रविवार, 21 दिसंबर 2008

मेरा वाला नीला


मेरे घर के बागीचे में यह फूल खिला है। कोयलस के पौधे में इन दिनों ऐसे खूब सारे फूल लगे हैं।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

ये विजय दिवस क्‍या ?

आज विजय दिवस है। ये क्‍या है... आओ मंथन करें 

आजकल हर दिन का दिवस बना दिया है मीडिया वालों ने। कभी जच्‍चा दिवस, कभी बच्‍चा दिवस, कभी पुराने मित्र दिवस  तो कभी नए मित्र दिवस, कभी पिता दिवस तो कभी माता दिवस। कुल मिलाकर साल के 365 दिन अपने आप में विशिष्‍ट हैं। फिर ये विजय दिवस क्‍या है। 

ये दशहरे के आस-पास नहीं आता क्‍या, या उसी दिन आता है। अभी सर्दियों में इसकी बात क्‍यों हो रही है। इसमें तो शस्‍त्र पूजा होती होगी। या फिर करगिल युद्ध जीता उसकी याद में मनाया जाता है। 


16 दिसम्‍बर 1971 की याद में सेना द्वारा जाने वाले विजय दिवस के संदर्भ में एक परिचर्चा करने का काम मुझे सौंपा गया। बीस से अधिक बुद्धिजीवियों (बुद्धि बेचकर खाने वालों, श्रमजीवी की तर्ज पर) से बात की। अधिकांश लोग अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे। उनके जवाब कुछ ऐसे ही थे। एक ने तो यहां तक कहा कि जब तक इस सवाल को कंपीटीशन परीक्षाओं में शामिल नहीं किया जाएगा तब तक लोगों को ध्‍यान नहीं आएगा। 

करीब तीन घण्‍टे की मशक्‍कत के बाद मैं झल्‍ला गया और अपनी तरफ से कुछ लोगों को विजय दिवस के बारे में जानकारी देकर उनके 'विचार' जाने। संदर्भ पता चलने के बाद कुछ ने नेताओं की भाषा में इतना गोलमोल बोला कि फोन रखने के बाद कई देर तक मुझे सोचना पड़ा कि बंदे ने वास्‍तव में जवाब दिया क्‍या है। कुछ ने कहा यार कुछ भी लिख देना। तूं लिखेगा तो गलत थोड़े ही लिखेगा। 

मैंने सोचा कि किसी पुराने सैनिक को ये बातें बता देता हूं वो पहले वाले बीस और बाद वाले चार लोगों को अपनी थ्री नॉट थ्री से गोली मार आएगा। दुख से अधिक क्षोभ हुआ कि जिस जीत को मैं आल्‍हादकारी मान रहा था उसकी याद भी लोगों की जेहन से धुमिल होती जा रही है। 


खैर कुछ जानकारी जो मुझे है इस बारे में बता देना चाहूंगा। 

16 दिसम्‍बर 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्‍तानी को ढाका में उसकी 93000 सैनिकों के साथ झुकने पर मजबूर कर दिया और संधि पर हस्‍ताक्षर कराए। एक अलग देश बना बांग्‍लादेश। यह ऐतिहासिक जीत थी। इसी की याद में सेना द्वारा विजय दिवस मनाया जाता है। आज इस जीत की महज 37वीं वर्षगांठ है और बहुत से युवा इस जीत को भुला चुके हैं। जिन वीरों मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर किया उन्‍हें भूलना खुद की जड़ें भुला देने जैसा है। 

मेरी ओर से देश के वीर शहीदों और आज देश की रक्षा कर रहे जवानों को गर्वीला सलाम। 

इन दिनों बीकानेर में छाए बादल


इन दिनों बीकानेर में बादलों का जमावड़ा है। यहां बादल होना ही अपने आप में घटना है। बादलों का एक सुंदर चित्र 

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

यही है वो मंदिर

राजस्‍थान के अधिकांश लोगों के लिए इस मंदिर की चर्चा करना घावों को कुरेद देने जैसा काम है। अभी कुछ दिन पहले जोधपुर गया। सालों बाद और शादी के बाद तो पहली बार जोधपुर जाना हुआ। वहां पत्‍नीजी साथ थीं। पहुंचने के कुछ ही मिनटों के भीतर वे पता कर आईं कि यहां कोई ऐसा मंदिर है जहां कुछ भी मांगों मिल जाता है। वैसे वे मांग-तांग में विश्‍वास नहीं करती लेकिन बहुत ज्‍यादा मांगना हो तो वे किसी स्‍थापित भगवान का गला पकड़ती हैं और मांग लेती है। कभी मिल जाता है तो ठीक वरना इन रोड साइड भगवानों की नि:स्‍सारता का तो उन्‍हें भान है ही। खैर मेरे दिमाग में घूमने का प्‍लान था और पत्‍नीजी के दिमाग में उस मंदिर जाने का। एक ऑटो वाले को पकड़ा और घूमने की जगह पूछी। वह बिना प्‍लान सीधे मेहरानगढ़ ले गया। गढ़ में प्रवेश से पहले ही वहां गढ़ की प्राचीरों के ऊपर मं‍डराती चीलें दिखाई दी। मैंने सोचा राजशाही का कत्‍ल हुए साठ साल से ज्‍यादा समय हो गया अब ये चीलें किसका मांस ढूंढ रही हैं। हम ऊपर चढ़ते गए। गढ़ के अन्‍दर की कुछ महिलाएं कठपुतलियां बेच रही थीं। कान्‍हा (मेरा बेटा) उत्‍सुकता से उनके पास चला गया। उनमें से एक से मैंने पूछा गढ़ में आगे क्‍या है। तो उसने बताया आगे चामूण्‍डा माता का मंदिर है। मेरे दिमाग में एक मिनट के लिए भी ख्‍याल नहीं आया था कि हम उसी देवी के पास जा रहे हैं जिसने कुछ ही दिन पहले सैकड़ों जवान लड़कों की बलि ली है। पीठ में सिरहन दौड़ गई। एक उत्‍सुकता थी देखने की सो कुछ तेजी से आगे बढ़ा। साथिन ने पूछा क्‍यों जी ये वही मंदिर है जहां मनौतियां सौ प्रतिशत पूरी होती है। मैं एक बारगी कुछ बोल नहीं पाया। एक ओर पत्‍नी का उत्‍साह तो दूसरी ओर दिमाग में चल रहा तूफान। मैंने धीरे-धीरे बोलते हुए बताया ये वही मंदिर है जहां सैकड़ो युवा कुचलकर मर गए थे। अब श्रीमतीजी के पांव भी ठिठक गए। माहौल बिल्‍कुल काला-काला सा नजर आने लगा। एक-दूसरे को हिम्‍मत देते हुए आगे बढ़े और निज मंदिर तक आए। हम दोनों ही कुछ नहीं बोल रहे थे। मंदिर से लौटते वक्‍त उन्‍होंने कहा मुझे तो केवल चीत्‍कार का ही अनुभव हुआ। वापस लौटते समय दोनों शांत थे। कान्‍हा समझ नहीं रहा था कि जब घूमने आए हैं तो खुश क्‍यों नहीं है।


किले के ऊपर का नजारा

सोमवार, 17 नवंबर 2008

बीकानेर की पाटा संस्‍कृति


भारत के बीकानेर शहर और इटली के उदीने शहर में एक समानता है और एक चीज दोनों शहर आपस में बांटते हैं।

जो चीज समान है वह है पाटा... इसके बारे में अभी  बताता हूं और क्‍या बांटते हैं वह लेख के आखिर में बताउंगा।

जो लोग बीकानेर के हैं या कुछ समय बीकानेर में  रह चुके हैं उन्‍हें अजीब लगेगा कि इस विषय पर मैं कैसे लिख रहा हूं लेकिन मुझे  पाटे पर लिखने का ख्‍याल कल रात को ही आया। हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स के स्‍पेशल कोरस्‍पोंडेंट  श्रीनंद झा, जो किसी पॉलिटिकल कवरेज के लिए बीकानेर आए थे, मुझसे फोन पर पूछा कि ये पाटा क्‍या  होता है। मैंने जवाब में सवाल ही पूछा कि आपको इस बारे में किसने बता दिया?

उन्‍होंने  कहा बता दिया किसी ने। क्‍या आप मुझे दिखाकर लाएंगे। मैंने कहा काम से फारिग होते  ही आपको ले चलूंगा। उन्‍होंने समय पूछा तो मैंने बताया रात दस बजे ठीक रहेगा। वे  अगले दिन की उम्‍मीद कर रहे थे और मेरे रात के दस बजे के प्रपोजल को सुनकर पशोपेश  में पड़ गए। फोन की दूसरी ओर तक कुछ देर की शांति के बाद उन्‍होंने कहा ठीक है, चलते हैं। मुझे काम निपटाने में कुछ अधिक समय लग गया। रात साढे़ दस के बाद ही मैं  उनकी आरटीडीसी की होटल तक पहुंच पाया। वे इंतजार कर रहे थे। उनका विचार था कि  फोटोग्राफर को भी साथ ले लेंगे तो काम हाथों-हाथ निपट जाएगा। मैंने कहा तीन लोग  चलेंगे तो कार लेनी पड़ेगी। पुराने शहर की तंग गलियों में कार मुश्किल से चल पाएगी, तो बाइक पर चलना ठीक रहेगा। फोटोग्राफर अगले दिन सुबह भी फोटो ले सकता है।

कुछ देर के डिस्‍कशन के बाद मेरी बात मान ली गई।  झा को लेकर मैं शहर के मुख्‍य मार्गों से होता हुआ पुराने शहर की ओर बढ़ रहा था तो  पहली बार मुझे शहर के बाहरी इलाके और तंग गलियों वाले पुराने शहर में अन्‍तर शिद्दत से महसूस हुआ।

अब पाटों की बात-

निकलने से पहले श्रीनन्‍दजी ने मुझसे थोड़ा ब्रीफ करने के लिए कहा। शुरुआती तौर पर मैंने जो बताया उसे झा ने कुछ इस तरह से समझा कि पाटा एक तरह का बड़ा दीवान होता है जो मोहल्‍ले के बीचों-बीच लगा होता है। इस पर कई लोग बैठते हैं। उनका सवाल था कि लोग करते क्‍या हैं पाटे पर? उनके लिए विषय नया था और मेरे लिए यह सवाल नया था। मैंने कहा सबकुछ। यानि हर तरह की गतिविधि पाटे से जुड़ी होती है। उन्‍होंने पूछा पाटे पर बैठते कौन लोग हैं। मैंने बताया हर तरह के पाटे पर अलग तरह के लोग नजर आएंगे। गुत्‍थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही थी। झा को लगा चलकर देख लेना ठीक रहेगा वरना ये युवा पत्रकार उन्‍हें और उलझा देगा।

ऐसा दिखता है पाटा-


यह है आचार्यों के चौक का पाटा-

बीकानेर के तकरीबन हर मोहल्‍ले में पाटा है या कहूं कि पाटे हैं। पाटे पाटा का बहुवचन है। हर पाटे का अपना इतिहास है। मोहल्‍ले के बीचों-बीच शीशम की टनों लकड़ी से बना यह ऊँचा ‘दीवान’ सामाजिक कार्यों की धुरी बनता है।

खैर हम लोगों ने आचार्यों के चौक पहुंचकर पाटे पर बैठे लोगों से सीधे बातचीत शुरू कर दी। पहले मैंने मारवाड़ी में बोलते हुए बैठे लोगों को बताया कि ये झा सा’ब हैं और दिल्‍ली से हिस्‍दुस्‍तान टाइम्‍स अख़बार से आए हैं। अपने पाटे के बारे में जानना चाहते हैं। इसके बाद आधे घण्‍टे से अधिक लम्‍बे समय तक लोग बोल रहे थे। इसमें वर्ड बैंक के पूर्व निदेशक और वर्तमान राजस्‍थान सरकार के वित्‍तीय सलाकार विजय शंकर व्‍यास, विभिन्‍न शोधों के तेरह पेटेंट हासिल कर चुके हर नारायण आचार्य और उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों को अपने तख्‍त पर बैठा चुका पाटा मानो खुद बोल रहा था। कैसे हर सामाजिक कार्यों में पाटा लोगों को एक स्‍थान पर एकत्रित करता है, बुजुर्गों की शामें और रातें तक इस पर गुजरती हैं, युवाओं की बीवीओं को सौत लगने वाला पाटा कई सौ सालों की स्‍मृति संजोए आने वाली पीढ़ी को, बीती हुई पीढ़ी के साथ मौहल्‍ले के बीचों-बीच बैठकर देखता है। झा केवल हां-हां में सिर हिला रहे थे और उत्‍साहित बड़े-बूढ़े, अधेड़ और जवान लोग लगातार बोल रहे थे। कोई आधे घण्‍टे बाद मैंने यह कहकर झा को मुक्ति दिलाई कि इन्‍हें भट्टड़ों के चौक का पाटा भी देखना है। लोगों ने निकलते हुए कहा वहां तो आपको ज्‍योतिषियों की पूरी जमात मिल जाएगी। झा एक बारगी अचकचा गए। मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि खुद ही देख लीजिए पूरी रात जगने वाले पाटे को।  

भट्टड़ों के चौक का पाटा

यह पाटा पूरी रात जगता है। दिन में बड़े-बूढ़े इस पर बैठते हैं और जैसे-जैसे रात ढ़लती है यहां ज्‍योतिषियों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। रात नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक एक ज्‍योतिषी जाता है तो दूसरा आता है। धुरी में रहते हैं प‍ंडित राजेन्‍द्र व्‍यास उर्फ ममू भईजी। कई बार वे आस-पास या कलकत्‍ता गए हुए होते हैं तो यह गहमा-गहमी कम होती है। लेकिन हमारा भाग्‍य प्रबल था। ममू वहीं मिल गए पाटे पर। अपने शिष्‍यों के साथ लैपटॉप पर किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण कर रहे थे। मैंने झा साहब का परिचय दिया तो उन्‍होंने गोत्र तक पूछ डाले। किसी समय मैं भी ममू के दरबार का हिस्‍सा रहा हूं। सो उनका स्‍वभाव जानता हूं। मैंने झा को ममू के हवाले कर किनारे हो गया। पाटा संस्‍कृति का दूसरा आयाम देखने के बाद झा बस नोट करते जा रहे थे। दो दिन पूर्व दिवंगत हुए आचार्यराज के बारे में पूरी जानकारी ली।

इसके बाद शुरू हुआ ज्‍योतिष का काम। बिना झा की कुण्‍डली देखे ममू ने प्रश्‍न कुण्‍डली बनाकर झा को उनके जीवन और परिवार के बारे में कई बातें बताई। जब झा को विश्‍वास हो गया तो उनसे जन्‍म समय और तारीख लेकर कुण्‍डली बनाई। इसके बाद तो ममू ने कई पन्‍ने खोलकर रख दिए। करीब डेढ़ घण्‍टे इसी पाटे पर व्‍यतीत हुए। यहां से देर रात रवाना होने के बाद मैंने झा से कहा कि बाकी पाटे मैं केवल आपको दिखा देता हूं। स्‍टोरी इन दो जगहों के आधार पर ही बन जानी चाहिए। झा सहमत थे। मैंने उन्‍हें मोहता चौक, कीकाणी व्‍यासों का चौक, हर्षों का चौक आदि स्‍थानों पर पाटे दिखाए और अंत में ले गया दम्‍माणी चौक के छतरी वाले पाटे पर। पूरे समय झा चुपचाप बस देखते रहे। बाद में देर रात जब मैं उनको वापस होटल छोड़ने गया तो उन्‍होंने धन्‍यवाद जैसी कुछ औपचारिकताओं के अलावा पाटे के बारे में कहा...

अद्भुद् 


अब दूसरी बात बीकानेर और उदीने शहर टैस्‍सीटोरी के रूप में एक हस्‍ती को बांटते हैं। कुछ उनकी क्‍योंकि यह हस्‍ती वहां पैदा हुई और कुछ हमारी क्‍योंकि जिन्‍दगी का अधिकांश हिस्‍सा उन्‍होंने बीकानेर में रहकर काम किया और यहीं दिवंगत हुए। उनके बारे में विशद चर्चा फिर कभी..

बुधवार, 5 नवंबर 2008

बहुत दिनों बाद

पिछले कई दिनों से सही कहूं तो चालीस दिन बाद फिर से ब्‍लॉग पर लौटा हूं। इस बीच गंगा, यमुना और हमारे यहां सरस्‍वती में बहुत सा पानी बह गया है। गंगा यमुना का पानी तो समुद्र तक पहुंच गया लेकिन सरस्‍वती का पानी पता नहीं कहां गया। कुछ दिन बाद बीकानेर में कोलायत का मेला भरेगा। इसमें दूर दूर से नाथ साधू भी आएंगे। लम्‍बे समय से कोलायत को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अभी तक तो सफलता नहीं मिली है। अच्‍छा ही है नंगी-अधनंगी हालत में बैठे नाथ साधुओं से विदेशी पर्यटकों की जितनी दूरी बनी रहे अच्‍छा है। कपिल मुनि की तपोभूमि पर गर्मी से सर्दी के संधिकाल में लगने वाले इस मेले के प्रति क्षेत्र के लोगों का खासा रुझान होता है। हमारे बीकानेर में तो कहा जाता है कि श्रीकोलायत के कपिल सरोवर का पानी छिड़ने के बाद ही ठण्‍ड की शुरूआत होती है। इससे पहले तक तो पंखे चलते रहते हैं घरों में।
ऑक्‍ल्‍ट का छात्र होने के नाते मेरा भी इस मेले के प्रति रुझान रहता है। एक दो बार तो मैंने वहां पूरा दिन इसी आशा में बिताया कि काश कहीं कोई पहुंचा हुआ नाथ साधू मिल जाए लेकिन अभी तक तो निराशा ही हाथ लगी है। इस बार कोशिश करूंगा कि रिपोर्टिंग के लिहाज से कोलायत के मेले में शिरकत करूं।
अब बात वापस ब्‍लॉगिंग की। पिछले कुछ दिनों में मैंने लिखना कम क्‍या किया सभी धड़ाधड़ लिखने लगे। अमित जी, आमिर भाई, वाजपेयी जी सभी लगे हैं धमाधम, पुण्‍य प्रसूनजी को भी देखा । लगा चलो कहीं तो हम भी आगे हैं। अब सभी लोग आ चुके हैं तो हम भी कुछ लिख मारते हैं शायद लोग पढ़ें। टाइफाइड ने तो पूरा सिस्‍टम ही बिगाड़ दिया। अच्‍छी स्‍पीड बनी हुई थी। अब तो घण्‍टे दो घण्‍टे बैठ पा रहा हूं। सारा समय दूसरों को पढ़ने में ही खर्च हो जाता है। लिखने लायक सोचता हूं तब तक सिस्‍टम को बंद करने का मन होने लगता है। आज बस इतना ही...

रविवार, 21 सितंबर 2008

स्थितप्रज्ञता या मूढ़ता? कुछ लोचा तो है...

गुणीजनों ने बताया कि जब समस्‍याएं चारों ओर से घेर ले और चिंताएं हावी होने लगे। दिमाग का अधिकांश हिस्‍सा तब तात्‍कालिक समसयाओं में उलझा हो और सामने दिख रहे परिवर्तन का हल समझ में न आए तो कुछ देर के लिए शांत बैठो। खुद को छोड़ दो। जो होता है हो जाने दो। देखते रहो साक्षी भाव से। विचारों के प्रवाह में बाधा लाने की बजाय एकाग्र होओ किसी एक बिन्‍दु पर चाहे वह हृदय के भीतर का आकाश और उसके भीतर के आकाश और उसके भीतर खिले कमल पर ही क्‍यों न हो। एक बिन्‍दू लेकर उसमें डूब जाओ, तब आएगी स्थिरता। पहले विचार आएगा, जो बाद में ध्‍यान बनेगा, उससे धारणा बनेगी और धारण सिद्ध होकर समाधि बनेगी। यानि स्थित प्रज्ञत आएगी। 

शिष्‍ट सवाल दागता है: हे गुरूदेव क्‍या होता है स्थितप्रज्ञता में ?

गुरूजी:  हैं ? 

ये स्थितप्रज्ञ स्थिति क्‍या है। 

अब गुरूजी ने स्‍वाद ले भी रखा है तो कैसे समझाए कि अदरक मी‍ठी है या खट्टी, नमकीन है या फीकी। 

खैर गुरू तो गुरू ठहरे मोर पकड़ने का तरीका भी बताएंगे तो कुछ इस तरह कि पहले पीछे से जाकर उसकी आंखों पर डामर लगा दो उसे दिखाई देना बंद जाए तो झट से पकड़ लो। आगे कोई सवाल नहीं। 

सो शिष्‍ य को बताया कि यह नो माइंड स्‍टेज है। 

यानि ?  चेले का सवाल का क्रम चालू है 

हे शिष्‍य (गुरू का चेहरे में ललासी आ रही है, शिष्‍य खुश हो रहा है कि गुरूजी के चेहरे का तेज बढ़ रहा है, श्रद्धावश आवाज की तल्‍खी को महसूस नहीं कर रहा) जब दिमाग में कोई विचार न आए तो वह स्थिति स्थितप्रज्ञता की है। भेजा विचारशून्‍य हो जाता है। नए विचार आने बंद हो जाते हैं। 

शिष्‍य समझने की फिराक में नो माइंड होकर बैठ जाता है। 

एक दो दिन से अपने दिमाग की भी हालत कुछ ऐसी ही है। हमेशा दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है लेकिन अभी कुछ भी नहीं आ रहा। अब सोच रहा हूं कि यह स्थिति नो माइंड की है या नेवर माइंड की। दिमाग में विचार नहीं आ रहे। यानि कुछ तो लोचा है। अब ये किससे पता लगवाया जाए कि मैं स्थितप्रज्ञ हो रहा हूं या मूढ़। 

बुधवार, 17 सितंबर 2008

हर व्‍यवस्‍था एक समय तक ही परिहार्य होती है

लगता है एक अर्सा हो गया हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के साथ। मैं पुराने लोगों को देखूं तो लगता है जैसे कल ही यहां आया हूं लेकिन पिछले आठ महीने से लगातार कुछ न कुछ ब्‍लॉ‍ग के बहाने करता रहा हूं। इंटरनेट के टूल, भड़ास की सदस्‍यता, अपने इस पुराने ब्‍लॉग पर दिमाग की हलचल को डालने, ज्‍योतिष का नया ब्‍लॉग शुरू करके उसमें लगातार विचारों का निवेश करके और जयपुर के राजीव जैन से एक रात की चैटिंग के बाद कहावतों का ब्‍लॉग शुरू करने के प्रयासों को इकठ्ठा किया जाए तो लम्‍बी पारी दिख सकती है।

इस बीच वैचारिक स्‍तर पर कई उतार चढ़ाव आए। कभी सोचता था कि क्‍या लगातार लिख पाउंगा तो कभी सोचा कि मुझे पढ़ने वाले लोग कौन होंगे, कभी व्‍यवस्‍तताओं के लम्‍बे दौर (जो आमतौर पर दो या तीन दिन के होते) मुझे फिर से ब्‍लॉगिंग के प्रति अजनबी बना देते। कुल मिलाकर तीखे क्षणें से गुजरता रहा। हो सकता है मैंने दूरी महज दो या तीन किलोमीटर ही तय की हो लेकिन तीखे क्षणों के उतार चढ़ाव ने इस दूरी को कई सौ किलोमीटर तक फैला दिया।

इसी यात्रा में टिप्‍पणी ऐसी चीज थी जिसने मुझे हमेशा हतोत्‍साहित किया। भले ही वह अच्‍छी हो लेकिन मेरे विचारों के अनुरूप टिप्‍पणियां मुझे कम ही मिली। सही कहूं तो एक भी नहीं मिली। तो कौन लोग हैं जो मुझे पढ़ रहे हैं। इसका खुलासा हुआ मेरे ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग पर लगाए गए एक बॉक्‍स से। जिसे मैं प्रश्‍न डिब्‍बा कहता हूं। इसे मैंने किसी दूसरी साइट पर थोड़ा सा स्‍पेस लेकर बनाया है। इस डिब्‍बे को लगाने के दूसरे तीसरे दिन से ही प्रश्‍नों की बौछार शुरू हो गई। एक महीने में सौ से अधिक सवाल। वह भी मेरे विषय से संबंधित। हां, इनमें से कुछ निजी सवाल थे तो कुछ ऐसे सवाल भी थे जो मुझे विषय को और अधिक गंभीरता से समझने में मदद करते। ब्‍लॉगिंग के अलावा दूसरा रास्‍ता है साइट का। एक पत्रकार होने के कारण मेरे पास इतना समय नहीं था कि खुद अपनी साइट डवलप कर लूं और इतना पैसा भी नहीं था कि किसी से डवलप करा लूं। सो इसी माध्‍यम से चिपका हूं। ब्‍लॉग के जरिए प्रश्‍नों की बौछार और टिप्‍पणियों में वही सूनापन देखकर मुझे टिप्‍पणी और भी अधिक निस्‍सार नजर आने लगी।

मेरे दिमाग में किसी टिप्‍पणी देने वाले का अपमान करने या उनके अब तक किए गए अथक प्रयासों को झुठलाने का इरादा कतई नहीं है। लेकिन हर व्‍यवस्‍था एक समय तक ही परिहार्य होती है। आज जब गूगल एनालिटिक जैसे टूल उपलब्‍ध हैं यह जानने के लिए कि कितने लोग कितनी देर के लिए आपके ब्‍लॉग पर आए तो फिर टिप्‍पणी देने और उसके लिए आग्रह करने की जरूरत कहां रह जाती है। पिछली रात न तो मैं किसी अवसाद में था न ही इस बारे में मेरे दिमाग में कोई कुंठा है लेकिन समीर भाई को भी यह बात समझनी होगी कि सभी टिप्‍पणीकार उनकी तरह मलंग नहीं होते कि पढ़ा और छोटा सा संकेत देकर निकल लिए। अब जो लोग टिप्‍पणी दे रहे हैं वे न तो अधिकांश विषयों को समझते हैं और ना ही इसे स्‍वीकार करने की उनमें ईमानदारी है। हां टिप्‍पणी के साथ अपना लिंक देना नहीं भूलते। मैंने कभी नहीं कहा कि समीर भाई को टिप्‍पणियों की आवश्‍यकता है। वे इतना रोचक लिखते हैं कि मैं टिप्‍पणी करूं या नहीं उनके ब्‍लॉग का चक्‍कर जरूर लगा आता हूं। यह सोचकर ही कि कुछ सीखने को मिलेगा। मैंने तो उनकी जय ही बोली है। व्‍यंग तो उन लोगों पर है जो दूसरे ब्‍लॉगर की किसी पोस्‍ट पर जाते हैं। एक ऐसी टिप्‍पणी छोड़ते हैं जो या तो समीर भाई की टिप्‍पणी जैसी दिखाई देती (यानि छोटी सी, लेकिन सारगर्भित नहीं) या ऐसी कि पोस्‍ट से टिप्‍पणी का संबंध बिठाने में ही घण्‍टाभर लग जाए। इसके बाद टिप्‍पणी के अंत में खुद का लिंक जोड़ा हुआ होता है। इस प्रवृत्ति को ही मैंने तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्‍हारी पीठ खुजाता हूं वाली शैली कहा है।

मैंने अपनी बात स्‍पष्‍ट की, यह मेरे दिमाग की हलचल थी।

अब भी कोई गिला शिकवा हो तो कहा सुना माफ करें...

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्‍हारी पीठ खुजाता हूं

पहला सवाल तो यह कि ब्‍लॉगिंग के बाड़े में कमेंट का सांड पहले पहल छोड़ा किसने। ठीक है छोड़ भी दिया तो बाकी के लोगों को कमेंट करके यह कहने की क्‍या जरूरत है कि कमेंट करो। मैं हिन्‍दी भाषी हूं, पढ़ता हूं, लिखता हूं, बोलता हूं, सोचता हूं। कुल मिलाकर मेरे सभी काम हिन्‍दी में ही होते हैं लेकिन कभी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मुझे किसी को प्रेरित करने के लिए हिन्‍दी के ब्‍लॉग पर कमेंट लिखने के लिए कहना चाहिए। अब अगला सवाल कि जब सब लोग लिख चुके हैं कुछ पक्ष में तो कुछ विरोध में तो मैं अब क्‍यों जुगाली कर रहा हूं। मेरे पास इसका भी कारण है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के शुरूआती वीरों ने नए लोगों को प्रोत्‍साहित करने के लिए इसकी शुरूआत की होगी। अपने लिखे पर संदेश पढ़ते ही मुझे भी बड़ा आनन्‍द आता है लेकिन एनानिमस जैसे अलगाव वादियों और क्षुद्र मानसिकता वाले लोगों के कारण कई बार अच्‍छा खासा लिखने वाला व्‍यक्ति हतोत्‍साहित भी हो सकता है। व्‍यक्ति दो चीजों के लिए जिन्‍दा रहता है। महत्‍व और स्‍पर्श। ब्‍लॉग पर मिली टिप्‍पणी दोनों का अहसास देती है। लेकिन क्‍या आपने कभी सोचा है कि इसका दूसरा पक्ष नुकसान का भी है। कितने लोगों ने आहत होकर अपनी लाइन और लैंथ बिगाड ली है। कितने लोग हैं जो केवल टिप्‍पणी पाने के लिए लिख रहे हैं और पहले कभी शुद्ध विचार लिखने वाले लोग थे। फिर भी एक बात है एक लेखक को हमेशा यह चिंता होती है कि जो कुछ मैं सृजन कर रहा हूं वह लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं। कसम से जब से मुझे गूगल एनालिटिक मिला तब से आज तक मैंने किसी की टिप्‍पणी का इंतजार नहीं किया। मेरे ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग पर स्‍त्री की सुंदरता विषय पर मैंने बिल्‍कुल परमहंस वाले भाव से लिखा और कुछ महिलाओं ने इसे गलत समझा और मुझे ऐसी टिपिया झाड़ पिलाई कि मेरी‍ घि‍ग्‍घी बंध गई। वो दिन आज का दिन स्‍त्री लिखने से पहले चार बार सोचता हूं। पहले पता होता तो वह पोस्‍ट ही नहीं लिखता। मेरे कहने का अर्थ यही है कि टिप्‍पणी लाइन और लैंथ को बिगाड़ भी सकती है।
इसका एक पहलू राजनीति भी है। अब टिप्‍पणी से ब्‍लॉग का स्‍टेटस आंका जाने लगा तो टिप्‍पणी लेने के लिए भी जुगत होने लगी और आज टिप्‍पणी की हैसियत वोट जैसी हो गई है। हर ब्‍लॉगर और ईमेल धारक की विशिष्‍ट पहचान है। अपनी टिप्‍पणी किसी दूसरे के यहां करके उसे यह आग्रह भी कर दिया जाता है कि भईया मेरे ब्‍लॉग पर भी आईयो।
कुल मिलाकर तूं मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाता हूं...

जय हो
टिपिया देवी की जय
ब्‍लॉगर महाराज की जय
प्‍यारे समीर और शास्‍त्री जी की जय,
ब्‍लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत की जय
पूरे हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की जय

रविवार, 14 सितंबर 2008

जीमण यानि पार्टी का खाना

शनिवार, 13 सितंबर 2008

इंटरनेट और परमपिता परमात्‍मा

अभी किसी से आत्‍मा और परमात्‍मा के संबंध पर बात हो रही थी। वहीं मुझसे किसी ने पूछा कि आपका ब्‍लॉग काम कैसे करता है। मैंने बताया कि इंटरनेट में एक सुपर कम्‍प्‍यूटर से तार के जरिए दुनियाभर के कम्‍प्‍यूटर जुड़े होते हैं। इतने में यह बात क्लिक हुई कि ईश्‍वर यानि पर‍म पिता और सामान्‍य आत्‍मा तथा सुपर कम्‍प्‍यूटर और पीसी में रिलेशन के तरीके और कार्य करने के तरीके में बहुत अधिक समानताएं हैं। कैसे एक एक कर बताने का प्रयास करता हूं।

परमपिता: वह जिससे यह सृष्टि शुरू हुई है। जो इसे नियंत्रित करता है। जो सभी आत्‍माओं के बीच सेतु का कार्य करता है। जो संवाद स्‍थापित करने का कार्य करता है। सभी आत्‍माएं उसी से मिलने का प्रयास करती हैं। एक आत्‍मा पूर्णता प्राप्‍त कर परमपिता परम ब्रह्म बन जाती है।

आत्‍मा: परमपिता से अलग होकर पृथ्‍वी पर आया उसी का अंश, अपूर्णता के बावजूद खुद का अलग वजूद, हर आत्‍मा अन्‍य आत्‍माओं से जुड़ी होती है। पूर्णता के लिए प्रयास करती है। इस प्रयास के चलते वह ऊंचे आयाम प्राप्‍त करती है। एक दिन परमपिता के पास पहुंच जाती है। वह जो कुछ करती है वह उसे वृहद् स्‍तर पर पहुंचाने के लिए वह परमपिता से प्रार्थना करती है।

सुपर कम्‍प्‍यूटर: इंटरनेट का आधार तैयार करता है (विर्चुअल वर्ड), पीसी इससे जुड़ते हैं, इसका खुद का डाटाबेस होता है जो पीसी के लिए उपयोगी होता है। पीसी इसमें इनपुट करते हैं और एक से दूसरे स्‍थान तक यह सुविधाएं, सेवाएं और इनपुट पहुंचाता है। जैसे जैसे पीसी का विकास होता है इसके द्वारा तैयार डाटा बेस और वेबजाल का भी विकास होता जाता है।

पीसी: यह तीन तरह से काम करता है। एक खुद के सी और डी ड्राइव में और लेन में अन्‍य ड्राइव में तथा इंटरनेट पर। जिस पीसी का जितना जुड़ाव होता है वह उतना ही अधिक उपयोगी होता है। ब्राउजर में जितने अधिक एडओन होंगे इंटरनेट पर उसका जुड़ाव उतना ही अधिक स्‍मार्ट होगा।

जिस तरह ईश्‍वर की आराधना करने के‍ कई तरीके होते हैं वैसे ही इंटरनेट से सुपरकम्‍प्‍यूटर तक पहुंचने के लिए गूगल के क्रोम, मोझिला के फायरफॉक्‍स, माइक्रोसॉफ्ट के इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर और एप्‍पल के सफारी से गूगल,याहू, एमएसएन आदि से सम्‍पूर्णता को प्राप्‍त करने का प्रयास किया जा सकता है।
इति साधू:

बुधवार, 10 सितंबर 2008

सुंदरता का पैमाना


पिकासो ने एक सिद्धांत दिया था जिसमें उसने बताया कि हर चीज की सुंदरता उसके घटकों के सही अनुपात में होने से होती है। अगर यह अनुपात गड़बड़ जाए तो सुंदरता कम हो जाती है। 

बुधवार, 13 अगस्त 2008

छोटे निवेश में अधिक लाभ

बिजनेस में हम इसे स्मार्ट निवेश कह सकत हैं लेकिन यहां मैं पैसों के निवेश के बजाय आध्यात्मिक निवेश की बात करना चाहूंगा। व्यापार से जुड़े सैकड़ों लोगों को मैंने करीब से देखा और समझने की कोशिश की। आध्यात्मिक स्तर पर बणिए (यहां बणिए से तात्पर्य उद्यमी से है) दो प्रकार के होते हैं। एक तो अपने प्रतिष्ठान में देवी-देवता की तस्वीर लगाते हैं और पूजा पाठ का जिम्मा किसी पण्डित को सौंप देते हैं। पण्डित रोजाना सुबह आता है देवताओं की सुध लेता है और चला जाता है। देवता किनारे बैठे रहते हैं। दूसरे वे जो अपना सारा काम भगवान के निमित् होकर करते हैं। पहली प्रकार के बणियों को मैंने पैंतीस से चालीस साल तक की छोटी उम्र में साइटिका, स्पांडलाइटिस और नर्वस सिस्टम की अन् बीमारियों से जूझते हुए देखा है। चिकित्सक के पास जाने पर इनका पुख्ता र्इलाज भी नहीं होता। क्योंकि चिकित्सकों को कहना है कि ये बीमारियां शारीरिक होने के बजाय तनाव से अधिक प्रभावित होती हैं।

उद्यमियों को क्‍या करना चाहिए?

समस्या को इस दृष्टिकोण से देखने के बाद मैंने अपने जानकार उद्यमियों को आध्यात्मिक होने की सलाह दी तो उन्होंने मुझी से पूछा,

क्यों पंडित जी अब धंधा छोड़कर पूजा-पाठ में लगना पड़ेगा।

मैंने जबाव दिया, नहीं।

आध्यात्मिक होने का अर्थ पूजा-पाठ कतई नहीं है। शेयर बाजार में जहां यह कहा जाता है कि ईमानदार दोस् खोजने की बजाय कुत्ता पाल लेना बेहतर है ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो कि आपकी बात को सुनकर समाधान सुझाए। यहां एक बार फिर में वैज्ञानिकों की खोज का हवाला देते हुए बताना चाहूंगा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि हम अपनी दिनचर्या में अपने दिमाग का महज एक प्रतिशत हिस्सा ही काम में लेते हैं। शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन मस्तिष् के पास होता है। हमारा आध्यात्मिक रुझान इसी 99 प्रतिशत हिस्से से हमारे लिए अतिरिक् ऊर्जा और समाधान चुराता है। यानि आध्यात्मिक होकर अपनी सहायता खुद ही कर रहे होते हैं। रहा सवाल पूजा पाठ का यह तो मात्र बाहरी उपांग हैं। वास्तविक रुप से तो हमें उस ईश्वर का ध्यान करना है जो हमें सही रास्ता दिखा सके। आप भी गौर करेंगे तो पाएंगे कि जो लोग ईश्वर की शरण में रहते हैं वे अपनी सामान् जिन्दगी में तनावों को खुद से दूर रखने में सफल होते हैं। तो सुबह या शाम के समय खुद और ईश्वर में किया गया समय का जरा सा निवेश हमें अच्छा फायदा दिला सकता है।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना- भाग पांच

मानसिक गुलामी...
ईश्वर ने हमें पैदा किया तो साथ ही हमारे खाने की भी व्यवस्था की। इस धारणा के साथ हरी घास के मैदान में चरती भेड का चित्रण किया गया। फिर इस भेड को एक रस्सी से बंधा देखा गया और निष्कर्ष निकाला गया कि खूंटे से बंधी रस्सी से बंधी भेड उतनी दूर तक ही चर सकती है जितनी दूर तक रस्सी जाती है। यानि कल्पना करें कि अधिक से अधिक कितनी घास खाई जा सकती है तो लगता कि एक गोल घेरे जितनी घास जिसका व्यास रस्सी के बराबर हो। यहां फिर से पूर्वनियतता धमकती है। यानि खूंटा ईश्वर ने लगाया, रस्सी उसने दी और कितना खा सकते हो इसकी आजादी भी। यहां आजादी है लेकिन रस्सी से बंधी आजादी। यह कल्पना भारतीय प्राचीन दर्शन से मेल नहीं खाती जो खुद को ईश्वर का ही अंश बताती है और एक दिन ईश्वर हो जाने का विश्वास भी दिलाती है।
पश्चिमी दार्शनिकों ने हालांकि स् और ईश्वर दोनों की ही विशद व्याख्या की है लेकिन भारतीय दर्शन ने तो मुक्ति के नाम पर चमत्कार ही कर दिया। हर बंधन का जवाब है। अद्वैतवाद में देखा जाए तो सबकुछ मिथ्या है और इससे परे निकला जा सकता है। द्वैतवाद को देखें तो लगता है कि भले ही सबकुछ मिथ्या हो लेकिन इससे बाहर निकला जा सकता है। चार्वाक की सुनें तो ऋण लेकर भी जिंदगी को और विशाल बनाया जा सकता है। सांख् की सुनें तो सृष्टि के साथ ही बंधन दिखाई देता है। इसके परे निकलने पर निर्गुण तक पहुंचा जा सकता है। यानि बच निकलने की संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन मानसिक गुलामी का क्या जो भेड के साथ बंधी रस्सी की शक् में लगातार हमारे साथ रहती है।

शनिवार, 29 मार्च 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना... भाग चार

आत्मा की स्वतंत्रता की बात से पहले बात आती है मानसिक स्वतंत्रता की। जब तक मनुष् इस दृष्टिकोण से सोचना शुरू नहीं करता कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता भी है तब तक स्वतंत्रता की अन् संभावनाओं पर विचार करना व्यर्थ प्रतीत होता है। मोटीवेशनल मेनेजमेंट गुरुओं की सुनें तो लगता है जैसे कि आम आदमी के लिए बनाए गए अधिकांश निय व्यक्ति को सीमाओं में बांध देते हैं और इसी से स्वतंत्र होने की संभावनाएं खत् होने लगती है। इसकी परिणिती यह होती है कि व्यक्ति खुद को बंधनों में जकडा हुआ पाता है और कभी स्वतंत्र नहीं होता है। लेकिन विवेकानन् और रामकृष् परमहंस को देखा जाए तो मानसिक बंधनों की क्षुद्रता समझ आने लगती है। एक ओर परमहंस हैं जो कि कीचड के बीच भी श्वेत धवल नजर आते हैं। सांसारिकता में इतने सूक्ष् की मूर्ति से इतना प्यार कर बैठे कि उसे जीवंत कर दिया। माया के जाल में इतने सूक्ष् हो गए कि जाल का ताना-बाना उन्हें जकड नहीं पाया। अपनी पत्नी को ही मां का दर्जा दे दिया। दूसरी ओर हैं विवेकानन्, उन्हीं परमहंस के शिष्य। माया के जाल के हर टुकडे से दूर। सांसारिकता त्यागने के बाद भी उन्हें चैन नहीं आया तो अपनी मातृभूमि त्याग दी और हर संबंध को खुद से दूर रखा। यानि अपना कद इतना विशाल कर लिया कि माया का जाल छोटा पड गया। केवल भारतीय और अमरीकी ही नहीं दुनिया का हर मनुष् उनके लिए भाई या बहन बन गए। तो जीवन बंधनों से बंधा हुआ होकर भी इतना सूक्ष् हो सकता है कि माया का आवरण बांध सके और इतना विशाल भी कि आवरण ही छोटा पड जाए। यानि स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकला जाए। यहां दूसरी खोज शुरू होती है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

गुरुवार, 6 मार्च 2008

दूसरे दिमाग की आहट

(Listening The Second Mind)
हमने चेतन और अवचेतन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। योग में राजयोग ऐसा सैगमेंट है जो हमें सैकण् माइंड तक पहुंचने के लिए सहायता करता है। इसके अलावा तंत्र में भी कई ऐसी तकनीकें हैं जो हमें सैकण् माइंड तक लेकर जाती हैं। फिलहाल मैं बात करूंगा साइकोलॉजिकल पद्धति की। साइकोलॉजिस् बताते हैं कि हमारे दिमाग की चार अवस्थाएं होती है। उन्हें एल्फा, बीथा, थीटा आदि में बांटा गया है।
एल्फा लेवल तकनीक: सेकण् माइंड में उतरने की यह मुझे सबसे सुलभ पद्धति लगती है। इसमें शांत होकर एक बंद कमरे में बैठना होता है। कमर सीधी और आंखें ठीक पैंतालीस डिग्री पर छत की ओर। अब सौ से एक तक उलटी गिनती करनी होती है। धीरे-धीरे। एक तक पहुंचने तक हमारा दिमाग एल्फा लेवल में पहुंच जाता है। तब हमारी श्वास स्थिर और स्वाभाविक हो जाती है। दिमाग की इस अवस्था में पहुंच हुए व्यक्ति को समस्याओं के समाधान भी नजर आते हैं और डिप्रेशन के पेशेंट को अधिक लॉजिकल सोचने का अवसर मिलता है। योग एवं तंत्र संबंधी चर्चा बाद में कभी...

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग तीन

ईश्‍वरवादी धर्मों में स्‍वतंत्रता की संभावना
ईश्वरवादी धर्म वे हैं जो वेदों को मानते हैं। यह दर्शन विषय की भाषा है। ईश्वर की व्युत्पत्ति कुछ इस तरह होती है कि वह सबकुछ जानने वाला है और सभी कुछ नियंत्रित रखता है। यानि सृष्टि में जो कुछ हो रहा है वह पूर्व नियत है। इंसान केवल खिलौना मात्र है। जो इस सृष्टि में परम पित परमात्मा के इशारे पर सुख दुख का खेल खेलते रहते हैं।
आप गहराई में सोचेंगे तो लगेगा कि सारे प्रयास फिजूल है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे किया जा सके क्योंकि सबकुछ तो ईश्वर ही कर रहा है। अमिताभ बच्चन की फिल् अक् में भी खलनायक भी यही कहता है मैं कुछ नहीं करता जो करता है वह करता है मैं नहीं कहता गीता में लिखा है। यानि कत् भी किया तो ईश्वर की मर्जी से और सजा भुगती तो वह भी ईश्वर की मर्जी से। ज्योतिष भी कुछ ऐसा ही कहती है। इंसान के पैदा होने के साथ ही उसके आगामी जीवन का खाका बनकर तैयार हो जाता है। यानि वह कितना पढेगा, कब शादी होगी, पत्नी कैसी होगी, बच्चे कितने और क्या होंगे, व्यवसाय करेगा या नौकरी, जिंदगी में कितना सफल होगा। सबकुछ।
दोनों बातें मिलकर परेशान कर देती है कि जब सबकुछ पूर्वनियत है तो मनुष् के स्वतंत्र होने की क्या संभावना है। क्या ऐसे ही एक के बाद दूसरी योनि में प्रवेश करता रहेगा और जीवन भोगता रहेगा। कभी मनुष् तो कभी चींटी, कभी हाथी तो कभी चिडिया।
मनुष् में स्वतंत्र होने की संभावना विद्यमान है। कैसे मैं नहीं जानता लेकिन विवेकानन् ने कहा कि स्वतंत्र हुआ जा सकता है, ओशो भी कहते हैं पुरातन भारतीय मनीषीयों ने भी कहा है। ईश्वरवादी धर्म के इस बंधन को त्यागने के लिए धर्म को त्याग भी दूं तो मैं नहीं जानता कि मुक्ति का रास्ता क्या है
शायद बुद्ध जानते थे, शंकराचार्य ने पहचाना था, शायद कृष् कुछ इशारा कर रहे थे। किसकी सुनूं और किधर जाउं यह यक्षप्रश् सदा दिमाग में घूमता रहता है। आपके भी घूमता होगा कि इन बंधनों से कैसे निकला जाए...

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावना - भाग दो

व्‍यवस्‍था बिगाडती है ऑरेकल
मुझे बताने पर याद आया कि मैट्रिक्‍स का पूरा किस्‍सा लिख दिया और ऑरेकल को भूल गया। मैमोरी एक्‍सपर्ट्स तो कहते हैं कि हम कुछ भी नहीं भूलते। तो क्‍या मैं ऑरेकल को लिखना नहीं चाहता था या फिर सचमुच भूल गया।

मैं दोबारा से शुरू करता हूं। किस्‍सा यह है कि मैट्रिक्‍स यानि कपिल मुनि की प्रकृति या शंकराचार्य की माया के प्रमुख किरदारों के केन्‍द्र में है नियो। स्‍वयं व्‍यक्ति। इसे सिखाया जाता है शंका करना। इंसान थोडा बहुत शंकालु हमेशा होता है लेकिन शंका की पराकाष्‍ठा यह होती है कि वह विश्‍वास करने से डरने लगता है कि सबकुछ वास्‍तविक है। मैट्रिक्‍स में ऑरेकल उस अविश्‍वास का प्रतीक है जो वर्तमान व्‍यवस्‍था को बिगाडने का काम करती है। पहली बार में तो मुझे समझ में ही नहीं आया कि व्‍यवस्‍था को बिगाडने वाली इकाई को इतना अधिक महत्‍व क्‍यों दिया जा रहा है कि उसे सबकुछ पता है।
शंकर के दर्शन के साथ जोडने पर मुझे समझ में आया कि मैं कौन हूं इस शंका के साथ जो यात्रा शुरू होती है वह आगे बढते हुए ऑरेकल तक जाती है। यानि परम अविश्‍वास। हर व्‍यवस्‍था पर। नितान्‍त अराजक। लेकिन फिल्‍म में तो उसे बहुत शांत दिखाया गया है और साथ में सुरक्षा प्रहरी भी दिया है। यही सुरक्षा प्रहरी नियो को लेकर जाता है ऑरेकल के पास। सीरीज के पहले भाग में ऑरेकल का रोल स्‍पष्‍ट नहीं होता है और नियो भी उसे शक की निगाह से देखता है। दूसरे भाग में तो स्थिति को स्‍पष्‍ट किया जाता है ऑरेकल को बदले हुए रूप में दिखाकर। इस बार तात्‍कालिक व्‍यवस्‍था के प्रति और अधिक शंकालू हो चुके नियो ऑरेकल को पहचान कर भी नहीं पहचान पाते। फिल्‍म की सीरीज देखने के दौरान मुझे लगा कि नियो (फिल्‍म देखते समय दर्शक आमतौर पर खुद को हीरो के साथ जोड लेता है) या कह सकते हैं मैं ऑरेकल को पसन्‍द नहीं करता। शायद यही कारण रहा होगा कि पिछली पोस्‍ट में मैं ऑरेकल के व्‍यक्तित्‍व को ही नजरअंदाज कर गया।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2008

अनुशासन और कुछ भी चलता है

हिटलर बहुत कडे अनुशासन में रहता था और पूरी जिन्‍दगी उसने बहुत सलीके और ध्‍यान से काटी। हद तो यह थी कि बहुत पहले ही उसने मीन कैम्‍फ नाम से अपने जीवन का एक नक्‍शा तैयार किया और लगातार उस पर चलता रहा। छोटा सा कद बुलंद हौंसले और उन्‍हें पूरा करने के लिए भयंकर अनुशासन। ओशो ने एक जगह लिखा कि क्‍या होता कि अगर हिटलर कुछ संगीत सुन लेता, कुछ नृतय कर लेता और कुछ समय छुट्टियां मना लेता। मैंने इन शब्‍दों को पढा तो एक बार लगा कि ओशो सही कह रहे हैं लेकिन भाग्‍य या दुर्भाग्‍य उन्‍हीं दिनों में मुझे अनुशासन का पाठ पढाया जा रहा था।
बहुत कुछ खो देने के विश्‍वास के साथ मैं भी एक सैट फारमेट में अनुशासन की सीख ले रहा था। तब मुझे महसूस हुआ कि कुछ हासिल करना है तो अनुशासन बहुत जरूरी है। यह भी तब आता है जब सत्‍य हो। सत्‍यता के साथ समझौता कर लोग अनुशासन में ढील लेते हैं और परिणाम में असफलता हाथ लगती है। यह कुछ कुछ दाल के हलवा बनाने जैसा काम है। दाल का हलवा बनाते समय हम पिसी हुई दाल को सेंकना शुरू करते हैं तो खुशबू आने तक सेंकते रहते है पूरे अनुशासन के साथ, इसके बाद घी डालते समय पूरी ईमानदारी बरतते हैं और जब तक हलवा तैयार नहीं हो जाता तब तक उसे चम्‍मच से बिना थके बिना रुके हिलाते रहते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी थोडी भी ढिलाई रहे तो...
दाल कच्‍ची रह जाएगी
घी की कमी से हलवा सूखा सूखा बनेगा
या फिर अधिक फीका या अधिक मीठा
यानि दाल का हलवा बिल्‍कुल सही बनाना हो तो पूरा अनुशासन और पूरी ईमानदारी चाहिए। बिना मिलावट
यही कुछ सफलता के साथ भी है।

सोचो अगर दाल का हलवा बनाते समय यह सोच दिमाग में हो कि सब कुछ चलता है...

रविवार, 17 फ़रवरी 2008

रसायनिक प्रेम

मुझे इस टॉपिफ पर लिखने से पहले काफी सोचना पडा। हर बार लगता कि किसी एक विषय की ओर झुक गया तो दूसरा विषय खुद को उपेक्षित महसूस करेगा। बहुत सोचने के बाद लिखने का मानस बना चुका हूं तो लिखूंगा ही


प्रेम और रसायन का आपस में संबंध में यह एक सामान्‍य जानकारी है। जो लोग विज्ञान में रुचि रखते हैं उन्‍हें यह जानकारी है कि दो लोग जब प्‍यार करते हैं तो दिमाग में दो प्रकार के रसायनों की भरमार होती है। करीब आते वक्‍त ऑक्‍सीटोसिन और दूर जाते वक्‍त डोपामिन। इस तरह तो विज्ञान की पुस्‍तकों में नहीं लिखा है। पुस्‍तक में तो लिखा है कि रोलर कोस्‍टर राइट के दौरान ऑक्‍सीटोसिन लडने की ताकत देता है और इसके स्‍त्राव के ठीक बाद डोमामिन का सीक्रेशन होता है। डोपामिन के साए में दो प्रेमियों का प्‍यार पलता है। यह तो हुई विज्ञान की बात।
तो मैं क्‍या कहना चाह रहा हूं। कुछ दिन पहले वैलेन्‍टाइन डे आकर गया। यानि आया और चला गया। मैं रुटीन के काम कर रहा था। मेरी पत्‍नी रूटीन के काम कर रही थी और बाकी मेरे जान-पहचान के लोग भी अपना रूटीन का काम कर रहे थे। संत वेलेन्‍टाइन की इससे अधिक तौहीन और क्‍या हो सकती है कि हमने अपना काम काज छोडकर उसके पीछे नहीं भागे। बसंती बयार में सर्दी जुकाम का डर था और बाजार में निकलने पर खर्च का। कुल मिलाकर हमने दोनो जेब और दिमाग दोनों के स्‍त्राव रोक लिए। इससे क्‍या....
अब जब मेरे स्‍त्राव रुके तो ध्‍यान आया कि प्‍यार पर सोचा जाए। विद्वजनों मैने कहीं पढा कि आदमी तीन जगह पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है। गोद में बैठे बच्‍चे के साथ, गोद में रखे शीशे के साथ और गोद में पसरी प्रेमिका के साथ। तीनों अवस्‍थाओं में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। उस समय वह जो हरकतें करता है अगर उनकी वीडियो रिकार्डिंग कराकर उसे वापस दिखाई जाए तो शायद वह जमीन में गढ जाए।
शेक्‍सपीयर ने भी इसे समझ लिया था। तभी उसने कहा कि प्रेमी मीठी बेवकूफिया करते हैं और उनके अलावा सभी लोगों को ये बेवकूफियां दिखती है।
तो सज्‍जनों मैंने और आप जैसे बहुत से लोगों ने बुद्धिमानी से पैसे और रसायन बचाए लेकिन जीवन का रस भी इसी के साथ लुप्‍त हो गया।
अब सोचता हूं कि काश स्‍त्राव को नहीं रोकता और खुद ही क्‍यों न बह जाता उसके साथ ही
रस तो बना रहता चाहे रासायनिक ही क्‍यों न हो...

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

तंत्र और तांत्रिक क्रियाएं

तंत्र को ज्‍योतिष से अधिक गूढ विषय माना जाता है। आज मैं आपके समक्ष तंत्र का दूसरा ही पक्ष पेश करने की कोशिश करूंगा। इस पक्ष को जानने के बाद शायद आपके दिमाग से तांत्रिक के नाम पर उभरने वाली छवि में कुछ बदलाव आए जिसमें एक काले, लाल या गेरूए कपडे पहने एक आदमी होता है। लम्‍बे बाल, दाढी और रहस्‍यमयी आवाज के साथ दूसरी दुनिया से सम्‍पर्क बनाने की कोशिश करते तांत्रिक की बजाय मैं शुरुआत करता हूं तंत्र से
तंत्र क्‍या है?
किसी विशेष परस्थिति को बनाने के लिए एक व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता होती है। यह व्‍यवस्‍था कोई व्‍यक्ति भी कर सकता है और इसके लिए पूरा सिस्‍टम भी बनाया जा सकता है। इसी सिस्‍टम को गूढ भाषा के साथ तंत्र कहा जाता है। बस इतना ही।
नहीं जनाब यह तो शुरूआत है सिस्‍टम या तंत्र को समझने की। यहां से हम जान सकते हैं कि तंत्र क्‍या है इसमें प्रवेश कैसे किया जा सकता है। मैं आपको कोई काम बताउं और आप उस काम को सोचने की बजाय करके देखें तो यह भी सिस्‍टम ही है। कैसे... याद करें मैंने आपको एक प्रयोग बताया कि जिसमें घर के एकांत स्‍थान पर ध्‍यान करना था कि आप छत के किसी कोने से खुद को देख रहे हैं।
इसमें जब आप खुद यह कार्य करके देखते हैं तो आपको कुछ रियलाइज होता है यानि एक विशिष्‍ट अनुभूति जो सिर्फ अपने संबंध में आपको ही हो सकती है। अगर आपने यह प्रयोग किया है तो जान सकते हैं कि आप एक अलग अंदाज में अलग वातावरण में पहुंच जाते हैं। यानि आपने तांत्रिक क्रिया के साथ अपने सैकण्‍ड माइंड में दस्‍तक दी और उसे सुना भी। कुछ इसी तरह से वह ढोंगी तांत्रिक भी करता है। अंतर इतना है कि वह अपने सैकण्‍ड माइंड में उतरकर वर्तमान परिस्थितियों की गणना अवचेतन से करता है और आपके प्रश्‍नों का माकूल जवाब देने में सफल होता है। आप कोशिश करें तो आप भी अपने सैकण्‍ड माइंड (अंतरमन) में उतरकर वही जवाब हासिल कर सकते हैं।

यहां एक सवाल- यह कैसे होता है
हर व्‍यक्ति के पास अपने सवालों के जवाब होते हैं।

इस पर एक और सवाल- फिर उलझनें क्‍यों होती है
क्‍योंकि जो जवाब है हम उसका सामना करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते

अगला सवाल- जवाब पाने का क्‍या तरीका है
जवाब – तांत्रिक हो जाइए

ऐसा करने से आपके पास जवाब को स्‍वगत हासिल नहीं करने की सुविधा उपलब्‍ध रहती है। जब आप अपने अंतरमन में तंत्र की सहायता से उतर चुके होते हैं तो वहां सवालों के जवाब भी सामने होते हैं और संभावित परिणाम भी।
क्‍या किया जाए तांत्रिक होने के लिए
सबसे आसान तरीका तो यह है कि अपने अंतरमन की हमेशा सुनो। एक बार सुनने में तो कोई समस्‍या नहीं है लेकिन हमेशा शब्‍द के साथ यह क्रिया लगभग असंभव हो जाती है। दूसरा तरीका धार्मिक हो जाने का है। हम अपने ईष्‍ट के समक्ष बहुत कम झूठे होते हैं।
क्‍योंकि जैसा देव वैसा पूजारी और जैसा पूजारी वैसा देव
यहां किसी प्रकार का अहंकार या छिपाव नहीं होता और आप आसानी से अपने सवालों के जवाब पा जाते हैं
और अंत में तरीका बचता है ध्‍यान का
इसके बारे में कल बात करेंगे...

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

स्‍वतंत्रता की संभावनाएं- भाग एक

जन्‍म-मृत्‍यु के चक्र को नियति मान भी लिया जाए तो मोक्ष मनुष्‍य की इच्‍छा स्‍वातंत्रय (freedom of will) का परिचायक है।
कपिल मुनि ने सांख्‍य दर्शन में जिस निरपेक्ष पुरुष का और शंकराचार्य ने अद्वैतवाद में जिस निगुर्ण, निराकार और निर्लिप्‍त ब्रह्म का उल्‍लेख किया है उस सामानन्‍तर सत्‍ता से एक आम इंसान अपने प्रयासों से कैवल्‍य अवस्‍था प्राप्‍त कर जुड जाता है। फिर उसे सांसारिक बंधन गौण लगने लगते हैं। पश्चिमी मान्‍यता में ऐसा कुछ नहीं है जो भौतिक जगत को चुनौती दे सके।
एक बार ओशो ने इसे बहुत खूबसूरती के साथ पेश किया था। उन्‍होंने कहा कि भारत मे बुद्ध ने देखा कि एक गरीब, दूसरा रोगी, तीसरा मृत और चौथा सन्‍यासी है। पश्चिम के लोग इस सन्‍यास को समझ नहीं पाए इसलिए वहां कोई योगी नहीं हुआ।
पश्चिम के अनुसार जो कुछ है सब यहीं पर है। ऐसे में हॉलीवुड की एक फिल्‍म मैट्रिक्‍स प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक पश्चिमी भौतिकवाद के बीच अद्भुद् सांमजस्‍य पेश करती है।

मैट्रिक्‍स मेरी नजर में:

इस फिल्‍म के पात्रों के नाम भी कुछ इस तरह है जो मौजूदा इंसानों का संबंध दूसरी दुनिया से जोडते हैं।

नियो: metaphysical world का प्रतिनिधित्‍व करता है। ट्रिनिटी: भौतिक और अध्‍यात्मिक जगत के बीच संचरण में नियो की सहायता करती है और अंत में उसका साथ भी छूट जाता है।
मारफीयस: यह जानता है कि नियो होता है और उसे कैसे बाहर निकाला जाता है।
एजेन्‍ट स्मिथ: भौतिक जगत पर कब्‍जा करने वाले लोग, इन्‍हें वायरस माना गया है।
कम्‍प्‍यूटर वर्ड: माया के आवरण से ढकी सृष्टि को दिखाने का प्रयास

पूरी फिल्‍म को एक इंसान के दिमाग और उसके चारों ओर के वातावरण के साथ देखा जाए तो महसूस होता है कि गूढ बातों को कितनी सुंदरता के साथ पेश किया गया है। एक आम इंसान कि तरह “मिस्‍टर एडम्‍स” पैदा होता है, पढ लिखकर (पहले से तैयार सिस्‍टम में) एक बडी कंपनी में मुलाजिम हो जाता है। स्‍वाभावित चारित्रिक कमजोरियों- डर और लालच के साथ जिंदगी गुजार रहा होता है कि एक दिन:
मारफीयस (अंतचेतना) का संदेश आता है जिसमें माया को तोडकर निकल जाने का भाव होता है। शुरू में मिस्‍टर एडम्‍स डरता है लेकिन ट्रिनिटी और अन्‍य गुणों के साए में वह माया का जाल तोडकर दूसरी ‘वास्‍तविक’ दुनिया में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद शुरू होताह एक और संघर्ष-
विश्‍वास करने का: माया के आवरण से ढकी सृष्टि में क्‍या वास्‍तविक है और क्‍या भ्रम इस बारे में निर्णय करना कतिपय मुश्किल है। लोगों, वस्‍तुओं और घटनाओं पर कितना यकीन किया जा सकता है और कितना अविश्‍वास यह भी स्‍पष्‍ट नहीं होता। 

इस बारे में एक झेन गुरू की कहानी भी है: एक झेन गुरू एक खूबसूरत सुबह जागे और जोर-जोर से रोने लगे। शिष्‍य सकते में आ गए कि क्‍या हो गया गुरूजी को। पूछा क्‍यों रो रहे हैं गुरूजी। तो जवाब मिला कि मैं सपने में तितली बन गया था और खिली धूप में उपवन में फूलों रस चूसता घूम रहा था। इस पर शिष्‍यों की जान में जान आई। किसी समझदार शिष्‍य ने कहा गुरूजी वह तो स्‍वप्‍न था। यह जवाब सुनकर तो गुरूजी दहाड मारकर रोने लगे। बोले मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि वह स्‍वप्‍न था कि यह स्‍वप्‍न है। इस कहानी में वर्तमान पर अविश्‍वास करने के बजाय जो वास्‍तविक है उस पर विश्‍वास करने की कोशिश की गई है। भारतीय दर्शन में भी जाग्रत अवस्‍था से तुरीय अवस्‍था तक चेतना के कई स्‍तर बताए गए हैं।

अब वापस मैट्रिक्‍स में चलते हैं: यहां मारफीयस भी मिस्‍टर एडम्‍स को नियो बनाने में जुटते हैं और नियो को विश्‍वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन इस प्रयास में भी भौतिक रुख कायम रहता है। पता नहीं दर्शको को समझाने के लिए या फिर पश्चिमी मान्‍यता के कारण। कुछ भी हो मारफीयस का प्रयास रंग लाता है और नियो खुद में विश्‍वास करने लगता है। भारतीय दर्शन में इस अवस्‍था को कहते हैं

अहम् ब्रह्मास्मि यानि मैं ही ब्रह्म हूं।
इसके बाद नियो के सामने कम्‍प्‍यूटर वर्ड (माया के आवरण वाली दुनिया) धूमिल होने लगती है। अंतत: नियो माया के जाल को तोड देता है। भौतिक और सांसारिक नियमों के टूटने के साथ ही नियो उडने लगता है, गोलियों को रोकने लगता है और बिना साधनों के दोनों दुनियाओं में भ्रमण करने लगता है।
... स्‍वतंत्रता की संभावनाएं...

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

दिल से ईश्‍वर तक ले जाने वाले गीत

हमेशा दर्शन और अध्‍यात्‍म के बारे में चिंतन करने वाले लोग (हो सकता है मेरे जैसे हों लेकिन) इस बारे में बहुत अच्‍छा नहीं सोचते। चलिए मैं आपके साथ सोचने की कोशिश करता हूं। पिछले कुछ दिनों में मैने गानों के बारे में सोचा। जो दिल, प्रेयसी और विरह के प्रेम से पगे थे। इसमें खास क्‍या है। सुनकर आपको सुखद आश्‍चर्य होगा कि जो भी गाने हिट हैं वे सभी ईश्‍वर पर फिट बैठते हैं।
भईया यह कैसे।
बताता हूं
एक गाना सोचो जो आपने सुना और दिल को छू गया।
मन हूंम हूंम करे घबराए घन धम धम करे गरजाए
इक बूंद कहीं पानी की अखियों से बरसाए
इस गाने में पिया से विरह की पीडा कूटकर भरी हुई है लेकिन गरीब प्रियतमा अपने प्रिय से कहती है

तोरी ऊंची डारी मैने पंख लिए कटवाए

इसे पूरी तरह ईश्‍वर के विरह में कलपती आत्‍मा के लिए माना जा सकता है। एक क्षण ऐसा आया कि इस आत्‍मा को उसका साथ कुछ देर के लिए मिल गया और नन्‍ही आत्‍मा उसके प्रेम में उलझ गई अब जब निरंकुश निराकार ईश्‍वर ऊपर बैठा देख रहा है तो आत्‍मा कहती है नैतिक रूप से तुम्‍हारी डारी बहुत ऊंची है और मैने शरीर में फंसकर अपने पर कटवा लिए हैं। न उडा जा सकता है और न रहा जा रहा हे।

बहुत कारुण

एक और गाना लेते है
पंख होते तो उड आती रे रसिया ओ बालमा तुझे दिल के दाग दिखलाती रे...

कुंठा बढाती शिक्षा

सैकडो साल पहले अरस्‍तू ने एक बार कहा कि कोई नहीं जानता कि बच्‍चों को अच्‍छा कैसे बनाया जाए। यकीन मानिए तब से अब तक हजारों लोग लाखों घण्‍टे लगाकर इस बारे में शोध कर चुके हैं लेकिन इसका कोई निश्चित जवाब नहीं खोजा जा चुका है। शिक्षा के कई स्‍तर है। एक ओर रविन्‍द्रनाथ का प्रयोग है जिसमें युवक-युवतियों को पेडों के नीचे बैठाकर प्रेमपूर्ण माहौल में पढाया जाता था। समस्‍या तब आई जब प्रेमपूर्ण वातावरण में युवकों और युवतियों को प्रेम तो बढने लगा लेकिन पढाई के बारे में कुछ कहना मुश्किल रह गया।
ठीक है
इसके साथ ही चल रहा था मैकाले का प्रयोग
इसमें कक्षा लोअर किंडर गार्डन से लगाकर मास्‍टर ऑफ द सब्‍जेक्‍ट तक की पढाई थी लेकिन एक अत्‍यंत मेधावी बालक चार साल की उम्र से बाईस साल की उम्र तक पढकर भी इंसान बन जाए इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है। इस पद्धति की खासियत यह है कि यह पडाव दर पडाव होती है और हर साल आपको कुछ हासिल कर लेने का सुख सौभाग्‍य प्रदान करती है ऐसे में कोई अभिभावक या फिर विद्यार्थी साल दर साल मिल रही इस संतुष्टि को कैसे अलविदा कह सकता है। सरकार के लिए भी यह अधिक सहूलियत की चीज है कि पहले से तैयार सिस्‍टम को बनाए रखा जाए इसमें सोचने की जरूरत भी नहीं पडती।
अब बात रही कुंठा की
मान लिया शिक्षा की हर संभव पद्धति को लागू किया जाए और विद्वान से विद्वान लोग तैयार किए जाएं लेकिन ये लोग आखिर करते क्‍या हैं
मैं किसी रेंटिंग के चक्‍कर में न पडूं तो आपको बता सकता हूं कि यह पढाई बनाती है
अध्‍यापक
वकील
चिकित्‍सक
सेल्‍समैन
प्रशासनिक अधिकारी
इंजीनियर
और तीन चार जोड लीजिए लिस्‍ट खत्‍म हो जाएगी
तो मैं क्‍या कहना चाह रहा हूं
सही सवाल
मैं बता रहा हूं कि उक्‍त सभी कार्य नौकरीपेशा लोगों के हैं जो नहीं है वे स्‍वरोजगार के लिए उन्‍मुक्‍त करते हैं। यानि या तो रोजगार के लिए किसी का मुंह देखो या फिर जिंदगीभर मेहनत करके रोटी कमाओ
अमीर कैसे बनोगे, संतुष्‍ट कैसे होवोगे, शांत कैसे होवोगे, क्‍या पैसे के पीछे भागते रहोगे, लम्‍बी छुट्टियां कब मनाओगे, अपने मन का काम कब करोगे

आखिरी सवाल ज्‍यादा चुभोने वाला है इस जिन्‍दगी में मन का काम क्‍या होता है जो काम है वही करना पडेगा यही नियति है जिन्‍दगी ने इसी ओर धक्‍का मारा है तो इसी ओर जाएंगे जिन्‍दगी जब तक दूसरी बार धक्‍का नहीं मारेगी तब तक कैसे परिवर्तन हो सकता है। परिवर्तन के लिए परिस्थितियां जरूरी है।
अब आई बात समझ में देश, काल, समाज और अर्थ यानि पैसा तय करता है कि हम किस ओर जाएंगे न कि हमारी इच्‍छा। यानि ईश्‍वरवादी धर्मो के अनुसार सबकुछ पूर्वनियत है और यह सही है।
अब मेरी सोच यह है कि स्‍वतंत्रता की संभावना (freedom of will) कहां है। सबकुछ तो धक्‍के से चल रहा है।
वर्तमान में हमें मिल रही शिक्षा केवल इस धक्‍के को समझने और झेलने की क्षमता देती है ऐसे में कुंठा परत दर परत दिमाग में घर करती जाती है और आखिरी परिणाम होता है कि हम अपनी शक्तियों को भूलकर हथियार डाल देते हैं। इसे समझने के लिए मैं आपको एक प्रयोग करने के लिए आमंत्रित करूंगा
अपने घर के शांत स्‍थान पर कुछ देर के लिए आंखें बंद करके बैंठें और कल्‍पना करें कि आप कमरे के ही किसी ऊपरी कोने से खुद को देख रहे हैं अब बताएं कि क्‍या आपको दिखाई देने वाला व्‍यक्ति वही है जिसकी छवि आपने बचपन में अपने मन में गढी थी यदि नहीं तो कुंठाएं सिर उठा चुकी है।
अगला प्रयोग
परिस्थितियों से कितना लड सकते हैं
ऊपर बताई अवस्‍था में ही बैठे रहें और सोचें कि यह व्‍यक्ति अपने मन की करने के लिए कितने दिनों के लिए वर्तमान स्थिति से गायब हो सकता है हट सकता है बिना कमाए बिना किसी की चिंता किए बिना कोई व्‍यवस्‍था किए
इस लेख को पढकर एक बार हो सकता है आपको डिप्रेशन महसूस हो लेकिन परतें खुलने लगेंगी
श्‍ोष कल...

बुधवार, 30 जनवरी 2008

ओशो का नजरिया

सामान्‍य शिक्षा

दीक्षा की आलोचना करने वाले ओशो ने एक ही बात पर बल दिया कि शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्‍य को सोचना सिखाए। जब तक मनुष्‍य खुद सोचना नहीं सीखेगा और दूसरे की सोच पर काम करेगा तब तक दुख पाएगा। ऐसे में किसी विद्यार्थी को गुरू क्‍या सिखा सकता है। इस बारे में ओशो कहते हैं कि सिखाओ मत देखो कि विद्यार्थी क्‍या सीखने को प्रवृत्‍त है। जैसा विद्यार्थी का रुझान हो शिक्षक को बडे भाई की तरह उसका मार्गदर्शन करना चाहिए। न कि बाप की तरह। ऐसे में सीखने के दौरान आने वाली बाधाओं को पार करने के अलावा अतिरिक्‍त स्‍वतंत्रता की संभावना बनी रहेगी जो विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में सहायक होगी। ऐसा नहीं होने पर सिस्‍टम में पहले से तैयार हो रहे लोगों जैसा ही एक और मनुष्‍य आ खडा होगा। जो व्‍यवस्‍था से सांमजस्‍य बनाकर चलता हो और जीवनयापन करता हो।
गुरू की भूमिका के बारे में ओशो स्‍पष्‍ट करते हैं कि मारने या अन्‍य विधियों से भ्‍ाय पैदा करने से अगर चेला गुरू का कहना मानता है तो इसका कोई फायदा नहीं है। गुरू ऐसा होना चाहिए जिसके प्रति चेले के मन में स्‍वयं ही आदर पैदा हो। और ऐसा केवल प्रेम अनुराग से ही संभव है।

तार्किक शिक्षा की जरूरत

शिक्षा कैसी हो इस बारे में बहुत कम दार्शनिकों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं। यह बात अलग है किन इन दार्शनिकों ने परम्‍परागत शिक्षा ग्रहण नहीं की। आधुनिक भारत में जहां कुछ पिछडे हुए लोगों को उठाने के लिए आरक्षण की व्‍यवस्‍था की गई है वहीं अगडों में से भी अधिकांश के पास नौकरी और सुरक्षित भविष्‍य नहीं है।
राष्‍ट्रवादी संगठनों ने मैकाले को गाली दी और अपनी जिम्‍मेदारी से मुक्ति पा ली। कुछ संगठन और मिशनरीज स्‍कूलें भी चला रहे हैं ताकि बचपन में ही बच्‍चों को धर्म विशेष का बीज पकडा दिया जाए। ताकि बडे होकर वे सफेद, लाल, गेरूए या हरे वस्‍त्र पहनकर धर्मयुद्ध में कूद सकें।
फिर भी आज एक पिता को इस बात की चिंता रहती है कि उसके पुत्र का भविष्‍य क्‍या होगा। क्‍या वह अपने पैरों पर खडा हो पाएगा, क्‍या वह वायोलेंट होते समाज में अपने पैर जमा पाएगा, क्‍या वह प्रतिस्‍पर्द्धा में टिक पाएगा। उसे क्‍या बताया जाए कि वह सबसे आगे रहे। अक्षर ज्ञान प्राप्‍त कर चुके लोगों को भी यह पता नहीं कि अपने अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए या फिर आज की हमारी नैतिक जिम्‍मेदारी क्‍या है
किसी बच्‍चे को तार्किक और स्‍पष्‍ट सोच के लिए न केवल पढाई की बल्कि तर्कपूर्ण वातावरण की भी आवश्‍यकता होती है।
अगले पोस्‍ट में मैं बात करुंगा ओशो के नजरिए की।