शनिवार, 29 अगस्त 2009

दार्शनिकता कब शुरू होती है

Adi    SwamiMain      ka     11024X768

दो साल तक ऑ‍फीशियली दर्शन का विद्यार्थी रहा। ऑफीशियली का मतलब पोस्‍ट ग्रेजुएट का विद्यार्थी रहा। उन दो सालों में ओशो, कृष्‍णामूर्ति, अरविन्‍द और विवेकानन्‍द के जीवन दर्शन से इतर शुद्ध लॉजिकल दर्शन से रूबरू हुआ। मेरे लिए जुदा अनुभव था। 'मैं हूं इसलिए ईश्‍वर है' और 'घोस्‍ट इन द मशीन' के पश्चिमी विचारों से लेकर 'एको ब्रह्म जगत मिथ्‍या' तक के विचारों को पढ़ गया था। हालांकि शंकराचार्य उत्‍तरार्द्ध में आते थे लेकिन मैं उन्‍हें भी पूर्वाद्ध में पढ़ गया। कोई काम तो था नहीं, नया नया शौक था सो पढ़ता गया। दिसम्‍बर की सर्दियों में जोधपुर विश्‍वविद्यालय से एक प्रोफेसर आए जोशी जी (अभी उनका पूरा नाम याद नहीं आ रहा, वे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर भी हैं।) का अतिथि व्‍याख्‍यान हुआ। पहले दिन उन्‍होंने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में 'दर्शन क्‍या है' पर भाषण दिया। न तो भाषण समझ में आया न उसका औचित्य। एक सवाल उन्‍होंने शुरू से आखिर तक खड़ा किया था कि दर्शन कब शुरू होता है। और मेरे दिमाग में एक ही बात आई कि जब आदमी खा पीकर लेटी हुई मुद्रा में होता है तब यह दर्शन शुरू होता है।

भाषण के आखिर में उन्‍होंने पूछ ही लिया कि बताइए दर्शन कब शुरू होता है। उनका मतलब सत्‍य की खोज लॉजिकल तरीके से पराकाष्‍ठा तक पहुंचने के संदर्भ था। उन्‍होंने डेढ़ घण्‍टे के अपने भाषण में यही स्‍थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन मैं अड़ गया। मेरे पास अपने ठोस कारण थे। हमारी बीकानेर की डूंगर कॉलेज में पूर्वाद्ध और उत्‍तरार्द्ध के अस्‍सी छात्रों में एक भी ऐसा बंदा नहीं था जो स्‍थापित परिवार से न हो। यानि सब खाते-पीते घरों के। पोस्‍ट ग्रेजुएट करके भी वे अपने परिवारों पर अहसान कर रहे थे, कि बेरोजगार नहीं है पढ़ रहे हैं। मेरे खा-पीने के बाद लेटने वाले लॉजिक में दम था। हमारी कॉलेज के संस्‍कृत के एक विद्वान अध्‍यापक को मेरी बात जंची नहीं। वे सोच रहे थे कि मैं दर्शन की मजाक बना रहा हूं लेकिन जोशी सर समझ गए। उन्‍होंने कहा आज के संदर्भ में तुम्‍हारी बात ठीक है लेकिन पश्चिम में अरस्‍तू और भारत में शंकराचार्य ने भूखे रहकर दर्शन को स्‍थापित किया। इस पर मेरा कहना था कि वे शुद्ध विचार थे जिन्‍हें अब दर्शन में शामिल किया गया है। जोशी सर का पक्ष भी उतना ही दमदार था, लेकिन मेरा लॉजिक भी कॉलेज में दर्शन को चुनौती दे रहा था। इस बीच संस्‍कृत वाले सर बौखला गए। वे वार्ता को सिरे पर पहुंचाने के बजाय मुझे ही डांटने लगे। उनके कारण बात सिरे पर नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में भाषण और संवाद खत्‍म होने के बाद बाहर बरामदे में मैंने कोशिश की कि जोशी सर से एक बार फिर बात की जाए लेकिन दूसरे अध्‍यापकों ने मुझे मौका नहीं दिया। अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त लैक्‍चरर से हर कोई मिलने को उत्‍सुक था। मेरी बात वहीं  रह गई।

अंत में मैंने अपने स्‍तर पर ही निष्‍कर्ष निकाला कि अब जो दर्शन है वे इलाईट क्‍लास के हाथ में है ओर कुछ नया विचार आने के बजाय बस पुराने विचारों की जुगाली हो रही है। बाद में और भी पढ़ा पर कहीं भी शुद्ध दार्शनिकता नहीं मिली। उन दो सालों के बाद जब भी ओशो को पढ़ा तो लगा कि वे लॉजिक से स्‍थापित पुरानी बातों को चुनौती दे रहें, उसमें नया कुछ नहीं बस विरोध है। हर स्‍तर पर विरोध, चार्वाक को खराब बताया गया है तो चार्वाक का समर्थन कर देते हैं और नीति को सही बताया गया है तो उसके औचित्‍य पर सवाल खड़ा कर देते हैं। विवेकानन्‍द और अरविन्‍द पुरानी बातों को नए अंदाज में दोहरा रहे हैं। बस कृष्‍णामूर्ति का संवाद नया है लेकिन सिरे चढ़ता नहीं लगता। खुले सूत्र इतने अधिक हैं कि वह स्‍थाई नहीं दिखाई देता।

उत्‍तरार्द्ध में जब डेजरर्टेशन देने का मौका आया तब भी मैंने पुराने विचारों को ही लिया। बस अंतर इतना था कि दो दर्शनों को जोड़ दिया था। वास्‍तव में यह कहना भी गलत होगा कि जोड़ दिया। वे खुद जुड़े हुए हैं। राबिया,  अमीर खुसरो, खय्याम, इकबाल जैसे विचारक वास्‍तव में शंकराचार्य के दर्शन की ही पैरोकारी करते हैं। अपने अंदाज में। सो मैंने विषय रखा 'इस्‍लाम में धर्म की दार्शनिक पृष्‍ठभूमि।' इसमें मैंने इस्‍लाम को कुरान से इतर सूफी रहस्‍यवाद से जोड़कर पेश किया था। जब मैंने इसे सभा में पढ़ा तो विद्यार्थियों के अलावा हमारी एचओडी का चेहरा भी ब्‍लैंक था। डेजरर्टेशन खत्‍म होने के बाद तो उन्‍होंने ईमानदारी से कह दिया कि सिद्धार्थ ये कहां से उठा लाए हो। खैर मुझे तो समझ नहीं आया, जो भी है इसे सबमिट कर दो। :)

चाइनीज कॉल सेंटर में

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Caller: Hello, can I speak to Annie Wan?

Operator: Yes, you can speak to me..

Caller: No, I want to speak to Annie Wan!

Operator: Yes I understand you want to speak to anyone. You can speak to
me.. Who is this?

Caller: I'm Sam Wan .. And I need to talk to Annie Wan! It's urgent.

Operator: I know you are someone and you want to talk to anyone ! But
what's this urgent matter
about?

Caller: Well... just tell my sister Annie Wan that our brother Noe Wan
was involved in an accident.
Noe Wan got injured and now Noe Wan is being sent to the hospital.
Right now, Avery Wan is on his way to the hospital.

Operator: Look, if no one was injured and no one was sent to the
hospital, then the accident isn't an urgent matter! You may find this hilarious but I don't have time for
this!

Caller: You are so rude! Who are you?

Operator: I'm Saw Ree ..

Caller: Yes! You should be sorry . Now give me your name!!

Operator: That's what I said. I'm Saw Ree ..

Caller: Oh .....God.... .

From
Good Wan!

यह चुटकुला आज मेल से प्राप्‍त हुआ।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

बाबे के पीरत्‍व में कमी

Baba Ramdev2
भादवे ही दशमी को बाबा रामदेव का मेला भरेगा। एकम् को बीकानेर से हजारों पैदल यात्रियों ने 200 किलोमीटर से अधिक लम्‍बी यात्रा शुरू की। कई लोग तो बीकानेर से भी दूर से आए थे, जैसे हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर से। यानि यात्रा में कुछ सौ किलोमीटर और जुड़ गए। जैसलमेर के रूणीचा स्थित धाम जाने वालों में कुछ साल पहले तक हिन्‍दुओं को मुसलमानों की संख्‍या बराबर थी। यह ऐसा मेला है जहां जांत-पांत ऊंच-नीच खत्‍म हो जाते हैं। पूरा रास्‍ता श्रद्धालुओं से अटा होता है और मार्ग पर एक ही घोष होता है, जय बाबे री। यही पदयात्रियों को इतनी लम्‍बी यात्रा करने का जोश दिलाता है। इस बार हिन्‍दुओं की तुलना में मुसलमान बहुत कम दिखाई दिए। सही कहूं तो दिखाई ही नहीं दिए। मुझे पता नहीं क्‍या कारण रहा होगा, लेकिन दिखाई नहीं दिए सो बता रहा हूं। सालों से सुनता आ रहा हूं कि बाबा रामदेव जहां हिन्‍दुओं के लिए देवता है  वहीं मुसलमानों के लिए पीर है। 
क्‍या बाबा रामदेव के पीरत्‍व में कमी हो गई है।
क्‍या बाबा कि केवल हिन्‍दुओं की मन्‍नत पूरी कर रहे हैं।
क्‍या मुसलमानों को इन सालों में उन्‍होंने कोई पर्चा नहीं दिया।
क्‍या लोकदेवता के आगे भी नेताओं की बनाई छद्म दीवार आड़े आ रही है।
क्‍या मुस्लिमों की सभी मन्‍नतें पूरी हो चुकी हैं।
अभी रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। मुसलमान रोजा रखकर अपने तन और मन की शुद्धि में लगे हैं। दिनभर हर तरह की बुराई से दूर रहकर कठोर व्रत करते हैं और दिन ढलने पर रोजा खोलते हैं। इन सालों में रोजा रखने वाले बच्‍चों की संख्‍या में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे मैं कह सकता हूं कि धार्मिक आस्‍थाएं कम तो नहीं हुई। अल्‍लाह पर मुसलमानों को अब भी गहरा भरोसा है। पर दोनों समुदायों को एक जैसा मानने वाले और हर आने वाले श्रद्धालु को श्रद्धा के अनुरूप पर्चा देने वाले बाबा रामदेव के प्रति रुचि कम होने का कारण सोचने के लिए मजबूर कर देता है।
वैसे मेरा यह ऑब्‍जर्वेशन बीकानेर तक ही सीमित है। हो सकता है दूसरे शहरों, दिशाओं, रास्‍तों और माध्‍यमों से मुस्लिम समुदाय के लोग रूणीचा पहुंचे होंगे। बीकानेर के मार्ग से जा रहे पैदल यात्रियों में इनकी संख्‍या कम देखकर कुछ उथल-पुथल हुई सो व्‍यक्‍त कर दी।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर बैठकर...

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यहां बीकानेर में पाकिस्‍तान की अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर बैठकर एक भारतीय दिल्‍ली और शिमला में हो रही उठापटक के क्‍या मायने देख सकता है। मुझे सोचता हूं कि सिंधु नदी के इस पास सुदूर दक्षिण में हिन्‍द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और उत्‍तर में हिमालय के बीच गोथळी की तरह तीन दिशाओं से सुरक्षित है। इस भूभाग को हमेशा पश्चिमी कोने से आए विदेशियों का इंतजार रहा है। भले ही वे हमें अच्‍छे लगें हों या नहीं लेकिन उनका आना और हमें प्रभावित करने का सिलसिला अब भी जारी है और आगे भी जारी रहना चाहिए। वरना हम नए विचारों के अभाव में सड़ने लगेंगे।

पश्चिम और पश्चिमी लोगों के प्रति भारतीयों का रैवेया हमेशा स्‍वागत वाला रहा है। इतिहास बताता है कि कई बार पश्चिमी आक्रांताओं ने भारत को लूटा लेकिन भारत ने कभी इस राह में चीन जैसी दीवार बनाने की नहीं सोची। क्‍योंकि नए विचार और क्रांतियां भी इधर से ही आ रही थी। सतत क्रांति के दौर से गुजर रहे भारत को लगातार ताजी बयार की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि जड़ मानसिकता वाले लोग इस बयार और ताजे विचारों का विरोध करने लगते हैं। मुझे लगता है यही द्वंद्व है।

जिन्‍ना को लेकर हिन्‍दू उग्रवादी संगठन का अपने ही नेता के प्रति रेवैया यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्‍या वास्‍तव में सीमा हमें इस कदर काटकर रख देती है कि हम उस पार की अच्‍छाई या बुराई या तटस्‍थ विचार  भी बयान नहीं कर सकते। वह भी ऐसे संगठन में जो राष्‍ट्रीय होने का दंभ भरता है। शायद सीमा पर रहने वाले बहुत से लोग जमीन और इंसानों से घृणा नहीं भी करते हैं। घृणा के लायक बस गंदी राजनीति ही हो सकती है जो सीमाओं को बांधे रखती है। वरना तो मीलों तक पसरे रेगिस्‍तान में कभी भी जामों की अदला-बदली भी हो सकती है। भले ही जमीन पर बाड़ खींच दी गई हो, लेकिन आंखें देखती हैं कि हम भी नहाते-धोते हैं, हंसी मजाक करते हैं और वे भी। हमारे पास भी पशु और धान हैं और उनके पास भी। वे भी उतने ही जिंदा और ईश्‍वर के करीब हैं जितने हम। विदेश मंत्री रहने के दौरान और विदेशी जमीन पर स्‍थापित कंपनियों में भारतीयों और पाकिस्‍तानी नागरिकों को एक थाली में खाते देख जसवंत सिंह ने भी पार्टी और संघ की लघु सोच पर विचार किया होगा। यह इसलिए हुआ होगा क्‍योंकि नागपुर में उनका ब्रेनवाश नहीं किया जा सका था। अपनी अधिकांश उम्र छद्म राष्‍ट्रवाद और हिन्‍दुवाद में झोंक देने के बाद जब इस व्‍यक्ति ने अपने विचार व्‍यक्‍त किए तो मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए इक्‍का-दुक्‍का मुस्लिम लीडर शामिल कर चुकी भाजपा ने उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया।

विभाजन से पहले और बाद में बहुत सा हिन्‍दुतान बचा रह जाता है। हालांकि अब उसका कुछ भाग पाकिस्‍तान के पास है लेकिन यादों का क्‍या करें?

विभाजन की त्रासदी को जिन लोगों ने झेला हैं उनमें से कुछ को मैं भी जानता हूं। सीमा से बिल्‍कुल सटे बीकानेर में ऐसे बहुत से परिवार हैं जो सिंध में अपना चलता कारोबार छोड़कर यहां आ बसे। जो कुछ साथ लाए थे वह भी जल्द ही खत्‍म हो गया। उन लोगों ने शून्‍य से शुरूआत की और अब तक अच्‍छी स्थिति में आ चुके हैं। विभाजन का दर्द कम भले ही न हुआ हो लेकिन कुछ धुंधला पड़ने लगा है। वह अब रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित नहीं करता। वे लोग सिंध से आए तो सिंधी भाषा और संस्‍कृति भी अपने साथ लेते आए। कुछ झूलेलाल को मानने वाले हैं तो कुछ वल्‍लभाचार्य के वैष्‍णव हैं। पिछले दिनों सिंधी समाज के बिल्‍कुल करीब जाने का अवसर मिला। तो पता चला कि पुष्‍करणा भी सिंधी ही हैं। यानि मैं भी सिंध से ही आया हुआ हूं। मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ। लेकिन सिंधी समाज के लोग जिनसे मैं बात कर रहा था, यह बात इतनी सहज होकर कह रहे थे कि बात मेरी समझ में नहीं आई। तो एक पढ़े लिखे सज्‍जन ने बताया कि अरे सांई, हम तो पचास-साठ साल पहले ही आए हैं, तुम तीन-चार सौ साल पहले आ गए थे। मैं इंटरव्यू कर रहा था और कई लोग बैठे थे सो सोचने का समय नहीं था। मैंने बात वहीं खत्‍म कर दी। घर आया तो यही बात दिमाग में घूम रही थी। पुष्‍करणा ब्राह्मणों में भी लालवाणी, सत्‍याणी और देवाणी की तरह कीकाणी, लालाणी और केशवाणी जैसी जातियां होती हैं। तो मेरे लिए यह स्‍वीकार करना अधिक आसान हो गया कि मैं भी इन सिंधियों की तरह इस भारत भूमि पर सिंध प्रांत से आया बंदा हूं। बस अंतर इतना है कि मैं तीन-चार सौ साल पहले आ गया था। यानि भारत ने इतने वर्ष पहले ही मुझे स्‍वीकार कर लिया था। विभाजन तो बहुत बाद की घटना है। विभाजन के बाद पाकिस्‍तान बना और अब तो सिंध प्रांत से आने वाली हवा को भी घृणित समझा जाने लगा है। अगर वह हमारा, कम से कम पुष्‍करणा समाज का उद्गम स्‍थल है तो मैं तो उस स्‍थान से घृणा नहीं कर सकता। दूसरे लोगों के लिए भी केवल यही कारण नहीं हो सकता घृणा करने का, कि वह उनका उद्गम स्‍थल नहीं है। इसी आधार पर मैं भी पंजाब, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश से घृणा नहीं कर सकता। एक हिन्‍दु ब्राह्मण होने के बावजूद सिंध से अपना कुछ जुड़ाव महसूस करता हूं और सोचता हूं, क्‍या उधर भी कुछ सोचने विचारने और देश व संप्रदाय की सीमाओं को ताक पर रखने वाले लोग होंगे।

इसका जवाब मिला अपने मामा से। वे एक दशक से अधिक लम्‍बे समय तक‍ डिफेंस रिसर्च एण्‍ड डवलपमेंटल ऑर्गनाइजेशन की दिल्‍ली लैब में रहे। पिछले दिनों निदेशक के पद से सेवानिवृत्‍त होकर बीकानेर लौट आए हैं। डीआरडीओ में काम करने से पहले वे बीस साल तक अमरीका में थे। बाद में कलाम के बुलावे पर भारत लौटे। बातचीत में एक बार उन्‍होंने बताया कि उनके दो दोस्‍त थे और एक प्रतिद्वंदी। दोस्‍तों में एक अमरीकी था और एक पाकिस्‍तानी। प्रतिद्वंदी कश्‍मीरी था। वह अपने काम में इतना अधिक दक्ष था कि हमेशा कड़ी चुनौती दिए रखता था। काम को पूरा करने में अमरीकी और पाकिस्‍तानी दोस्‍त हमेशा उनकी मदद करते थे। मेरे लिए उन दिनों यह सोचना भी टेढ़ा काम था कि एक पाकिस्‍तानी उनका खास दोस्‍त है। मैं कौतुहल से पूछता तो वे हंसते। कहते वहां सब एक हो जाते हैं। देशों की सीमाएं संस्‍थानों में लुप्‍त हो जाती हैं। तभी अमरीका इतनी तरक्‍की कर पा रहा है। क्‍या भारत भी ऐसा कर सकता है। या ऐसा ही चलता रहेगा कि उन्‍मुक्‍त विचारों का गला घोंटने के लिए कुछ संगठन प्रतिगामी क्रियाओं में ही व्‍यस्‍त रहेंगे।

कभी सोचता हूं भारतीय मतदाता भी इसमें बराबर के दोषी हैं...

बुधवार, 19 अगस्त 2009

दो मामा की भूखी भानजी

champu bai 

अनाथ चंपूबाई के दो मामा हैं। छोटे हैं जो हल्‍दी की गांठ लेकर पंसारी की दुकान चलाते हैं और बड़े ट्रेडिंग से जुड़े हैं। वे पुराने सामान से लेकर घर के बर्तनों तक की ट्रेडिंग करते हैं। जब चंपूबार्इ के बड़े मामा की शादी पक्‍की हुई तो ससुराल वालों ने पूछा था कि मामा क्‍या करते हैं। तो नानी ने अश्‍वत्‍थामा हतोहत: की तर्ज पर झूठ बोल दिया कि बड़ा बर्तन बेचता है। उनके ससुराल वालों को बाद में बहुत गुस्‍सा आया जब पता चला कि बड़ा तो घर के ही बर्तन बेचता है और पैसा बैंक में जमा कर देता है। शादी में मिले बर्तन भी बड़े ने बेच दिए और पैसा बैंक में जमा करा दिया। नाना ने पूछा कि क्‍या करोगे बेटा पैसा जमा करके। तो बेटा बोला किसी दिन लौटा लाएंगे बड़ी योजनाओं के लिए। तो नाना ने समझाया बड़ी योजनाएं तो मेरा खून चूसने के लिए ही बनाई जाती है फिर तेरा पैसा कहां काम आएगा। लेकिन बड़ा अड़ा रहा। बर्तन बिक गए। घर में खाना पकना बंद हुआ तो घर के बच्‍चों ने सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिल रहे मिड-डे मील को खाना शुरू कर दिया। बड़ा मामा खुश था। क्‍योंकि नाना के ही पैसों से अभियान चल रहा था। बड़ी योजना थी।

अब हाल छोटे का। नाना ने सोचा कि छोटे की भी शादी कर देते हैं। बहु कान खींचेगी तो बड़े से धन निकलवा लेगा। शादी हो गई। शादी होते ही छोटा प्रसन्‍नचित्त रहने लगा। न दिन का ख्‍याल न रात का जीभरकर मजे लूट रहा था। नाना को गुस्‍सा आ गया। एक दिन बिस्‍तर से बाहर खींचा और फेंक दिया बड़े के कमरे के आगे। और कोई चारा न देखकर छोटा बड़े के कमरे में डरते-डरते दाखिल हुआ और पता नहीं क्‍या सांठ-गांठ हुई कि बड़े ने कई बड़ी योजनाएं छोटे को पकड़ा दी। छोटा खुशी-खुशी योजनाएं लेकर अपने कमरे में दाखिल हो गया। नाना देखते रह गए। अब दोनों मामाओं की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढाही में। बाकी बच गए तीन जन। नाना, नानी और अनाथ चंपूबाई। न बड़े ने खाने का पूछा न छोटे ने। दोनों अपनी-अपनी बीवीयों और बच्‍चों के साथ होटल गए और खाना खा आए। चंपूबाई अब भी देख रही थी। धान की गैळ में दोनों मामाओं को घर में बैठी चंपूबाई दिखी ही नहीं। दोनों अपने-अपने कमरों में जाकर सो गए। रात को बड़ी मामी ने मामा से पूछा चंपू ने क्‍या खाया तो बड़े ने कहा छोटा लाया होगा चंपू के लिए। उधर छोटी मामी ने मामा से पूछा तो छोटे मामा ने कहा बड़ा कुछ लाया होगा चंपू के लिए। दो मामाओं की भानजी चंपू को कुछ नहीं मिला।

भूखी चंपूबाई रातभर भूख से तड़पती रही। कुछ दिन यही क्रम चलता रहा। चंपूबाई की भूख बढ़ी तो बाहर निकली और गंगू के घर पहुंच गई। वहां जमकर खाया और घर के राज बताए। गंगू को यही तो चाहिए था। वह घर में घुसा और तोड़-फोड़ मचाकर निकल गया। मामा सोते रह गए। सुबह मामाओं की आंख खुली तो पता चला कि घर में तोड़ फोड़ हुई है। अब दोनों एक दूसरे पर दोष मंढने लगे। चंपूबाई रातभर की जागी हुई थी और भोर में खाना मिला था सो लम्‍बी तान के सो गई। नाना भूखे बैठे किनारे की ओर बैठे देख रहे थे और हंस रहे थे। शाम ढलने तक मामा लड़ते रहे, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

जब तक राज्‍य और केन्‍द्र के मामाओं के बीच हमारी राष्‍ट्रीय सुरक्षा यो ही भूखों मरेगी तब तक घर में आतंकी हमले होते रहेंगे। घर को योजनाओं के नाम पर मामा खा रहे हैं और चंपूबाई भूख से बेहाल होकर गंगू के हाथों दो रोटी की एवज में बिक रही है। अब तक मेरी समझ में यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि करप्‍शन ऊपर से नीचे आता है या नीचे से ऊपर जाता है।