गुरुवार, 27 सितंबर 2012

प्रिय गूगल, जन्‍मदिन की बधाई

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प्रिय गूगल, जन्‍मदिन की ढे़रों बधाइयां और उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए शुभकामनाएं। इस बार तुम चौदह साल के हो चुके हो। यकीन नहीं होता कि जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सबकुछ जानता है, वह महज चौदह साल का ही है। वास्‍तव में देखा जाए तो यह तुम्‍हारा कम और दुनिया में पिछली सदी में शुरू हुई सूचना क्रांति का चमत्‍कार अधिक नजर आता है। तुम्‍हारी ख़ासियत यही रही कि तुमने उस क्रांति के परों पर सवार होने में कतई देरी नहीं की। कम्‍प्‍यूटर युग का पहला चरण पूरा होने तक तुमने समझ लिया था कि ठीक है लोगों के हाथ में कम्‍प्‍यूटर तो आ गए, लेकिन इसका उपयोग किस तरह होगा। तुमने अपनी पूरी ताकत इस काम में लगा दी कि दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो रहा हो, उसे संबंधित यूजर तक किसी भी सूरत में पहुंचा दिया जाए। यह कहते हुए खुशी हो रही है कि तुम इसमें सफल भी रहे हो, हालांकि सुधार की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है, फिर भी श्रेष्‍ठ और सर्वश्रेष्‍ठ के अलंकरण उत्‍साह तो बढ़ाते ही हैं।
मेरा तुमसे परिचय 2002 में हुआ। यानी तब तक तुम भी चार साल के हो चुके थे। इसके बाद 2006 में पहली बार मैंने जीमेल खाता बनाया (देखा कितना पुराना साथी हूं तुम्‍हारा), इसके बाद तुमने एक के बाद एक कई एप्‍लीकेशन दी। मैंने तकरीबन हर एप्‍लीकेशन को इस्‍तेमाल करने का प्रयास करता रहा। एक दौर ऐसा भी था जब मैं तुम्‍हारी 31 एप्‍लीकेशंस का तेजी से उपयोग कर रहा था। इस बीच तुम्‍हारे कुछ प्रोजेक्‍ट फेल भी हुए। मसलन बज्‍ज और वेव। इन दोनों में मुझे संभावना दिखाई दे रही थी। भले ही बज्‍ज फेसबुक के बाद आया था, लेकिन तुमने तेजी से अपनी जगह बनाई। भले ही दुनियाभर में फेसबुक तेजी से फैल रहा था, लेकिन भारत में बज्‍ज के दीवाने भी थे। अधिकांश तो ब्‍लॉगर ही दिखाई देते थे।
और हां, ब्‍लॉग, इसने तो मुझे अपने अंदाज में लिखना तक सिखा दिया। पत्रकारिता की नौकरी मुझे बंधी बंधाई लीक पर लिखने के लिए बाध्‍य कर रही थी, तब तुमने मुझे अलग अंदाज से सोचने और लिखने के लिए उत्‍साहित किया। इसका नतीजा यह हुआ कि मेरे लिखने की खुद की शैली बनी। इसका मुझे अपने संस्‍थान में भी फायदा मिला। तुम्‍हारी सफलताओं के लिए तुम्‍हें ढेरों बधाइयां, लेकिन साथ ही कुछ नसीहत भी, ठीक वैसी ही जैसी स्‍पाइडरमैन के अंकल कहते थे “ताकत बढ़ने के साथ जिम्‍मेदारियां भी बढ़ती हैं”। तुम्‍हारे ऊपर भी समय के साथ जिम्‍मेदारियों का बोझ बढ़ रहा है। अब तक जिस बखूबी के साथ इसे निभा रहे हो, उम्‍मीद करता हूं कि भविष्‍य में भी ऐसे ही तटस्‍थ और सक्रिय रहोगे।
गूगल प्‍लस के संबंध में एक सलाह भी, अगर तुम्‍हारे शीर्ष अधिकारियों तक पहुंचे तो, गूगल प्‍लस सेवा फेसबुक से बेहतर साबित हो सकती है, अगर इसके पेज तनिक तेजी से लोड हो। पता नहीं क्‍यों गूगल प्‍लस पर अधिकांश लोग जीआईएफ इमेजेज लगातार लोड करते रहते हैं। एक से दो एमबी की चार या पांच इमेज भी स्‍ट्रीम में होने पर गूगल प्‍लस के खुलने की रफ्तार बैलगाड़ी से मुकाबला करने लगती है। ऐसे में मैं प्‍लस को छोड़कर फिर से फेसबुक पर जा बैठता हूं। उम्‍मीद है इस ओर ध्‍यान दोगे तो स्‍ट्रीम लोड होने की समस्‍या का समाधान होगा और खीज कम होने पर अधिक लोग इस ओर भी आ पाएंगे।
तुम्‍हारे बेहतर भविष्‍य की उम्‍मीद के साथ
पुराना यूजर
सिद्धार्थ जोशी
बीकानेर

रविवार, 23 सितंबर 2012

‘विश्‍वास का चमत्‍कार’

हवाई द्वीप के एक मनोचिकित्‍सक डॉ. ह्यू लिन ने अपने देश के सबसे कठिन मनोरोगियों को बिना उनसे मिले उन्‍हें ठीक कर दिया। आप और हम भले ही इसे चमत्‍कार मान लें, लेकिन इस चिकित्‍सक ने अपनी दिनचर्या में इस चमत्‍कार को शामिल कर रखा है। कुछ साल पहले इस चिकित्‍सक की पहली नियुक्ति देश के ऐसे मनोचिकित्‍सालय में हुई, जहां मनोरोग के सबसे विकट मामले भेजे जाते थे। डॉ. ह्यू लिन ने सोचा कि उन्‍हें यहां भेजा गया है तो इसमें जरूर ईश्‍वर का कोई न्‍याय रहा होगा। उन्‍होंने यह मानते हुए कि इन सभी मरीजों का चिकित्‍सक से कोई न कोई संबंध जरूर रहा है। इस जीवन में न सही पिछले किसी जन्‍म में हुए संबंध की वजह से आज वे साथ हैं। एक मरीज से रूप में तो दूसरा चिकित्‍सक के रूप में। यहीं से इलाज की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। 

जब चिकित्‍सक अस्‍पताल में आए तो वहां के मरीजों से न केवल अस्‍पताल का स्‍टाफ बल्कि चिकित्‍सक भी डरते थे। जंजीरों में जकड़े होने के बावजूद इन मरीजों के करीब जाना भी खतरनाक था। यहां ड्यूटी इतनी कठिन थी कि अस्‍पताल के स्‍टाफ को महीने दो महीने के बाद बदल दिया जाता था, ताकि ड्यूटी कर रहे कार्मिकों का मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य न बिगड़ जाए। इसी के साथ चिकित्‍सक की एक नई यात्रा शुरू हुई मानसिक संदेशों के आदान-प्रदान के रूप में। उन्‍होंने एक एक मरीज की फाइल को पढ़ना शुरू किया। हर केस को पढ़ने के दौरान उन्‍होंने दो मानसिक संदेश हर मरीज तक पहुंचाने का प्रयास किया। 

‘मुझे खेद है,’ ‘मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं’ डॉ. ह्यू लिन इसे ‘खुद की सफाई’ की पद्धति बताते हैं। वे इसे ‘हो’ओपोनोपोनो’’ कहते हैं। आश्‍चर्य की बात यह है कि मरीजों पर धीरे धीरे इसका असर दिखाई देने लगा। एक समय के बाद खतरनाक मरीज शांत होने लगे। अब स्‍टाफ भी नियमित काम करने लगा। जो मरीज हल्‍के मनोरोग से पीडि़त थे, वे ठीक होकर घर लौटने लगे, फिर अधिक गंभीर मरीजों में भी तेजी से सुधार शुरू हुआ। आखिर एक दिन खतरनाक स्‍तर के मनोरोगियों का वार्ड पूरी तरह खाली हो चुका था। आज डॉ. ह्यू लिन दुनियाभर में मरीजों को दुरुस्‍त करते हैं। उन्‍होंने अपने अनुभवों को अपनी पुस्‍तक ‘द जीरो लिमिट’ में सहेजा है। इसमें उन्‍होंने स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है कि दुनिया जैसी है वह हमारे भीतर का ही प्रतिबिंब है। भले ही आज हम उस प्रतिबिंब के कारणों को न जानतें हों, लेकिन इसी जन्‍म का भूतकाल अथवा पूर्वजन्‍म का बंधन इन बिंबों को पैदा करता है। भारतीय दर्शन भी सृष्टि में मौजूद हर जीव के आपसी संबंध को मानता है। हम जैसी दुनिया को देखते हैं, वह बाहरी दुनिया नहीं होती, बल्कि हमारे भीतर हमारे द्वारा बनाई गई दुनिया का प्रतिबिंब मात्र है। 

कुछ साल पहले ब्राजील के लेखक पॉल कोएलो ने इसी बात को अपने प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘द एल्‍केमिस्‍ट’ में इस तर्ज में कहा था कि ‘जिस चीज को तुम पूरी शिद्दत से चाहते हो, पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की साजिश करती है।’ इस कहानी में स्‍पेन का एक गडरिया अपने सपने पर विश्‍वास कर उसका पीछा करना शुरू करता है और आखिर में अपने भाग्‍य को पाता है। केवल एक विश्‍वास ही होता है जो सामान्‍य गडरिए को एल्‍केमिस्‍ट यानी अन्‍य धातुओं से सोना बनाने वाला कीमियागर बना देता है। 

इस कहानी से सालों पहले परमहंस योगानन्‍द ने अपनी जीवनी में मन के विश्‍वास और उससे उपजने वाले चमत्‍कारों के बारे में अपनी जीवनी ‘योगी कथामृत’ में जानकारी दी। खण्‍डों में विभक्‍त आत्‍मकथा में ऐसे कई उद्धरण हैं। मसलन एक बार योगानन्‍द अपनी बहिनों को छत पर देखते हैं जो कटी हुई पतंगों को हसरत भरी निगाहों से देख रही होती हैं। छत नीची होने के कारण योगानन्‍द के घर में एक भी पतंग नहीं आ रही होती है। योगानन्‍द विश्‍वास के आधार पर वातावरण में ऐसा परिवर्तन लाते हैं कि ऊंचाई पर उड़ रही पतंग अचानक हवा बंद होने के कारण गोता लगाती है और सीधे उनके घर में आ गिरती है। देखने में यह छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन किसी कटी पतंग की ओर इशारा कर उसे अपनी ओर बुला लेने का अर्थ पूरे माहौल पर कब्‍जा करना है। 

एक ओर हमारा हमारा अंतर्मन यह जानता है कि पूरी सृष्टि का संतुलन कैसे चल रहा है। किसी मामले में यह हमारी लय को सृष्टि की लय के साथ मिला देता है तो दूसरी ओर मन ही है जो प्रकृति के संतुलन को अपनी इच्‍छा के अनुसार मोड सकता है। हो सकता है कि इससे प्रकृति का संतुलन एक नई व्‍यवस्‍था की ओर मुड़ जाए, लेकिन अंतत: संतुलन बना रहता है। जो लोग इस संतुलन को जानते हैं और सृष्टि की परम लय के साथ खुद को जोड़कर चलते हैं, उन्‍हें भाग्‍यशाली कहा जाता है। दूसरी ओर इस संतुलन से परे रहने वाले लोग जीवन के उस रस से लगातार वंचित रहते हैं जिसके वे हकदार हो सकते हैं। हमारे दिमाग में हर तथ्‍य के सकारात्‍मक और नकारात्‍मक पहलू साथ साथ चलते हैं। जब सकारात्‍मक पक्ष हावी रहता है तो हमें तेजी से सफलताएं मिलती हैं और नकारात्‍मक पहलू के हावी रहने पर विफलता निश्चित हो जाती है। सफल होने वाले लोगों में इस सकारात्‍मक दृष्टिकोण को सहज रूप से देखा जा सकता है। वे कहते हैं मुझे नहीं पता कि इस काम में सफलता कैसे मिलेगी, लेकिन मेरा मन कह रहा है कि मैं सफल रहूंगा। कहा जा सकता है कि अगर किसी इंसान को भाग्‍यशाली बनना है तो उसे पहले खुद पर विश्‍वास करना होगा, इसके बाद अपने विश्‍वास पर अडिग रहना होगा। या तो वह सृष्टि की परम लय के साथ खुद को जोड़ पाने में सफल होगा, या लय को बदलने की क्षमता हासिल कर लेगा।

यह लेख राजस्‍थान पत्रिका में 23 सितम्‍बर को छपा है

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

समान्‍तर सत्ताएं...

मुझे लगता है कि देश और काल से परे तीन तरह की सत्ताएं समान्‍तर रूप से सक्रिय हैं। हो सकता है कि मैं समय के फलक पर उड़ती हुई चील नहीं हूं, लेकिन फिर भी निरपेक्ष रहने का प्रयत्‍न करते हुए मुझे लगता है कि धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं साथ साथ चलते हुए एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाए रखती हैं और एक दूसरे को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।

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धार्मिक - यहां धर्म गीता में वर्णित कर्म ही धर्म नहीं बल्कि वर्तमान दौर में अपनी पूर्व स्‍थापित मान्‍यताओं के साथ जड़ हुए संप्रदाय हैं। इसमें हिन्‍दू, मुस्लिम, इसाई सहित सभी संप्रदायों को शामिल किया जा सकता है। इस सत्‍ता से जुड़े लोग अपनी मान्‍यताओं के साथ इतनी शिद्दत से जुड़े हैं कि इन्‍हें हर समस्‍या का समाधान धर्म में ही नजर आता है। इस कोण में न तो अर्थ का कोई महत्‍व है और न ही राजनीति का। यहां आकर आर्थिक और राजनीतिक की रेखाएं धूमिल होने लगती है।

आर्थिक - इसमें पैसे को ही सबकुछ मानने वाले लोग हैं। वे लोग नहीं जो कहते हैं कि अर्थ का अपना महत्‍व है। इसमें वे लोग हैं जो कहते हैं कि पैसे से सबकुछ किया जा सकता है। उनके लिए धन ही धर्म  है और धन से जुड़ी ही की राजनीति करते हैं। धर्म अथवा राजनीति के समीकरण यहां आकर धुंधले हो जाते हैं। अलग अलग क्षेत्रों, समुदायों, धर्म और शक्तियों से आए लोग यहां केवल धन कमाने और उसे बढ़ाने के लिए एक हो जाते हैं, दूसरे कारण उन्‍हें किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं कर पाते।

राजनीति - यह जनता के समर्थन का दावा कर, संसाधनों पर काबिज होने, उनके व्‍यवस्थित करने और प्राप्‍त हुए पदों के जरिए राज्‍य को चलाने वाली सत्‍ता है। ये लोग अपनी सत्‍ता को बचाए रखने के लिए धन और धर्म का जमकर उपयोग या दुरुपयोग करते हैं।

(इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जो सुविधा को सिद्धांत बनाए हुए हैं। धन के लिए काम करते हैं, लेकिन मौका मिलने पर लाभ भी छोड़ देते हैं, या फिर धार्मिक काम करते हैं, लेकिन पैसे लिए कुछ समय के लिए धर्म (संप्रदाय) के नियम सिद्धांतों को ताक पर रख देते हैं।)

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जब मैं इनमें से किसी एक प्रकार की सत्ता के करीब रह रहे, या उसके बारे में सोच रहे लोगों से मिलता हूं तो उनके सभी तर्क, सभी संभावनाएं और आशंकाएं उसी सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। उन्‍हें दूसरा पक्ष बताने का प्रयास करता हूं तो वे उसे सिरे से खारिज कर देते हैं। उदाहरण के लिए धार्मिक सत्ता से प्रभावित लोगों को उनका धर्मगुरु आदेश देते हैं कि फलां जगह धर्मशाला और कुछ सुविधाएं बना दो। लोग धन अथवा राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना अपने गुरु की इच्‍छा को पूरा करते हैं। इसी तरह आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं अपना प्रभाव व्‍यक्‍त करती हैं। हर सत्‍ता के अपने नियम और पद्धतियां हैं। इनका अनुसरण किए बिना क्षेत्र में आपके आगे बढ़ने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। तीनों ही क्षेत्र अपने नियमों और सिद्धांतों को लेकर इतने कट्टर हैं कि “गलती की सजा मौत” के रूप में सामने आती है। राजनीति में इसे पॉलीटिकल एसेसिन कहते हैं तो धर्म में इसे धर्मच्‍युत कहा जा सकता है, धन के क्षेत्र में दीवालिया या बर्बाद जैसे शब्‍द आम हैं।

दूसरे संसाधन दूसरे दर्ज पर

धर्म, राजनीत और धन की सत्‍ताओं में से किसी एक सत्‍ता का चरम भले ही दूसरे संसाधनों को आसानी से उपलब्‍ध करा देता है, इसके बावजूद इन्‍हें साधने वाले साधक को दूसरे संसाधनों को हमेशा ही दूसरे दर्जे पर रखना पड़ता है। इसका परिणाम यह दिखाई देता है कि धर्म गुरु के पास अकूत संपदा होते हुए भी वह उसका वैसा उपयोग नहीं कर पाता, जैसा कि एक व्‍यवसायी कर सकता है, इसी तरह एक राजनीतिज्ञ को धर्म का ज्ञान और धंधे की समझ होने के बावजूद उसे कम ज्ञानी साधकों के सामने झुकना पड़ता है और लाभ के अवसर जानते हुए भी छोड़ने पड़ते हैं। कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि देश के शंकराचार्यों और अन्‍य धर्मगुरुओं के पास आज की तारीख में लाखों करोड़ रुपए की संपत्तियां और धन है, लेकिन वे इसका कोई उपयोग नहीं करते, इसी तरह कई राजनीतिज्ञों को धर्म के बारे में विशिष्‍ट जानकारियां हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में इनका कोई उपयोग नहीं है। किसी व्‍यवसायी या बाजार पर राज कर रहे धन के उपासक को ज्ञान और राजनीति की समझ होने के बावजूद वह अपने क्षेत्र तक सीमित रहता है, ताकि उसका बाजार प्रभावित न हो। इसके बावजूद एक सत्‍ता का दूसरी सत्‍ता का प्रभावित करने का खेल जारी रहता है। न तो राजनीति में ऐसे लोगों की कमी है जो धर्म का ध्‍वज उठाए रखते हैं और न धार्मिक सत्‍ता वोटों को प्रभावित करने से चूकती है। इसी तरह बाजार अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए राजनीतिक पार्टियों और धर्म के ठेकेदारों को अपने प्रभाव में रखने का प्रयास करता है।

सत्‍ताओं के बीच विचरण

एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता की ओर गमन के लिए हमेशा ही प्रयास जारी रहते हैं। कुछ लोग इनमें जबरदस्‍त सफलता अर्जित करते हैं तो कुछ औंधे मुंह गिरते हैं। किसी जमाने में इंग्‍लैण्‍ड के हाउस ऑफ कॉमंस में केवल धनिकों को ही जगह मिल पाती थी, वहीं चीन और रूस में धर्म के प्रभाव को खत्‍म करने के बाद एक नया धर्म पेश किया गया कार्ल मार्क्‍स का, उससे सत्‍ताएं केन्‍द्र में आई। कई देशों में आज भी धर्म की सत्‍ता का प्रभाव राजनीति और धन दोनों को बुरी तरह प्रभावित रखता है। भारत के इतिहास में भी ऐसे प्रकरण देखने को मिलते हैं। हालांकि तीनों को अलग अलग रखने के लिए स्‍पष्‍ट नीतियां और सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, लेकिन समय बदलने के साथ ही इन सिद्धांतों का अतिक्रमण होता है और सत्‍ताएं एक-दूसरे का अतिक्रमण कर जाती हैं। आजादी के बाद पहली पॉलीटिकल पार्टी कांग्रेस ने धर्म को राजनीति से दूर रखा और देश के विकास के लिए धन को शरण दी। लाइसेंस राज स्‍थापित किए गए और कुछ विशिष्‍ट लोगों को अधिकांश सुविधाएं मिली। बाद में जब भाजपा ने धर्म का ध्‍वज बुलंद किया तो देश की जनता ने उन्‍हें भी केन्‍द्र में ला बैठाया। फिर उदारणीकरण के बाद बाजार हावी हुआ तो धर्म की उपादेयता कम नजर आने लगी। ऐसे में भाजपा सत्‍ता से बाहर हो गई और पिछले नौ साल से कांग्रेस फिर केन्‍द्र में है। भले ही आम जनता कांग्रेस की नीतियों से सहमत न हो, लेकिन भाजपा भी विकल्‍प के रूप से अब तक खुद को स्‍थापित नहीं कर पा रही है। प्रचलित धर्मों और धन की सत्‍ता का नैसर्गिक विरोध करने वाले कॉमरेड भी लगभग हाशिए तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में धन के साथ चल रहे धर्म और राजनीति को आज हर कहीं प्रश्रय मिल रहा है।

विचरण का श्रेष्‍ठ उदाहरण

लेख के आखिर में बाबा रामदेव का नाम लेने से कहीं ऐसा न माना जाए कि यह पूरी पोस्‍ट बाबा रामदेव को केन्द्रित करके लिखी गई है। इसके बावजूद एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण का कोई श्रेष्‍ठ उदाहरण है तो आज के दौर में बाबा रामदेव है। बाबा रामदेव ने धर्म के जरिए धन के क्षेत्र में प्रवेश किया। आम जनता को धर्म की बातें बताई, योग कराया, स्‍वस्‍थ रहने की अपील की और भगवा धारण किए रखा। उनकी दवा कंपनियां और एफएमसीजी प्रॉडक्‍ट आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्‍ता उत्‍पाद बनाने वाली कंपनी हिंदुस्‍तान लीवर लिमिटेड तक को धक्‍का पहुंचा रहे हैं। हजारों करोड़ का साम्राज्‍य खड़ा करने के बाद अब रामदेव दूसरा अतिक्रमण राजनीति में करने का प्रयास कर रहे हैं। दीगर बात यह है कि धर्म और धन को साधने के बाद राजनीति को साधने के लिए उन्‍होंने लगभग सभी प्रचलित मान्‍यताओं को ताक पर रख दिया है। भले ही वे राजनीति में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं, लेकिन केवल धर्म का झंडा या धन की ताकत हाथ में रखकर दूर से प्रभावित करने के बजाय उन्‍होंने सीधे राजनीति क्षेत्र में उतरकर सिद्ध कर दिया है कि विचरण संभव है।

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ऐसे में दूसरे लोगों के लिए भी संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं कि किसी एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण किया जा सकता है। आज भले ही यह इतना आसान न लगे, लेकिन आने वाले दिनों में हमारे देश में इन सत्‍ताओं के बीच की रेखाएं और अधिक धूमिल होने की संभावनाएं बन रही हैं।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

गुटखा : एक स्‍वीकारोक्ति, एक गुजारिश

अपनी हर एक समस्‍या के लिए समाज और व्‍यवस्‍था को दोष देने की परम्‍परा का निर्वहन करते हुए मैं एक बार फिर राज्‍य सरकार को गुटखे पर पाबंदी लगाने के लिए बधाई देने के साथ ही गुजारिश करूंगा कि गुटखे पर पूरी तरह प्रतिबंध क्‍यों न लगा दिया जाए। इससे घटिया कैमिकल, सुपारी और नष्‍ट कर दिए जाने योग्‍य जर्दे का इस्‍तेमाल कर बनाए गए कैंसर के टूल को समाप्‍त करने में मदद मिलेगी।

राज्‍य सरकार ने राजस्‍थान में गुटखे पर प्रतिबंध कर दिया है, लेकिन एक सुराख (बहुत बड़ा सुराख) खुला छोड़ दिया है। इसके अनुसार राजस्‍थान में केवल उस गुटखे को प्रतिबंधित किया गया है जिसमें पान मसाला और तम्‍बाकू पहले से मिला हुआ हो। दुकानदार पान मसाला और तम्‍बाकू अलग अलग बेच सकते हैं। ऐसे में गुटखे पर प्रतिबंध केवल सांकेतिक बनकर रह जाएगा। राज्‍य सरकार को लगा कि गुटखा खाने वाले लोगों में कैंसर की समस्‍या अधिक है। हो सकता है इसके लिए राज्‍य सरकार ने किसी मेडिकल रिपोर्ट का सहारा लिया हो। तो क्‍या यह मेडिकल रिपोर्ट यह कह सकती है कि

पान मसाला और गुटखा अलग अलग खरीदने और बाद में उन्‍हें मिलाकर खाने से कैंसर नहीं होगा?

गुटखे पर प्रतिबंध से पहले भी मैं रजनीगंधा पान मसाला और तुलसी 00 मिलाकर खाता था। आज भी खा रहा हूं। उसकी सप्‍लाई पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगी है। हां, जिन गुटखों की सप्‍लाई पर रोक लगी है, वे इतने महंगे हो गए हैं कि गुटखा प्रेमी आज की तारीख में रोटी से अधिक गुटखे पर खर्च कर रहे हैं। भले ही रजनीगंधा तुलसी पर रोक नहीं लगी है, लेकिन दूसरे गुटखों पर रोक का असर रजनीगंधा पर हुआ है और दस रुपए एमआरपी का यह सैट (सात रुपए का पान मसाला और तीन रुपए का जर्दा) आज पंद्रह से बीस रुपए में मिल रहा है। मुझे पैसा अधिक देने में कोई दिक्‍कत नहीं है, मजे की बात तो यह है कि पंडितजी को खिलाने वाले भी एक ढूंढो दस मिलते हैं, लेकिन मुझे पीड़ा है, कालाबाजारी से।

गुटखे की कीमतें बढ़ने का यह दूसरा प्रकरण है। इससे पहले राज्‍य में पॉलीथिन पर रोक लगाने के साथ ही गुटखे के पाउच पर भी रोक लगा दी गई थी। इसके चलते बाजार में पड़ा गुटखा महंगा बिकने लगा था। दस रुपए का रजनीगंधा उन दिनों बीस रुपए के भाव देख आया था, फिर बारह या तेरह रुपए से नीचा को कभी बिका भी नहीं। मैंने अपने समाचार पत्र के जरिए स्‍थानीय डीलर और कंपनी के प्रतिनिधि को लाइन में लिया था। कंपनी प्रतिनिधि ने तो दीपावली के बाद कह दिया कि होली से पहले इसके भाव कम करवा देंगे (आप देखिए पान मसाला बनाने वाली कंपनी का प्रतिनिधि यह बात कह रहा है) और स्‍थानीय वितरक ने कहा कि मांग अधिक है और उसके पास सामान देने के लिए पर्याप्‍त आदमी नहीं है। आपको यह लॉजिक समझ में नहीं आया होगा। मामला यह है कि रजनीगंधा का स्‍थानीय वितरक बहुत अधिक “ईमानदार” आदमी है। इसलिए वह अधिक कीमत पर माल नहीं बेचता। बस उसके पास माल होता ही नहीं है। इसका तो अब क्‍या ईलाज है। ऐसे में रिटेल दुकानदारों को एमआरपी से भी ऊंची कीमत देकर अंडरकटिंग कर रहे लोगों से माल खरीदना पड़ता है।

सरकार और गुटखे के खिलाडि़यों की मिलिभगत से आम जनता का साथ दिखाई दे रहा है। सरकार ने बैन लगा दिया और कंपनियों ने गुटखा बेचना बंद कर दिया। बस अलग अलग ही तो बेचते हैं...

gutkha

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

हमें मंच पर नाचते बाबा ही पसंद हैं...

healthmystic.-yoga-baba-ramdev-jiआज जैसे ही कोई योग, आसन या प्राणायाम की बात करता है तो तुरंत दिमाग में मंच पर नौली क्रिया करते अथवा नाचते रामदेव बाबा दिखाई देते हैं। यह एक ओर बाबा की सफलता है तो दूसरी ओर हमारी गलती। हमने हमारे योग को सही तरीके से समझा नहीं और लगे कसरत करने। आज की तारीख में योग कर रहे सौ लोगों को पूछा जाए कि आप योग क्‍यों करते हैं तो पचानवे प्रतिशत लोगों के संभावित जवाबों में फिट रहना, बीमारी से लड़ना या तनाव को दूर करने का प्रयास करना जैसे जवाब शामिल होंगे। क्‍या योग फिजिकल फिटनेस का काम करता है। क्‍या यह कसरत का एक रूप है।

कम से कम मुझे तो नहीं लगता। ऋषि पातंजलि ने अपने पहले श्‍लोक में स्‍पष्‍ट किया है कि योग चित्‍त की वृत्तियों का निरोध करता है। कुछ लोगों ने योग को जोड़ से भी जोड़ा है। इसमें अच्‍छी और खराब एनर्जी के मिलन से लेकर शरीर और आत्‍मा तक के मिलन को जोड़ दिया है। पर चित्‍त की वृत्तियों के निरोध के लिए किया जा रहा योग, शरीर को वहां कैसे लेकर जा रहा है। यह समझ में नहीं आता।

योग पर कुछ बात करने से पहले क्‍यों न बाबा की कुछ तारीफ कर ली जाए। बाबा रामदेव ने “आधुनिकता” की रौ में बह रहे भारतीय समाज को बेहतर तरीके से पकड़ा और प्रचार के जोर को भी समझा। स्‍टेज पर मुंहफट अंदाज में बोलना और रिसर्च पेपर लेकर अपनी बात सिद्ध करने के लिए चिकित्‍सकों तक की मदद लेने के अंदाज ने भारतीय जनमानस को जोरदार तरीके से प्रभावित किया। उन्‍होंने योग को आध्‍यात्मिक उत्‍थान के बजाय शारीरिक सौष्‍ठव और सुंदरता से जोड़ दिया। हालांकि इसे भी प्राथमिकता पर नहीं रखा और इससे एक कदम आगे जाकर उन्‍होंने कहा कि इससे भीषण होती जा रही बीमारियों और बुढ़ाते शरीर को भी दुरुस्‍त किया जा सकता है। बीकानेर के छोटा शहर है। इसके बावजूद मैंने साठ पार के पचासों लोगों को सार्वजनिक पार्कों में सुबह सुबह बैठकर योग और प्राणायाम करते हुए देखा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाबा रामदेव ने लोगों में एक नई जान फूंक दी। पश्चिम के मार्केटिंग हथियारों से ही पश्चिम की कंपनियों को चित्‍त करते हुए उन्‍होंने लोगों को विश्‍वास दिलाया कि प्राचीन भारतीय पद्धतियां ही तुम्‍हारी रक्षा कर सकती है। लोग भी उतर गए मैदान में। बस, यही बाबा की कमाई का आधार है, एक तरफ योग (आसन और प्राणायाम) सिखाते हैं और दूसरी तरफ स्‍वस्‍थ्‍य बने रहने के लिए दवाएं बेचते हैं। मेरे निजी सूत्रों के अनुसार बाबा रामदेव की दिव्‍य फार्मेसी सहित तीन दवा कंपनियां 2400 करोड़ से अधिक कीमत की हैं। बाबा ने उपेक्षित ग्‍वारपाठे और लौकी को प्रचलन में ला दिया है। भारतीय योग शिक्षा के लिए मैं बाबा रामेदव के प्रयास की जितनी सराहना करूं, उतनी कम है।

अब इसके दूसरे पक्ष को देखने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि बाबा ने कितना बड़ा नुकसान किया है। पश्चिम के लोगों ने योग को जिस तरीके से समझा, वह उनकी भौतिक सोच का नतीजा था, लेकिन भारत में योग की एक सतत धारा बह रही थी, उसे बाबा रामदेव ने बुरी तरह झकझोर दिया है।

योग जीवन के हर हिस्‍से में है। कहीं यह प्रेमयोग है तो कहीं कर्मयोग, भक्तियोग, क्रियायोग, ज्ञानयोग या हठ योग। योग के शारीरिक कसरत के रूप में पेश कर बाबा रामदेव ने हठ योग को ही योग का पर्याय बना दिया। चित्‍त की वृत्तियों के निरोध का दर्शन कहीं पीछे दबकर रह गया है। योग के नाम पर अब कसरत बाकी रही है...

 सिर्फ हठ योग के रूप में योग को पेश करने का एक दुष्‍परिणाम यह भी हुआ कि केन्‍द्र सरकार ने योग और हैल्‍थ क्‍लब को एक ही श्रेणी में डाल दिया।
...और तो और इस पर दस प्रतिशत कर भी लगा दिया है।

हो सकता है बाबा रामदेव खुशी से यह टैक्‍स चुका रहे हों, क्‍योंकि किसी भी मंच पर आजतक उन्‍होंने इस कर का विरोध नहीं किया है, लेकिन श्रीश्री रविशंकर का आर्ट ऑफ लिविंग भी इसकी जद में आ गया है। वे अपने तीन से सात दिनों के शिविरों में क्रियायोग का अभ्‍यास कराते हैं। केन्‍द्र सरकार के अनुसार यह क्रिया योग भी हैल्‍थ क्‍लब एक्टिविटी है और इस कारण शिविर में ली जाने वाली फीस पर दस प्रतिशत कर लगने लगा है। करीब सालभर पहले बीकानेर में श्री श्री रविशंकर का कार्यक्रम हुआ था। इससे पहले आर्ट ऑफ लिविंग की एज्‍युकेशन विंग के निदेशक मुरलीधर कोटेश्‍वर बीकानेर आए थे। सामान्‍य इंटरव्‍यू के बाद सामान्‍य बातचीत में उन्‍होंने इस कर के बारे में जानकारी दी। आप भी इस कर के बारे में देख सकते हैं।

yoga tax

(ऊपर दिए गए चित्र पर क्लिक करें। केन्‍द्र सरकार की वेबसाइट पर पूरी जानकारी मिल जाएगी)

सरकार आमतौर पर ऐसे साधनों पर कर की प्रताड़ना जारी करती है, जिन कामों को वह रोकना चाहती है। जैसे शराब, सिगरेट या विदेशों से लाई जाने वाले उत्‍पाद। ऐसे मेंयोग पर टैक्‍स किस कोण से लगाया गया है, यह समझना अभी बाकी है। दुनिया के अधिकांश देशों में जहां योग को प्रमुख रूप से अपनाया जा रहा है, वहां की सरकारों ने न केवल योग को करमुक्‍त रखा है, बल्कि इसके विकास और शोध के लिए अच्‍छा खासा धन भी व्‍यय कर रही है। विदेशों में चल रहे प्रयासों की एक बानगी यहां, यहां और यहां सहित इंटरनेट के कई ठिकानों पर देख सकते हैं। केवल सरकार के ही प्रयास नहीं, कई बड़े संस्‍थान भी अपने स्‍तर पर जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार टैक्‍स लगाकर योग को दबाने की जुगत लगा रही है। है ना मूर्खतापूर्ण, लोकसभा में एक विशेष कक्षा सभी सांसदों के लिए लगनी चाहिए - योग की...

... योग के पातंजलि पक्ष और अनुलोम विलोम पर अगली किसी पोस्‍ट में चर्चा करेंगे।

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

आश्रम का साधू : फेसबुक और ब्‍लॉगिंग

बहुत साल पहले जब खेलने के लिए पहली बार स्‍टेडियम गया तो एक ऐसा अनुभव हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। अनफेयर सलेक्‍शन का। बाद में मैं खुद इसी जमात में शामिल हो गया...

Basketball Dunkछुट्टियों के दिनों में कई नौसिखिए खिलाड़ी स्‍टेडियम पहुंचते थे। यह स्‍टेडियम एक छोटा-मोटा स्‍पोर्ट्स काम्‍प्‍लेक्‍स की तरह था। मैंने एक साथ चार खेलों का चुनाव किया। पहले टीटी और बैडमिंटन खेलेंगे, इसके बाद फुटबॉल और आखिर में बास्‍केटबॉल। बैडमिंटन और फुटबॉल में मैं प्रियता के अनुसार पात्रता बांटे जाने का “शिकार” हुआ। टीटी और बास्‍केटबॉल खेलने वाले खिलाड़ी कम थे। दोनों ही खेलों में अपेक्षाकृत अधिक स्किल की जरूरत थी। छूटी हुई दोनों चीजें मुझे आसानी से मिल गई। मैं हमेशा चिढ़ता रहता था कि फुटबॉल और बैडमिंटन में जमे हुए भोमिए किसी को आसानी से अंदर नहीं आने देते। अपने चेहतों को आसान प्रवेश, बाकी लोगों के लिए कठिन परीक्षाएं। धीरे धीरे टीटी भी छूट गया, केवल बास्‍केटबॉल रहा।

यहां अधिक अच्‍छे खिलाड़ी नहीं थे। सभी शौकिया और आस-पास रहने वाले लोग थे। मैं ही सबसे अधिक दूरी से आता था। बास्‍केटबॉल में पुष्‍करणा स्‍टेडियम में खेलने के कुछ ही महीनों बाद मैंने डूंगर कॉलेज और रेलवे स्‍टेडियम में भी खेलना शुरू कर दिया था। इससे मेरा खेल तेजी से सुधरा और मेरे साथ पुष्‍करणा स्‍टेडियम में खेल रहे शौकिया खिलाडि़यों का स्‍तर भी तेजी से ऊपर आया। खेलते हुए करीब एक साल हो गया तब तक करीब पंद्रह खिलाड़ी हो गए थे। यह तीन टीमें बनाने के लिए पर्याप्‍त था। दो टीमें खेलती जो हारती वह हटती थी। मैं श्रेष्‍ठ खिलाडि़यों में से एक था। बाद में डूंगर कॉलेज और रेलवे स्‍टेडियम भी छूटते गए और मैं सुबह शाम दोनों समय करीब छह सात घंटे रोजाना प्रेक्टिस कर रहा था। इन्‍हीं दिनों में कई नए खिलाड़ी भी मैदान में आए। इनमें नौसिखिए भी थे और अच्‍छे खिलाड़ी थी। चूंकि मैं श्रेष्‍ठ खिलाड़ी था और उस समय तक यह कुंठा मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी। श्रेष्‍ठ खिलाड़ी होने के कई फायदे होते हैं, आपको भागकर बॉल नहीं लानी होती है, जब आप प्रेक्टिस कर रहे होते हैं तो जूनियर दौड़कर आपको बॉल पकड़ाते हैं आदि आदि। नए खिलाड़ी मुझे गांठते नहीं थे। सालभर से अधिक समय तक मेहनत करने के बाद मुझे लगने लगा कि इन खिलाडि़यों द्वारा मेरी इज्‍जत की जानी चाहिए। इसी कुंठा में मैंने खिलाडि़यों के गुट बना दिए। पुराने खिलाड़ी शायद यही चाहते थे (मेरी तरह), सो गुट आसानी से बन गए। इसी बीच मुझे टाइफाइड हुआ।

कई दिन के अवकाश के बाद फिर से ग्राउंड पहुंचा तो पुरानी ताजगी लौट आई थी। वहां हो चुकी गुटबाजी और उससे बिगड़ते खेल और उससे भंग होते आनन्‍द को मैं निरपेक्ष भाव से देख पा रहा था। मन में बड़ी ग्‍लानि हुई। अब अगले पंद्रह दिन तक मैंने जैसे कैम्‍प चालू कर दिया। नए और पुराने खिलाडि़यों को एक ही छड़ी से ताड़ना शुरू किया। सभी कतार में आ गए। खेल का आनन्‍द फिर से शुरू हो गया, लेकिन मैं अधिक खराब हो गया। क्‍योंकि मेरी भूमिका खिलाड़ी से बदलकर कोच की हो गई। अब अहं पहले से भी अधिक हो गया। इसके चलते उदंड खिलाडि़यों से मेरी नियमित नोंक झोंक होने लगी। अधिकतर उदंड खिलाड़ी ऐसे थे जिनकी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि खिलाडि़यों की ही थी। ऐसे में वे भी “बाहर के” कोच को स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे। धीरे धीरे बास्‍केटबॉल के मैदान से नाता टूटता गया। एक दिन पूरी तरह जाना बंद कर दिया।

इस प्रकरण के कई साल बाद स्‍वामीनारायणन् जी से मुलाकात हुई। एक बार की बातचीत में मुझसे कहीं ऐसी बात निकली होगी तो उन्‍होंने एक रोचक कथा सुनाई कि

“रामराज्‍य के दिन थे, राजा राम का दरबार लगा हुआ था कि एक कुत्‍ता वहां आया। उसका सिर फटा हुआ था और उससे खून निकल रहा था। उन दिनों जानवर भी बोला करते थे। कुत्‍ते ने कहा कि एक ब्राह्मण ने अकारण ही उसका यह हाल किया है। भगवान राम ने तुरंत ब्राह्मण को दरबार में बुलाया। ब्राह्मण ने आते ही बताया कि वह गंगाजी में नहाकर बाहर निकला ही था कि इस कुत्‍ते ने खुद को झड़काने के उद्देश्‍य से कुछ छींटे उछाले। इससे मैं अपवित्र हो गया। मुझे गुस्‍सा आया तो मैंने ईंट से मारकर इस कुत्‍ते का सिर फोड़ दिया। भगवान को कथा समझ में आ गई। उन्‍होंने ब्राह्मण से कहा कि तुम्‍हें इसकी सजा मिलेगी। फिर कुत्‍ते से पूछा कि तुम ही बताओ कि इस ब्राह्मण को क्‍या सजा दी जाए। इस पर कुत्‍ते ने कहा कि मैं तो धोबी का कुत्‍ता हूं। इस कारण मुझे कभी घाट तो कभी धोबी के घर चक्‍कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन मैं दोनों ही जगह का नहीं रहा। इस ब्राह्मण को कुछ ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिससे इसे मेरी वास्‍तविक स्थिति का पता चले। राम मुस्‍कुराए, उन्‍होंने ब्राह्मण को आश्रम का साधू बना दिया।”

मैंने स्‍वामीनारायणजी से पूछा कि ब्राह्मण को यह सजा कैसे मिली। अब वे हंसने लगे। बोले आश्रम का साधू कहीं का नहीं होता। घर-बार इसलिए छोड़ता है ताकि दुनियादारी से दूर रहे, लेकिन आश्रम की व्‍यवस्‍थाएं एक कुशल गृहिणी की तरह उसे देखनी पड़ती है। आया-गया साधू आश्रम की व्‍यवस्‍थाओं के लिए उसे कोसता है, आश्रम के अधिष्‍ठाताओं के सामने उसे हाजिरी लगानी पड़ती है। व्‍यवस्‍थाएं देखते देखते साधू खुद को आश्रम से पूरी तरह जोड़ लेता है और तो और उसे खुद के आध्‍यात्मिक उत्‍थान के लिए उसे समय नहीं मिल पाता है। ऐसे में वह न घर-परिवार वाला रहता है न पूरी तरह साधू बन पाता है। यह कमोबेश धोबी के कुत्‍ते वाली ही स्थिति है।

उन्‍होंने कुछ इस अंदाज में बात कही कि मुझे अपने बॉस्‍केटबॉल कोर्ट वाले दिन याद हो आए। मैं समझ गया कि एक बास्‍केटबॉल कोर्ट पर नियमित रूप से आते-जाते कैसे मैं उसे अपना समझने लगा था। वहां की अधिकार भावना भी ऐसी ही थी। वहां मेरा कुछ नहीं था, जब गया था तब कोर्ट था और जब छोड़कर आया तब भी कोर्ट ही था। आनन्‍द लेने के बजाय मैंने खुद को व्‍यवस्‍थाओं के हवाले कर दिया था। यही स्थिति अन्‍य खेलों (बैडमिंटन, फुटबॉल और टीटी) के मठाधीशों की रही होगी।

अब ऑनलाइन चल रहे खेल को देखता हूं तो दिखाई दे रहा है कि जहां सब कुछ स्‍वतंत्र है और सभी आनन्‍द लेने वाले लोग हैं (इसमें टूल्‍स के फ्री होने का बड़ा योगदान है), वहां धीरे धीरे लोग अपने निकाय बनाते जा रहे हैं। फेसबुक समूह और पेज तो ऐसी जगहें बन रही हैं, जहां इस भावना का जमकर दोहन किया जा रहा है। कमोबेश यही स्थिति ब्‍लॉगिंग की भी है। बीच के दो साल ब्‍लॉगिंग से दूर रहा और अब लौटकर आया हूं तो देखता हूं कि शुरूआती दिनों में मुक्‍तता के साथ सृजन का जो आनन्‍द था, उसके रस को काल ने पी लिया है। अब अधिकांश ब्‍लॉगर और फेसबुकिए अपने अहं का विस्‍तार कर रहे हैं। ब्‍लॉगिंग में भी ऐसे निकाय देख रहा हूं। कई ब्‍लॉगर तो एक-दूसरे के ब्‍लॉग पर जाना तक छोड़ चुके हैं।

इस वर्चुअल दुनिया में, जहां न आश्रम अपना है, न घर अपना है। फिर क्‍यों आश्रम के साधू बनें !!!!!

सोमवार, 9 जुलाई 2012

प्रिय शिव, भोले हो पर गजब के हो...

yoga-shiva
श्रावण मास में शिव खुद ब खुद याद आने लगते हैं। स्‍वभाव से भोले, गायों (संपदा) की रक्षा करने वाले और शीघ्र प्रसन्‍न होने वाले प्रिय शिव भक्‍तों की पुकार पर दौड़कर आते हैं। मैंने-आपने उन्‍हें देखा नहीं है, महसूस तो किया ही होगा। मैंने महसूस किया है, इतना करीब कि बता सकता हूं।
करीब पंद्रह साल पहले हमें योगीराज (उनका मूल नाम सुनील शर्मा था, जो मुझे बाद में पता चला) के पास भेजा गया। वे हमें हठ योग सिखाते थे। 5 फीट 9 इंच ऊंचाई के साथ मेरा वजन बिना वर्जिश किए 84 किलोग्राम तक पहुंच गया था। पेट पर हाथ मारते तो कई देर तक हिलता रहता था। मैंने योगीराज से कहा कि मुझे वजन कम करना है। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए पूछा वजन कम करना है या पतला होना है। मैंने कहा 84 किलोग्राम वजन है। उन्‍होंने कहा अभी एक किलोग्राम और बढ़ाना पड़ेगा। मेरी आंखे दीवार की दरार की तरह थीं। हंसने पर तो दिखाई देना भी बंद जाता था। मुझे दिखाई नहीं दिया कि योगीराज भी हंस रहे हैं या नहीं...
उन दिनों बाबा रामदेव का कहीं नामो निशान भी नहीं था। ऐसे में केवल एक ही प्राणायाम था जिसे विवेकानन्‍द ने अपने राजयोग में बताया था। वह था अनुलोम विलोम। सुबह पहले सूक्ष्‍म व्‍यायाम होते थे। इसमें शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में हिलाया जाता। सूक्ष्‍म व्‍यायाम के बाद सूर्य नमस्‍कार। शरीर की इन मामूली हरकतों से भी सर्दियों की सुबह सवा पांच बजे पसीना निकल आता था। इसके बाद आसन और आखिर में प्राणायाम।
सूक्ष्‍म व्‍यायाम और प्रणायाम कोई भी कर सकता है, लेकिन आसन, वे तो तोड़कर रख देते हैं। हर आसन मेरे लिए नई चुनौती लेकर आता। कुछ दिन में जब आसन लगने लगता तो योगीराज अगला आसन बता देते। पद्मासन, मत्‍स्‍यासन, अर्द्धमत्‍यासन, भुजंगासन, पर्वतासन तो मैंने किसी तरह आगे पीछे करके कर लिए। इसके बाद आया एक बहुत ही आसान आसन। वह था वज्रासन। मैंने समझा यह आसन कराना तो फिजूल है। सभी आराम से बैठ गए हैं। इसी आसन की अगली कड़ी था सुप्‍त वज्रासन।
10b-Supta-Vajrasana
(इस चित्र में वज्रासन की एक्‍सट्रीम स्थिति दिखाई गई है। इससे पूर्व कुछ आसान प्रकार भी होते हैं। जैसे ये नीचे वाला)
Supta-Vajrasana
देखने में यह ऊपर वाली स्थिति से आसान दिखाई दे रहा होगा, लेकिन कल्‍पना कीजिए एक मोटे व्‍यक्ति की, जिसकी जांघे उसके शरीर के कुल भार के बराबर हों। ऐसी स्थिति में वज्रासन में सीधा बैठना आसान है। पीछे तरफ झुकने की भी कल्‍पना नहीं की जा सकती। योगीराज पास में आए। उन्‍होंने एक-दो बार पीठ के पीछे हाथ रखकर मुझे सहारे से लिटाने का प्रयास किया, फिर छोड़ दिया। कहा क्‍लास के बाद मुझसे मिलकर जाना। उन्‍होंने मुझे एक कागज पेन दिया और कहा कि लिखो। उन्‍होंने शंख प्रक्षालन की विधि बताई। कहा दो दिन यहां आना मत। शंख प्रक्षालन करो और एक दिन का आराम करो, फिर लौटकर आना। घर आया और शंख प्रक्षालन में जुट गया। इसमें नमक मिला पानी पीना होता है और भुजंग आसन सहित चार आसान आसन बार बार करने होते हैं। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद चारों आसन। छह गिलास पीने तक तो कुछ महसूस नहीं हुआ, लेकिन जब सातवीं गिलास पानी पी रहा था, तो अचानक तेज प्रेशर महसूस हुआ। लैट्रीन की ओर भागा। मुझे बीस गिलास तक यह क्रिया दोहरानी थी। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद दौड़ना पड़ रहा था। बस राहत की बात इतनी ही थी कि घर में इटैलियन कमोड था। अगर नीचे बैठने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ती तो शंख प्रक्षालन से पहले उठक बैठक से ढेर हो चुका होता। आखिर बीसवें गिलास तक यह स्थिति हो गई कि जैसा पानी पी रहा था, साफ सुथरा, वैसा ही निकाल रहा था। (इसे कहते हैं शंख प्रक्षालन, मेरी आंतों को नमक मिले पानी ने धो दिया था) अब मैं काफी हल्‍का और थका हुआ महसूस कर रहा था। अगले दिन आराम किया और तीसरे दिन पहुंचा तो फिर वही सुप्‍त वज्रासन। दूसरे पुराने विद्यार्थी आसानी से आसन कर रहे थे और मैं उन्‍हें देख भर रहा था। आंतें साफ हो चुकने के बाद पीछे की ओर झुकने की स्थिति नहीं बन पा रही थी। 19 साल तक जिस कमर को ठोस बनाया था, वह मुड़ने को तैयार नहीं हो रही थी। सभी को आसन की मुद्रा से हटने को कहा गया और योगीराज ने सभी को एक बात बताई कि :-
“शिव का योगीराज कहा जाता है। जानते हो इसका कारण क्‍या है। किसी को नहीं पता था। योग गुरु ने बताया कि
शिव ने विश्‍व में पाई जाने वाली कुल जमा 84 लाख योनियों के अनुरूप 84 लाख आसनों को सिद्ध किया है। इसलिए वे योगीराज हैं।”
(किसी भी हठ योगी को एक आसन सिद्ध करने में कई बार सालों लग जाते हैं। आसन सिद्ध होने का अर्थ होता है करीब साढ़े तीन घंटे उसी एक आसन में बैठे रहना। आसन सिद्ध तभी समझा जाता है जबकि योगी को उस आसन में बैठने में किसी प्रकार की कठिनाई महसूस न हो)
मैं रोमांचित था इस बात को सुनकर। सभी विद्यार्थी फिर सुप्‍त वज्रासन में जुट गए। मैं अब भी सुप्‍त वज्रासन नहीं कर पा रहा था। इस बार योगीराज ने मेरी सहायता नहीं की। बस इतना भर कहा कि शिव का ध्‍यान करो। मैंने आंखें बंद की और खिलंदड़ शिव दिखाई दिए। सुप्‍त वज्रासन करते हुए। मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट आई और मैं पीछे की ओर लेट गया। लेटे लेटे मैंने आंखे खोली तो देखा कि सिर की ओर योगीराज (योग गुरु) खड़े हैं और मुस्‍कुरा रहे हैं। धीरे से बोले, जितना असर तुममें दिखाई दिया है किसी और में नहीं दिखा।
उस दिन से आज भी मेरे दिमाग में शिव की वही छवि है। कोई दूसरी छवि बैठ भी नहीं पाई। अब भी ध्‍यान करने बैठता हूं तो अनुलोम विलोम के पूरक, कुंभक और रेचन में एक, चार और दो के अनुपात को बनाए रखने के लिए ऊं नम: शिवाय का मंत्र बोलता हूं। एक बार के लिए एक, चार बार के लिए चार बार और दो बार के लिए दो बार मंत्र का जाप। इससे ध्‍यान भी जल्‍दी लगता है।
आष्‍टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि ये आठ भाग हैं। ये मन को स्थिर करते हैं। चूंकि शिव इन सभी के लिए कृपा करते हैं, इसलिए कहते हैं शिव की उपासना करने से मन को मजबूती मिलती है...

रविवार, 24 जून 2012

क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो...

जोशीजी, ध्‍यान रखना
क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो, उसका क्‍या, जो दंतहीन, विषहीन विनीत सरल हो...
एक साथी स्‍वतंत्र पत्रकार ने मुझे उस समय यह बात कही जब मुझे अपने संस्‍थान में डेस्‍क से उठाकर पूरी तरह रिपोर्टर बना दिया गया था और कुछ बड़े विभाग मुझे रिपोर्टिंग के लिए सौंपे गए थे। इनमें राजस्‍थान का शिक्षा मुख्‍यालय यानी शिक्षा निदेशालय भी शामिल था। मुझे इस तथ्‍य को समझने में अधिक वक्‍त भी नहीं लगा। मेरे जिस साथी का बाहर तबादला हुआ था, वे शिक्षा विभाग की सालों तक रिपोर्टिंग करते रहे थे, शायद दस साल से वे इस विभाग से जुड़े थे। ऐसे में निदेशालय ने नए रिपोर्टर को एक जल्‍दी से स्‍वीकार नहीं किया। मेरा संस्‍थान बड़ा था और रसूखदार भी, लेकिन न मैं उस समय इतना प्रभाव रखता था, न मेरा भय। कई दिन तक निदेशालय में एक अनुभाग से दूसरे अनुभाग तक चक्‍कर लगाता रहा। मंत्रालयिक कर्मचारियों के नेता हो या शिक्षक नेता, मुझसे मीठी मीठी बातें तो करते, लेकिन खबर नहीं देते। मैं परेशान, पूरा दिन निदेशालय के चक्‍कर काटकर शाम को प्रेस लौटता को संपादक की झिड़कियां सुनने को और मिलती। फिर मुझे मिले एक प्रशासनिक अधिकारी, मुझे परेशान देखकर ही उन्‍होंने माजरा समझ लिया। पूछा कितनी खबरें निकाली है अब तक, मैं खिसियाया, बोला अब तक तो प्रतिस्‍पर्द्धी से पिट ही रहा हूं। उन्‍होंने कुछ ऐसी ही बात दोहराई कि पीटोगे नहीं तो पिटोगे। मैंने कहा अपने ही लोग हैं, अच्‍छे लोग हैं पीटने से क्‍या होगा, खबर है ही नहीं उनके पास। तो अधिकारी महोदय ने कहा कि दूसरा अखबार यहां आकर खबर पैदा थोड़े ही करता है।
यह बात मुझे भी जंच गई। मैंने अधिकारी महोदय से ही पूछा कि कैसे पीटें। तो एक अभिभावक की तरह उन्‍होंने समझाया। जो बात बताई वह समझ में भी आ गई। दो दिन बाद मैंने एक खबर लगाई।
“यही लगे यहीं से रिटायर होंगे”
शिक्षा निदेशालय की स्थिति के बारे में यहीं के एक कर्मचारी ने कभी कहा कि ये तो करणी माता के काबा हैं। देशनोक की करणी माता के बारे में प्रसिद्ध है कि चारण जाति के लोग मानव देह त्‍यागकर करणी माता के काबे (चूहे) बन जाते हैं और काबा शरीर छोड़ने के बाद चारण बनते हैं। कमोबेश यही स्थिति निदेशालय में भी है। सचिवालय की तरह यहां क्‍लोज कैडर नहीं होने के बावजूद यहां एक बार लगा कर्मचारी कभी फील्‍ड में नहीं जाता। अस्‍सी प्रतिशत मामलों में ऐसा ही होता है। मेरी खबर में यही दिया गया था कि क्‍लोज कैडर नहीं होने के बावजूद कई कर्मचारी ऐसे हैं जो तीस तीस साल से यही बैठे हैं। अधिक से अधिक उनका अनुभाग ही बदल रहा है।
खबर ने जिस तेजी से असर दिखाया, वह मुझे हैरान करने वाला था। अगले दिन निदेशालय में पहुंचने के साथ ही कर्मचारी और शिक्षक नेता मुझे बुला बुलाकर बात करने लगे। उनके तयशुदा ठिकानों का एक ही दिन में दर्शन कर लिया। पहले तो मुझे झिड़का कि ऐसी क्‍या खबरें लगाते हो। फिर प्‍यार से पूछा कि यह खबर किसने बताई। मैं टाल गया तो समझ गए कि मसाला दिए बिना यह छोरा हमारे ऊपर ही हमला कर देगा। फिर इधर-उधर की खबरें निकलने लगी। किसी एक समूह ने दूसरे की तो तीसरे ने चौथे की खबरें बताई। पहले से चल  रही धड़ेबंदी भी एक ही दिन में टूट गई। दोनों प्रमुख अखबारों के खबरी मुझे खबरें दे रहे थे। शाम साढ़े चार बजे तक तो मैं प्रेस पहुंच गया और तीन खबरें ठोंक दी। रात तक फोन आते रहे। आखिर रात दस बजे तक मैंने कुल जमा सात खबरें दी और तीन प्रेस नोट सबमिट किए।
उस एक दिन के उदाहरण से मैं समझ गया कि प्रेम से बात करना बेकार है। अब तो हाथ में जैसे छड़ी ही उठा ली। किसी एक की खबर का कोई सूत्र भी हाथ में होता तो दस लोगों के बीच में उसकी बात करना शुरू करता। संबंधित अधिकारी या कर्मचारी मुझे रोकता और बाद में कोने में ले जाकर पूरी बात समझाता। इसी दौरान मेरे सोर्सेज भी तेजी से बने। कुछ दिन में तो मैं खबरों को क्रॉस चैक तक करने लगा। पुराने लोगों को बनाया तिलस्‍म टूट चुका था और नए लोग पूरी तरह मेरे लोग थे। चूंकि मैंने खबर लेने के लिए किसी प्रकार का वादा किसी से नहीं किया था, इसलिए कहीं स्‍पैल बाउंड भी नहीं हुआ। कर्मचारी और शिक्षक नेताओं के लिए यह सबसे कठिन बात थी। अपनी मर्जी की खबरें छपवाने के आदी नेताओं को सबसे अधिक पीड़ा हुई। उन्‍होंने कई तरह से मुझे घेरने की कोशिश की, लेकिन मेरे हाथ तब तक बहुत मजबूत छड़ी आ चुकी थी। या तो खबर बताओ, वरना तुम्‍हारी फंसी हुई खबर छाप देते हैं। डेढ़ साल के दौरान मैंने जो चाहा वो छापा। जो नहीं जंचा उसे छापने से साफ इनकार कर दिया। इसका सबसे ज्‍वलंत उदाहरण रहा स्‍कूलों के एकीकरण का। राजस्‍थान सरकार ने निर्णय किया कि जिन स्‍कूलों में अधिक शिक्षक और कम छात्र हैं उन्‍हें करीबी स्‍कूलों में मर्ज कर दिया जाए। शहर में कई स्‍कूल ऐसे थे, जिनमें शिक्षक तो चौदह से बीस तक थे, लेकिन छात्रों की संख्‍या दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंची थी। इस निर्णय से शहरी क्षेत्र में सालों से जमे शिक्षकों पर तगड़ी ग़ाज गिरनी तय थी। सो उन्‍होंने आंदोलन शुरू कर दिया। शिक्षक नेताओं ने मुझसे संपर्क किया और आंदोलन के पक्ष में सॉलिड खबरें डालने के लिए कहा। मैंने साफ इनकार कर दिया। संसाधनों के समुचित उपयोग की एकमात्र सरकारी योजना को मैं धक्‍का कैसे पहुंचा सकता था। एक शिक्षक नेता ने अधिक जोर दिया तो मैंने कहा कि आप चौदह शिक्षक और छह छात्रों वाले स्‍कूल का औचित्‍य सही सिद्ध करके बात दो, मैं खबरें छाप दूंगा। खबरें नहीं आई तो आंदोलन ने भी एक सप्‍ताह के भीतर दम तोड़ दिया।
इन दिनों देख रहा हूं कि सरकारी आदेशों और सरकारी प्रेसनोट का पत्रकारों को बेसब्री से इंतजार रहता है। ऐसे में किस आधार पर पत्रकार डंडा उठाएंगे और किसे मारेंगे। यह स्थिति अखबारों को इस स्‍तर तक भी उतार सकती है कि वे क्षमा करने लायक भी न बचें...

शुक्रवार, 11 मई 2012

पिछले दिनों लेखन में...

पिछले लंबे अर्से से ब्‍लॉग से गायब हूं, लेकिन राहत की बात यह है कि लेखन से नदारद नहीं हूं। पिछले एक साल में ऑफलाइन लिखने का भी खूब मौका मिला और उसे मैंने भुनाने में कसर भी नहीं रखी। यहां कुछ लिंक छोड़ रहा हूं। इन पर मेरे कुछ लेख हैं। समय मिले तो आप भी पढि़एगा।

साहस के साथ कुछ युवा अपने देश के लिए ऐसे काम कर रहे हैं जो आमतौर पर हमें देखने को नहीं मिलते। अपनी जान पर खेलकर नाम कमा चुके कुछ लोगों के नाम गिनाए हैं मैने इस आलेख में...
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=30990

नवसंवत्‍सर शुरू हुआ तो इसके स्‍वागत में भी कलम चलाई थी...
http://www.patrika.com/article.aspx?id=32735

फलादेश और कारक ज्ञान - कुंडली में स्थित कारकों के बारे में यदि स्पष्ट जानकारी हो तो कोई भी शख्स खुद से जुड़ी जिज्ञासा का समाधान कर सकता है। हर सवाल का जवाब प्राप्त कर सकता है। आइए देखें भावों के अनुसार कारक कौन से होते हैं।
इस विषय पर पूरा लेख मिलेगा आपको राजस्‍थान पत्रिका की वेबसाइट पर...
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=28580

शिवोपासना से चंद्र मजबूत - मन की गति को कोई नहीं पकड़ सकता। यह मन ही है जो हमें सपने दिखाता है और उन्हें पूरे करने की ताकत भी देता है। मन में पैदा हो रहे विचार की शक्ति ही हमें पशुओं से अलग करती है। ये विचार ही हैं जो हमें सपनों के रूप में मिलते हैं और विचार ही हमें सपने पूरे करने की ताकत देते हैं। मन की इसी ताकत के कारण हम दूसरों से कुछ अलग होते हैं।
शिव की उपासना के संबंध में इस लेख के बाद मेरे पास कई फोन आए... कुछ खास तो नहीं है लेकिन पत्रिका वालों ने कहा कि आम आदमी के काम का है, इसलिए अच्‍छा रेस्‍पांस मिला...
लिंक - http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=27829

पेड़-पौधे दिलाएं ग्रहों से शांति - पेड़-पौधे न केवल हमें जीवन देते हैं, बल्कि बुरे ग्रहों के प्रभाव से भी हमें बचाते हैं। सामान्य उपचारों में देखें तो यदि शनि मारकेश है तो राजपथ पर वट वृक्ष लगाने से आयु बढ़ती है। गुरू निर्बल है या किसी अन्य ग्रह के कारण अल्पायु योग बनाता है तो गुरूवार के दिन पीपल का वृक्ष लगाना ठीक रहता है।
http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=33987 इस लिंक पर पूरा लेख मिलेगा...

चेहरा बताता है ग्रहों का प्रभाव  - किसी व्यक्ति की सूरत देखने पर उसके सीरत का अहसास तो हो ही जाता है लेकिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखें तो पता चलता है कि दिखने वाले चेहरे के इतर भी बहुत सी बातें होती हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर जाते हैं। इस आलेख को पढ़ने बाद आप हो सकता है आप जिक्र करने लगें कि उस आदमी की शक्ल तो राहू से मिलती है या बुध से। देखतें हैं कि क्या विशेषताएं होती किसी व्यक्ति के चेहरे की ग्रह विशेष के प्रभाव में- हालांकि इस लेख का बड़ा हिस्‍सा मैं अपने ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग में पहले से लिख चुका हूं, लेकिन संपादन के बाद इसमें नई रंगत आई है लिंक है ... http://www.patrika.com/print/emailarticle.aspx?id=31200

इसके अलावा वास्‍तु संदेश और ज्‍योतिष मंथन मैग्‍जीन में कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं। जैसा कि इस ब्‍लॉग में मैंने कहा कि ज्‍योतिष और पत्रकारिता के इतर सबकुछ लिखूंगा, सो एक बार फिर हाजिर हूं अपने उसी वादे के साथ। जल्‍द ही बीकानेर की राजनीतिक स्थिति पर एक नया आलेख लाने की सोच रहा हूं। पता नहीं कितने दिन में होगा, लेकिन अब नई ऊर्जा महसूस कर रहा हूं सो, हो सकता है जल्‍द ही आपको नया लेख मिले।

सादर

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

पगड़ी का रिश्ता


यह अतिथि पोस्ट है. पेशे से न्यूरोलोजिस्ट और मेरे मामा डॉ. अरविन्द व्यास ने मुझे ये किस्सा बताया. मैंने उनके शब्दों को हूबहू यहाँ उतारा है. बताइयेगा कैसे लगी ये अतिथि पोस्ट. 

यहाँ बात पिछली गर्मियों की है. मैं हॉस्पिटल से घर आया ही था कि एक ग्रामीण अपनी भतीजी को दिखाने ले आया. अस्पताल कि भागदौड़ से परेशान था और भूख भी लग रही थी तो मैंने उस ग्रामीण को घर के सामने वाले पेड़ के नीचे बैठने के लिए कह दिया. वह सामने जाकर बैठ तो गया लेकिन 5 मिनट मैं ही लौट आया. मैं अंदर था और पापा ने गेट खोला. उसने पापा से पूछा कि डॉक्टर साब को दिखाना है ? पापा ने उसे कह कि थोड़ी देर में आयेंगे. वह चला गया पर थोड़ी ही देर में फिर लौट आया. इस बार मैं नाराज हो गए. उसे जोरदार लताड़ पिलाई . वह चुपचाप चला गया. 
बाद में खाना खाकर चेम्बर में मैंने ग्रामीण और उसकी भतीजी को बुलाया. बातचीत में पता चला की भतीजी पंजाबी में बोल रही थी और ग्रामीण शुद्ध मारवाड़ी था. दोनों के कपड़ों से भी लग रहा था की दोनों अलग-अलग देश, भाषा और संस्कृति के लोग है. मुझे पंजाबी आती नहीं और मरीज को हिंदी बोलनी नहीं आ रही थी. मैंने ग्रामीण से कह की यह क्या बोल रही है तूं बता, पर ग्रामीण की भी वही स्तिथि थी जो मेरी थी, उसे भी पंजाबी समाज में नहीं आ रही थी. अब मुझे माजरा समाज में नहीं आया. में पूछा कि ये तेरी भतीजी कैसे हुई ? तब ग्रामीण ने बताया कि करीब 30 साल पहले उस युवती के दादा बीमार होकर इलाज के लिए बीकानेर के पीबीएम अस्पताल आये थे. अस्पताल में किसी ने सरदारजी की जेब काट ली. opretion के लिए तुरंत 20 हज़ार रुपयों की जरुरत थी. मेरे पिता और इसके दादा का इलाज एक ही वार्ड में चल रहा था. मेरे पिता ने मौके कि नजाकत को देखते हुए अपने मित्रों की मदद से कहीं से २० हज़ार रुपये दिलाये. इलाज सफल रहा. इसके दादा अनजान शहर में ऐसे आत्मीयता के भाव देख  अपनी पगड़ी मेरे पिता के सर पर रख दी. मेरे पिता ने भी अपनी पगड़ी इसके दादा के सर पर रखकर एक नए रिश्ते की नीव रख दी. आज मेरे पिता और इसके दादा गुजर चुके है, लेकिन पगड़ी का रिश्ता आज भी वैसा ही है. इन लोगों को मारवाड़ी नहीं आती और हमें पंजाबी. उसी पगड़ी के रिश्ते की डोर ने हमें तीसरी पीढ़ी तक बाँध रखा है. 
ग्रामीण की बात सुनकर पहले तो  मैं स्तब्ध रह गया. फिर उससे किये अपने व्यवहार पर पश्चाताप होने लगा. जिस व्यक्ति को मैं शिष्टाचार का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा था, उसने मुझे संबंधों को निभाने का पाठ पढ़ा दिया...

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

किशोर दा का संगीत सफर

आज फेसबुक पर किशोर दा के संगीत सफर पर एक शानदार लेख मिला। यह अंग्रेजी में है, लेकिन जिस शानदार तरीके से लिखा गया है उसे पढ़कर बहुत अच्‍छा लगा। मूल रूप से यह किसका है यह तो पता नहीं लेकिन जिसका भी है उससे साभार...

“Kishore Kumar”

(4 August 1929 – 13 October 1987)

kishoreKishore Kumar was born into a Bengali family at Khandwa in Madhya Pradesh, on 4 August 1929. He married four times. His first wife was Ruma Guha Thakurta aka Ruma Ghosh. Their marriage lasted from 1950 to 1958. Kishore Kumar's second wife was the actress Madhubala, who had worked with him on many films including his home production Chalti Ka Naam Gaadi (1958). When Kishore Kumar proposed to her, Madhubala was sick and was planning to go to London for treatment. At this time, she didn't know that she had a ventricular septal defect, and her father wanted her to wait and consult the London doctors first. Nevertheless, Madhubala married Kishore Kumar in 1960. Madhubala was a Muslim, and the two had a civil marriage.

His family was against the marriage, and the couple also had a Hindu marriage to please them, but Madhubala was not accepted by them. The doctors in London told Madhubala that she would not live for long. The marriage lasted for 9 years, and ended with Madhubala's death on 23 February 1969. Kishore Kumar's third marriage was to Yogeeta Bali, and lasted from 1976 to 4 August 1978. Kishore Kumar was married to Leena Chandavarkar from 1980 until his death. Kishore Kumar had two sons, Amit Kumar (playback singer) with Ruma, and Sumit Kumar with Leena Chandavarkar. Kishore Kumar is said to have been paranoid about not being paid. During recordings, he would begin singing only after his secretary confirmed that the producer had made the payment. When the director questioned him, he replied "Aadha paisa to aadha make-up." (Half make-up for half payment). On the sets of Bhai Bhai, Kishore Kumar refused to act because the director M V Raman owed him five thousand rupees. His brother Ashok Kumar persuaded him to do the scene. But, when the shooting started, he walked across the floor and, each time he walked a few places, he said, "Paanch Hazzar Rupaiya," (five thousand rupees) and did a somersault. After he reached the end of the floor, he went out of the studio, jumped into his car, and ordered his driver Abdul to drive away. On another occasion, when the producer R. C. Talwar did not pay his dues in spite of repeated reminders, Kishore Kumar turned up at Talwar's residence one morning and started shouting "Hey Talwar, de de mere aath hazaar" ("Hey Talwar, give me my eight thousand"). He did this every morning for a few days, until Talwar paid him. 

The film Anand (1971) was originally supposed to star Kishore Kumar and Mehmood in the lead roles. Hrishikesh Mukherjee, the director of the film, was asked to meet Kishore Kumar to discuss the project. However, when he went to Kishore Kumar's house, he was driven away by the gatekeeper due to a misunderstanding. Kishore Kumar (himself a Bengali) hadn't been paid for a stage show organized by another Bengali man, and had instructed his gatekeeper to drive away this "Bengali", if he ever visited the house. When Hrishikesh Mukherjee (also a Bengali) went to Kishore Kumar's house, the gatekeeper drove him away, mistaking him for the "Bengali" that Kishore Kumar had asked him to drive away. Consequently, Mehmood had to leave the film as well, and new actors (Rajesh Khanna and Amitabh Bachchan) were signed up for the film.

In spite of his "no money, no work" principle, sometimes Kishore Kumar recorded for free even when the producers were willing to pay. He recorded for free, for some films produced by Rajesh Khanna and Danny Denzongpa On one occasion, Kishore Kumar helped actor-turned-producer Bipin Gupta, by giving him Rs. 20,000 for the film Dal Mein Kala (1964). When the little-known actor Arun Kumar Mukherjee died, Kishore Kumar regularly sent money to his family in Bhagalpur. Mukherjee was one of the first persons to appreciate Kishore's singing talent.

Many journalists and writers have written about Kishore Kumar's seemingly eccentric behavior. Kishore Kumar had put a "Beware of Kishore" sign at the door of his Warden Road flat, where he stayed for some time while his bungalow was being done up. Once, the producer-director H. S. Rawail, who owed him some money, visited his flat to pay the dues. Kishore Kumar took the money, and when Rawail offered to shake hands with him, he reportedly put Rawail's hand in his mouth, bit it, and asked "Didn’t you see the sign?". Rawail laughed off the incident and left quickly. Once, when a reporter made a comment about how lonely he must be, Kishore Kumar took her to his garden. He then named some of the trees in his garden, and introduced them to the reporter as his closest friends.

According to another reported incident, once Kishore Kumar was to record a song for the producer-director G. P. Sippy. As Sippy approached his bungalow, he saw Kishore going out in his car. Sippy pleaded him to stop his car, but Kishore only increased the speed of his car. Sippy chased him to Madh Island, where Kishore Kumar finally stopped his car near the ruined Madh Fort. When Sippy questioned his strange behavior, Kishore Kumar refused to recognize or talk to him and threatened to call police. Sippy had to return. Next morning, Kishore Kumar reported for the recording. An angry Sippy questioned him about his behavior on the previous day. However, Kishore Kumar insisted that Sippy must have seen a dream, and claimed that he was in Khandwa on the previous day.
Once, a producer went to court to get a decree that Kishore Kumar must follow the director's orders. As a consequence, Kishore Kumar obeyed the director to the letter. He refused to alight from his car until the director ordered him to do so. Once, after a car scene in Mumbai, he drove on till Khandala because the director forgot to say "Cut". In the 1960s, a financier called Kalidas Batvabbal, patently disgusted with Kishore Kumar's alleged lack of cooperation during the shooting of Half Ticket, gave him away to the income tax authorities. Kishore had to face a raid at his house. Later, Kishore invited Batvabbal home, tricked him by asking him to enter a cupboard for a "chat" and locked him inside. He unlocked Batvabbal after two hours and told him "Don’t ever come to my house again."

After Ashok Kumar became a Bollywood star, the Ganguly family used to visit Mumbai regularly. Abhas Kumar changed his name to Kishore Kumar and started his cinema career as a chorus singer at Bombay Talkies, where his brother worked. His first film as an actor was Shikari (1946), in which Ashok Kumar played the lead role. Music director Khemchand Prakash gave him a chance to sing the song Marne ki duayen kyon mangu for the film Ziddi (1948). After this, Kishore Kumar got many other assignments, but he was not very serious about a film career. In 1949, he decided to settle in Mumbai.
Kishore Kumar played hero in the Bombay Talkies film Andolan (1951), directed by Phani Majumdar. Although Kishore Kumar got some assignments as an actor with help of his brother, he was more interested in becoming a singer. He was not interested in acting, but his elder brother Ashok Kumar wanted him to be an actor like himself.
He starred in Bimal Roy's Naukri (1954) and Hrishikesh Mukherjee's directorial debut Musafir (1957). Salil Chowdhury, the music director for Naukri was initially dismissive of him as a singer, when he came to know that Kishore Kumar didn't have any formal training in music. However, after hearing his voice, he gave him the song Chhota sa ghar hoga, which was supposed to be sung by Hemant Kumar.
Kishore Kumar starred in films New Delhi (1957), Aasha (1957), Chalti Ka Naam Gaadi (1958), Half Ticket (1962), and Padosan (1968). Chalti Ka Naam Gaadi, his home production, starred the three Ganguly brothers, and Madhubala. The film is about romance between a city girl (Madhubala) and a car mechanic (Kishore Kumar), with a subplot involving brothers.

Music director S. D. Burman is credited with spotting Kishore Kumar's talent as a singer, and advancing his singing career. During the making of Mashaal (1950), Burman visited Ashok Kumar's house, where he heard Kishore imitating K. L. Saigal. He complimented Kishore, but also told him that he should develop a style of his own, instead of copying Saigal. Kishore Kumar did not have a formal training in music.

S. D. Burman recorded with Kishore for Dev Anand's Munimji (1954), Taxi Driver (1954), House No. 44 (1955), Funtoosh (1956), Nau Do Gyarah (1957), Paying Guest (1957), Guide (1965), Jewel Thief (1967), Prem Pujari (1970), and Tere Mere Sapne (1971). He also composed music for Kishore Kumar's home production Chalti Ka Naam Gaadi (1958). Some of their initial films included the songs "Maana Janaab Ne Pukara Nahin" from Paying Guest, "Hum Hain Rahi Pyar Ke" from Nau Do Gyarah (1957), "Ai Meri Topi Palat Ke Aa" from Funtoosh, and "Ek Ladki Bheegi Bhaagi Si" and "Haal Kaisa Hai Janaab Ka" from Chalti Ka Naam Gaadi (1958). When S. D. Burman was not on good terms with Lata Mangeshkar during 1957-62, he gave patronage to her younger sister, Asha Bhosle. The Asha Bhosle-Kishore Kumar duets composed by S. D. Burman include "Chhod Do Aanchal" from Paying Guest (1957), "Ankhon Mein Kya Ji" from Nau Do Gyarah (1957), "Haal Kaisa Hai Janaab Ka" and "Paanch Rupaiya Baara Aana" from Chalti Ka Naam Gaadi (1958), "Chhedo Na Meri Zulfein" from Ganga Ki Lahren (1964), and "Arre Yaar Meri Tum Bhi Ho Gajab" from [Teen Devian|Teen Deviyan] (1965).

C. Ramchandra was another music director who recognized Kishore Kumar's talent as a singer. and their collaborations include Eena Meena Deeka from Aasha (1957). Kishore Kumar's work includes, Nakhrewaali from New Delhi (1956) by Shankar Jaikishan, and C.A.T. Cat Maane Billi and Hum To Mohabbat Karega from Dilli Ka Thug (1958) by Ravi.

Kishore Kumar produced, directed, and acted in the film Jhumroo (1961). He wrote the lyrics for the title song, Main Hoon Jhumroo, and composed music for all the songs in the film. Later, he produced and directed the film Door Gagan Ki Chhaon Mein (1964). He also wrote the script and composed music for the film. The film is based on the relationship between a father (Kishore Kumar), and his deaf and mute son (played by his real-life son, Amit Kumar). He made another two films called Door Ka Rahi (1971) and Door Waadiyon Mein Kahin (1980).

In the 1960s, as an actor, Kishore Kumar built up a notoriety for coming late for the shootings, or bunking them altogether. His films flopped frequently, and he also landed in income tax trouble. As a singer, his work in this period includes "Zaroorat Hai Zaroorat Hai" from Manmauji (1961), "Gaata Rahe Mera Dil" from Guide (1964), and "Yeh Dil Na Hota Bechara" from Jewel Thief (1967).
In the late 1960s, Rahul Dev Burman worked together on the soundtrack of the film Padosan (1968), in which Kishore Kumar sang the popular songs "Mere Saamne Wali Khidki Mein" and "Kehna Hai". Padosan was a comedy film starring Kishore Kumar as a dramatist-musician, Mehmood as a Carnatic music and dance teacher, and Sunil Dutt as a simpleton named Bhola. Kishore Kumar's character in the film was inspired by the personality of Kishore's own uncle, Dhananjay Bannerjee (a classical singer). The highlight of the film was a musical, comical duel between Kishore Kumar-Sunil Dutt and Mehmood, Ek Chatur Nar Karke Singaar.
Kishore Kumar produced and directed some movies in the late 1970s and early 1980s, such as Badhti Ka Naam Daadhi (1978), Zindagi (1981) and Door Wadiyon Mein Kahin (1980). But none of these films did well at the box office. His last appearance as an actor was in Door Wadiyon Mein Kahin.

शनिवार, 26 नवंबर 2011

वाल मार्ट को आने दो

ऐसा नहीं है कि मैं रिटेल दुकानदारों के विरोध में हुं या बड़ी कं‍पनियां मुझे उनका समर्थन करने के लिए पैसा दे रही हैं। ना ही मैं केन्‍द्र सरकार का मुलाजिम हूं। इस सबके बावजूद मैं चाहता हूं कि विदेशी कंपनियां देश में सीधा निवेश करें और यहां के लोगों को वह सब चीजें उपलब्‍ध कराएं जिसके वे हकदार हैं। यकीन जानिए कि वे कंपनियां यहां व्‍यापार कर यहां से बहुत कुछ नहीं ले जा पाएंगी। कुछ लोग इस प्रकिया को इस्‍ट इंडिया कंपनी का लौटना तो कुछ स्‍थानीय बाजार से टूटने से जोड़ रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे कुछ अलग है। हो सकता है वाल मार्ट आठ या दस साल में यहां फेल होकर लौट जाएं। कैसे ?

ऐसा नहीं है कि अमरीका का यह मल्‍टीस्‍टोर हमेशा सफल ही रहा है। खुद को आर्य बताने वाले जर्मनों और एशिया की खुद के दम पर खड़ा होने की कोशिश कर रही एक शक्ति दक्षिण कोरिया ने वाल मार्ट को फेल कर दिया। अब यही स्थिति वाल मार्ट की भारत में भी हो सकती है, लेकिन इससे पहले वाल मार्ट हमें वो दे जाएगा जिसे देने में बड़े दुकानदार हमेशा हिचकिचाते रहे हैं।

पहले इस स्‍टोर की खासियत

यह स्‍टोर धनिया से लेकर टाइटन घड़ी तक और बादाम से लेकर महंगे परिधानों तक हर चीज बेच लेता है, जो आपके दैनिक जीवन का जरूरी हिस्‍सा है। इसके स्‍टोर कई बार किलोमीटर में फैले होते हैं। आपको अपनी पसंद की हर चीज का चुनाव करने की आजादी मिलती है। डिस्‍काउंट मिलते हैं। ग्राहक यहां देवता है और दुकानदार उसका पुजारी। किसी भी उपभोक्‍तावादी व्‍यवस्‍था की यह चरम अवस्‍था कही जा सकती है। नए उत्‍पाद, नई जानकारियां और कीमतों में कटौती की जिम्‍मेदारी कंपनी की होती है और आम आदमी के पास विकल्‍पों का ढेर होता है। आज बाजार उपभोक्‍ता को अपने घटिया उत्‍पाद से रिझाता है और बेहतर माल 'कुछ लोगों' तक सीमित कर दिया गया है, वहीं यह स्‍टोर एक तरह का लोकतंत्र बनाता है जो यह कहता है कि जो पैसा देगा वो माल ले जाएगा।

जर्मनी में फेल होने के प्रमुख कारण

आपको जानकार सुखद आश्‍चर्य होगा कि हजारों करोड़ रुपए कमाने वाले मार्ट जर्मनी में गए तो वहां बहुत कुछ खोकर वापस बाहर आ गए। उन्‍हें वहां विफलता का कडुवा स्‍वाद मिला। कैसे मिला, Andreas Knorr and Andreas Arndt के एक लेख में इसे स्‍पष्‍ट किया गया है। उन्‍होंने लिखा कि

Clearly dominating the US retail market, Wal-Mart expanded into Germany (and Europe) in late 1997. Wal-Mart’s attempt to apply the company’s proven US success formula in an unmodified manner to the German market, however, turned out to be nothing short of a fiasco. Upon closer inspection, the circumstances of the company’s failure to establish itself in Germany give reason to believe that it pursued a fundamentally flawed internationalization strategy due to an incredible degree of ignorance of the specific features of the extremely competitive German retail market. Moreover, instead of attracting consumers with an innovative approach to retailing, as it has done in the USA, in Germany the company does not seem to be able to offer customers any compelling value proposition in comparison with its local competitors. Wal-Mart Germany’s future looks bleak indeed.

ऐसे में भारत की आबोहवा को समझना मैं समझता हूं कि वाल मार्ट के लिए जर्मनी से अधिक कठिन होगा। यहां गंदगी के बीच पसरी हुई सब्जियों में से लाल सुर्ख टमाटर को कच्‍ची भिंडियां तलाश लेने वाले भा‍रतियों को सजे संवरे स्‍टोरों तक खींचना टेढ़ा काम होगा। और मोल भाव के बिना कोई चीज ले लेना, इसे तो असंभव ही जानिए। इसके चलते वाल मार्ट कंज्‍यूमर सेटिस्‍फेक्‍शन इंडेक्‍स में सबसे नीचे आएगा। वह कहता है माल पड़ा है, लेना है तो लो वरना चलते बनो। हम यह कभी बर्दाश्‍त नहीं कर सकते।

कोरिया में फेल होने के कारण

कोरिया के लोगों की खासियत जानें तो पता चलेगा कि वहां के लोग वालमार्ट के प्रति कैसे प्रतिक्रिया कर सकते हैं- एक बानगी-

Korea : The men are proud, masculine, patriot, somewhat militant, but in a good way. There’s a mix of strong, expansive, traditional values, along with a large minority undercurrent of modernity. It’s really good – it’s the best of all possible worlds. There’s problems – the blatant racism and xenophobia kind of sucks, but I don’t mind it so much. Nowhere’s perfect.

वहीं वाल मार्ट के रैवेये के बारे में आप समझ सकते हैं कि कैसा रहा होगा। एक  लेखक Sebastian जैसा बताते हैं-

Walmart has really, really low prices. There’s a few reasons for this – the company is one of the best in the world at logistics, so they manage to have fast turnover of inventory without keeping too much onhand at any given store. I’d love to see how their logistics division runs sometime – I remember reading that they’ve got some of the most sophistication about predicting and automatically changing stock at stores based on factors like the weather changing that are hard to pin down.

ऐसे में भारतीय बाजार की विशिष्‍टता ही इसका सुरक्षा कवच है। हमें कदापि चिंतित नहीं होना चाहिए कि एक बाहरी दैत्‍य हमारे बाजार में प्रवेश कर रहा है।

हमें क्‍या फायदा है

तो सवाल पैदा होता है कि हमें क्‍यों विरोध नहीं करना चाहिए हमें क्‍या फायदा है- इसका स्‍पष्‍ट कारण है कि स्‍थानीय बाजार के बड़े खिलाडि़यों और स्‍थानीय खिलाडि़यों के साथ काम कर रहे बाहरी खिलाड़ी भी अब तक हमें उन सभी उत्‍पादों से महरूम रखे हुए हैं जो कंपनी की तुलना में उपभोक्‍ताओं के लिए फायदे का सौदा है। सो, वाल मार्ट से सबसे बड़ा नुकसान उन धन्‍ना सेठों को होगा, जो अधिक फायदे वाले सौदों में निवेश कर उपभोक्‍ताओं को उनकी जरूरतों से महरूम रख रहे हैं। गलाकाट प्रतिस्‍पर्द्धा सेठों का मुनाफा कम करेगी, न कि रिटेलरों को फायदा। गली गली घूमकर फेरियां लगा रहे दुकानदारों को नुकसान कम और फायदा अधिक होगा, क्‍योंकि बड़े स्‍टोर सेल में जो सामान निकालेंगे वे सामान बाद में ठेलों पर आएंगे और रिसाइक्लिंग में मास्‍टर भारतीय उपभोक्‍ता ठेले वालों का बेसब्री से इंतजार करेंगे। हो सकता है ली की जींस या एचटीसी का फोन भी हमें ठेले पर खरीदने को मिल जाए Smile 

 

स्‍वागत वाल मार्ट...

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

मेरा आदर किया तो... झापड़ दूंगा!!

अरे नहीं यह मैं नहीं कह रहा, पूजारी महाराज ने कहा। और इतना स्‍पष्‍ट कहा कि मैं दंग रह गया। पिछले कुछ समय से इन पुजारीजी के पास जा रहा हूं। पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन बहुत ज्ञानी हैं। उनके पास कई तरह के लोग आते हैं। कुछ लोगों में एक-दो दिन बात करने के बाद उनके प्रति श्रद्धा पैदा होने लगती है। फिर किसी को कोई समस्‍या होती है तो वह पुजारीजी से आकर बात करता है, पुजारी जी अपनी तरंग में कुछ बोल देते हैं और सुनने वाले को अपनी समस्‍या का समाधान नजर आने लगता है।

यहां तक सब ठीक है, लेकिन कुछ दिन बाद श्रद्धालु जैसे ही पुजारीजी से कहता है कि उसकी पुजारीजी के प्रति अगाध श्रद्धा है, पुजारीजी चिढ़ जाते हैं। बोलते हैं मेरा आदर सम्‍मान करने की कोई जरूरत नहीं है, ना ही मेरे प्रति कोई पूर्वाग्रह रखो।

मैंने एक को डांट पड़ते देखा। बाद में जब अकेले बैठे थे, तो पास जाकर बातचीत करने लगा, उसी दौरान पूछा कि आप आदर-सम्‍मान करने वालों से इतना चिढ़ते क्‍यों हैं। तो बोले आज तुम श्रद्धा का पात्र बना रहे हो, कल मुझे किसी डांस क्‍लब में खड़ा देखोगे तो चिल्‍लाओगे कि इतने बड़े पुजारीजी हैं, मैं इनकी इज्‍जत करता हूं और ये डांस क्‍लब में खड़े शराब पी रहे हैं। पहले काम होता है तो मेरे पास आते हैं, बाद में अपनी गरज से मेरे प्रति श्रद्धा पैदा करते हैं। इसमें मेरा कहीं दोष नहीं है। इसके बावजूद उनकी गरज और उनके स्‍वार्थ की श्रद्धा के प्रति मुझे जिम्‍मेदार बने रहना पड़े यह मुझे बर्दाश्‍त नहीं है। इसी कारण मैं किसी की श्रद्धा का पात्र बनने से कतराता हूं।

2002110300030401इन दिनों किरण बेदी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। पहले से स्‍थापित सिस्‍टम के साथ लड़ते हुए इसमें सुधार की कोशिश कर रही देश की श्रेष्‍ठ महिला को आज कुत्सित राजनीति की भेंट चढ़ाया जा रहा है। जब उन्‍होंने नौकरी में रहते हुए पहली बार सिस्‍टम के खिलाफ काम करने की कोशिश की होगी, तब किसी ने भी उनके भीतर कोई छद्म चेहरा नहीं देखा होगा। समय के साथ इस आईपीएस ऑफिसर ने सिस्‍टम बदलने तक इसकी कमियों का ही फायदा उठाकर बेहतर काम करने के प्रयास किए होंगे। ऐसे में कई चीजों को गलत भी ठहराया जा सकता है। लेकिन कुछ सवाल बाकी रह जाते हैं..

- जब किरण बेदी सिस्‍टम के भीतर रहकर उससे लड़ रही थी तब,  आज आरोप लगा रहे कितने लोग उनके साथ थे ?

- जब किरण बेदी ने सिस्‍टम की कमियों का फायदा उठाना शुरू किया तब किन लोगों ने उसकी तरफ अंगुली उठाई, अगर नहीं उठाई को आज इसकी क्‍या जरूरत आन पड़ी ?

- आज वे किस फायदे के लिए यह सबकुछ कर रही हैं ?

- क्‍या बेदी ने किसी एक भी व्‍यक्ति को अपने प्रति श्रद्धावनत होने के लिए दबाव बनाया?

- किरण बेदी इकोनॉमी क्‍लास में सफर करती हैं और बिजनेस क्‍लास का पैसा लेती हैं, तो क्‍या जरूरत है उन्‍हें बुलाने की। अगर जरूरत है तो उनकी शर्तों पर ही उन्‍हें बुलाना होगा।

- राजनीतिज्ञों के खिलाफ बोलने पर हमेशा से ही उन पर हमले होते रहे हैं, यह उनकी नीयति लगती है, लेकिन क्‍या इससे उनकी नीयत पर शक किया जा सकता है।

 

राजनीति गंदी होती है। हमारे यहां भी अपवाद नहीं है। यह गंदी थी, गंदी है और भविष्‍य में भी गंदी ही रहेगी। इस सिस्‍टम को साफ करने वाले लोगों को अपने हाथ गंदे करके ही इसे साफ करना होगा। मैं किरण बेदी की इज्‍जत करता हूं, लेकिन उनके प्रति श्रद्धा नहीं रखता, केवल इसलिए ताकि उन पर सौ प्रतिशत सही बने रहने का दबाव न बनें और वे सफाई के इस काम में सतत प्रयास जारी रखें...

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

माइक्रो कचौरी - मेडिकेटेड है भाई...

बीकानेर के लोगों को खाने, खिलाने और विशिष्‍ट खाद्य उत्‍पादों का ऐसा शौक है कि पूछिए मत। खाने के मामले में मैं खुद भी कोई अपवाद नहीं हूं। अगर आप बीकानेर से बाहर के हैं तो आपने भुजिया के दो या तीन टेस्‍ट लिए होंगे, लेकिन बीकानेर में क्षेत्र और हलवाई की खासियतों के हिसाब से सौ से अधिक तरह के भुजिया बनते हैं, और हां, खाने के शौकीन लोग थोड़े से भुजिया चखकर बता सकते हैं कि आप कौनसी दुकान से भुजिया लाए हैं... इस पर पूरी किताब हो सकती है, लेकिन अभी बात मेडिकेटेड कचौरी की...

सुनने में ऐसा लगता है कि कचौरी बनाने के बाद उसका स्‍टरलाइजेशन किया गया होगा, लेकिन वास्‍तव में ऐसा नहीं है। संभाग के सबसे बड़े अस्‍पताल प्रिंस बिजय सिंह मैमोरियल अस्‍पताल के पास एक बाबा है, कचौरी वाला। अपेक्षाकृत कम मसाले, नमक और तेल भी कम (? पता नहीं कैसे) वाली कचौरी बनाता है। इसकी ढेरों कचौरियां खाने से चिकित्‍सक भी परहेज नहीं करते। दो सौ से अधिक चिकित्‍सकों और करीब एक हजार स्‍टाफ वाले अस्‍पताल में लंच टाइम में चाय के साथ हर कहीं बाबे की कचौरी मिल जाएगी। इसकी कीमत महज एक रुपया है, कीमत कम होने का खामियाजा कचौरी को ही भुगतना पड़ता है, अपने साइज के साथ कांप्रोमाइज करके। आप खुद ही देख लीजिए...

kachori

मेरी अंगुली और अंगूठे के बीच में कचौरी ही है। वर्ष 1995 में मैंने पहली बार यह कचौरी खाई तो यह 50 पैसे में मिलती थी, इसके बाद कीमत बढ़ाई गई और लोगों ने सहर्ष बढ़ी हुई कीमत को स्‍वीकार किया, लेकिन अब पिछले दस साल से बाबा कचौरी का साइज छोटा और छोटा होता गया और अब इस वर्तमान स्‍वरूप में पहुंच गई है। मैंने बाबे से कहा कि अब भाव दोगुना कर दो, यानी दो रुपया, लेकिन बाबा ने मना कर दिया, बोले सामने वाले लूट खाएंगे ग्राहकों को... बात उलझ गई।

दरअसल इस माइक्रो इकोनॉमी में कुछ ऐसे तत्‍व घुस आए हैं तो क्‍वालिटी और साफ सफाई से समझौता कर बाबे की कचौरी जैसी ही दिखने वाली कचौरियां बनाने लगे हैं। घटिया तेल, घटिया मैदा, घटिया मसाले इस्‍तेमाल कर ये लोग बाबे की क्रेडिट को भुना रहे हैं। अब जब तक बाबा अपनी कचौरी की कीमत को कम रखेगा, ये लोग अधिक नुकसान नहीं कर पाएंगे, इसके चलते बाबा ने कचौरी की कीमत को कम ही बना रखा है। पिछले तीन सालों में महंगाई बढ़कर दोगुनी से अधिक हुई तो कचौरी का साइज भी आधे से कम हो गया है। पता नहीं यह सूक्ष्‍य इकोनॉमी कितनी सूक्ष्‍म हो पाएगी।

वैसे आजकल आता क्‍या है एक रुपए में, बीकानेर के लोग कह सकते हैं एक स्‍वादिष्‍ट कचौरी... Smile 

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

एसएमएस के जरिए करोड़ों कमाएं

अगर आप एसएमएस करते हैं तो कुछ खोते हैं,  लेकिन पाते हैं तो यह धन कमाने का अच्‍छा जरिया है। कुछ लोग कमा भी रहे हैं, कितना ?

अरे करोड़ों में.... Smile  आप खुद ही देख लीजिए...

Every body is in temptation of earning 1 lac &  3 lac do this sms business but surprisingly you are not selected because you are not in their selection list even you send correct & fastest SMS. you have no time to track this & keep on trying ,trying,thinking that........... thik hai  panch rupiya per episod kuch nahi hai........ jane do.yar Pl pass on this msg to your friends Regards

Stop Spoiling & Wasting your money and stop SMS-ing to KBC or the OTHER TV CONTESTs

We all know KBC is Good Business.
But have you ever pondered...
How Good....????

Any guesses? Let's see...

Airtel, Idea & All other subscribers are charging Rs.5/- per SMS sent for this contest.
India have States: 28, Union Territories: 7, Districts: 640,
Population =1,210,193,422 (Survey On March 1, 2011),

Average Districts population is 18, 00,000
82,69,30,000 (82 Crore) Mobile User &

Telephone Subscribers (Wireless and Landline): 861480000 (86 Crore) (Apr’2011)
[Land Lines: 34550000 (3 Crore) (Apr’2011), Mobile Cell phones: 82,69,30,000 (82 Crore) (Spr’2011)]

Assuming 1% person are making call to KBC

5Rs/SMS X 8269300 (82Lac, 0.82 Crore) = Rs. 4,10,00,000 (4.1Crores)

4.1Crore in 20 minutes.
(People trying for the 2 Lac cash prize)

Imagine what if 10% person entries try out than it will be 41 Crores

And it does not stop there...

In practice it could be another multiple of 100 or a multiple of 1000 on an average.

In that case it is 4.1 x 30episode = 123 crores earnings in just 20 minutes on every episode!!!
So Total per month income from this KBC season is 123 crores from episode and 1230 crores from (People trying for the 2 Lac cash prize.) = 1353 Crores per months

And the prize money: A mere 2 crores...
(And from whose pocket?)

Smart Business by Siddharth Basu!

And the best part of this calculation is just the SMS earning!!

What about the Ad money?

A rough annual profit calculation goes like this:
Rs. 1353 Crores per months X 12 = Rs. 16263 Crores annually

Let even 50% get dissolved in taxes and other payments of mobile company, still you will be left with

Rs. 8118-crores profit!!! (Only from SMS)

Simple Question:
"KAUN BANEGA CROREPATI”
And your options are---

A) SONY TV
B) AIRTEL, IDEA, AND OTHER MOBILE COMPANY
C) AMITABH BACHAN
D) SIDDHARTH BASU
Computerji iska jawab bataiye....

Ans: All FOUR..!!!!
PS: Now you know why AB gets all emotional when the episodes end...........

So friends please ...... stop Spoiling & Wasting your money and stop SMSing to KBC or the OTHER TV/FM Radio  CONTESTs........... for such

Please Care for Your Money in this inflation & price high

अब क्‍या कहें कुछ दिन पहले घर बैठे चार लाख रुपए पाने के चक्‍कर में एक एसएमएस किया था, तब से गिल्‍टी हो रही थी, आज यह मेल मिली तो सोचा चस्‍पां कर ही दें... क्‍यों दूसरों को मूर्ख बनने दें..

रविवार, 25 सितंबर 2011

दो बहुत शानदार ब्‍लॉग

2007 से ब्‍लॉगिंग में सक्रिय हूं। कई दिन तक अकेले लिखते लिखते आखिर लगा कि मैं अकेला ही क्‍यों पीडि़त रहूं, सो अपनी जमात बढ़ाने की कोशिश करने लगा। हालांकि अकेले लिखने के कुछ फायदे भी हैं, मसलन मेरे एक भाईसाहब गूगल में डिस्टिंगुइश इंजीनियर हैं। अमरीका से कुछ दिन के लिए बीकानेर आए, मैं मिलने के लिए पहुंचा तो बोले कि तुम्‍हारा ब्‍लॉग पढ़ता रहता हूं। आप यकीन नहीं कर सकते कि मेरी खुशी का क्‍या ठिकाना रहा होगा। मैंने पूछा आपको कैसे पता, दुनिया में लाखों ब्‍लॉग हैं फिर आपको मेरा ब्‍लॉग कैसे मिला, उन्‍होंने जवाब दिया कि बीकानेर में ब्‍लॉग लिखने वाले और उनमें भी हिन्‍दी लिखने वाले बहुत कम है (यह वर्ष 2008 की बात है)

हालांकि एकछत्र राज्‍य का आनन्‍द ही अलग है फिर भी यह कसक थी कि अकेला भुगत रहा हूं सो अपनी जमात बढ़ाने के प्रयास करता रहा। पिछले दिनों दो ऐसे लोगों को जमात में शामिल कर लिया है जो धुरंधर लिक्‍खाड़ हैं और अब तक नेट के इस माध्‍यम को पेचकस से अधिक उपयोगी नहीं मान रहे थे। मैंने इस टूल का नया आयाम उन्‍हें पकड़ाने का प्रयास किया है। एक ने बिना नाम तो दूसरे ने अपने नाम के साथ लिखने पर हामी भरी है और यकीन मानिए शानदार लिख रहे हैं।

 पहला ब्‍लॉग है नचिकेता का (इन्‍होंने इसी नाम से लिखने की ठानी है)। यम और नचिकेता संवाद पर आधारित यह ब्‍लॉग नचिकेता  के लेखक भारतीय राजनीति पर अच्‍छी पकड़ रखते हैं। इस ब्‍लॉग में वे लगातार भीषण व्‍यंग्‍य लिख रहे हैं। अब नाम किसी को पता नहीं है तो जमकर पिलाई कर रहे हैं नेताओं की और व्‍यवस्‍था की। आप भी देखिए।

 

जिनेश जैन (यह लिंक है)

दूसरा ब्‍लॉग है राजस्‍थान पत्रिका के संपादकीय प्रभारी जिनेश जैन का। उन्‍होंने अपने ही नाम से ब्‍लॉग बना लिया है और लिखना शुरू किया है। एक बार पत्रिका ऑफिस में रात दो बजे हमारी बाचतीत के दौरान यह निर्णय हुआ कि एक बाहरी व्‍यक्ति बीकानेर को कैसे देखता है और उसकी तुलना अगर देश के अन्‍य शहरों (जहां जिनेश जैन रह चुके हैं) की तुलना में यह कैसे लगता है, इस पर एक पूरा ब्‍लॉग हो और समय के साथ इसमें नए लेख जुड़ते जाएं। उन्‍होंने अब तक कुल जमा पांच पोस्‍ट लिखी है, लेकिन हर एक पोस्‍ट बीकानेर के बारे में विस्‍तार से जानकारी देती है और यह भी कि यह शहर चंडीगढ़, बीकानेर, कानपुर, भोपाल या देश के कई दूसरे शहरों की तुलना में कैसे अलग है।

रविवार, 11 सितंबर 2011

मैं अन्‍ना पर भरोसा करता हूं, लेकिन...

हालांकि जन लोकपाल बिल आने और उसके जमीनी तौर पर लागू होने में अभी बहुत समय बाकी है, लेकिन आम आदमी के चेहरे पर संतोष का भाव अभी से दिखाई देने लगा है। क्‍योंकि अन्‍ना उसके साथ है, अन्‍ना मेरे साथ है। जो व्‍यक्ति आज मुझसे जबरन भ्रष्‍टाचार के पैसे ले रहा है, कल वह मेरे समक्ष नतमस्‍तक खड़ा होगा और मैं फिर से मिमियाने के बजाय लोकतंत्र की पुख्‍ता जमीन पर सीना तानकर खड़ा होउंगा। मुझे अन्‍ना पर गर्व है... लेकिन....

कुछ सवाल पिछले कुछ दिन से मुझे परेशान करने लगे हैं। अखबारों, समाचार चैनलों और सूचना के अन्‍य माध्‍यमों के इतर नेट पर मैंने कुछ सवाल देखे, वह विचलित कर देने वाले लगते हैं, हालांकि अब भी मैं अन्‍ना और उनकी टीम को संदेह के घेरे में नहीं लेता, पर कहीं भविष्‍य में यह नूरा कुश्‍ती सिद्ध हुई तो सवा अरब भारतियों के साथ मैं भी गहरे अवसाद में चला जाउंगा। हो सकता है खुद ही भ्रष्‍टाचार के नए कीर्तीमान स्‍थापित करने लगूं। मेरा ईश्‍वर मुझे इसकी अनुमति नहीं देता, पर गीता में कृष्‍ण यह कहकर कि 'विवेक के अनुसार जो सही है वही सही है' मुझे भ्रष्‍टाचार का रास्‍ता अपनाने का विवेक दे देते हैं।

कुछ सवाल जिन पर अन्‍ना और उनकी टीम को जवाब देना ही चाहिए। हालांकि पूर्व में इस बारे में नेट पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन जिन सवालों ने मेरी श्रद्धा को विचलित किया उन पर तो मुझे चर्चा करनी ही होगी। ये सवाल हैं....

- रेलवे एक्‍सीडेंट से लेकर क्रिकेट मैच के स्‍कोर तक के बीच में विज्ञापन दिखाने वाली मीडिया ने बिना कमर्शियल विज्ञापनों के अन्‍ना के आंदोलन का निर्बाध प्रसारण किया... मीडिया कंपनियों ने इस घाटे को कैसे सहन किया?

- विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने वाले सांसद को दिल्‍ली बम विस्‍फोट के बाद अचनाक ब्रह्मज्ञान हुआ और उसने विस्‍फोट के अगले ही दिन अपना प्रस्‍ताव वापस ले लिया।

- खुद के संपत्ति नहीं होने और सारी संपत्ति अपने ही ट्रस्‍ट को दान करने वाले अरविन्‍द केजरीवाल इनकम टैक्‍स विभाग से छूट मांग रहे हैं, और साथ में झूठ भी बोल रहे हैं। बाद में वे अपनी बात से मुकर जाते हैं, और कहते हैं कि इस प्रकरण का आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन इसका सीधा संबंध उस व्‍यक्ति के चरित्र से है, जो आंदोलन के प्रणेताओं में से एक होने का मान रखता है।

- अन्‍ना को अनशन करने के लिए जेपी पार्क दिया गया था, वहां उन्‍हें अनशन नहीं करने दिया गया और तिहाड़ जेल भेज दिया गया (कानून का हवाला देकर)। बाद में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अन्‍ना तीन दिन बिना किसी नियम और कानून के तिहाड़ जेल के अतिथि बने रहे और बाहर लोग और मीडिया डटे रहे। संवेदनशील इलाके को खाली कराने के लिए न राज्‍य सरकार ने कुछ किया न केन्‍द्र ने।

- भ्रष्‍टाचार के मुद्दे का जातिवाद से कोई लेना देना नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन में ट्विस्‍ट लाने के लिए कुल जमा 35 मुसलमानों को आंदोलन स्‍थल पर लाया गया और नमाज पढ़वाई गई। क्‍या इसकी जरूरत थी। अगर थी भी तो उन्‍हें मंच के समक्ष नमाज पढ़वाने का नाटक क्‍यों किया गया।

- गुजराज के लोकायुक्‍त पद पर नियुक्‍त किए गए सेवानिवृत्त जज के नैतिक आचरण पर सालों पहले से कई सवाल उठते रहे हैं। यह व्‍यक्ति कांग्रेस के मीडिया प्रकोष्‍ठ में एक बाबू की हैसियत से दस साल से अधिक समय तक काम करता रहा, फिर राजनैतिक हैसियत का लाभ उठाकर उच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश बना और अब उसे लोकायुक्‍त बनाया गया है। केवल पैसे खाना ही भ्रष्‍टाचार नहीं है, आचरण भी इसमें शामिल है। अप्रेल में आंदोलन के बाद मई माह में अन्‍ना हजारे इस लोकायुक्‍त के घर पर ठहरे थे। इस तथ्‍य ने मुझे अधिक चिंता में डाला...

- अरविन्‍द केजरीवाल ने अपने ही विभाग से मिले नोटिस को राष्‍ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया, इसके लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की और लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया।

- अरुणा राय और दूसरे साथी जिन्‍होंने सूचना का अधिकार कानून को पास कराने के लिए पहले दौर में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, इस बार उन्‍हें उपेक्षित रखा गया। क्‍या वे राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व के लायक नहीं हैं।

- केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के रेलवे स्‍टेशन पर सोते हुओं के चित्र नेट पर जारी किए गए। क्‍या इस तरह के मीडिया कैंपेन की जरूरत थी।

- राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि अन्‍ना और उनकी टीम की ओर से किए जा रहे इस आंदोलन की वे कड़े शब्‍दों में निंदा करते हैं, क्‍या टीम अन्‍ना के पास उनके लिए कोई जवाब नहीं था।

- बुखारी ने कहा कि मुस्लिम आंदोलन के साथ नहीं है, टीम अन्‍ना जो सरकार के हर कैल्‍कुलेटेड वार का जवाब देती रही, बुखारी के लिए एक भी शब्‍द नहीं मिला।

- आखिरी सवाल, भ्रष्‍टाचार के मुद्दे के साथ जुड़ी दो चीजों को सफाई से दरकिनार कर दिया गया है, एक भारत माता का चित्र और दूसरा बाबा रामदेव। बाबा की कई कमियां रही होंगी, लेकिन क्‍या उन्‍हें आंदोलन से अलग किया जा सकता है। एक साल तक बाबा पूरे देश में घूमकर काले धन की रट लगाता रहा, सोनिया गांधी को स्विट्जरलैण्‍ड जाकर धन का प्रबंधन करना पड़ा, लेकिन टीम अन्‍ना कुछ नहीं बोली। हो सकता है कि इससे विषयान्‍तर हो जाता, लेकिन क्‍या भर्त्‍सना भी नहीं की जा सकती।

- अन्‍ना ने कांग्रेस के ही तीन हथियार काम में लिए हैं। तिरंगा, गांधी टोपी और खुद गांधी। हर बार सरकार नहीं बदले जाने की बात कही है।

ये सभी तथ्‍य मिलकर एक बड़े नाटक के खेले जाने, वर्तमान सरकार के मुखिया को अयोग्‍य घोषित करने, कालेधन के मुद्दे को नेपथ्‍य में ले जाने, दूसरी पार्टियों (कांग्रेस के अलावा) को नुकसान पहुंचाने, राहुल गांधी का 2014 के चुनावों के लिए प्रोजेक्‍शन करने का आधार बनाते नजर आते हैं।

अब अगर अन्‍ना के आंदोलन के अगले चरण में राहुल गांधी निर्णायक भूमिका में बाहर आते हैं तो यह बात सिद्ध होगी, अगर कांग्रेस की सत्‍ता अल्‍पसंख्‍यक कार्ड और मनरेगा के साथ जातिगत वोटों को लेकर वापस भी आ जाती है तो देश खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा। दुख की बात यह है कि लुंज पुंज विपक्ष भी विकल्‍प पेश नहीं कर पा रहा है।

हे भगवान...