक्सीजन कैरियर्स होते हैं। ये कैरियर दिमाग के पिछले हिस्से में जाकर ऑक्सीजन को आरबीसी से ले लेते हैं और फिर दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में चलते जाते हैं। वहां ऑक्सीजन की सप्लाई हो जाती है। दिमाग के हर हिस्से के लिए कैरियर पहले से तय हैं। इनमें बदलाव नहीं होता।
अब चाहे किसी बाहरी चोट से, किसी मेंटल डिसऑर्डर से या वंशानुगत कारणों से ये ऑक्सीजन के वाहक बनना बंद हो जाते हैं। अब दिमाग का एक हिस्सा बिना ऑक्सीजन की अवस्था में आ जाता है। तो उस हिस्से के न्यूरॉन मरने के संदेश भेजने लगते हैं। इसे नीयर डेथ एक्सपीरियंसेज कहते हैं। मौत को बहुत करीब से देखने वाले बहुत से लोगों को चमक, भगवान और कई तरह की चीजें दिखाई देने लगती हैं। दायां मस्तिष्क इस कल्पना को जन्म देता है और बायां भाग उसे जस्टिफाई करता है। अब स्कीजोफ्रीनिया में अंतर यह होता है कि दिन के चौबीस घण्टे, सातों दिन और सालों तक यह प्रक्रिया चलती है। ऐसे में रोगी संदेह करने लगता है। हर तथ्य पर जो सामने आता है। इसी अवस्था में ईश्वर उसे एकमात्र सहायक के रूप में नजर आने लगते हैं और वह छद्म विश्वास बना लेता है कि ईश्वर उससे बात कर रहे हैं या ईश्वर उसके कांटेक्ट में है।
इन लोगों के केवल ईश्वर ही नहीं बल्कि अन्य ऐसी कई चीजों के प्रति छद्म विश्वास होता है जो आमतौर पर होती ही नहीं हैं। जैसे एक रोगी को लगता था कि उसके सामने रखे शीशे में दो ड्रेगन हैं, एक अन्य रोगी को दूसरों द्वारा की जा रही साजिश दीवार पर चित्रों के रूप में दिखाई देती है। एक अन्य दूसरों पर अनैतिक लांछन लगता है।
प्रभाव: इस सबका असर यह होता है कि रोगी के परिवार के लोग ही एक-दूसरे को गलत समझने लगते हैं और रोगी के रोग की वजह बताने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रोगी और भी अकेला पड़ जाता है। वह खुद यह डिसाइड नहीं कर पाता है कि कौन उसके पक्ष में है और कौन विरोध में।
ईलाज: सालों पहले तक इस रोग के बारे में चिकित्सकों की स्पष्ट राय नहीं होने के कारण पहले रोगी को संदमित करने की दवाएं दी जाती रहीं बाद में इलेक्ट्रिक शॉक की सहायता भी लगी गई लेकिन ये रोगी अनपेक्षित रूप से कभी भी ठीक हो जाते हैं और कभी भी गड़बड़। अब साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कब होगा और कब नहीं कोई नहीं कह सकता। ऐसे में रोगी का व्यवहार की उसके ईलाज में आड़े आता है। यानि कभी पूर्ण संयत होता तो भी पूर्ण मैनिक होना।
दवाएं: पिछले कुछ समय में कम संदमन करने वाली और ऑक्सीजन कैरियर की कमी की पूर्ति करने वाली दवाएं बाजार में आई हैं। इससे रोगियों को बहुत हद तक आराम भी मिला है।
अब मैं कह सकता हूं कि अंध विश्वास और छद्म विश्वास में अंतर है। उम्मीद है आप भी समझे होंगे....
अंत में: अगर आपको एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी की सुपरफीशियल तस्वीर देखनी हो तो आप ए ब्यूटीफुल माइंड फिल्म देखिए। गेम थ्योरी विषय में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके जॉन नैश ने इस रोग को पूरे जीवन भोगा है और अब उनका पुत्र भी इसी बीमारी से ग्रस्त है।
जिस प्वाइंट को लेकर मेरे दिमाग में यह हलचल शुरू हुई वह लवली कुमारीजी की पोस्ट अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया थी।
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